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शुक्रवार, 2 अगस्त 2024

विकल्पहीनता के विरोध का विमर्श

- प्रेम प्रकाश

विकल्पहीन नहीं है दुनिया - किशन पटनायक

नीदरलैंड्स इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंस की सोशल न्यूरोलॉजिस्ट एमिली कैस्पर ने एक दिलचस्प शोध किया है। कैस्पर जानना चाहती थीं कि सत्ता के विरोध का निर्णय लोग निर्भीकता से करते हैं या ऐसा करते हुए वे किसी भय से दबे होते हैं। शोध के नतीजे से यह बात जाहिर हुई है कि अनजाने ही सत्ता के साथ सहमति की मनोवैज्ञानिक स्वाभाविकता हाल के दौर में बढ़ी है। अपने शोध अध्ययन की व्याख्या करते हुए कैस्पर कहती हैं कि बगैर उचित प्रशिक्षण और जागरुकता के लोग सत्ता के खिलाफ अपनी असहमति को खुले विरोध के मोर्चे तक ले जाने से भागते हैं। कैस्पर के अध्ययन और उसके नतीजे को अगर भारत के मौजूदा हालात से जोड़कर देखें तो विमर्श का एक नया आधार विकसित हो सकता है।

इस आधार को विकसित करने की पहल में पहला संदर्भ अगर मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव के 325 के मुकाबले 126 वोटों के भारी अंतर से गिरने का लें तो इस परिणाम का प्रोजेक्शन सीधे 2019 के लोकसभा चुनाव पर करने के बजाय, इस पूरी स्थिति को इतिहास की रोशनी में धैर्य के साथ देखना होगा। भारतीय संसद के इतिहास में पहला अविश्वास प्रस्ताव पंडित जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में अगस्त 1963 में जेबी कृपलानी ने रखा था। तब इस प्रस्ताव के पक्ष में केवल 62 वोट पड़े थे और विरोध में 347 वोट पड़े थे। पर इस प्रस्ताव का महत्व महज इसलिए कम नहीं हो जाता कि वह गिर गया, बल्कि इसकी अहमियत इसलिए है क्योंकि इससे देश में कहीं न कहीं विपक्षी राजनीति की वह सैद्धांतिकी तय हुई, जिसे गैर-कांग्रेसवाद के रूप में हम जानते हैं। विपक्षी राजनीति की यह सैद्धांतिक धुरी आज भी कायम है। बस उसका नाम बदलकर गैर-भाजपावाद हो गया है। देश में राजनीतिक विरोध का यह सैद्धांतिक तकाजा विपक्ष और जनता दोनों के सामने है। लिहाजा इस तकाजे पर कौन अपनी भूमिका कैसे तय करता है, यह ज्यादा बड़ा सवाल है।

लोकतंत्र में विकल्पहीनता की बात एक खतरनाक स्थिति है। इसलिए आज जब नरेंद्र मोदी की विकल्पहीनता पर बहस के कई सिरे एक साथ खुले हैं तो उसमें हमें लोकतंत्र के कुछ बुनियादी सरोकारों की भी फिक्र करनी चाहिए। कैस्पर ने भी अपने अध्ययन में इस खतरे का जिक्र किया है। अंग्रेजी में इस खतरनाक स्थिति के लिए ‘टीना’ नाम से एक टर्म काफी लोकप्रिय है और इन दिनों काफी इस्तेमाल भी हो रहा है। ‘टीना’ यानी ‘देअर इज नो अल्टरनेटिव’। यहां यह साफ हो जाना चाहिए कि सत्ता और उसे हासिल करने का गणित ही लोकतंत्र में सब कुछ नहीं है। आज भी इस मुल्क की तारीख में अगर महात्मा गांधी से लेकर राममनोहर लोहिया, जेबी कृपलानी और जयप्रकाश नारायण जैसे राजनेताओं के नामों के आगे उनके लोकतांत्रिक संघर्ष और राजनीतिक विवेक के कई-कई उल्लेख दर्ज हैं तो इसलिए क्योंकि उनके लिए लोकतंत्र में शक्ति का केंद्र सत्ता नहीं बल्कि लोकशक्ति है। 

कैस्पर ने अपने अध्ययन का संदर्भ बड़ा रखा है। लिहाजा उसके आधार पर अगर भारतीय राजनीतिक स्थिति का हम मूल्यांकन कर रहे हैं तो हमें तात्कालिकता से आगे एक बड़े परिप्रेक्ष्य में विमर्श को ले जाना होगा। पहली बात तो यही कि यह शोध अध्ययन कहीं न कहीं इस बात को रेखांकित करता है कि दुनिया भर में सत्ता का ढांचा हाल के दशकों में मजबूत हुआ है। लिहाजा उसके खिलाफ विरोध की जमीन तैयार करना और उस जमीन पर टिक कर खड़ा होना एक बड़ी चुनौती बन गई है। अमेरिका से लेकर भारत तक जिस तरह सत्ता और राजनीति का सूर्य एक साथ दक्षिणायन हुआ है, उसने सत्ता पर अधिकार के लोकतांत्रिक संघर्ष को सीधे-सीधे राजनीतिक वर्चस्व में बदल दिया है। इस बदलाव ने लोकतंत्र के बुनियादी सत्य को भी पीछे धकेला और आगे आ गया है ‘पोस्ट ट्रूथ'। 

‘पोस्ट ट्रूथ’ यानी सत्य से ज्यादा प्रभावी प्रचार और शोरगुल। प्रचार का यह शोर बीते चार वर्षों में हर तरफ सुना जा सकता है। कैस्पर जिसे सत्ता की मजबूती के तौर पर देख रही हैं, वह सत्ता से ज्यादा उस सोच की मजबूती है कि जिसमें सरकारें विरोध और हस्तक्षेप के हर लोकतांत्रिक स्पेस को खत्म कर अपने शक्तिशाली होने के भान को पुष्ट करती हैं। किसी नेतृत्व को लेकर विकल्पहीनता का भान अगर सुनियोजित और प्रचारित है तो फिर इस पोस्ट ट्रूथ फिनोमेना को लोकतंत्र के बुनियादी सरोकारों को मिल रही चुनौती के रूप में देखना होगा। 

आखिर में एक बात यह कि 2019 का लोकसभा चुनाव निश्चित तौर पर अहम है, पर यह वर्ष देश के लिए अपने राष्ट्रपिता की 150वीं जयंती मनाने का भी होगा। संघर्ष और सद्भाव के बीच सत्य और अहिंसा जैसे उच्च मूल्यों को जीनेवाले देश में नेतृत्व और विकल्प की बात अगर महज व्यक्तिवादी चौंध में खो जाए तो यह विचार और मूल्य के स्तर पर बहुत बड़ी स्फीति होगी। 

(लेख 2019 के लोकसभा चुनाव के संदर्भ में लिखा गया था। अब 2024 के चुनाव नतीजे भी सामने हैं। पर लोकतंत्र में विकल्प को लेकर चिंताएं अब भी उसी तरह कायम हैं।)

मंगलवार, 3 अप्रैल 2018

दलित मुद्दे पर भाजपा का इनकाउंटर

- प्रेम प्रकाश





एस-एसटी एक्ट को लेकर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर पैदा हुआ असंतोष अब पूरी तरह से राजनीतिक रंग ले चुका है। विरोधी दलों को लगता है कि भाजपा की सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति को दलित अस्मिता के संघर्ष को सड़कों पर तेज करके काउंटर किया जा सकता है

जिन राजनीति और समाज विज्ञानियों को यह लगता था कि मंडलवादी राजनीति का एक्सटेंशन मुश्किल है, उनके लिए दो अप्रैल 2018 का राष्ट्रव्यापी घटनाक्रम नींद से जगाने वाला है। एससी-एसटी एक्ट के संबंध में बीते 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में दलित और आदिवासी संगठनों की तरफ से आयोजित भारत बंद का व्यापक असर हुआ। बंद के दौरान हिंसा भी हुई। खासतौर पर राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, गुजरात, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर में हिंसा और आगजनी की कई घटनाएं हुई। दिलचस्प है कि एक्ट पर फैसला सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया है। केंद्र सरकार ने तो इसके खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल की है। फिर भी बंद और विरोध के निशाने पर केंद्र सरकार रही। उसी के खिलाफ नारे लगे और उसी की नीतियों और मंशा को लेकर सवाल उठे, सड़कों पर असंतोष दिखा।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम-1989 के दुरुपयोग को रोकने को लेकर गाइडलाइन जारी की थी। यह सुनवाई महाराष्ट्र के एक मामले में हुई थी। ये गाइडलाइंस फौरन लागू हो गई थी। इसके तहत अब शिकायत के बावजूद सरकारी कर्मचारियों की गिरफ्तारी सिर्फ सक्षम अथॉरिटी की इजाजत से होगी और अगर आरोपी सरकारी कर्मचारी नहीं है, तो उनकी गिरफ्तारी एसएसपी की इजाजत से होगी। यही नहीं, इस मामले में अग्रिम जमानत पर मजिस्ट्रेट विचार करेंगे और अपने विवेक से जमानत मंजूर या नामंजूर करेंगे। इस अदालती फैसले का आधार कहीं न कहीं यह है कि एनसीआरबी 2016 की रिपोर्ट बताती है कि देशभर में जातिसूचक गाली-गलौच के 11,060 शिकायतें दर्ज हुईं। जांच में 935 झूठी पाई गईं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दलित संगठनों को लगता है कि कहीं न कहीं सरकार उसे मिले न्यायिक सुविधा या अधिकार के कटौती के पक्ष में है। जबकि जिस मामले में सर्वोच्च अदालत ने नया फैसला सुनाया है, उसमें सरकार कहीं से भी पार्टी नहीं है। बावजूद इसके सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एससी/एसटी एक्ट के फैसले पर फिर से विचार करने के लिए एक याचिका दायर की। पर कोर्ट ने सोमवार यानी भारत बंद के एलान के दिन इस पर फौरन सुनवाई से मना कर दिया।
दरअसल, यह पूर मामला अब कहीं न कहीं राजनीतिक रंग ले चुका है। विरोधी दलों को लगता है कि भाजपा की सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति को दलित अस्मिता के संघर्ष को सड़कों पर तेज करके काउंटर किया जा सकता है। इस सियासी वार-प्रतिवार के पीछे एक बड़ी वजह 2019 का लोकसभा चुनाव है। यही वजह है कि महज 13 दिन के भीतर इस मामले पर तकरीबन सारा विपक्ष एक सुर में बोलता दिखा।
गैरतलब है कि देश में एससी-एसटी की आबादी 20 करोड़ और लोकसभा में इस वर्ग से 131 सांसद आते हैं। जाहिर है कि इस वर्ग के साथ हर दल के हित जुड़े हैं। यहां तक कि भाजपा के भी सबसे ज्यादा 67 सांसद इसी वर्ग से हैं। साफ है कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से बड़ा गणित कहीं न कहीं दलित और पिछड़ों की राजनीति का है। भाजपा का कसूर सिर्फ इतना है उनके और संघ परिवार के कुछ नेताओं ने जिस तरह आरक्षण और जाति के मुद्दे पर जिस तरह के बयान दिए हैं, उससे विपक्ष को दलितों-पिछड़ों को यह कहने-समझाने में मदद मिली है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार आरक्षण सहित इस वर्ग के कई संवैधानिक सम्मत अधिकारों पर कैंची चलाने की मंशा रखती है। अलबत्ता इस धारणा का खंडन खुद प्रधानमंत्री तक ने कई बार किया। पर खासतौर पर जिस तरह से भाजपा के त्रिपुरा में सत्तारूढ़ होने के बाद बिहार, प. बंगाल, यूपी, राजस्थान, कर्नाटक से लेकर केरल तक देश का राजनीतिक-सामाजिक घटनाक्रम बदला है, उसने भाजपा विरोध का एक नया मंच खड़ा कर दिया है। यह मंच दलित राजनीति का है, मंडलवादी राजनीति के आक्रामक और हिंसक एक्सटेंशन का है।   

शनिवार, 17 मार्च 2018

राहुल की लाइन से अलग बोल रहे हैं खडगे



- प्रेम प्रकाश

कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में राहुल जहां भाजपा को भय और तोड़ने वाली पार्टी बता रहे हैं तो वहीं खडगे कांग्रेस को संघ-भाजपा से सीखने के लिए कह रहे हैं
   
यूपी की दो सीटों पर उपचुनाव में भाजपा की हार से देश में राजनीतिक पारा भले चढ़ा दिखता हो, पर इस गरमाहट से भारतीय राजनीति का चरित्र का बहुत बदलने जा रहा है, एेसा कम से कम फिलहाल तो नहीं दिख रहा। यूपी में अगला उपचुनाव कैराना सीट पर होगा। खबर है कि उपचुनावों से भागने वाली इस बार बसपा वहां भाजपा से भिड़ने के मूड है। फूलपुर और गोरखपुर के नतीजे अगर कैराना में भी दोहरा दिए जाते हैं तो भी यह सवाल अपनी जगह कायम रहेगा कि भाजपा के खिलाफ विपक्ष की गोलबंदी का बड़ा आधार क्या होगा और इसकी अगुवाई क्या कांग्रेस करने में सफल होगी।
दिल्ली में अभी 2019 के चुनावी समर की तैयारी के लिए कांग्रेस का तीन दिवसीय सम्मेलन चल रहा है। राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद यह कांग्रेस का पहला राष्ट्रीय अधिवेशन है। हाल में जो भी चुनाव-उपचुनाव हुए हैं, उसमें कांग्रेस को शिकस्त ही खानी पड़ी है। आगे अगर कर्नाटक भी उसके हाथ से निकला तो बड़े सूबे के तौर पर उसके पास बस पंजाब रह जाएगा। इसलिए यूपी-बिहार की सोशल इंजीनियरिंग से बसपा-सपा औ राजद भले अपनी प्रांतीय पकड़ सुधार लें, इससे आगे वे विपक्ष के किसी राष्ट्रीय गठजोड़ की उम्मीद नहीं जगाते हैं। रही कांग्रेस की बात तो वह इस उम्मीद में भले है कि 2019 के पहले उसकी छतरी के नीचे सारा विपक्ष आ जाएगा। पर इसके लिए उसकी जो तैयारी और समझ है, वह एक फिर निराशा पैदा करती है।
पार्टी के अधिवेशन में लोकसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने पार्टी कार्यकर्ताओं से अपील की है कि भाजपा और संघ कार्यकर्ताओं की तरह वे भी कर्नाटक में घर-घर जाएं। जबकि इससे पहले कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि वे नफरत और डर फैलाने वाली नहीं बल्कि प्रेम और भरोसा जगाने वाली पार्टी हैं। उन्होंने कांग्रेस और भाजपा की राजनीतिक संस्कृति में बुनियादी अंतर बताया। सवाल यह है कि एक ही पार्टी के भीतर नेताओं के बीच जब यह साफ नहीं है कि वे चुनावी मैदान में उतरने से पहले किन बातों पर जोर देंगे और चुनावों में जीत के लिए उनकी बुनियादी रणनीति क्या होगी, वह पार्टी अगर देश के आगे राजनीतिक बदलाव और सत्ता परिवर्तन की उम्मीद जगाती है, तो यह भी साफ दिख रहा है कि इस उम्मीद के खिलाफ विरोधाभास खुद उनके अपने भीतर है।   
एक तरफ तो अधिवेशन के उद्घाटन भाषण में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी यह कह गए कि आज देश में गुस्सा फैलाया जा रहा है, देश को बांटा जा रहा है। हिंदुस्तान के एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से लड़वाया जा रहा है। हमारा काम जोड़ने का है। कांग्रेस का हाथ निशान ही देश को जोड़ कर रख सकता है। दूसरी तरफ उनकी ही पार्टी के दूसरे नेता यह कह रहे हैं कि चुनावी जीत के लिए उन्हें भाजपा-संघ का मॉड्यूल अपनाना चाहिए। साफ है कि कांग्रेस अगर अपने इतिहास के सबसे बुरे दिन में है तो यहां से उबरने का रास्ता उसे अभी तक नहीं सूझ रहा है।
जुमलों और भाषणों के भरोसे न तो राजनीति बदलाव संभव है और न ही सत्ता के शिखर तक पहुंचा जा सकता है। आज की तारीख में यह बात अगर देश में किसी राजनीतिक दल को सबसे ज्यादा समझने की जरूरत है तो वह देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस है।


सोमवार, 12 मार्च 2018

अलग झंडा क्यों चाहिए कर्नाटक सरकार को!


- प्रेम प्रकाश

नब्बे के दशक से जोर पकड़ी अस्मितावादी राजनीति 2014 तक आते-आते हांफने लगी। बिहार विधानसभा चुनाव में इसका नया प्रभावी संस्करण देखने को जरूर मिला, पर आज नीतीश और लालू जिस तरह राजनीति के दो छोर पर खड़े हैं, उसने इस संस्करण की आगामी संभावना को पूरी तरह ढहा दिया। कहने को उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा की नई दोस्ती भी अस्मितावादी राजनीति के इसी संस्करण की नकल है, पर इसका एक तो रकबा अभी बहुत कम है, दूसरे दोनों दल की तरफ से अभी इस बारे में बहुत कुछ साफ होना बाकी है। इन सारे घटनाक्रमों के बीच क्षेत्रीय अस्मिता की जमीन को बीते एक वर्ष से जिस तरह कर्नाटक में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी सींचने में लगी है, वह एक खतरनाक संकेत है।

तमिलनाडु के साथ कावेरी जल विवाद के बाद कर्नाटक ने अपना अलग झंडा तैयार कर लिया है। कर्नाटक में इसी वर्ष अप्रैल-मई में चुनाव होने हैं। वहां कांग्रेस का जो रुख है, उसमें क्षेत्रीय अस्मिता और राष्ट्रवाद का चुनावी संघर्ष पहली बार जमीन पर आमने-सामने होगा। ताज्जुब है कि राष्ट्रवादी राजनीति के सामने क्षेत्रीय स्वाभिमान और अस्मिता की जो सियासी जमीन पूर्वोत्तर राज्यों, प. बंगाल, तमिलनाडु और केरल में भी नहीं तैयार हो सकी, उसका उदाहरण कर्नाटक बनने जा रहा है। देश के इन तमाम सूबों में क्षेत्रीय राजनीति का एक अपना गणित जरूर रहा है, पर इस गणित से राष्ट्रवादी घोड़े पर सवार भाजपा का विजय रथ रोकने के लिए कोई सियासी प्रयोग अगर कहीं सीधे तौर पर आजमाई जा रही है, तो आज की तारीख में देश का वह अकेला राज्य कर्नाटक है।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने दांव खेला है, उसने निस्संदेह भाजपा की उलझनें बढ़ा दी हैं। सिद्धारमैया ने कर्नाटक के लिए एक झंडे का डिजाइन कैबिनेट से पास कराया है, जिसको अब वह केंद्र सरकार को भेजने जा रहे हैं ताकि इसको संवैधानिक मंजूरी मिल सके। कन्नड़ संगठनों के साथ अपने कैंप दफ्तर में बैठक के दौरान सिद्धारमैया ने इस झंडे को दिखाया, जो तीन रंगों का है। झंडे में ऊपर पीली पट्टी, बीच में सफेद और नीचे लाल पट्टी है। बीच में सफेद पट्टी पर राज्य का प्रतीक चिन्ह गंद्दु भेरुण्डा (दो बाज) बना है। अपने दांव को किसी संवैधानिक चुनौती से बचाने और अलगाववादी हिमाकत से अलग दिखाने की कोशिश में सिद्धारमैया कह रहे हैं वे इस झंडे को राष्ट्रीय ध्वज से नीचे ही फहराएंगे।

पर जिस तरह सिद्धारमैया इस पूरे प्रकरण को बता रहे हैं, उसमें उनकी मंशा को पढ़ना आसान है। वे जब कहते हैं कि उनका यह झंडा कन्नड़ अभिमान के लिए है और तकराबन सभी कन्नड़ संगठनों का समर्थन उन्हें इसके लिए हासिल है, तो साफ दिख जाता है कि वे एक बड़ा सियासी दांव खेल रहे हैं। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले झंडे को लेकर सामने आने की टाइमिंग भी इसी बात की तरफ इशारा कर रही है। 

दिलचस्प है कि कर्नाटक कई तरह की राजनीति की प्रयोगशाला पहले से रहा है। सरकारी भ्रष्टाचार के भी बड़े-बड़े मामले वहां उठे हैं। पर राज्य के लिए अलग झंडे की मांग उठाकर वहां की कांग्रेस सरकार ने जो हिमाकत की है, उसका खामियाजा कांग्रेस की सियासी नैतिकता को तो अपनी तरह से उठाना ही पड़ेगा। देश में इन दिनों प. बंगाल और जम्मू-कश्मीर से लेकर उत्तर-पूर्व के कुछ राज्यों और केरल में जिस तरह की अशांति है, उसका प्रतिफलन अगर अलग-अलग या साझे तौर पर देश के आगे एक नए क्षेत्रीयतावादी या प्रांतवादी संकट के तौर पर सामने आए तो यह देश की अखंडता के लिए वाकई बहुत बड़ी चुनौती होगी। यह चुनौती कैसी बड़ी हो सकती है, वह आंध्र सरकार के विशेष राज्य का दर्जा मांगने से शुरू हुई सियासी लपट के देखते-देखते बिहार तक पहुंचने के घटनाक्रम के तौर पर भी समझा जा सकता है। मूर्तिभंजक पागलपन के दौर में क्षेत्रीय अस्मिता के नाम पर भड़काने वाली मानसिकता के प्रकटीकरण से राष्ट्रीय सद्भाव के बुरी तरह चोटिल होने का खतरा है।

भारत में राष्ट्रवादी दरकारों और उसके उसूलों को लेकर बहस आजादी मिलने से पहले ही शुरू हो गई थी। एक समय जब देश के पहले गृहमंत्री सरदार पटेल रियासतों के विलय के लिए कठिन चुनौतियों का समाना कर रहे थे तो एक तरह से यह राष्ट्रीय सम्मति भी बनी थी कि देश की भौगोलिक, राजनीतिक एकता के लिए तमाम ऐसे विवादों को एक किनारे रखना होगा, जिससे देश की संघवादी रचना कमजोर हो सकती है। पर दुर्भाग्य से अस्सी-नब्बे के दशक के बाद से देश में राजनीतिक स्फीति इतनी ज्यादा हुई कि सत्ता की सीढ़ी बनाने के लिए सियासी जमातें और उनके नेता आज किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार हैं। बीते सालों में विधानसभाओं में बजाप्ता प्रस्ताव लाए और पास किए गए हैं कि उन आतंकियों को क्षमादान मिले, जिसे देश की न्यायिक व्यवस्था आजीवन कारावास या फांसी की सजा सुना चुकी है। याकूब मेनन, अफजल गुरु से लेकर देविंदर पाल सिंह भुल्लर के लिए सियासी आंसू रोने वालों को कभी यह फिक्र नहीं रही कि उनकी इस हिमाकत का देर-सबेर देश को कितनी बड़ी कीमत चुकानी होगी।   

यहां एक बात जो और समझनी है, वह यह कि बीते चार सालों में देश की राजनीति का सूर्य पूरी तरह से दक्षिणायन हो चुका है। देश की राजनीति में यह बड़ा शिफ्ट है। जिस कांग्रेस के खिलाफ कभी डॉ. राम मनोहर लोहिया सरीखे नेताओं को विपक्षी मोर्चा तैयार करने और फिर उसे चुनावी समर में शिकस्त से बचाने में पसीने छूट जाते थे, उस कांग्रेस का जनाधार आज इतना कमजोर हो चुका है कि नेहरू-गांधी परिवार का नेतृत्व भी चाहकर कुछ नहीं कर पा रहा है। ज्यादा बुरी स्थिति यह है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी अपने खिलाफ बने इस माहौल को समझने-परखने के बजाय उन तिकड़मों पर भरोसा कर रही है, जो उन्हें जड़मूल से और कमजोर कर देगी।

बहरहाल, अगर बात करें कर्नाटक की तो वहां अलग झंडे की मांग को लेकर जो कुछ भी हुआ, वह गंभीर मामला होने के साथ हास्यास्पद भी है। एक तो भारत जिस देश का संघीय राष्ट्र है, उसमें संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत विशेष दर्जा सिर्फ जम्मू-कश्मीर को ही प्राप्त है। इसलिए सिर्फ जम्मू कश्मीर के पास ही अपना अलग झंडा है। अलग झंडे की मांग एक तरह से अलग राष्ट्रीयता की मांग की तरह है, जिसे कम से कम देश की मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था के तहत मंजूरी नहीं मिल सकती। ऐसी कुछ मांगें आरक्षण जैसे मसलों पर भी आई हैं, जिसमें चुनावी फायदे के लिए राजनीतिक दलों ने जनता के बीच जाकर यह वादा कर दिया कि वह संवैधानिक और घोषित न्यायिक व्यवस्था और सीमा से बाहर जाकर भी कुछ समुदायों को आरक्षण देंगे। अलबत्ता इस चुनावी दांव में यह समझ भी शामिल रहती है कि ऐसा कुछ चाहकर भी इसलिए भी नहीं किया जा सकता क्योंकि विधानसभा या राज्य सरकार की मंजूरी के बावजूद इसे न्यायिक चुनौती दी जाएगी, जहां उसे मान्यता मिलने का सवाल ही नहीं है।

एक जो आखिरी बात इस पूरे मसले पर गौर करने की है, वह यह कि कर्नाटक में झंडे की मांग कोई आज नई नहीं उठी है, बल्कि इससे पहले जब वहां भाजपा की सरकार थी तो कांग्रेस की तरफ से यह मांग उठी थी और इसके लिए विधानसभा में प्रस्ताव लाया गया था। मामला न्यायालय भी पहुंचा और तब सदानंद गौड़ा की अगुवाई वाली भाजपा सरकार ने कर्नाटक उच्च न्यायालय को बताया कि उसने दो रंग वाले कन्नड़ झंडे को राज्य का आधिकारिक झंडा घोषित करने के सुझाव को स्वीकार नहीं किया है, क्योंकि अलग झंडा ‘देश की एकता एवं अखंडता के खिलाफ’  होगा। साफ है कि नए सिरे से इस मांग को उठाकर कांग्रेस देश में सांप्रदायिक से आगे प्रांतवादी या अलगाववादी ध्रुवीकरण का खतरनाक दांव खेलना चाहती है।

मंगलवार, 4 मार्च 2014

मंडलवादी राजनीति का एक्सटेंशन मुश्किल


मंडल कमीशन के मुद्दे पर तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह का पूरे देश में विरोध हो रहा था। इस मुश्किल हालात से निकलना उनके लिए बड़ी चुनौती थी। उन्हें लग रहा था कि कहीं वे देश और समाज में इस कदर अलोकप्रिय न हो जाएं कि उनका नाम इतिहास में सामाजिक तनाव और विद्बेष बढ़ाने वाले एक नेता के तौैर पर दर्ज हो। अगर ऐसा होता तो यह वीपी के पूरे राजनीतिक करियर पर ऐसा दाग होता, जिसे वह चाहकर भी नहीं धो पाते। दिलचस्प है कि वह दौर सामाजिक न्याय की राजनीति के तौर पर भले जाना गया पर उसकी शुरुआती शिनाख्त भय, हिंसा, असुरक्षा और विद्बेष के तौर पर
हुई थी।
ये सारी बातें याद करने की जरूरत आज इसलिए आन पड़ी हैं क्योंकि सामाजिक न्याय के नाम पर शुरू होने वाली अस्मितावादी राजनीति का मुहावरा अब मौजूदा भारतीय राजनीति के लिए एक खोटे सिक्के की तरह होता जा रहा है। ऐसा बिल्कुल निर्णान्यात्मक तौर पर कहना भले अभी एक जल्दबाजी हो, पर इस तरह केे खतरों को तो जरूर पढ़ा जा सकता है।
वीपी सिंह को रातोरात पिछड़ों के मसीहा और सामाजिक न्याय के जुझारू योद्धा की छवि दिलाने वालों में तीन नेताओं के नाम लिए जाते हैं। ये हैं रामविलास पासवान, शरद यादव और लालू प्रसाद यादव। तब ये तीनों जनता दल में थे। इस पार्टी का गठन तो भ्रष्टाचार विरोध की वीपी की लड़ाई को संसद तक ले जाने के लिए हुआ था पर देखते-देखते राजनीति की कौड़ियां उलटी पड़ गईं और मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने का फैसला सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया।
सवर्ण युवकों का आक्रोश दिल्ली से लेकर इलाहाबाद, लखनऊ और पटना तक फूट रहा था। ऐसे में खासतौर पर रामविलास पासवान आगे आए। दलित सेना के नाम पर शुरू किए गए उनके नॉनपॉलिटिकल आउटफिट ने विभिन्न जातियों के पिछड़े नौजवानों की गोलबंदी शुरू की। देखते-देखते मंजर बदला और दलितों-पिछड़ों की दबी आवाज बड़े-बड़े मंचों से गूंजने लगी। राजनीति की मुख्यधारा में पिछड़े नेताओं की एक पूरी जमात विशेष सक्रियता के साथ शामिल हुई। इनमें से ज्यादातर पहले से राजनीति में थे पर नई परिस्थिति में उनकी भूमिका अतिरिक्त रूप से रेखांकित होने लगी। पर बीते दो दशकों में नई राजनीति का यह तार्किक तकाजा देश में वोट बैंक की राजनीति का एक विद्रूप उदाहरण भर बनकर रह गया। खासतौर पर बात करें यूपी-बिहार की तो इसने राजनीति के नए जातीय समीकरण को भले जन्म दिया हो पर इससे सामाजिक स्तर पर बदलाव की कोई लंबी लकीर नहीं खिंच पाई।
अब जबकि इस साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले हर स्तर पर पॉलिटिकल पोजिशनिंग की नई दरकार सामने आई है तो जाति की राजनीति का पुराना खेल फिर से दखल बढ़ाने की फिराक में है। यह अलग बात है कि भ्रष्टाचार विरोध, समावेशी विकास और वैकल्पिक राजनीति को लेकर बीते कुछ सालों में जिस तरह की जन जागरूकता दिखी है, उसमें राजनीति में जातिगत समीकरणों का पुराना खेल शायद ही बहुत मायने रखे।
बात करें सामाजिक न्याय आंदोलन की पुरानी त्रिमूर्ति की तो वे आज भी राजनीति में सक्रिय हैं पर उनकी हैसियत पहले जैसी नहीं रही। लालू यादव अब भी तय नहीं कर पा रहे हैं कि इस चुनाव में वे कांग्रेस-एनसीपी के साथ उतरेंगे या अकेले। शरद यादव की पार्टी जेडीयू का नया चेहरा बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं। भाजपा से डेढ़ दशक से भी लंबा गठबंधन तोड़ने के बाद नीतीश फिर से तीसरे मोर्चे की छतरी में जरूर आ गए हैं पर बिहार में वे अपने लिए साथी दल की तलाश में हैं। रही रामविलास पासवान की बात तो वे जिस नाटकीय तरीके से भाजपा के साथ गए हैं, वह अवसरवाद की राजनीति की बड़ी मिसाल है। कायदे से पासवान की पार्टी लोजपा इस चुनाव में भाजपा के भरोसे है। बदले में वे भाजपा को कितना फायदा दे पाने की स्थिति में होंगे यह देखने वाली बात होगी। दिलचस्प है कि पासवान ने जो भी फैसला किया वह मन मसोस कर ही किया है। इससे पहले राजद और कांग्रेस के साथ उनके गठबंधन की बात चल रही थी। पर उन पर दबाव था कि वे महज दो-तीन सीट पर चुनाव लड़ने के लिए राजी हो जाएं। अपने राजनीतिक सफरनामे में पासवान के लिए यह संभवत: सबसे बुरा समय है। उन्हें साफ लग रहा है कि राजनीति की नई हवा में उनकी पतंग अब बहुत नहीं उड़ सकती।
लालू-शरद और रामविलास के साथ बात मुलायम सिंह यादव की भी कर ही लेनी चाहिए। मुलायम ने मंडल और मंदिर आंदोलन के जमाने से एक तरह से दोहरी राजनीति यूपी में की है। उन्होंने एक तरफ पिछड़ों को अपने साथ बनाए रखना चाहा तो वहीं दूसरी ओर अल्पसंख्यकों के भी भरोसे पर खरा उतरने की भरसक कोशिश करते दिखे।
इसी तरह की राजनीति लंबे समय तक बिहार में लालू भी करते रहे हैं। पर राजनीति के मैदान के इन दोनों ही धुरंधरों के आगे मुसीबत यही है कि वे अपने पुराने वोटबैंक को कैसे बचाएं। इन तमाम जिक्रों के बीच मायावती और उनकी पार्टी बसपा की स्थिति जरूर आपवादिक रूप से थोड़ी अविचलित है। ऐसा इसलिए भी संभव हो सकता है क्योंकि बसपा का जन्म मंडल राजनीति की गोद से नहीं हुआ है।
आखिर में कांग्रेस नेता जनार्दन द्बिवेदी की कुछ समय पहले आई उस टिप्पणी का जिक्र, जिसमंे उन्होंने सवाल उठाया कि सामाजिक न्याय के नाम पर शुरू हुई राजनीति ने एक नए क्रीमी लेयर को जन्म दिया है। कुछ नेताओं और परिवारों की बदली हैसियत को छोड़ दें तो सामाजिक बदलाव के किसी भी निर्णायक गंत्वय तक पहुंचने में यह राजनीति विफल रही है। पासवान से लेकर लालू और मुलायम ने जिस तरह एक नए तरह की वंशवादी राजनीति को जन्म दिया है, उससे समाज के अगड़े-पिछड़े तमाम वर्गों में चिढ़ पैदा हुई है। यह चिढ़ सोलहवीं लोकसभा के चेहरे को काफी हद तक बदल देने तक की ताकत रखता है। क्योंकि इस चिढ़ में इन नेताओं के राजनीतिक आचरण के साथ इन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों तक को लेकर गुस्सा शामिल है।
गौरतलब है कि भारतीय समाज की बहुलतावादी खासियत इसकी सांस्कृतिक विलक्षणता को लंबे समय से दूध पिलाती रही है, बलिष्ठ करती रही है। पर इस सांस्कृतिक विलक्षणता और बलिष्ठता के बीच कुछ ऐसे अंतरविरोध भी रहे हैं, जो हमारे विकास और सभ्यता के दावों को सामने से आईना दिखाते हैं। लिहाजा, इनके खिलाफ क्रांतिकारी राजनीतिक शपथ की दरकार तो आगे भी बनी रहेगी। अलबत्ता मौजूदा परिस्थिति में इतना जरूर कहा जा सकता है कि मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने के साथ शुरू हुआ राजनीति का अध्याय अब समाप्त होने जा रहा है।

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

संभावित बदलाव के साथ नई राजनीति का दौर

इस बार के लोकसभा चुनाव में फैसला महज इस बात का नहीं होगा कि दिल्ली में सरकार कौन बनाएगा, बल्कि यह चुनाव देश की राजनीति को भी नए निकष पर कसने जा रहा है। यह इस लिहाज से जरूरी भी है कि बीते कुछ दशकों में जनता को राजनीतिक विचारधारा और उसके प्रति दिखाई जाने वाली प्रतिबद्धता के नाम पर खतरनाक तरीके से बहलाया-भड़काया और बांटा जाता रहा है।
दरअसल, देश की राजनीति में कांग्रेस के वर्चस्व के खिलाफ आई गैरकांग्रेसवाद की डॉ. राममनोहर लोहिया की अवधारणा के बाद जिस तरह सेक्यूलर और अस्मितावादी राजनीति ने अपना रकबा बढ़ाया, उसने भारतीय राजनीति के अखिल चरित्र को क्षेत्र, जाति और वर्ग के खांचों में पूरी तरह बांटकर रख दिया। सोशल इंजीनियरिंग की सामयिकता और दरकार की वकालत करने वालों की नजर में लंबे समय से चले आ रहे सामाजिक अन्याय के खिलाफ यह एक जरूरी राजनीतिक कार्रवाई है। पर यह कार्रवाई कई तरह की प्रतिक्रियावादी अनीतियों-कुतर्कों की जिस तरह शिकार हुई, वह काफी चिंताजनक है।
चिंता की इस जमीन को समझने के लिए खासतौर पर बीते दो दशकों में उत्तर प्रदेश में बसपा की राजनीति को देखा जा सकता है। दलित या बहुजन समाज की बात करने वाली पार्टी की नेता मायावती ने नई सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर ब्राह्मणों-क्षत्रियों सबके मंच पर गईं और अपने लिए वोट का जुगाड़ किया। बात बनी तो सनक इस तरह सवार हुई की बहनजी सरकार में आने पर सूबे में कई जगहों पर करोड़ों रुपयों की लागत से अपनी मूर्तियां लगवाने लगीं। इसी तरह की राजनीति अपनी-अपनी सुविधा से बिहार में लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान करते रहे हैं। थोड़े किंतु-परंतु के साथ इस सूची में आप चाहें तो नीतीश कुमार को भी गिन सकते हैं।
अब जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव के दिन करीब आते जा रहे हैं अस्मितावाद के नाम पर क्षेत्रवाद की राजनीति करने वालों के पांव के नीचे से जमीन खिसकती जा रही है। इस स्थिति को और समझने के लिए आपको मायावती के पिछले दिनों आए उस बयान पर गौर करना होगा, जिसमें उन्होंने नरेंद्र मोदी को घेरने के लिए सांप्रदायिकता विरोधी ताकतों की एकजुटता की बात की थी। बहनजी ने कितने दफे भाजपा के साथ आकर यूपी में सत्ता सुख भोगा है, यह कोई ज्यादा पुराना इतिहास नहीं है। अब जब उन्हें लग रहा है कि एक व्यक्ति गुजरात से निकलकर पूरे देश में विकास और देश के नवनिर्माण की बात कर रहा है तो उन्हेंयह खौफ खाए जा रहा है कि कहीं यह लोकप्रियता उनकी सियासी जमीन को ही न हड़प ले।
बात यूपी की निकली है तो राजनीति के पुराने पहलवान मुलायम सिंह यादव का भी जिक्र जरूरी है। अपनी सेक्यूलर छवि के लिए मुस्लिम तुष्टि की हर हद को छूने वाले नेताजी को इन दिनों सबसे ज्यादा आक्रोश इसी बिरादरी से देखने को मिल रहा है। मुजफ्फरनगर दंगे के बाद 'मुल्ला मुलायम’ का सियासी तिलिस्म किस कदर दरका है, इसकी मिसाल है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय जाने का दौरा नेताजी को रद्द करना पड़ा। वहां के छात्र उनके विरोध में सड़कों पर उतर आए थे। छात्रों का आक्रोश मुजफ्फरनगर दंगे को लेकर सपा सरकार के अगंभीर रवैए को लेकर था। दिलचस्प है कि यह वही विश्वविद्यालय है, जहां एक जमाने में मुसलमानों के सबसे बड़े रहनुमा के तौर पर मुलायम की आवभगत होती थी। इस सबसे घबड़ाए नेताजी सांप्रदायिकता का खौफ दिखाकर भरसक कोशिश कर रहे हैं कि मुसलमानों का साथ उन्हें फिर से मिल जाए। तीसरे मोर्चे का तंबू एक बार फिर तानकर वे आखिरी सियासी दांव चल रहे हैं। पर शायद अब बहुत देर हो गई है।
नया ताजा पॉलिटकल ड्रामा बिहार में खेला जा रहा है। उत्तर प्रदेश में दलित नेता उदित राज के भाजपा में शामिल होने के साथ ही खबर आई कि दलित राजनीति के पुराने सूरमा रामविलास पासवान भाजपा के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ सकते हैं। इन दोनों खबरों ने हिंदी पट्टी में बीते कम से कम से कम दो दशकों से चली आ रही दलित राजनीति के अस्मितावादी तकाजे को एक तरह से अप्रासंगिक ठहरा दिया।
दिलचस्प तो यह रहा कि इस बड़े सियासी उलटफेर के साथ खबर यह भी आई कि बिहार में लालू यादव की राजनीति का लालटेन अचानक बुझने लगा है। एक जमाने में बैलेट बॉक्स से 'जिन्न’ निकालने का दावा करने वाले लालू प्रसाद यादव को अपनी ही पार्टी में
विरोध की आग को ठंडा करने में पसीना बहाना पड़ रहा है।
इन तमाम सियासी घटनाक्रमों को एक सीध में रखकर देखें तो कुछ बातों के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं। पहला संकेत तो यही है कि गठबंधन राजनीति के दौर में क्षेत्रीय राजनीति की जो गुंजाइश बढ़ गई थी, वह अब सिमटती जा रही है। न सिर्फ यूपीए और एनडीए बल्कि अब देश की नई राजनीति कांग्रेस और भाजपा के दो ध्रुवों में बंटती नजर आ रही है। भारत की बहुलतावादी एकता के सूत्रों को समझने वालों की नजर में यह एक पॉजिटव पॉलिटकल डेवलपमेंट है।
इससे आगे की बात करें तो पूरे देश में नमो को लेकर आकर्षण है। इस स्थिति का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि पहले जो बात कांग्रेस के कुछ नेता अलग-अलग कह रहे थे, वह बात अब अरविंद केजरीवाल तक कह रहे हैं कि मोदी की कहीं न कहीं लहर तो जरूर है। हालांकि इसे समझने के लिए ग्राउंड रिपोट्र्स का ही भरोसा ज्यादा करना चाहिए क्योंकि ओपिनियन पोल्स पर नए स्टिंग ने इसकी विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठा दिए हैं।
अगर यह स्थिति वाकई है तो इसके चुनावी फलित को इस रूप में देखा जा सकता है कि इस बार मोदी की छतरी के नीचे कई ऐसे दल और नेता आ सकते हैं, जो अब तक दलित-पिछड़ा या सेक्यूलरवाद की आड़ में अपनी राजनीति खेलते रहे हैं। अगर ऐसा हुआ तो वाकई देश की राजनीति को देखने-समझने का पिछले दो-तीन दशकों का नजरिया बदल जाएगा। नए नजरिए में न तो कथित अस्मितावादी तकाजों के लिए कोई जगह होगी और न ही छद्म सेक्यूलरवाद के लिए कोई गुंजाइश।
यह नया बदलाव देश में राजनीति के तर्क को जहां और ठोस करेगा, वहीं पक्ष या विरोध की राजनीति के लिए स्टैंड लेने वालों को ज्यादा गंभीर लोकतांत्रिक विवेक दिखलाना होगा। अपने साढ़े छह दशक से भी लंबे सफरनामे के बाद अगर भारतीय राजनीति इस मुकाम तक पहुंची है, तो यह सचमुच काफी सुखद है। कह यह भी सकते हैं कि इस संभावित बदलाव के साथ देश में 21वीं सदी की नई राजनीति का दौर शुरू होगा।
 

रविवार, 5 अगस्त 2012

घोषणापत्र : ऐसी चुनावी रुढि़ की क्या जरूरत

अपने यहां चुनाव का सीजन कभी खत्म नहीं होता। ग्राम पंचायत और निकाय चुनाव से लेकर आम चुनाव तक कुछ न कुछ हमेशा चलते रहता है। नहीं कुछ तो बीच में सीट खाली होने के कारण उपचुनाव ही हो जाते हैं। यह मांग पुरानी है कि एक समन्वित व्यवस्था बने ताकि कम से कम सारे स्थानीय चुनाव के एक साथ करा लिए जाएं। इसी तरह लोकसभा और राज्यसभा के चुनाव एक साथ होने की अनिवार्यता हो तो यह न सिर्फ देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के हित में होगा बल्कि इस कारण चुनावी राजनीति की चिकचिक से भी जनता को थोड़ी निजात मिलेगी।
इसी तरह का एक और मुद्दा चुनाव के मौके पर राजनीतिक दलों द्वारा जारी किए जाने वाले चुनाव घोषणापत्र से जुड़ा है। आमतौर पर जनता के लिए अब इन घोषणापत्रों का कोई महत्व नहीं रह गया है। वैसे भी इन घोषणापत्रों के जारी होने का परंपरागत महत्व भले हो पर इनका कोई संवैधानिक महत्व नहीं होता। यहां तक कि चुनाव आयोग भी इसे कोई महत्व नहीं देता। पर बावजूद इसके कुछ मौकों पर इन घोषणापत्रों से बड़े-बड़े चुनावी खेल आज भी बनते-बिगड़ते हैं।
अभी ज्यादा दिन नहीं हुए हैं उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए। इससे पहले तमिलनाडु में भी चुनाव हुए थे। इन दोनों विधानसभा चुनावों के नतीजों में विजयी दल के घोषणापत्र मतदाताओं को काफी रास आए, नतीजों के विश्लेषण में ऐसा कई चुनाव विश्लेषकों ने कहा। पर यह इस बात के लिए पर्याप्त आधार नहीं है कि जनता किसी दल को या उनके दल के निर्वाचितों को चुनाव घोषणापत्र का पूरी तरह या आंशिक रूप में पालन के लिए मजबूर कर सकती है। और अगर ऐसा है तो फिर घोषणापत्र के रूप में जारी ऐसी चुनावी रुढि़ क्या जरूरत है?
अभी नई दिल्ली में प्रभाष परंपरा न्यास के एक कार्यक्रम में पूर्व केंद्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान ने इसी सवाल को गंभीरता से उठाया। उन्होंने कहा कि विधायकों और सांसदों को संविधान की शपथ दिलाई जाती है। उन्हें वचनबद्ध किया जाता है कि वे संविधान की व्यवस्था और मूल भावनाओं के मुताबिक आचरण करेंगे। निर्वाचन से पहले या बाद कहीं भी औपचारिक रूप से चुनाव घोषणापत्र की बात नहीं होती। ऐसे में महज राजनीति के लिए ऐसे दस्तावेज के जारी होने और इसके नाम पर जनता को गुमराह करने का क्या मतलब? जाहिर है यह मांग तार्किक है और इस पर सरकार और राजनीतिक जमात दोनों को गौर करना चाहिए। 

गुरुवार, 19 मई 2011

बिग बी को बताओ, जीती कैसे आशा


ऑक्सफोर्ड की लाइब्रोरी में मैग्ना कार्टा चार्टर देखकर अमिताभ बच्चन जब अभिभूत होते हैं तो अखबारों, टीवी चैनलों के लिए यह न छोड़ी जा सकने वाली खबर होती है। यह स्थिति तकरीबन वैसी ही है कि पूरब में खड़े होकर कोई पश्चिम को सूर्य का घर माने और उसकी लाली से अपनी चेतना और इतिहास बोध को रंग ले। दरअसल, हम बात कर रहे हैं लोकतंत्र की उन जड़ों की जिसकी डालियों पर झूला डालने वाले परिंदे आपको आज पूरी दुनिया में मिल जाएंगे। पर लोकतंत्र महज एक शासनतंत्र नहीं, एक जीवनशैली और मानवीय इच्छाशक्ति भी है। अगर यह बोध और सोच किसी को भावनात्मक अतिरेक लगे तो उसे भारत के पांच लाख गांवों के सांस्कृतिक गणतंत्र की परंपरा से परिचित होना चाहिए। परंपरा का यह प्रवाह आज जरूर पहले की तरह सजल नहीं रहा, पर है वह आज भी कायम अपने जीवन से भरे बहाव के साथ। अगर यकीन नहीं हो तो चलिए उस छोटे से गांव में जहां गणतंत्र आज भी सबसे बड़ी 'आशा' है, सबसे बड़ा यकीन है कल को आज से बेहतर होने का।
पिछले तीन दशकों में घाटी में उतनी बर्फ नहीं गिरी, जितनी आंच दिल्ली से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वहां के हालात को लेकर महसूस की गई। यह भारत की लोकतांत्रिक निष्ठा की कहीं न कहीं जीत ही है कि उसने अपने इस सबसे अशांत सूबे में भी लोकतांत्रिक शासन को लगातार बहाल रखा। जम्मू कश्मीर के हालात और राजनीति पर फारूख अब्दुल्ला ने कभी कहा था कि उनकी मजबूरी है कि वह हमेशा दिल्ली की सत्ता का साथ दें। पक्ष और विरोध के लोकतंत्र में दरअसल, यह तकाजा महज राजनीति का नहीं बल्कि उस तकाजे का भी है जो जम्मू कश्मीर को देश की मुख्यधारा के साथ एकमेक रहने की दरकार पेश करता है।  पिछले दिनों जब देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां चल रही थी, उसी दौरान जम्मू कश्मीर सहित कई प्रदेशों में लोकतंत्र का एक और बड़ा अनुष्ठान पंचायत चुनाव के रूप में चल रहा था। विधानसभा चुनावों, भ्रष्टाचार के खिलाफ अदालती कार्रवाई और नागरिक समाज की मांगों और आतंकी सरगना ओसामा बिन लादेन के खात्मे के शोरगुल में इस अनुष्ठान की तरफ कम ही लोगों का ध्यान गया। अलबत्ता स्थानीय लोगों की दिलचस्पी जरूर इसमें बनी रही। दिलचस्प तो यह रहा कि अशांत घाटी में इन चुनावों का औपचारिक निर्वाह ही जहां बड़ी कामयाबी ठहराई जा सकती थी, वहां अस्सी फीसद तक मतदान हुए। यही नहीं बिहार जैसे सूबे में जहां पंचायत की परंपरा को ऐतिहासिक मान्यता हासिल है, वहां भी यह चुनाव संगीनों के साए में होने के बावजूद खून के छीटों से बचे नहीं रहे। वहीं घाटी की वादियों में ये चुनाव तकरीबन शांतिपूर्ण संपन्न हुए।

दरअसल, पंचायत के बहाने इस चुनाव में घाटी के लोगों ने न सिर्फ लोकतांत्रिक सरोकारों की अपनी मिट्टी को एक बार फिर से तर किया है बल्कि दुनिया के आगे यह साफ भी किया है उनका जीवन, उनका समाज, उनकी संस्कृति उतनी उलझी या बंटी हुई नहीं है, जितनी बताई या समझाई जाती है। अगर ऐसा नहीं होता तो यह कहीं से मुमकिन नहीं था कि कश्मीरी पंडित परिवार की एक महिला उस गांव से पंच चुनी जाती, जो पूरी तरह मुस्लिम बहुल है। यहां विख्यात पर्यटन स्थल गुलमर्ग जाने के रास्ते में एक छोटा सा गांव है- वुसान। आशा इसी गांव से पंच चुनी गई है जबकि यहां से इस पद के लिए मैदान में उतरी वह अकेली कश्मीरी पंडित महिला थी। इस सफलता को स्थानीय, आपवादिक या कमतर ठहराने वालों के लिए यह ध्यान में रखना जरूरी है कि घाटी से 1980 में करीब दो लाख कश्मीरी पंडित परिवारों को पलायन कर जाना पड़ा था।
इस बार भी जब यहां पंचायत चुनाव चल रहे थे तो आतंकी धमकियां मिली थी पर यहां के लोगों ने तमाम उन मंसूबों को धूल चटा दिया, जो बंटवारे और कट्टरता की भड़काऊ बातें करते हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि वुसान का संदेश घाटी के सच को नए पूर्वाग्रहरहित नजरिए से देखने की जरूरत को तो रेखांकित करेगा ही यहां से बही लोकतंत्र की धारा को देश की मुख्यधारा बनने की प्रेरणा भी देगा।  फिर फारूख साहब भी कहेंगे अपनी लोकतांत्रिक मजबूरी का रोना रोने की बजाय अपनी मजबूती का बखान करेंगे, सगर्व और खुशी-खुशी। 

रविवार, 15 मई 2011

वाम को प्रणाम...!


लोकतंत्र का सबसे बड़ा अनुष्ठान चुनाव भले है, पर यह व्यवस्था मैदान मारने की राजनीतिक चालाकी भर नहीं सिखाता। चुनावी हार-जीत और पक्ष-विपक्ष के आंकड़ों से ज्यादा वजनी हैं, वे नीतियां और आदर्श जो किसी दल को लोकतंत्र में अपनी राजनीतिक भूमिका की प्रेरणा देते हैं, उसके लिए संघर्ष करने का हौसला बढ़ाते हैं। सैफोलोजी की मास्टरी का दावा करने वाले यह कहकर भूल कर रहे हैं कि वाम राजनीति का पटाक्षेप हो चुका है और निकट भविष्य में उसके बाउंस बैंक होने की संभावना नहीं के बराबर है।
भारतीय राजनीति के कम से कम दो दिग्गजों ने यही सबक सिखाया कि गिनती में बढ़ना या पिछड़ना किसी मुद्दे की जीत या हार नहीं बल्कि समय और समाज की दरकार के साथ उसके सरोकार लोकतंत्र में मुद्दों का कद, उसका जीवनकाल तय करते हैं। लोहिया चुनावी राजनीति में हमेशा संघर्ष करते दिखे तो वहीं जेपी ने संसद और विधानसभा में खुद न प्रवेश कर जनतंत्र और जनमत का सबसे ऐतिहासिक आख्यान लिखा। लिहाजा, न यह बेला वाम राजनीति के शाम की है, न ही लाल सलाम कहने वाले कैडरों और होलटाइमरों का मार्क्स और लेनिन से मोहभंग हुआ है? वैसे सवालिया लहजे में खड़ा पर यह मुद्दा इतना भर नहीं है, जितना जल्दबाजी में समझा-बताया जा रहा है।
भारत दुनिया का वाहिद देश है, जहां वोट की राजनीति में कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपने को तारीखी तौर पर शामिल किया, साबित किया है। कम्युनिस्ट राजनीति को सांगठनिक रूप से देखने वाले यह भूल करते हैं कि महज माकपा या भाकपा उसका चेहरा, उसका राजनीतिक औजार नहीं हैं। पूंजी और श्रम का संघर्ष डेवलपमेंट के ग्लोबल होड़ में कम होने के बजाय खतरनाक हुआ है। दुर्भाग्य से इस नई स्थिति में गांव, गरीब और मजदूर की चिंता को रेखांकित करने का दारोमदार जिन जनवादी संगठनों और नेताओं पर रहा, वे उसमें पूरी तरह नाकाम हुए। कह सकते हैं कि पूंजी और बाजार के गठजोड़ के आगे संघर्ष के वाम तकाजे न तो ढंग से आम लोगों की चिंताओं का प्रतिनिधित्व कर सके और न ही अंदरूनी बदलाव के लिए वाम दलों में कोई सामयिक ललक दिखलाई पड़ी। मामला केरल का हो या पश्चिम बंगाल का वहां वाम सरकारें केंद्रित उद्योग ढांचों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की आगवानी के लिए ठीक उसी तरह तैयार दिखीं, जैसे देश की दूसरी पार्टियां अपने शासित राज्यों में।
यही नहीं इस दौरान जो अंतर्मंथन जनवादी दलों में दिखा भी वह बगैर किसी बदलाव के अपने कुनबे की बची-खुची जागीरदारी बचाने के लिए। तकरीबन साढ़े तीन दशक की सत्ता की लाली अगर पश्चिम बंगाल ममता की हरियाली के आगे फीकी पड़ गई है, तो यह कई मायने में देश में कम्युनिस्ट राजनीति के लिए ऐतिहासिक वक्त है, जब उसे अपने भविष्य की नीति और रणनीति दोनों के लिए नए सिरे से कमर कसनी होगी। और अगर ऐसा नहीं होता है तो इस सूरत से भी इनकार नहीं किया जा सकता की सांगठनिक रूप में नए वाम अवतार हमारे सामने हों। यहां यह भी समझने की जरूरत है कि देश की सत्ता में सबसे कम स्पेस को भरने वाली वामपंथी दलों में भीतरी बंटवारा बहुत ज्यादा है।
दिलचस्प है कि दंतेवाड़ा से झाड़ग्राम तक जिस नक्सल प्रभाव की चिंता केंद्र सरकार तक के सिरदर्द है, उसक उत्स भी वाम विचारधारा ही है। यही नहीं छात्र राजनीति की जमीन वैसे तो देश में काफी खिसक चुकी है पर अब भी वैचारिक रूप से वहां वाम विचारधारा की नुमाइंदगी बची हुई है। इससे अलग बुद्धिजीवियों और संस्कृतिकर्मियों की भूमिका आज भले देश के नए लोकतांत्रिक ढांचे में गौण पड़ गई हो पर इस जमात की सर्वाधिक यकीनी और प्रतिबद्ध चेहरों की शिनाख्त आज भी प्रगतिशील तबके के रूप में ही है। इसका एक रंग अभी पश्चिम बंगाल में भी दिखा, जहां यही प्रगतिशील तबका वाम मोर्चा की सरकार के खिलाफ निर्णायक रूप से खड़ा हुआ। लिहाजा, पोलित ब्यूरो और काडर डिसिप्लीन वाले कम्युनिस्ट दलों के लिए यह वक्त का तकाजा है कि वह अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को सामयिक तकाजों से जोड़ें ताकि जनवादी राजनीति की उसकी परंपरा का आधुनिक कल्प भी सामने आए और आम लोगों का भरोसा उस पर कायम हो। नहीं तो जैसा कि सीपीआई नेता एबी बर्धन कहते हैं कम्युनिस्ट नेता और पार्टियां समय और समाज के हाशिए पर फेंक दिए जाएंगे और इस सिलसिले की बजाप्ता शुरुआत हो चुकी है।

बुधवार, 11 मई 2011

जागरण में अन्ना

दूरी हमारी पहचान के गाढ़ेपन को तो हल्का करती है पर उसके दायरे को बढ़ा देती है। नजरिया, मजहब, राजनीति, स्थान और बोली के अंतर देश में जिस अनेकता की लकीरों के रूप में दिखते हैं, देश के बाहर वही अनेकता हमें एकता के सूत्र में बांधती है। दूरी और मनुष्य के रिश्ते का यह मनोवैज्ञानिक सच तो है ही उसके सामाजिक और सार्वजनिक सलूक से जुड़ी बुनियादी बात भी है। जिस अन्ना हजारे को अपने देश में और अपनी सरकार से अपनी बातें कहने-मनवाने के लिए 98 घंटे का अनशन करना पड़ा, उसी को लेकर सरकार को जब देश के बाहर अपनी बातें कहनी होती है तो वह इसे किसी टकराव या मतभेद के बजाय बहुदलीय लोकतंत्र प्रणाली का नया आयाम बताती है...

रविवार, 6 फ़रवरी 2011

आज देख लें कौन रचाता मौत के संग सगाई है


चौहत्तर आंदोलन का मशहूर गीत है- 'जयप्रकाश का बिगुल बजा तो जाग उठी तरुणाई है।' कवि और सर्वोदय कार्यकर्ता रामगोपाल दीक्षित गीत में एक जगह कहते हैं- 'आज देख लें कौन रचाता मौत के संग सगाई है, तिलक लगाने तुम्हें जवानों क्रांति द्वार पर आई है।' दरअसल, देश के लिए जिंदगी से ज्यादा चमकदार होती है, देश के लिए कुर्बानी। समय, समाज और इतिहास तीनों ही शहादत की इस लाली को सबसे गहरे और सच्चे जज्बे के रूप में स्वीकारते रहे हैं, इन्हें सम्मान देते रहे हैं।
पर स्थिति तब उलट जाती है जब जान न्योछावर करने के आदर्श जज्बे के साथ जानबूझकर खिलवाड़ होता है, राजनीति होती है। पिछले दिनों मुंबई हमले में शहीद हुए शहीद मेजर उन्नीकृष्णन के चाचा के. मोहनन ने जिस आक्रोश से भरकर खुद को आग के हवाले किया, उसे आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता। मोहनन ने वैसे भी राजधानी में वहां जहां देश की सबसे बड़ी पंचायत बैठती है, उससे महज कुछ दूरी पर ही इस अकल्पनीय कृत को अंजाम दिया। आसान है बहुत यह समझना कि उनके भीतर जलते सवालों का रुख किस तरफ था। जैसा कि मौके से बरामद सुसाइड नोट से जाहिर है कि मोहनन 26/11 के मुख्य आरोपी अजमल आमिर कसाब को अब तक फांसी न दिए जाने से खासा खिन्न थे। यह खिन्नता इससे पहले भी जनता की आवाज बनकर सड़कों पर कई बार अलग-अलग शक्लों में फूट चुकी है। यह और बात है कि कसाब को फांसी का मुद्दा अब तक सरकार और उसके विरोधियों के लिए महज पॉलिटिकल माइलेज लेने का वसीला ही ज्यादा रहा है। इसलिए इस मुद्दे पर जो सियासी बहस या प्रतिक्रिया अब तक सामने आई है, उससे जनता में भड़का गुस्सा शांत होने की बजाय और तेज ही हुआ है।
कानून की अपनी मयार्दाए हैं, जिनका पालन लाजमी है। पर उस रवैए का क्या जो इन मर्यादाओं की आड़ में अपना हित साधने से नहीं चूकते। बदकिस्मती से ऐसा करने वाले लोग न सिर्फ सरकार के जवाबदेह पदों पर बैठे हैं बल्कि उनके विरोधियों का रैवया भी तकरीबन ऐसा ही रहा है। 26/11 की घटना को अदालत तक ने 'देश पर आक्रमण' माना है। लिहाजा, इसके आरोपी के साथ बर्ताव को लेकर सरकार की सख्ती साफ दिखनी चाहिए। पर आलम यह है कि सरकार कसाब को फांसी तो दूर इस हमले से सीधे बावस्त पाकिस्तान तक के साथ अपने सलूक को अब तक निर्णायक कसौटी पर नहीं उतर पाई है। यह साफ तौर पर उस शहादत के साथ क्रूर मजाक है, जो देश के लिए कुर्बानी के जज्बे को सर्वापरि मानती है।
मोहनन तकरीबन 99 फीसद जल चुके हैं और शायद ही उनकी सांसें ज्यादा समय तक उनका साथ दें। पर उनके आक्रोश का लावा तब तक धधकता रहेगा, जब तक यह देश न सिर्फ कसाब को फांसी से झूलता देख ले बल्कि देश के खिलाफ उठने वाली हर आवाज, हर हाथ और हर दुस्साहस को उसी की भाषा में जवाब देना नहीं सीख लेता। भूले नहीं होंगे लोग कि जब शहीद उन्नीकृष्णन के घर कुछ औपचारिक आंसू, सांत्वना और फूलमाला लेकर केरल के मुख्यमंत्री अच्युतानंदन पहुंचे थे तो उनके पिता ने कितनी सख्त प्रतिक्रिया जताई थी। इस अपमान से बिफरे मुख्यमंत्री ने यह तक बयान दे डाला था कि अगर यह शहीद उन्नीकृष्णन का घर नहीं होता तो उनके दरवाजे पर कोई  कुत्ता भी नहीं जाता। अच्युतानंदन  को अपने इस बयान को लेकर काफी फजीहत उठानी पड़ी थी। आखिरकार हारकर उन्होंने माफी मांगी। देश के लिए शहीद होने के जज्बे को महज फर्ज अदायगी से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। शहीद की विधवा और परिजन को सिलाई मशीन और फ्रेम में जड़े प्रशस्ति के कुछ शब्द और चांदी-तांबे के कुछ मेडल भर इसकी कीमत नहीं। इस महान जज्बे के कारण जिस पीड़ा और संकट से शहीद के परिजनों को गुजरना पड़ता है, उसका तो बगैर अनुभव के अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। मोहनन ने उस पीड़ा का एहसास सरकार को दिलाने के लिए जो तरीका अपनाया है, वह देश के नाम एक और कुर्बानी है।

मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

भ्रष्टाचार की अमर्त्य व्याख्या


अमर्त्य सेन को जब नोबेल मिला था तब इस सम्मान का इसलिए भी स्वागत हुआ था कि इस बहाने बाजार और  भोग का  खपतवादी "अर्थ" सिखाने वाले दौर में वेलफेयर इकॉनमिक्स की दरकार और महत्ता दोनों रेखांकित हुई। अमर्त्य  हमेशा अर्थ के कल्याणकारी लक्ष्य के हिमायती रहे हैं। इसलिए जीडीपी और सेंसेक्सी उछालों में दिखने वाले विकास के मुकाबले वे हमेशा ग्रामीण शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दों को विकास का बैरोमीटर बताते हैं। एक ऐसे दौर में जबकि अर्थ को लेकर तमाम तरह की अनर्थकारी समझ की नीतिगत स्थितियां हर तरफ लोकप्रिय हो रही हैं तो नोबेल विजेता इस अर्थशास्त्री ने दुनिया के सामने कल्याणकारी अर्थनीति की तार्किक व्याख्याएं और दरकार रखी हैं।
हैरत नहीं कि जब भ्रष्टाचार को लेकर बढ़ी चिंता पर उन्होंने अपनी राय जाहिर की तो देश में दिख रहे तात्कालिक आवेश और आक्रोश से अलग अपनी बात कही। अमर्त्य को नहीं लगता कि भ्रष्टाचार को लेकर सिर्फ मौजूदा मनमोहन सरकार पर दबाव बनाना वाजिब है। वह सरकार और सरकार में बैठे कुछ लोगों की भूमिका से ज्यादा उस व्यवस्थागत खामी का सवाल उठाते हैं, जिसमें भ्रष्टाचार की पैठ गहरी है। इस लिहाज से माजूदा यूपीए सरकार हो या इसके पहले की सरकारें, दामन किसी का भी साफ नहीं।
अमर्त्य की नजर में भ्रष्टाचार की चुनौती तो निश्चित रूप से बढ़ी है पर इससे निजात आरोपों और तल्ख प्रतिक्रियाओं से तो कम से कम मिलने से रहा। दुर्भाग्य से देश में संसद से लेकर सड़क तक अभी जो शोर-शराबा दिख रहा है, वह अपने गिरेबान में झांकने की बजाय दूसरे का गिरेबान पकड़ने की नादानी से ज्यादा कुछ भी नहीं। आखिर एक ऐसे समय में जबकि सभी यह स्वीकार करते हैं कि राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक नैतिकता के सरोकारों का अभाव हर स्तर पर दिख रहा है, हम कैसे यह उम्मीद कर सकते हैं कि भ्रष्टाचार की पागल नदी पर हम ऊपर ही ऊपर नैतिक पाररदर्शिता का सेतु बांध लेंगे या कि ऐसा करना ही इस समस्या का हल भी है।
भ्रष्टाचार को लेकर इस देश में केंद्र की सबसे शक्तिशाली कही जाने वाली सरकार तक को मुंह की खानी पड़ी है। यह इतिहास अभी इतना पुराना नहीं हुआ है कि इसके सबक और घटनाक्रम लोग भूल गए हों। आज भ्रष्टाचार का पैमाना लबालब है पर इसके खिलाफ कोई संगठित जनाक्रोश नहीं है। विपक्षी पार्टियां खुद इतनी नंगी हैं कि वे इस मुद्दे पर न तो जनता के बीच लंबी तैयारी से जा सकते हैं और न ही सरकार को सधे तार्किक तीरों से पूरी तरह बेध सकती हैं क्योंकि तब तीर उनके खिलाफ भी कम नहीं चलेंगे।
एक और सवाल अमर्त्य सेन ने गठबंधन सरकारों की मजबूरी को लेकर भी उठाया है। उन्होंने मनमोहन सिंह की छवि की तरफ इशारा करते हुए कहा कि भले आपकी ईमानदारी की छवि जगजाहिर हो पर गठबंधन का लेकर कुछ मजबूरियां तो आपके आगे होती ही हैं। दिलचस्प है कि गठबंधन भारतीय राजनीति का यथार्थ है। पर इस यर्थाथ की पालकी ढोने वाली पार्टियों को यह तो साफ करना ही होगा कि गठबंधन की जरूरत आैर सरकार चलाने की मजबूरी में वे कितनी दूर तक समझौते करेंगे।  
बहरहाल, अर्थ को कल्याण के लक्ष्य के साथ देखने वाले सेन मौजूदा स्थितियों से पूरी तरह निराश भी नहीं हैं। उनकी नजर में भ्रष्टाचार को अब लोग जिस स्पष्टता से स्वीकार कर रहे हैं, वह एक सकारात्मक लक्षण है। किसी समस्या को चुनौतीपूर्वक स्वीकार करने के बाद ही उसके खिलाफ आधारभूत रूप से किसी पहल की गुंजाइश बनती है। अभी कम से कम यह स्थिति तो जरूर आ गई है कि इस बात पर तकरीबन हर पक्ष एकमत है कि अगर समय रहते समाज और व्यवस्था में गहरे उतर चुके भ्रष्टाचार के जहर के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई तो सचमुच बहुत देर हो जाएगी। बस सवाल यहां आकर फंसा है कि इसके खिलाफ पहल क्या हो और  पहला कदम कौन बढ़ाए। तात्कालिक आवेश पर अंकुश रखकर अगर समाज, सरकार और  राजनीतिक दल कुछ बड़े फैसले लेने के लिए मन बड़ा करें तो एक भ्रष्टाचार विहीन समय और व्यवस्था के सपने को सच कर पाना मुश्लिक नहीं है। अमर्त्य अर्थ के जिस कल्याणकारी लक्ष्य की बात करते हैं, जाहिर है कि उसका शपथ मीडिया, समाज और संसद सबको एक साथ लेना होगा।         

मंगलवार, 23 नवंबर 2010

कितने गंदे हम


ऐसे समय में जबकि देश में सार्वजनिक जीवन में मलिनता को लेकर बहस की गरमाहट बढ़ी है, ’स्वच्छता‘ का सवाल खड़ा करना कुछ बुनियादी सरोकारों को रेखांकित करने जैसा है। हालिया कुछ आंकड़े हमारे विकास का विरोधाभासी चरित्र उजागर करते है। एक अरब से ज्यादा की आबादी वाले देश में अगर आज भी महज 36 करोड़ लोग ही ऐसे है जो शौचकर्म खुले में नहीं करते तो साफ है कि हमारी वस्तुस्थिति और उन्नति के बीच की खाई खासी चौड़ी है। इस खाई के बड़े और गहरे होने का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि देश में सेलफोन पर बतियाने वालों की गिनती शौचालय का प्रयोग करने वालों से दोगुनी है।
दरअसल, तेजी से हो रहे शहरीकरण ने गांव-देहात के जीवन की न सिर्फ उपेक्षा की है बल्कि एक ऐसी सनक के कंधे पर हाथ रखा है जिसमें कुछ चेहरों की लाली के लिए लाखों-करोड़ों मुरझाए चेहरे उनके हाल पर छोड़ दिये गये है। अच्छी बात यह है कि विकास योजनाओं के एकांगी चरित्र से बचने की सोच सरकार के भीतर भी अब काफी हद तक कारगर शक्ल अख्तियार कर रही है। इसे बेहतर संकेत मानना चाहिए कि विकास और समृद्धि के ऊपरी नारों और वादों की जगह, बिजली, सड़क, शौचालय और पानी जैसे बुनियादी जरूरत के मुद्दे एक बार फिर एजेंडे में बहाल हो रहे है। छूटते जा रहे इन मुद्दों ने जाति और क्षेत्र की राजनीति करने वालों को भी हतोत्साहित किया है।
केंद्र में जब दूसरी बार मनमोहन सरकार आई तब भी माना गया कि रोजगार गारंटी जैसी महात्वाकांक्षी योजनाओं के बूते ही संप्रग लोगों का व्यापक समर्थन हासिल करने में सफल रही। आज सरकार द्वारा जिस समेकित विकास नीति पर जोर दिया जा रहा है, उसकी जरूरत भी इसलिए पड़ी कि विकास की सरपट दौड़ में काफी कुछ छूटता चला गया है। जिन आंकड़ों से हमारे विकास का मलिन चेहरा उजागर हुआ है, उसमें यह भी शामिल है कि देश के दिल्ली और केरल जैसे हिस्सों में बेहतर स्वच्छता सहूलियत का लाभ उठाने वालों का प्रतिशत 90 से ज्यादा है जबकि झारखंड, बिहार, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में स्थिति सबसे खराब है। साफ है कि शिक्षा और शहरीकरण का सीधा रिश्ता स्वास्थ्य और स्वच्छता जैसी बुनियादी सहूलियतों से जुड़ा है। शहरी आबादी का बढ़ता बोझ और पलायन जैसी समस्या के पीछे भी शहर बनाम गांव की स्थिति सबसे बड़ा कारण है।
हमारी लोक परंपरा में स्वच्छता का स्थान काफी ऊंचा है। यह कहीं न कहीं हमारे संस्कारों में भी बीज रूप से शामिल है। हां, अशिक्षा और गरीबी ने देश की आबादी के एक बड़े हिस्से की परिस्थति को इतना मजबूर जरूर कर दिया कि उसे महज दो जून की रोटी के संघर्ष के साथ किसी तरह गुजर-बसर करने की जद्दोजहद में ही अपना सारा सामर्थ्य झोंक देना पड़ता है। अब जबकि सरकार का ध्यान शिक्षा और खाद्य सुरक्षा की तरफ गंभीरता से गया है तो उम्मीद करनी चाहिए कि न सिर्फ देश के संभ्रांत और सभ्य कहे जाने वाले इलाकों बल्कि सुदूर गांव-देहातों में भी शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता की बुनियादी सहूलियतें पहुंचेंगी।

बुधवार, 7 जुलाई 2010

देह राजनीति पर प्रकाश


"राजनीति' के कथानाक का पूरा ताना-बाना जिस तरह बुना गया है, उसमें महिला को इस्तेमाल होने का सच तो जरूर दिखाया गया है, पर उसे इस्तेमाल करने वाले पुरुषों को लेकर खटकने वाली खामोशी बरती गई है
जागरूक भारतीय जनमानस के लिए राजनीति एक प्रिय विषय रहा है। जिसे पूरबिया बेल्ट या गोबर पट्टी कहते हैं तो वहां तो जागरूकता का आलम यह है कि अब भी लोग विभिन्न राजनतिक मुद्दों पर चौपालों से लेकर चाय-पान की दुकानों तक घंटों बहस करते हैं। इन दिनों प्रकाश झा की "राजनीति' की भी चर्चा भी खूब है। चर्चा का एक स्तर तो उस खेल को लेकर है जिसमें मीडिया में 24-48 घंटे में किसी फिल्म की ऐतिहासिक सफलता से लेकर उसके डिब्बा मार्का होने का सर्टिफिकेट दे दिया जाता है। पर "राजनीति' को लेकर जो ज्यादा महत्वपूर्ण चर्चा और बहस सतह पर आई है, वह है इस फिल्म का कंटेंट। कहने के लिए यह पूरबिया अंचलों की राजनीति का महाभारती भाष्य है। खुद प्रकाश झा ने भी माना है कि वह बिहार-यूपी की राजनति के अलग-अलग शेड्स को इस फिल्म में उभारना चाहते थे।
फिल्म को देखकर हमारे जेहन में कई सवाल भी उठते हैं। पहला सवाल तो यही कि फिल्म में आमजनों के सरोकारों और संघर्ष की जो आवाज नसीरुद्दीन शाह फिल्म की शुरुआती रीलों में उठाते हैं, वह आवाज बीच में ही कहां और क्यों खो जाती है? इसका जवाब न तो फिल्म देती है और न ही यह बताना "राजनीति' बनाने वालों को जरूरी लगता है।फिर नसीर के रेडिकल कैरेक्टर शेड को थोड़ा और पावरफुल बनाने के लिए उसकी एक महिला मित्र के साथ दिल-दिमाग से होते हुए बिस्तर तक पहुंची नजदीकी को तेजी से घटित होते हुए दिखाया गया है। पर महिला के प्यार और उसके साथ को एक क्रांतिकारी राजनीतिक कार्यकर्ता के जीवन की बाधा किन तर्कों पर मान लिया जाता है, इसका जवाब नहीं मिलता। हां, यह सब देखते हुए मैथिलीशरण गुप्त की वो पंक्तियां जरूर याद आती है जिसमें यशोधरा बुद्ध के गृहत्याग पर मार्मिक उलाहने देती है।
दरअसल, यह फिल्म बिहार-यूपी में राजनीतिक अपराधीकरण की लाल जमीन को जितनी खूबी के साथ समझने का मौका देती है, उतना ही यह महिला किरदारों के मामले में अब तक बने-चले आ रहे पूर्वाग्रहों के आगे समझौता भी करती है। इस फिल्म का फलक काफी बड़ा है। तीन घंटे में सब कुछ समेट लेने की कलात्मक मजबूरी नेे जरूर प्रकाश झा को भी परेशान किया होगा। लिहाजा, उनके प्रति थोड़ी हमदर्दी भी होनी चाहिए।
पिछले छह दशकों में जनता के बीच से निकलकर देश के राजनीतिक नेतृत्व की पहली पांत तक पहुंचे नेताओं की बात करें तो कई बड़े और सफल नाम हमारी गिनती बढ़ाएंगे। पर यह बात महिला नेतृत्व को लेकर आसानी से नहीं की जा सकती। आज भी जो गिनी-चुनी महिलाएं राजनीति की मुख्यधारा में थोड़ी लंबी दूर तक अपने नेतृत्व की नौका खे पाई हैं, उनके पीछे परिवार और वंश की राजनीति है। वैसे वंशवाद की बैसाखी पर राजनीति करने वाले पुरुषों की भी तादाद कम नहीं है। "राजनीति' की कथाभूमि इस पृष्ठभूमि पर रची गई मालूम पड़ती है।
फिल्म में दिखाया गया है कि चुनाव में टिकट पाने की अहर्ता इतनी क्रूर है कि एक महिला को उसके लिए अपने कपड़े तक ढीले करने पड़ते हैं। बात इतने से भी नहीं बनती तो एक के साथ देह रिश्ते का सच, दूसरे के हाथ में अपने विरोधी के खिलाफ हथियार बनाकर सौंपने का सौदा तक करने की मजबूरी को भी वह सहर्ष स्वीकारती है। वहीं दूसरी तरफ वंश, परिवार और परंपरा की चारदीवारी का घेरा आज भी भारतीय समाज में इतना मजबूत है कि उसके भीतर महिला अस्मिता, संवेदना और महत्वाकांक्षा चाहे जितनी बार दम तोड़े, उसके लिए इस फांस को तोड़ पाना तकरीबन नामुमकिन है। दिलचस्प तो यह कि परिवार और परंपरा की राजसी ठाठ के नाम पर आज भी चुनावों में न सिर्फ थोक इमोशनल वोटिंग होती है, बल्कि उसके विरोध में उठी जरूरी राजनीतिक आवाज भी अनसुनी रह जाती है।
फिल्म के जिस एक दृश्य में और महज एक संवाद बोलने के लिए प्रकाश झा परदे पर आते हैं, बताया जा रहा है कि वह संवाद भी उन्हें बदलना पड़ा। वोटिंग के दिन झा एक चाय की दुकान पर वोटिंग के रुख पर अपनी टिप्पणी करते हैं कि लगता है कि "विधवा' सारे वोट बटोर ले जाएगी। फिल्म किसी विवाद में न फंसे और उस पर महिला संवेदना व अस्मिता से जानबूझकर खेलने का आरोप न लगे, इसलिए "विधवा' की जगह "बिटिया' शब्द फिट कर दिया गया।
"राजनीति' के कथानाक का पूरा ताना-बाना जिस तरह बुना गया है, उसमें महिला को इस्तेमाल होने का सच तो जरूर दिखाया गया है, पर उसे इस्तेमाल करने वाले पुरुषों को लेकर खटकने वाली खामोशी बरती गई है। यहां तक कि राजनीति के महाभारती भाष्य में कथित रूप से कृष्ण का किरदार निभाने वाले नाना पाटेकर को भी इन मामलों से या तो कटा-कटा दिखाया गया है या फिर उनके समर्थन और आशीर्वाद से ही सारी लीला खेली जाती है। लीक से हटकर एक अलग फिल्म बनाने के प्रकाश झा के जज्बे की सराहना करते हुए इतनी शिकायत तो उनसे की ही जा सकती है कि महिलाओं के खिलाफ "दामुली' अत्याचार पर वह चाहे तो कुछ जरूरी सवाल तो जरूर खड़े कर सकते थे।