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गुरुवार, 29 सितंबर 2016

दरियादिली अब नहीं


-प्रेम प्रकाश
उरी में हुए आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य जोर आजमाइश की जो आशंका थी, वह अब काफी हद तक दूर हो चुकी है। संयुक्त राष्ट्र में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के भाषण से भी यह साफ हुआ कि भारत, पाकिस्तान के साथ फिलहाल किसी सीधे टकराव की स्थिति में खुद को नहीं ले जाएगा। दरअसल, ये सारी स्थितियां एक बार फिर इस बात को साफ कर रही हैं कि कम से कम नब्बे के दशक से शुरू हुए वैश्विक उदारीकरण के दौर के बाद से ग्लोब के किसी छोड़ पर बैठा देश किसी दूसरे देश के खिलाफ ऐलानिया जंग की बात नहीं कर सकता। लिहाजा आज अंतरराष्ट्रीय संबंधों में शह और मात की सबसे बड़ी बिसात कूटनीति है।
आधुनिक दौर के सबसे बड़े कूटनीतिज्ञ माने गए जर्मनी के प्रधानमंत्री बिस्मार्क ने कभी कहा था कि कूटनीति पांच-छह गेंदों को एक साथ हवा में उछालने और फिर उसे लपकने जैसा सर्कसी करतब है। इसमें सब्र और संतुलन दोनों का इम्तहान एक साथ होता है। भारत अब खासतौर पर सिंधु जल समझौते को कूटनीतिक मेज पर लाकर पाकिस्तान के साथ इसी सब्र और संतुलन के साथ दबाव बढ़ाने में लगा है। यह एक ऐसा वैकल्पिक और सुरक्षित कदम है जो पाकिस्तान पर सख्ती तो बढ़ाएगा ही, भारत को इस कारण अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस बात से घिरने से भी बचाएगा कि वह अपने पड़ोसी मुल्क के खिलाफ किसी तरह के हिंसक या सैन्य अभियान को अंजाम दे रहा है।
अच्छी बात यह है कि अभी इस बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय बैठक भर हुई है। पर पाकिस्तान में इसकी प्रतिक्रिया है कि आने वाले दिनों में उस पर आफत का कोई बड़ा पहाड़ टूटने वाला है। इस बैठक में प्रधानमंत्री मोदी ने यह कहकर पाकिस्तान के माथे पर सिलवटें बढ़ा दी हैं कि खून और पानी साथ नहीं बह सकते। जबकि बैठक में जल संधि में बदलाव की किसी दरकार पर कोई विचार नहीं किया गया है। इसमें हुआ बस यह है कि अब भारत इस समझौते के प्रावधानों का इस सख्ती से पालन करना चाहता है ताकि पाकिस्तान को ऐसा कोई अतिरिक्त लाभ न मिले, जो उसे अब तक मिलता रहा है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है सिंधु जल क्षेत्र में बिजली परियोजनाओं को विकसित करने पर जोर। इसके तहत जो पहला कदम उठाने को भारत उत्सुक है, वह है तुलबुल बिजली परियोजना को फिर से शुरू करना।
बात करें सिंधु जल समझौते की तो पाकिस्तान का एक बड़ा इलाका भारतीय सीमा से छोड़े गए नदियों के पानी पर आश्रित है। विश्व बैंक की मध्यस्थता के बाद 19 सितंबर 196० में भारत और पाकिस्तान के बीच यह समझौता हुआ था। तब भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अयूब खान ने इस पर दस्तखत किए थे। संधि के मुताबिक भारत पाकिस्तान को सिधु, झेलम, चिनाब, सतलुज, व्यास और रावी नदी का पानी देगा। मौजूदा समय में इन नदियों का 8० फीसदी से ज्यादा पानी पाकिस्तान को ही मिलता है। यह समझौता पिछले 56 साल से बगैर किसी रुकावट के जारी है। जबकि इस दौरान भारत-पाकिस्तान के रिश्ते कई बार पटरी से उतरे। यहां तक कि दोनों देश इस दौरान जंग के मैदान में भी आमने-सामने हुए। पर अब भारत इस संधि को पाकिस्तान पर कारगर सख्ती के एक बेहतर कूटनीतिक विकल्प के तौर पर आजमाना चाहता है। इसे मौजूदा हालात में जम्मू कश्मीर में पाक के बढ़े आतंकी शह को काउंटर करने और भारतीय हित रक्षाके लिहाज से सबसे बेहतर विकल्प भी माना जा रहा है।
दिलचस्प है कि घाटी में अभी जिस तरह के राजनीतिक हालात हैं, उसमें भी सरकार के लिए सिंधु जल समझौते को लेकर पाकिस्तान के साथ अब तक बरती जा रही उदारता से कदम पीछ खींचने में मदद मिलेगी। क्योंकि 2००2 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा में इस संधि को खत्म करने की मांग उठ चुकी है। साफ है कि जम्मू कश्मीर की अवाम को भी अब तक यही लगता रहा है कि भारत सरकार उसके स्थानीय हितों की उपेक्षा करके पाकिस्तान को मदद करती रही है।
भारत की इस नई पहल के बाद पाकिस्तान एकदम से सक्रिय हो गया है और वह तमाम देशों के अलावा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस बात को उठाने में लग गया है कि भारत को ऐसे किसी कदम को उठाने से रोका जाए जिससे पाकिस्तान में जल संकट जैसी स्थिति आए। विदेशी मामलों में पाक प्रधानमंत्री के सलाहकार सरताज अजीज ने 56 देशों को बकायदा पत्र लिखकर कश्मीर मामले पर दखल देने को कहा है। पाकिस्तान के सामने दोहरा संकट यह है कि एक तरफ तो वह जल संकट की आशंका से उबरना चाहता है, वहीं भारत की नई कूटनीतिक पहल के बाद उसके लिए इस बात को प्रचारित करना जरूरी हो गया है कि भारत जम्मू कश्मीर के बिगड़े हालात के लिए उसे नाहक कसूरवार ठहराने में लगा है।
यहां यह समझ लेना खासा जरूरी है कि सिधु जल समझौते को आधुनिक विश्व इतिहास का सबसे उदार जल बंटवारा माना गया है। इसके तहत पाकिस्तान को 8०.52 फीसदी पानी यानी 167.2 अरब घन मीटर पानी भारत सालाना देता है। नदी की ऊपरी धारा के बंटवारे में उदारता की ऐसी मिसाल दुनिया की किसी और संधि में नहीं मिलेगी। सिधु समझौते के तहत उत्तर और दक्षिण को बांटने वाली एक रेखा तय की गई है, जिसके तहत सिधु क्षेत्र में आने वाली तीन नदियां पूरी की पूरी पाकिस्तान को भेंट के तौर पर दे दी गई हैं और भारत की संप्रभुता दक्षिण की ओर तीनों नदियों के बचे हुए हिस्से में ही सीमित रह गई है।
जाहिर है भारत अब इस उदारता को आगे इसलिए नहीं निभाना चाहता क्योंकि इसके बदले उसे पाकिस्तान की तरफ से आतंकी और जेहादी मंसूबों का हिंसक अंजाम भुगतना पड़ता रहा है। आज जम्मू कश्मीर में लोकतांत्रिक तौर पर बहाल सरकार काम कर रही है। यही नहीं, कम से कम पिछले एक दशक में वहां पंचायत से लेकर विधानसभा तक लोगों ने जिस तरह लोकतांत्रिक व्यवस्था में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है, उससे वहां अमन चैन की एक स्वाभाविक स्थिति कायम होने में मदद मिलनी चाहिए थी। पर कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय विवाद का मुद्दा बनाने की पाकिस्तानी जिद ने आज घाटी की स्थिति को लेकर भारत सरकार को नए सिरे से सोचने करने पर मजबूरकर दिया है। अच्छी बात यह है कि नदियों के जल का इस्तेमाल स्थानीय स्तर पर खेती से लेकर बिजली निर्माण तक करने पर सरकार अब अगर जोर दे रही है तो इससे घाटी में तो विकास का एक नया दौर शुरू होगा ही पाकिस्तानी आतंकी हिमाकत पर भी नकेल कसने में मदद मिलेगी।

सोमवार, 11 अगस्त 2014

और सैम हो गए विश्वकर्मा


अमेरिका में जब बराक ओबामा राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतने में सफल हुए थे, तो वहां की और भारत की स्थितियों को राजनैतिक और बौद्धिक जमात के बीच कई तुलनात्मक नजरिए सामने आए। बार-बार अमेरिका के उदाहरण को सामने रखकर यह समझने की कोशिश की गई कि भारत उस उदार और विकसित राजनीतिक-सामाजिक स्थिति तक पहुंचने से कितनी दूर है, जब हम भी अपने यहां एक दलित को या एक मुसलमान को प्रधानमंत्री पद पर बैठा देखेंगे। जो बात ज्यादा भरोसे से और तार्किक तरीके से समझ में आई वह यही कि विकास और संपन्नता मध्यकालीन और जातीय बेडिèयों को तोड़ने के सबसे मुफीद औजार हंै। अमेरिका में ये औजार सबसे ज्यादा तेजी से काम कर रहे हैं। इसलिए वहां चेंज को अलग से चेज करने की जरूरत अब नहीं है। पर क्या भारत भी अपनी विकासयात्रा में उन्हीं सोपानों पर पहुंच रहा है, जहां चेंज कोई चैलेंज न होकर एक स्वाभाविक स्थिति बन जाती है। शायद नहीं।
दरअसल, हम बात करना चाह रहे हैं 2०12 में हुए उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों की। इस साल हुए आम चुनाव में यूपी के चुनावी गणित कितने काम आए, सबके सामने है। पर तब सभी सियासी पार्टियां इसे दिल्ली की सत्ता के सेमीफाइनल के तौर पर ही लड़ रही थीं। आरक्षण का खुर्शीदी-बेनी खेल पहले ही बोतल से बाहर आ गया तो रही-सही कसर जातीय राजनीति को लेकर खेले गए नंगे खेल ने पूरी कर दी।
क्षेत्रीय प्रभाव रखने वाले दलों की मजबूरी तो छोड़ दें, कांग्रेस और भाजपा जैसे राष्ट्रीय प्रभाव और विस्तार वाले दलों ने भी विकास व भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को छोड़कर क्षेत्र और जाति की राजनीति पर अपना यकीन ज्यादा दिखाया। बाबू सिह कुशवाहा मामले में भाजपा ने जहां आंतरिक विरोध तक को सुनना गंवारा नहीं किया, वहीं रियल और फेयर पॉलिटिक्स के हिमायती राहुल गांधी ने चुनावी सभा में सैम पैत्रोदा को विश्वकर्मा जाति का बताकर केंद्र में अपने पिता राजीव गांधी के कार्यकाल के आईटी विकास को जातीय तर्कों पर उतारने को मजबूर हुए।
विकास को सामाजिक न्याय की समावेशी संगति पर खरा उतारना तो समझ में आता है पर इसे सीधे-सीधे जातीयता की जमीन पर ला पटकना खतरनाक है। इस लिहाज से कांग्रेस पार्टी की इस हिमाकत को तब सबसे बड़ा मर्यादा उल्लंघन ठहराया गया था, जब उसने देश में आईटी क्रांति के प्रणेता रहे सैम पैत्रोदा को जातीय राजनीति के चौसर पर पासे की तरह फेंका। यह गलती नहीं बल्कि कांग्रेस की सोची-समझी चुनावी रणनीति थी, यह तब ज्यादा समझ में आया जब पार्टी ने अपना चुनाव घोषणा पत्र जारी करते हुए सैम को मीडिया से मुखातिब कराया। सैम अगर सबके सामने कैलकुलेटेड ढिठाई से यह कहते कि 'मैं बढ़ई का बेटा हूं और अपनी जाति पर मुझे फL है’, तो कांग्रेस का उनको लेकर खेला गया चुनावी खेल तो समझ में आता है पर सैम को क्या पड़ी थी कि वह खुद को इस खेल में इस्तेमाल हो जाने दिया, समझना थोड़ा मुश्किल है। क्या सैम की यह 'बढ़ईगिरी’ विकास को भी जातिगत शिनाख्त देने की दरकार को खतरनाक अंजामों तक ले जाने के लिए थी। राजीव गांधी के जमाने का आईटी 21वीं सदी के एक दशक बीतते-बीतते कहां पहुंच गई, आप नहीं समझ पा रहे तो राहुल बाबा से मिलें।

गुरुवार, 29 मई 2014

रोनाल्ड रीगन की तरह उभरे हैं मोदी


महज तुलना के भरोसे कभी भी गंभीर विमर्श आगे नहीं बढ़ाता। पर इसका यह कतई मतलब नहीं कि तुलना का कोई महत्व ही नहीं है। तुलनात्मक विवेक का होना तार्किकता के लिए तो जरूरी है ही, इससे अच्छे-बुरे की एक सामान्य समझ को विशिष्ट बनाने में भी मदद मिलती है। तुलना को लेकर यह भी काफी महत्व की बात है कि यह हमारी स्वाभाविक वृति का हिस्सा है। अपनी कोई भी राय बनाने या किसी निर्णय पर पहुंचने के लिए हम अकसर जिस साधन की मदद लेते हैं, वह तुलना ही है। एक की दूसरे से, पहले की बाद से तुलना करके ही हम अपनी किसी समझ को गढ़ते हैं।
देश में आजकल ऐसी ही समझ को गढ़ने का एक नया सिलसिला शुरू हो गया है। इस सिलसिले के केंद्र में हैं भारत के नए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। कोई उनकी तुलना उनकी पृष्ठभूमि और जीवन को देखते हुए पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री से कर रहा है तो कोई उन्हें गुजरात की माटी से निकला देश का एक और महापुरुष बता रहा है। गुजरात की ऐतिहासिकता को खंगालने वाले महात्मा गांधी, सरदार पटेल, मोरारजी देसाई की पांत में नरेंद्र मोदी को बिठा रहे हैं।
मोदी की छवि और नेतृत्व क्षमता को देखते हुए लोग उनकी तुलना दूसरे देशों के नेताओं से भी कर रहे हैं और यह काम भारत में ही नहीं पड़ोसी पाकिस्तान से लेकर ब्रिटेन और अमेरिका तक हो रहा है। कोई मोदी को चीनी राष्ट्रपति शी जिन पींग के समकक्ष रखकर देख रहा तो कोई रूसी राष्ट्रपति पुतिन और मोदी में विलक्षण समानताएं देख रहा है। 6० वर्षीय जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे से भी मोदी की तुलना करने वाले बहुतेरे हैं।
बात जिन पींग की करें या फिर पुतिन की या कि शिंजो आबे की, लोग इन विश्व नेताओं की तुलना नरेंद्र मोदी से करने में इसलिए दिलचस्पी दिखा रहे हैं कि इन सभी नेताओं ने अपने देश की एक मुश्किल वक्त में कमान संभाली है। यही नहीं, इन तीनों नेताओं को यह भी श्रेय जाता है कि वे अपने देश को लोगों में राष्ट्र स्वाभिमान की भावना का संचार कर लगन, ऊर्जा और जोश को नए सिरे से बहाल कर पाने में सफल रहे।
इस दृष्टि से नरेंद्र मोदी की सबसे दिलचस्प तुलना की गई है पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन से। इस तुलना में अतीत और वर्तमान के बीच जहां संवाद के पुल का निर्माण होता है, वहीं यह भी दिखता है कि किस तरह एक नया उन्नयन, एक नया उभार पूरी दुनिया की निगाहों को अपनी तरफ मोड़ने में सफल होता है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के साथ न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय विचार और संवाद जगत में उनको लेकर बातें हो रही हैं बल्कि अब भारत को लेकर भी नए तरह के आकलन और मूल्यांकन सामने आ रहे हैं।
बहरहाल, बात मोदी और रीगन की। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के प्रशासन से जुड़े रहे डेविड कोहेन ने लेख में नरेंद्र मोदी की तुलना पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन से की है। उन्होंने दोनों नेताओं में कई समानताएं गिनाई हैं। उनका मानना है कि भारत को अपनी वृहद आर्थिक संभावनाओं को साकार करने में मोदीनॉमिक्स मददगार होगा। उनकी बात से भारतीय पाठक दंग हैं कि पश्चिम से एक आवाज आई है जो मोदी के प्रति नकारात्मक नहीं है।
कोहेन रीगन के प्रशंसक हैं और भारत के भी। भारतीय समाज के बारे में उनकी आलोचना को एक अमेरिकी द्बारा भारत के कमतर दिखाने के बजाय उसे एक भारत समर्थक अमेरिकी की राय मानना चाहिए। जो अमेरिकी और भारतीय समाज की कई बुराइयों और अच्छाइयों में समानता देखता है। उन्हें अमेरिका के चालीसवें राष्ट्रपति रीगन और नरेंद्र मोदी में कई समानताएं नजर आती हैं। मसलन, दोनों ही सामान्य परिवेश से आए हैं। दोनों लोकप्रिय और राज्य के मुख्यमंत्री (रीगन कैलिफोर्निया के गवर्नर रहे हैं) रहे। दोनों ही नेता खुली अर्थव्यवस्था के समर्थक हैं। दोनों के राजनीतिक विरोधी भी एक जैसे हैं। अमेरिका की ही तरह भारत में भी सांस्कृतिक कुलीनों का एक वर्ग है जो हर बात की तस्दीक के लिए यूरोप के अपने पुराने शासकों की ओर देखता है। यह वर्ग रीगन की ही तरह मोदी का भी तिरस्कार करता रहा है। यह वर्ग इस खयाल से भी घबरा जाता है कि उसके देश का नेतृत्व एक चाय वाले के हाथ में आ सकता है।
अमेरिकी संभ्रांत वर्ग को लगता था कि रीगन एक गंवार और सीधे सादे व्यक्ति हैं जो अतिरेक से भरे हैं। उन्होंने चुनाव के समय चेताया भी था कि अगर रीगन राष्ट्रपति बन गए तो देश मुसीबतों में फंस जाएगा। चुनाव के बाद क्या हुआ यह अब तारीखहै। अमेरिका के इस वर्ग ने रीगन पर जातिवादी (रेसिस्ट) होने का भी आरोप लगाया। अमेरिका में इस वर्ग के पास जब तर्क और तथ्य नहीं होते तो वे गालीगलौज पर उतर आते हैं।
मोदी को भी उनके विरोधी सांप्रदायिक कहते हैं। इस तरह का आरोप लगाने के पीछे विरोधियों की नीति अल्पसंख्यकों को डराकर उनका समर्थन हासिल करने की रही है। डेविड कोहेन लिखते हैं कि उन्हें भारत की मुख्यधारा की मीडिया में हो रही चर्चा थोड़ी भ्रामक लगती है। इसके मुताबिक यदि आप धर्म के आधार पर लोगों के साथ अलग सलूक का समर्थन करें तो आप धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील समझे जाते हैं। यदि आप सभी नागरिकों को समान रूप से देखते हैं तो आप धार्मिक उग्रवादी हैं। उनके मुताबिक दूसरे धर्मों के अनुयायिओं विकास का अवसर देना हिदू धर्म की सहिष्णुता का परिचायक है। भारत के पड़ोसी पाकिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की हालत का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि मोदी को धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति असहिष्णु बताने वाले पड़ोसी देशों के मानक नहीं अपनाते।
कोहेन ने मोदी के पाकिस्तान के प्रति कठोर रवैए की तुलना रीगन के सोवियत संघ के प्रति रवैए से की है। उनका कहना है कि मोदीनॉमिक्स भारत की अंतर्निहित आर्थिक शक्ति के दोहन के लिए अच्छा है, जिसे क्रोनी सोशलिज्म ने अवरूद्ध कर रखा है। यदि भारत की बहुआयामी उद्यमिता को अवसर मिले वह आकाश की ऊंचाइयों को छू सकता है।
अमेरिका में नरेंद्र मोदी उसी वर्ग में अवांछित रहे हैं, जिस वर्ग में रीगन थे। उनके मुताबिक अमेरिका की नौकरशाही पर वामपंथी रुझान के आभिजात्य वर्ग का कब्जा रहा है। उसी ने मोदी के अमेरिकी वीजा मिलने में अड़ंगेबाजी की। अमेरिका ऐसे नेताओं को वीजा देते रहते हैं जिन्होंने अपने देश में धार्मिक अल्पसंख्यकों को गैरकानूनी घोषित कर रखा और दूसरे धर्मों के प्रति घृणा फैलाना जिनकी राष्ट्रीय नीति का हिस्सा है।
आखिर में डेविड कोहेन लिखते हैं कि भारत को शायद अपना रीगन मिल गया है। अमेरिका को अपना मोदी कब मिलेगा?
 

बुधवार, 22 जनवरी 2014

आप नहीं बदलाव का सारथी


बीते तीन-चार दिनों के घटनाक्रम में देश की राजनीति ने अपने लिए नई व्याख्या और विमर्श की चौहद्दी को और बढ़ा दिया है। निराश वे लोग ज्यादा हैं जिन्हें अब भी लोकतंत्र की व्यवस्था 'इनक्लूसिव’ की जगह 'इंपोजिंग’ ही पसंद आ रही है। 21वीं सदी का दूसरा दशक देश में जिस तरह के लोकतांत्रिक तकाजे को बहस के केंद्र में लेकर आया है, उसकी बुनियादी दरकार ही यही है कि जनकल्याण का ढिंढ़ोरा पीटकर सियासी रोटियां सेंकने के दिन बीत गए। अब तो विकास का कोरा नारा भी व्यापक लोकमत के निर्माण में कारगर औजार साबित होगा, ऐसा कहना जोखिम भरा है। ये तमाम स्थितियां एक ही सवाल को बार-बार रेखांकित कर रही हैं कि जनता और सरकार का अस्तित्व एक दूसरे से जुदा या एक के ऊपर एक की बजाय साझा क्यों नहीं हो सकता? और अगर ऐसा नहीं हो सकता तो फिर लोकतंत्र में लोक की उपस्थिति कहां है और किस भूमिका के साथ है?
जिन बीते तीन-चार दिनों की हम बात कर रहे हैं उसमें एक तरफ कांग्रेस पार्टी और उनके सबसे लोकप्रिय करार दिए जाने वाले नेता राहुल गांधी बार-बार ये समझाने में लगे रहे कि उनकी सरकार ने जनता को जितना अधिकार संपन्न बनाया है, उसके लिए जितने प्रत्यक्ष लाभाकरी कदम उनकी सरकार ने उठाए हैं, उतना किसी ने नहीं किया है। आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी अपनी इन उपलब्धियों के नाम पर जनता से वोट के रूप में अपने लिए श्रेय चाह रही है।
2००9 में जब कांग्रेस की अगुवाई में यूपीए दोबारा सत्ता में आई थी तो सबने एक तरफ से कहा था कि मनरेगा का जादू काम कर गया। अब जबकि इस साल फिर चुनाव होने हैं तो मनरेगा जैसी मेगा योजना तो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी है। यही नहीं इस दौरान यूपीए-एक और दो के कार्यकाल के कई बड़े घोटाले और वित्तीय अनियमितताओं के मामले भी इस दौरान सामने आए। सूचना के अधिकार कानून के तहत एक के बाद एक खुलासे हुए कि सरकार जिस तरह काम कर रही है, उसमें भ्रष्टाचार से चुनौती से निपटने का कोई कारगर मैकेनिज्म नहीं है। एकाधिक मामलों में सीएजी ने कहा कि फैसले लेने के तरीके में ही नहीं मंशा में भी गलतियां हुई हैं। ऐसे में 'पॉवर वैक्यूम’ से लेकर 'पॉलिसी पैरालाइज’ तक के तमगे सरकार को मिले। फिर इस बीच जिस तरह जनता महंगाई और विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार से जूझती रही, उससे कुल मिलाकर एक मोहभंग की स्थिति पैदा हुई।
दिलचस्प है कि राहुल गांधी इन स्थितियों के बावजूद चीजों को कामचलाऊ तरीके से समझना चाह रहे हैं। सुधार और परिवर्तन के नाम पर वे महज रफ्फूगिरी से काम चलाना चाहते हैं। अपनी गलतियों और असफलताओं को वे उपलब्धियां गिनाकर ढकना चाहते हैं। यह एक आत्मघाती सोच है। पहले उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में फिर राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और दिल्ली में जिस तरह पार्टी को मुंह की खानी पड़ी, उससे कांग्रेस उपाध्यक्ष की आंख अब तक खुल जानी चाहिए थी।
इस मोहभंग का भाजपा अपने तरीके से लाभ उठाना चाहती है। नरेंद्र मोदी के दबंग और सम्मोहक नेतृत्व को सामने लाकर पार्टी को लगता है कि केंद्र में दस साल की सत्ता की केंद्रित जड़ता को वह तोड़ देगी। मोदी अपनी तरह से विकास की बात करते हैं, देश के लोगों खासतौर पर युवाओं के पुरुषार्थ में भरोसा दिखलाते हैं, साथ भी बिजली, सड़क, पानी, उद्योग और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में गुजरात में किए गए अपने सफल प्रयोगों से लोगों में इस बार के चुनाव में परिवर्तन का विकल्प अपनी तरफ स्थिर करने का यत्न करते हैं। रविवार को दिल्ली के रामलीला मैदान में जब वे बोलने के लिए खड़े हुए तो उनकी नजर में देश के नवनिर्माण का एक पूरा ब्लू प्रिंट था। उन्होंने लंबा भाषण ही नहीं दिया, तकरीबन सभी मुद्दों पर अपनी राय और सोच भी सबके सामने रखी।
पर भाजपा और कांग्रेस दोनों ही एक बात में चूक कर रही है। वह चूक यह है कि जिस मतदाता के पास आखिरकार उन्हें जाना है, उसकी बदली सोच को रीड करने में दोनों से कहीं न कहीं भूल हो रही है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के प्रदर्शन के बाद मीडिया से लेकर देश में बहस के तमाम चौपालों पर अगर यह बात हो रही है कि देश वैकल्पिक राजनीति की तरफ बढ़ रहा है तो यह बात देश की दोनों बड़ी पार्टियों को न सिर्फ समझ में आनी चाहिए बल्कि इसका फर्क उनकी कार्यनीति और आचरण में भी आना चाहिए। सिर्फ यह कह देना कि प्रातिनिधिक की जगह प्रतिभाग के लोकतंत्र की तरफ हम कदम बढ़ाएंगे, काम नहीं चलेगा। देश की जनता के इस आंदोलनात्मक रुझान को पार्टियों को अपने विजन और एक्शन दोनों में ट्रांसलेट करके दिखाना होगा।
दोनों दलों को याद रखना पड़ेगा कि बीते तीन-चार सालों में जनता अगर एकाधिक बार भ्रष्टाचार और महिला असुरक्षा के खिलाफ उतरी है तो यह कौल किसी पार्टी या नेता का नहीं था। देश की सिविल सोसाइटी ने अपने को आगे किया और देश में व्यवस्था परविर्तन की छटपटाहट को सड़क पर ला दिया। आम आदमी पार्टी इसी छटपटाहट का नतीजा है। यह पार्टी अपनी नीति और एजेंडे को लेकर आज जरूर कंफ्यूज्ड जरूर दिखाई पड़ती है पर उसके उन्नयन में कहीं न कहीं वैकल्पिक राजनीति की तलाश शामिल है।
आप से घबराए दलों के लिए शुक्र की बात यह है कि विचार और संगठन के स्तर पर उसकी लड़खड़ाहट साफ तौर पर जाहिर हो रही है। दिल्ली में सरकार बनाने के बाद गवर्नेंस के स्तर पर उसे उम्दा प्रदर्शन करके मिसाल पेश करनी चाहिए थी पर वह अब एक अराजकतावादी राह पर है। आप दिल्ली विधानसभा चुनाव के रिफ्लेक्शन को लोकसभा चुनाव में भी देखना चाहती है। इसलिए वह और उसकी सरकार फिर से सड़क पर प्रतिरोधी तेवर के साथ दिखना चाह रही है। यह आप की रणनीति कम असफलता ज्यादा है। यह उस उम्मीद के साथ भी नाइंसाफी है, जो आप ने लोगों के मन में राजनीतिक बदलाव के नाम पर जगाई थी।
पर आप के भटकाव के बावजूद यह कहीं से साबित नहीं होता कि देश की राजनीति में विकल्प का खाली स्पेस भरने की दरकार ही खारिज हो गई। भारतीय जन-गण का नया मन परंपरावादी राजनीति से वाकई तंग आ चुका है। देश की राजनीति में एक नई ताजी बयार को महसूस करने की तड़प मुट्ठियां बांध चुकी हैं। इन बंधी मुट्ठियों की ताकत को समझना होगा। भाजपा और कांग्रेस की मुश्किल यह है कि वह एक ही तरह के पॉलिटिकल कल्चर में कहीं न कहीं ढ़ल चुकी हैं। नई स्थितियों में जनता के बीच, जनता के साथ और जनता के बल पर ये पार्टियां अगर अपनी ताकत को गुणित नहीं करती हैं तो वह अपने सामथ्र्य के साथ बेईमानी करेंगी। खासतौर पर यह उम्मीद भाजपा को लेकर ज्यादा है क्योंकि वह केंद्र में पिछले दस सालों से सत्ता से बाहर है। वह देश के नागरिक समाज के साथ बेहतर संवाद कर अपनी संभावना में जादुई पंख लगा सकती है।
एक बात और यह कि परिवर्तन का पेटेंटे किसी एक नेता या आदमी के नाम पर दर्ज नहीं होता है। इसलिए सिविल सोसायटी की सक्रियता और आप के उभार को लेकर घबड़ाई हुई प्रतिक्रिया वही लोग दे रहे हैं, जिन्हें लग रहा है कि जनता इस उभार के साथ बंधक की तरह साथ है। दरअसल, देश में जनतांत्रिक सशक्तिकरण एक सामयकि दरकार है और इस दरकार को अपने सारोकारों में शामिल कर जो भी दल या नेता आगे बढ़ेंगे जनता उसके साथ होगी।
 

शनिवार, 21 दिसंबर 2013


अमेरिका 2०13 में दो हफ्ते से भी ज्यादा शटडाउन के खतरे में पड़ गया था। हालांकि यह संकट वहां डेमोक्रेट और रिपब्लिकन पार्टियों के बीच सियासी भिड़ंत के कारण आया था। पर यह सूरत एक बार फिर से इस तरफ इशारा कर गई कि दुनिया की तमाम बड़ी आर्थिक ताकतें कहीं न कहीं आज उस मुकाम पर पहुंच गई हैं, जिसमें उनका आर्थिक स्वाबलंबन कभी भी डगमगा सकता है। डॉलर से लेकर यूरो जोन तक की अर्थव्यवस्थाएं लगातार अपने को बचाने में लगी हैं। इस बात को समझना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यही बीते कुछ सालों से देश-दुनिया के रिश्ते को तय करनेवाले नियामक मुद्दे रहे हैं।
दिलचस्प है कि यह एक ऐसे दौर की सचाई बनती जा रही है जिसे 'उदार’ होने का खिताब दिया गया है। अमेरिका इस खिताब को पूरी दुनिया में बांटने वाला अगुवा देश है पर जो सूरत अब वहां भी बराक ओबामा के पिछले और मौजूदा कार्यकाल में बनी है, उसमें आर्थिक सुरक्षा के लिए उसे दुनिया के तमाम देशों के साथ अपने आर्थिक सरोकार खासे 'अनुदार’ तौर पर तय करने पड़ रहे हैं। यह सूरत 2०14 में अचानक से बदल जाएगी, ऐसी कोई उम्मीद न के बराबर ही दिखती है। यह अलग बात है कि अमेरिका इस बदले हालात में भी सुपर पावर नंबर वन होने के अपने दावे को अलग-अलग तरीकों से मजबूत करता रहा है। इस मजबूती के लिए वह कभी ईरान और उत्तर कोरिया पर अपनी आंखें तरेरता है तो वहीं पाकिस्तान जैसे राष्ट्र को प्रत्यक्ष-परोक्ष समर्थन और मदद देकर एक पूरे क्षेत्र में अपनी भूमिका के रकबे को लगातर बढ़ाने की जुगत में रहता है। उसकी यह जुगत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अगले साल भी जारी ही रहेगी, ऐसा मानकर चलना चाहिए। वैसे संतोषप्रद यह जरूर है कि जिस तरह इस साल ईरान के मामले में उसकी हिमाकत एक सीमा से आगे नहीं बढ़ पाई, वैसी स्थिति नए वर्ष में भी अमेरिका के कई विस्तारवादी मंसूबों पर पानी फेर सकता है।
बात करें भारत की तो अगले साल यहां लोकसभा चुनाव होने जा रहे हैं। जो सूरत और संकेत हैं, उसमें केंद्र की अगली सरकार यूपीए की बनती नहीं दिख रही है। वैसे भाजपा की अगुवाई में अगर अगली सरकार एनडीए की भी बनती है तो देश की विदेश नीति में कोई बहुत बुनियादी फर्क आएगा, ऐसा लगता नहीं है। हां, पाकिस्तान को लेकर भावी केंद्र सरकार के रवैए में थोड़ी सख्ती जरूर देखने को मिल सकती है। अलबत्ता यह सख्ती भी युद्धक होने की इंतिहा तक शायद ही पहुंचेगी। आखिर भारत और पाकिस्तान दोनों ही एटमी देश हैं। वैसे एक शुभ संकेत जरूर है कि पाकिस्तान में 2०13 में नवाज शरीफ के नेतृत्व में नई सरकार बनी है। पिछले दिनों वहां के सेनाध्यक्ष भी बदल गए हैं। ऐसे में राजनयिक कुशलता का अगर परिचय दिया जाए तो दोनों देशों के रिश्ते में थोड़ी मिठास घुल सकती है।
इस साल भारत और चीन के बीच सीमा विवाद काफी उलझा रहा और इसमें हमारा देश कई बार बैकफुट पर भी दिखा। पर आखिरकार सरकार ने इस मामले को गंभीरता से लिया और सीमा पर अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने का फैसला किया। यह सामरिक सुदृढ़ता भविष्य में चीन के खिलाफ भारत की स्थिति को रणनीतिक रूप से मजबूत करेगी।

सोमवार, 16 दिसंबर 2013

विसर्जन स्थापना की जरूरी शर्त नहीं


अस्मिता की राजनीति के दौर में भावनाओं के ज्वार खूब फूट रहे हैं। हर तरफ इस तरह के स्वर उठ रहे हैं कि फलां समुदाय के नेता के साथ तारीखी तौर पर अन्याय हुआ और अब उनके सही मूल्यांकन का समय आ गया है। किसी को स्थापित करने के लिए किसी को भंजित करना भी जरूरी होता है। सो हो यह रहा कि कई ऐतिहासिक नायकों के चेहरों पर कालिख पोती जा रही है। अस्मितावादी विमर्श में पिछले दो दशकों में ऐसी तमाम कोशिशों को एक बड़े अन्याय के खिलाफ खड़े होने का आधार माना जा रहा है। यह आधार अभिजात्यवादी या सवर्णवादी मानसिकता के खिलाफ सोशल चेंज -अब तो इसे सोशल इंजीनियरिंग तक कहा जा रहा है- का जरूरी औजार के तौर पर काम कर रहा है, ऐसा मानने वाले प्रगतिशील भी कम नहीं हैं। पर इस सोच का इस सवाल के बाद क्या मतलब रह जाता है कि बड़ी लकीर से आगे उससे बड़ी लकीर खिंचने की बजाय पहली खिंची लकीर के साथ ही काट-पीट क्यों?
कुछ विसर्जित होगा, भंजित होगा तभी नया कुछ स्थापित होगा, ऐसी सोच तो हिंसक ही मानी जाएगी। अंबेडकर के नाम पर सामाजिक न्याय की गोलबंदी ने समाज के जातीय तानेबाने को कैसे देखते-देखते वैमनस्य का नागफनी मैदान बना दिया, यह अनुभव हमारे सामने है। इसमें साफ होने की बात यह है कि जातीय विभेद अच्छी बात है, यह कोई नहीं कह रहा पर इसे मिटाने के नाम पर अगर सामाजिक समरसता का पारंपरिक आधार भी अगर दबता-मिटता चला जाए तो इस प्रतिवादी संतोष का हासिल क्या एक हिंसक नियति से ज्यादा रह जाता है।
अभी गुजरात के मुख्यमंत्री देश भर में घूम-घूमकर सरदार पटेल की दुनिया की सबसे बड़ी प्रतिमा स्थापित करने के लिए देशभर के किसानों से लोहा दान देने की बात कह रहे हैं। पहली नजर में यह एक आदर्श राष्ट्रवादी सोच दिखती है। ऐसा अगर इस अभियान को लेकर अगर कोई सोचता है, तो वह गलत भी नहीं है। सरदार का भारत के एकीकरण और राष्ट्र के रूप में उसके निर्माण में एक बड़ा योगदान है। इस योगदान का स्मरण हमें अपने राष्ट्र के प्रति गर्वित करता है। पर बात यहीं खत्म होती तो गनीमत थी। हम अपने बाकी के राष्ट्र नायकों का स्मरण कैसे करते हैं और उनके शील और विचार हम पर कितना कारगर असर अब तक छोड़ते रहे हैं, यह सचाई भी हमारे सामने है। दिनकर ने इन्हीं स्थितियों को ध्यान में रखकर बहुत पहले लिखा- 'तुमने दिया देश को देश तुम्हें क्या देगा, अपनी ज्वाला तेज करने को नाम तुम्हारा लेगा।’
सरदार की विशालकाय प्रतिमा के स्थापना पर महात्मा गांधी के पौत्र राजमोहन गांधी ने पहले तो हर्ष जताया। कहा कि सरदार साहब का व्यक्तित्व ऐसा रहा, जिसके कारण पूरे देश का उनके प्रति स्नेह रहा। यह स्नेह अब और प्रगाढ़ हो रहा है, तो यह प्रसन्नता की बात है। पर जिस रूप में यह सब किया जा रहा है, वह सही नहीं है। इससे एक तो यह पूरा मिशन ही अपने रास्ते से भटकेगा, दूसरा इसकी देखादेखी एक होड़ पैदा लेगी बाकी नेताओं और प्रतीक पुरुषों की बड़ी से बड़ी प्रतिमा स्थापित करने की। इससे देश और समाज का कोई भला तो क्या होगा नुकसान भले बहुत ज्यादा हो जाएगा।
राजमोहन गांधी ने ये बातें किसी पक्षकार के नाते नहीं कही। बल्कि उन्होंने ये बातें किसी नाते कही तो वे सरदार के व्यक्तित्व और कृतित्व के मुरीद होने के नाते। वे उन दलीलों में भी नहीं उलझे कि अब क्यों अचानक उनके नाम पर राजनीति हो रही है। अगर सरदार 'भारत रत्न’ हैं तो उन्हें इस या उस दल का नेता बताने का क्या औचित्य है? फिर यह भी कहने का क्या मतलब कि अगर सरदार पटेल तब देश के प्रधानमंत्री बने होते तो देश की आज तस्वीर ही कुछ दूसरी होती। यह भी कि तब न पाकिस्तान हमारे लिए सिरदर्द बनता और न ही आतंकवाद हमारे लिए एक नासूरी समस्या बनता।
कुछ अर्से पहले जब कश्मीर वार्ताकारों की टीम ने भारत सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी तो यह बहस छिड़ी कि क्या ऐतिहासिक घटनाक्रमों को बदला जा सकता है। इस बहस को आगे बढ़ाने की पैरोकारी करने वाले ही आज यह दलील दे रहे हैं कि सरदार को उनके दल ने पर्याप्त सम्मान और अवसर नहीं दिए। अलबत्ता यहां यह बात जरूर साफ होने की नहीं कि इतिहास कोई बंद किताब भी नहीं जो बस हमारी स्मृतियों के ताखे पर रखी रहे। इतिहास भविष्य के लिए हमारी आंखें हैं। हमारे संचित अनुभव हैं, जिससे भविष्य के मुहाने खोलने में हमें मदद मिल सकती है। इतिहास से मुठभेड़ भी होनी चाहिए क्योंकि यह एक गलत लीक को दुरुस्त करने की सबसे जरूरी दरकार है। पर इतिहास के प्रति कुढ़न और दुराग्रह का औचित्य कतई स्वस्थ नहीं हो सकता।
राजमोहन गांधी एक और खतरे की तरफ इशारा करते हैं। यह इशारा महिमा मंडन की राजनीति की तरफ है। ऐसी राजनीति शुरू तो होती है देश और समाज की नजर में किसी की शिनाख्त को और ज्यादा मुकम्मल करने, उसे और ऊपर उठाने के लिए। पर आगे चलकर यह कोशिश दूसरी तमाम शिनाख्तों को तहस-नहस करने की हिंसक सनक में बदल जाती है। सरदार का नाम ऐसे किसी सनक का हिस्सा बने, यह कौन चाहेगा। पर अगर ऐसा किसी पहल से हो जाने का खतरा है तो इसके बारे में सावधान तो रहना ही चाहिए।
एक बात और यह कि भारत की जिस सामासिक संस्कृति और परंपरा की बात की जाती है, वह सिर्फ जीवन, समाज या रहन-सहन से ही नहीं जुड़ा है। यह उस सोच को भी दर्शाता है जिसमें तमाम तरह के विचार और अनुशीलन एक साथ हमारे बीच अपना लोकतांत्रिक आधार विकसित करते हैं। समय के साथ इनमें से कई आधार दरकते चले जाते हैं तो कुछ और विस्तृत, और पुष्ट। अद्बैत से लेकर द्बैत तक की हमारी दार्शनिक समझ भी यही जाहिर करती है कि हम एक गंत्वय की तरफ शुरू से कई रास्तों से बढ़ते रहे हैं। विचार और आचरण के बीच विकल्प और स्वतंत्रता का खुलापन यह दिखाता है कि चयन और निर्णय करने की हमारी पूरी प्रक्रिया शुरू से खासी खुली और लोकतांत्रिक रही है। भारतीय सांस्कृतिक विमर्श में यह बहस खूब चली है कि एक ऐसी जागरूक चेतना और लोकतांत्रिक मानस से लैश देश-समाज को दशकों लंबी दासता का दंश आखिर क्यों झेलना पड़ा? इस सवाल को कुछ लोग इसका जवाब भी मानते हैं कि यह हमारी प्रखर चेतना की समन्वयी ताकत के ही बूते का था कि हम दासता की इतनी लंबी यातना के खिलाफ निर्णायक रूप से खड़े हो सके।
वैसे सरदार की प्रतिमा के बहाने अगर राष्ट्र निर्माण से जुड़ी तमाम तरह की चिंताओं-आशंकाओं का जाहिर होना एक तरह से शुभ लक्षण भी है। यह दिखलाता है कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को लेकर हमारी चेतना कितनी गहरी, कितनी उर्वर और कितनी जिम्मेदार है। एक देश का इससे बड़ा सौभाग्य क्या हो सकता है कि उसका भाल हमेशा तिलकित रहे और हमेशा चमकता रहा, इसके लिए उसकी संतानें इतनी विपुल आस्था के साथ विचार मंथन करती हैं।
 

मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

गरीब हम हैं इसलिए कि तुम अमीर हो गए


भारत की गिनती जरूर आज दुनिया में चीन के बाद सबसे ज्यादा सुरक्षित और संभावनाओं से भरे इकोनमी के रूप में होती है पर देश के भीतर विकास को लेकर वर्गीय अंतर खतरनाक तरीके से बढ़ गया है। तभी अपने देश में अब सीधे विकास को लेकर बात नहीं हो रही बल्कि इसके समावेशी आयाम पर सर्वाधिक बल दिया जा रहा है। आर्थिक सोच में आया यह फर्क अकारण नहीं है।
वित्त राज्यमंत्री नमोनारायण मीणा ने संसद में ग्लोबल वेल्थ इंटेलीजेंस फर्म के हालिया सर्वे की चर्चा में बताया कि देश के चोटी के सर्वाधिक 8200 अमीर लोगों के पास करीब 945 अमेरिकी डॉलर की दौलत है, जो देश की अर्थव्यवस्था का तकरीबन 70 फीसद हिस्सा है। साफ है कि धन और साधन के असमान वितरण की चुनौती एक खतरनाक स्थिति की ओर इशारा कर रही है।
कुछ महीने पहले आए 'हंगामा' रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ था कि देश में 14 करोड़ नौनिहालों का बचपन महज इस कारण असुरक्षित और बीमार है क्योंकि वे कुपोषित हैं। अभी कुछ ही दिन हुए हैं, जब योजना आयोग की तरफ से आए निर्धनता तय करने के अतार्किक पैमाने पर संसद से लेकर सड़क तक शोर मचा। आयोग ने अपनी रपट में शहरी क्षेत्रों में रोजाना 28.65 और देहाती इलाकों में 22.42 रुपए खर्च करने वालों को गरीबी रेखा से ऊपर माना है। कहने की जरूरत नहीं कि यह आमजन के प्रति एक तंग नजरिया है।
भूले नहीं हैं लोग आज भी अर्जुन सेनगुप्ता कमेटी की उस चर्चित रपोर्ट को जिसमें दावा किया गया था कि देश की 77 फीसद आबादी 20 रुपए रोजाना से कम पर अब जीवन गुजारने को विवश है। आज जब वित्तमंत्री कड़े फैसले लेने की दरकार पर जोर देते हैं तो इसमें यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि कड़े फैसले का मतलब अब भी कर ढांचा और आयात-निर्यात नीति आदि में बदलाव मात्र हैं तो यह विकास की असमानता को तो दूर करने वाली अर्थनीति तो साबित होने से रही।
समावेशी अर्थ विकास का दर्शन अगर आज भी सरकारी जुमलेबाजी का हिस्सा भर है तो आगे देश में गरीबी-अमीरी की खाई और बढ़ेगी ही। पिछले कुछ महीनों में भारत सहित दुनिया भर में आर्थिक मोर्चे पर चिंताएं सघन हुई हैं। चार साल पहले की विश्व मंदी एक बार फिर से सिर उठा रही है और इस बार इसकी चपेट में डॉलर से लेकर यूरोजोन तक की इकोनमी के आने का अंदेशा है। ऐसे में भारत को अपने आर्थिक विकास को वर्टिकल से हॉरिजेंटल ग्रोथ की तरफ फोकस करना होगा।

सोमवार, 29 अगस्त 2011

क्या हुआ जो मीडिया भी अन्ना गया


 स्वतंत्र भारत में चौबीसो घंटे के खबरिया चैनलों का दौर शुरू होने और भाषाई पत्रकारिता के विकेंद्रित विस्तार के बाद यह पहला अनुभव है, जब  अखिल भारतीय स्तर पर जनभावना का कोई दिव्य प्रकटीकरण हो। जो लोग आज अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में 1974 के जयप्रकाश आंदोलन की लिखावट पढ़ने चाह रहे हैं, उनकी भी पहली प्रतिक्रिया यही है कि लोकपक्ष और नए मीडिया का सकरात्मक साझा चमक के साथ कितना असर पैदा कर सकता है, यह चमत्कृत कर देने वाला अनुभव है। प्रेस को अगर लोकतंत्र का विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद चौथा बड़ा स्तंभ माना गया है, तो इसलिए भी कि उसकी भूमिका एक लोकतांत्रिक व्यवस्था को चलाने के लिए खासी जिम्मेदारी से भरी है। इमरजेंसी के दौरान जिम्मेदारी के इन हाथों को बड़ियां पहनाई गई थी तो अपने संपादकीय स्तंभ की जगह को खाली छोड़ अखबारों ने अपना विरोध जताया था।
15 अगस्त की अगली सुबह देश में नागरिकों के अहिंसक और  शांतिपूर्ण प्रतिरोध के अधिकार पर जो कुठाराघात हुआ, संसद का सत्र जारी रहने के बावजूद उसकी गूंज वहां के बजाय मीडिया में ज्यादा पैदा हुई। यह देश की मीडिया का सद्विवेकी रवैया का ही नतीजा रहा कि उसने लोकपक्ष की जुबान और चेहरा बनने का फैसला लिया। कह सकते हैं कि न्यायकि सक्रियता के बाद देश में मीडिया की सक्रियता के यह एक नए सर्ग का शुभारंभ है। दिलचस्प है कि अन्ना हजारे ने भी 16 अगस्त से अपने प्रस्तावित अनशन से एक दिन पहले मीडिया का इस बात के लिए शुक्रिया अदा किया था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी मुहिम को जोर पकड़ाने में उसकी बड़ी भूमिका रही है। यही नहीं जब वे रामलीला मैदान से अनशन से उठे तो उन्होंने और उनके साथियों ने मीडिया का कई-कई बार आभार जताया। 
असल में यह एक जीवंत और प्रगतिशील लोकतंत्र का तकाजा है कि लोक भावना और लोक संघर्ष  के स्पेस को वह न तो कमतर करता है और न ही उसे खारिज करता है। क्योंकि इससे लोकहित के मुद्दों के दरकिनार हो जाने का खतरा पैदा होता है। समाचार की 'इंफोमेंटी" समझ और 'प्रोफेशनल" होड़ ने मीडिया की भूमिका पर पिछले दो दशकों में कई सवाल उठाए हैं। प्रेस की आजादी के नाम पर मनमानी करने की छूट ने लोकतंत्र की एक जिम्मेदार संस्था को काफी हद तक अगंभीर और गैरजवाबदेह बना दिया है, ऐसे आरोप मीडिया पर लगने अब आपवादिक नहीं रहे। ऐसे में मीडिया के लिए यह फख्र के साथ सबक सीखने का भी अवसर है कि अगर वह लोकचेतना का चेहरा बनने का दायित्व पूरा करता है तो न सिर्फ उसकी विश्वसनीयता बहाल रहती है बल्कि उसकी साख भी बरकरार रहती है। 
लोकहित का तकाजा ही यही है कि उसे गुमराह करने के बजाय उसका हमकदम बना जाए, उसका मार्गदर्शी बना जाए। नया मीडिया ज्यादा तकनीक संपन्न है, लिहाजा उससे ज्यादा जिम्मेदार पहरुआ (वॉच डॉग) भी होना चाहिए। ऐसे में कुछ लोगों और समाज के कुछ वर्गों से आई कुछ शिकायतें मायने रखती है। मसलन असम के इरोम शर्मिला के दस साल से चले आ रहे अनशन का मुद्दा चौबीसों घंटे चौकन्ना मीडिया की आंखों से ओझल क्यों रहा? इसी तरह क्या पूनम पांडे और राखी सावंत को जिस मुंह से घर-घर तक पहुंचाने वाले मीडिया के पेशेवर सरोकार क्या वक्त-बेवक्त सुविधानुसार नहीं बदलते हैं और क्या यह बदलाव पूरी तरह विश्वसनीय माना जा सकता है।
बहरहाल, अन्ना का आंदोलन भले फिलहाल समाप्त हो चुका हो पर देश में लोकहित के कई जरूरी मुद्दे अब भी सरकार और व्यवस्था के एजेंडे में शामिल होने बाकी हैं। नए मीडिया का एक दायित्व यह भी कि वह हाशिए के इन मुद्दों को उठाए और एक सशक्त लोकमत के निर्माण का अपना दायित्व आगे भी पूरी ऊर्जा के साथ निभाए।

शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

आंदोलन की बहुरंगता को बदरंग देखना


अंग्रेजों ने भारत को कभी संपेरों और भभूती साधुओं का देश कहा था। आज भी दुनियाभर के इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों के बीच इस देश की रचना और चेतना को लेकर कई समानान्तर मत हैं। खुद अपने देश को देखने की जो समझ हमने पिछले छह दशकों में गढ़ी है, वह भी या तो कोरे आदर्शवादी हैं या फिर आधी-अधूरी। ऐसी ही एक समझ यह है कि भारत विविधताओं के बावजूद समन्वय और समरसता का देश है। ये बातें छठी-सातवीं जमात के बच्चे अपने सुलेखों में भले आज भी दोहराएं पर देश का नया प्रसंस्कृत मानस इस समझ के बरक्स अपनी नई दलील खड़ा कर रहा है।
असल में अपने यहां देश विभाजन की बात हो या सामाजिक बंटवारे की, राजनीतिक तर्क पहले खड़ा हुआ और बाद में सरजमीनी सच को उसके मुताबिक काटा-छांटा गया। मजहबी और जातिवादी खांचों और खरोचों को देश का इतिहास छुपा नहीं सकता पर यह भी उतना ही बड़ा सच है कि इन्हें कम करने और पाटने की बड़ी कोशिशों को देश की सामाजिक मुख्यधारा का हमेशा समर्थन मिला है। और इस समर्थन के जोर पर ही कभी तुलसी-कबीर का कारवां बढ़ा तो कभी  गांधी-लोहिया-जयप्रकाश का। बीच में एक कारवां विनोबा के पीछे भी बढ़ा, पर उनके भूदान आंदोलन की सफलता अपने ही बोझ से दब गई और बाद में इस सफलता के कई अंतर्द्वंद भी सामने आए। अभी देश में पिछले कुछ महीनों से जब भ्रष्टाचार के खिलाफ जनाक्रोश सड़कों पर उमड़ना शुरू हुआ है तो इस आक्रोश की वजहों को समझने के बजाय इसके चेहरे को पढ़ने में नव प्रसंस्कृत और प्रगतिशील मानस अपनी मेधा का परिचय दे रहा है। 
जनलोकपाल बिल के माध्यम से भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी मुहिम को देखते-देखते आजादी की दूसरी लड़ाई की शिनाख्त देने वाले अन्ना हजारे आज की तारीख में देश का सबसे ज्यादा स्वीकृत नाम है। गांधीवादी धज के साथ अपने आंदोलन को अहिंसक मूल्यों के साथ चलाने वाले हजारे का यह चरित्र राष्ट्र नेतृत्व का पर्याय बन चुका है तो इसके पीछे उनका जीवनादर्श तो है ही, वे प्रयोग भी हैं जिसे उन्होंने सबसे पहले अपने गांव समाज में सफलता के साथ पूरे किए। लिहाजा, यह सवाल उठाना कि उनके साथ उठने-बैठने वालों और उनके आह्वान पर सड़कों पर उतरने वालों में दलित या मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी नहीं है, यह एक आंदोलन को खारिज करने की ओछी हिमाकत से ज्यादा कुछ भी नहीं।
भूले नहीं होंगे लोग कि इसके पहले जब हजारे के जंतर मंतर पर हुए अनशन के बाद सरकार सिविल सोसायटी के साथ मिलकर लोकपाल बिल के बनी संयुक्त समिति के सोशल कंपोजिशन पर भी सवाल उठाए गए थे। अब जबकि रामलीला मैदान में हजारे के अनशन और उनकी मुहिम के समर्थन में देश के तमाम सूबों और तबकों से लोग घरों से बाहर आए हैं, तो 'तिरंगे' के हाथ-हाथ में पहुंचने और 'वंदे मातरम' के नारे के आगे मजहबी कायदों की नजीर रखी जा रही है। आरोप और आपत्ति के ये स्वर वही हैं, जिन्हें पेशेवर एतराजी होने फख्र हासिल है।
बहरहाल, जिन लोगों को लगता है कि महाराष्ट्र के एक गांव रालेगण सिद्धि से चलकर दिल्ली तक पहुंचे अन्ना हजारे के आंदोलन को समाज के हर तबके का समर्थन हासिल नहीं है, उन्हें अपने जैसे ही कुछ और आलोचकों की बातों पर भी गौर करना चाहिए। कहा यह भी जा रहा है बाजार के वर्चस्व और साइबर क्रांति के बाद देश में यह पहला मौका है जब जनांदोलन का इतना बड़ा प्रकटीकरण देखने को मिला है। यही नहीं इसमें शामिल होने वालों में ज्यादातर संख्या ऐसो लोगों की है, जिन्होंने आज तक किसी मोर्चे, किसी विरोध प्रदर्शन में हिस्सा नहीं लिया। लिहाजा यह देश की लोकतांत्रिक परंपरा का एक नया सर्ग भी है, जिसकी लिखावट में समय और समाज के के नए-पुराने रंग शामिल हैं। इस बहुरंगता को बदरंग होने से बचाना होगा।

गुरुवार, 19 मई 2011

बिग बी को बताओ, जीती कैसे आशा


ऑक्सफोर्ड की लाइब्रोरी में मैग्ना कार्टा चार्टर देखकर अमिताभ बच्चन जब अभिभूत होते हैं तो अखबारों, टीवी चैनलों के लिए यह न छोड़ी जा सकने वाली खबर होती है। यह स्थिति तकरीबन वैसी ही है कि पूरब में खड़े होकर कोई पश्चिम को सूर्य का घर माने और उसकी लाली से अपनी चेतना और इतिहास बोध को रंग ले। दरअसल, हम बात कर रहे हैं लोकतंत्र की उन जड़ों की जिसकी डालियों पर झूला डालने वाले परिंदे आपको आज पूरी दुनिया में मिल जाएंगे। पर लोकतंत्र महज एक शासनतंत्र नहीं, एक जीवनशैली और मानवीय इच्छाशक्ति भी है। अगर यह बोध और सोच किसी को भावनात्मक अतिरेक लगे तो उसे भारत के पांच लाख गांवों के सांस्कृतिक गणतंत्र की परंपरा से परिचित होना चाहिए। परंपरा का यह प्रवाह आज जरूर पहले की तरह सजल नहीं रहा, पर है वह आज भी कायम अपने जीवन से भरे बहाव के साथ। अगर यकीन नहीं हो तो चलिए उस छोटे से गांव में जहां गणतंत्र आज भी सबसे बड़ी 'आशा' है, सबसे बड़ा यकीन है कल को आज से बेहतर होने का।
पिछले तीन दशकों में घाटी में उतनी बर्फ नहीं गिरी, जितनी आंच दिल्ली से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वहां के हालात को लेकर महसूस की गई। यह भारत की लोकतांत्रिक निष्ठा की कहीं न कहीं जीत ही है कि उसने अपने इस सबसे अशांत सूबे में भी लोकतांत्रिक शासन को लगातार बहाल रखा। जम्मू कश्मीर के हालात और राजनीति पर फारूख अब्दुल्ला ने कभी कहा था कि उनकी मजबूरी है कि वह हमेशा दिल्ली की सत्ता का साथ दें। पक्ष और विरोध के लोकतंत्र में दरअसल, यह तकाजा महज राजनीति का नहीं बल्कि उस तकाजे का भी है जो जम्मू कश्मीर को देश की मुख्यधारा के साथ एकमेक रहने की दरकार पेश करता है।  पिछले दिनों जब देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां चल रही थी, उसी दौरान जम्मू कश्मीर सहित कई प्रदेशों में लोकतंत्र का एक और बड़ा अनुष्ठान पंचायत चुनाव के रूप में चल रहा था। विधानसभा चुनावों, भ्रष्टाचार के खिलाफ अदालती कार्रवाई और नागरिक समाज की मांगों और आतंकी सरगना ओसामा बिन लादेन के खात्मे के शोरगुल में इस अनुष्ठान की तरफ कम ही लोगों का ध्यान गया। अलबत्ता स्थानीय लोगों की दिलचस्पी जरूर इसमें बनी रही। दिलचस्प तो यह रहा कि अशांत घाटी में इन चुनावों का औपचारिक निर्वाह ही जहां बड़ी कामयाबी ठहराई जा सकती थी, वहां अस्सी फीसद तक मतदान हुए। यही नहीं बिहार जैसे सूबे में जहां पंचायत की परंपरा को ऐतिहासिक मान्यता हासिल है, वहां भी यह चुनाव संगीनों के साए में होने के बावजूद खून के छीटों से बचे नहीं रहे। वहीं घाटी की वादियों में ये चुनाव तकरीबन शांतिपूर्ण संपन्न हुए।

दरअसल, पंचायत के बहाने इस चुनाव में घाटी के लोगों ने न सिर्फ लोकतांत्रिक सरोकारों की अपनी मिट्टी को एक बार फिर से तर किया है बल्कि दुनिया के आगे यह साफ भी किया है उनका जीवन, उनका समाज, उनकी संस्कृति उतनी उलझी या बंटी हुई नहीं है, जितनी बताई या समझाई जाती है। अगर ऐसा नहीं होता तो यह कहीं से मुमकिन नहीं था कि कश्मीरी पंडित परिवार की एक महिला उस गांव से पंच चुनी जाती, जो पूरी तरह मुस्लिम बहुल है। यहां विख्यात पर्यटन स्थल गुलमर्ग जाने के रास्ते में एक छोटा सा गांव है- वुसान। आशा इसी गांव से पंच चुनी गई है जबकि यहां से इस पद के लिए मैदान में उतरी वह अकेली कश्मीरी पंडित महिला थी। इस सफलता को स्थानीय, आपवादिक या कमतर ठहराने वालों के लिए यह ध्यान में रखना जरूरी है कि घाटी से 1980 में करीब दो लाख कश्मीरी पंडित परिवारों को पलायन कर जाना पड़ा था।
इस बार भी जब यहां पंचायत चुनाव चल रहे थे तो आतंकी धमकियां मिली थी पर यहां के लोगों ने तमाम उन मंसूबों को धूल चटा दिया, जो बंटवारे और कट्टरता की भड़काऊ बातें करते हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि वुसान का संदेश घाटी के सच को नए पूर्वाग्रहरहित नजरिए से देखने की जरूरत को तो रेखांकित करेगा ही यहां से बही लोकतंत्र की धारा को देश की मुख्यधारा बनने की प्रेरणा भी देगा।  फिर फारूख साहब भी कहेंगे अपनी लोकतांत्रिक मजबूरी का रोना रोने की बजाय अपनी मजबूती का बखान करेंगे, सगर्व और खुशी-खुशी। 

रविवार, 8 मई 2011

देस में मना परदेस में अन्ना


दूर होकर भी हम किसी के बेहद करीब हो सकते हैं और कोई बेहद नजदीक होकर भी हमारा नहीं होता। ये बातें प्रेमाख्यानों और कविताई में ही नहीं, जिंदगी की कई दूसरी सूरतों में भी हम बारहा महसूस करते हैं। असल में दूरी और नजदीकी का सच समय, स्थान और परिवेश के साथ बदलता है। कहा यह भी जाता है कि दूरी हमारी पहचान के गाढ़ेपन को तो हल्का करती है पर उसके दायरे को बढ़ा देती है। नजरिया, मजहब, राजनीति, स्थान और बोली के अंतर देश में जिस अनेकता की लकीरों के रूप में दिखते हैं, देश के बाहर वही अनेकता हमें एकता के सूत्र में बांधती है। दूरी और मनुष्य के रिश्ते का यह मनोवैज्ञानिक सच तो है ही उसके सामाजिक और सार्वजनिक सलूक से जुड़ी बुनियादी बात भी है।
जिस अन्ना हजारे को अपने देश में और अपनी सरकार से अपनी बातें कहने-मनवाने के लिए 98 घंटे का अनशन करना पड़ा, उसी को लेकर सरकार को जब देश के बाहर अपनी बातें कहनी होती है तो वह इसे किसी टकराव या मतभेद के बजाय बहुदलीय लोकतंत्र प्रणाली का नया आयाम बताती है। वित्त मंत्री प्रणव मुख़र्जी उस लोकपाल बिल प्रारूप समिति के अध्यक्ष हैं, जिनमें पांच सदस्य सरकार की तरफ से और पांच सदस्य नागरिक समाज की नुमाइंदगी कर रहे हैं। स्वतंत्र भारत की इतिहास में यह अभिनव प्रयोग है, जब कानून बनान के लिए सामज और सरकार एक साथ बैठी है। चूंकि प्रयोग नया है, लिहाजा इस पर प्रतिक्रियाएं भी कई तरह की हैं। सरकार के साथ राजनीतिक बिरादरी में अभी तक इस बात को लेकर बयानबाजी जारी है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना का प्रयोग सैद्धांतिक तकाजों पर कितना खरा या खतरनाक है। पर ये बातें देश के भीतर जिस तरह की प्रतिक्रिया को जन्म दे रही हैं, देश की सीमा से बाहर उसका स्वरूप इससे नितांत भिन्न है। अमेरिका से लेकर यूके और फ्रांस तक में अन्ना के सत्याग्रही प्रयोग के कई प्रशंसक हैं और वे अपने-अपने तरह से इस पहल को ग्लोबल बनाने के लिए प्रयासरत भी हैं।

इस स्थिति से सरकार भी अवगत है और वह इसे लोकतांत्रिक ढांचे के सशक्तिकरण की कोशिश के रूप में ही दुनिया के आगे रखना चाहती है। तभी तो एशियाई विकास बैंक की बैठक के दौरान जब प्रणव मुखर्जी को जब अन्ना हजारे को लेकर प्रतिक्रिया जतानी पड़ी तो वह यह स्वीकार करने में जरा भी नहीं हिचके कि लोकपाल मुद्दे पर सामाजिक संगठनों के दबाव में सरकार को तत्काल कार्रवाई करनी पड़ी क्योंकि कोई भी जिम्मेदार और जवाबदेह सरकार इसकी अनदेखी नहीं कर सकती। मुखर्जी एक वरिष्ठ राजनेता हैं। वह यह जानते हैं कि लोकतंत्र की मर्यादाएं क्या हैं और किस तरह असहमतियों के बीच सहमति की गुंजाइश निकालनी पड़ती है। तभी तो वे इस मौके पर यह कहना भी नहीं भूले कि सरकार की कार्यप्रणाली के विभिन्न पहलू पारदर्शी, जवाबदेह और भ्रष्टाचार मुक्त तो होना ही चाहिए।
देश के बाहर देश की जिस तस्वीर को हम निहायत ही भावुकता के साथ बनाते हैं, उस तस्वीर का सच देश के भीतर भी प्रकट हो तो विचार और वस्तुस्थिति की अनेकता के बीच एकता कायम होगी। लोकपाल बिल प्रारूप समिति की अभी तीन बैठकें हुई हैं। बैठक के टेबल से सहयोग और सौहार्द का संदेश ही बाहर जाए ऐसी कोशिश दोनों पक्षों की तरफ से रही है। देश के भीतर भी ऐसा ही माहौल रहे तो बड़ी बात होगी। क्योंकि परेदस में देस याद आना और देस में इस याद का बिसर जाना खतरनाक है। यह बात कोई और समझे न समझे प्रणव दा तो जरूर समझते होंगे।

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

अपसेट कर गया लांसेट


लांसेट की रिर्पोट हमेशा से ही हंगामाखेज रही हैं। इससे पहले जब उसने युवाओं में लैंगिक रूप में सेक्स प्रवृत्तियों में आए बदलाव का जिक्र किया था, तो आरोप यहां तक लगे थे कि वह कंडोम बनाने वाले एक अंतरराष्ट्रीय ब्रांड के लिए काम कर रही है। सेक्स सर्वे चर्चा को सतह पर लाने का आज एक माना हुआ जरिया हो गया है  और इसका इस्तेमाल ठंडे कमरों में क्रांति की आंच पैदा करने वाले एक्टिविस्टों से लेकर मीडिया तक के लिए दौड़ में बने रहने का सबसे आसन्न औजार बन गया है।
बहरहाल, बात लांसेट के हालिया अध्ययनों की। महज कुछ ही दिनों के अंतराल पर उसकी यह दूसरी रिपोर्ट है, जिसने भारत सहित कई देशों की एक ऐसी तस्वीर दुनिया के सामने रखी है, जो न सिर्फ चिंता बढ़ाने वाली है बल्कि आईना दिखाने वाली भी है। दिल्ली में मिलने वाले पेयजल में सुपरबग मिलने के खुलासे पर बवाल अभी थमा भी नहीं था कि इस प्रसिद्ध मेडिकल जर्नल ने यह आकलन छापकर सनसनी मचा दी कि दुनिया में हर रोज सात हजार से ज्यादा मृत बच्चे पैदा होते हैं। दिलचस्प है कि इनमें 68 फीसद मृत बच्चे मारत, चीन और बांग्लादेश सहित दस देशों में पैदा होते हैं। लांसेट ने अपने विश्लेषण में इस समस्या को सीधे आमदनी से जोड़ा है। उसके मुताबिक 98 फीसद मृत बच्चे उन देशों में पैदा हुए जहां आमदनी कम है।
भारत की गिनती भी अगर विपन्नता के मारे ऐसे देशों में होती है तो इसकी वजह  यह नहीं है कि हमारे यहां अरबपतियों या धनकुबेरों की कोई कमी है। फोर्ब्स जो सूचियां दुनियाभर के रइसों की छापती है, उनमें भारतीयों का दबदबा लगातार कायम है। पर अमीरी और संपन्नता की गाढ़ी मलाई जिस दूध-पानी पर तैर रही है, उसकी सचाई अब भी खासी स्याह है। लांसेट के नए खुलासे भी इस तथ्य पर मुहर लगाते हैं। आलम यह है कि जो देश अपनी शिनाख्त को पिछले तकरीबन दो-ढ़ाई दशकों में लगातार एक बड़ी इकोनमी पावर के रूप में शिद्दत से गढ़ने में लगा है, वह कोख में नौ माह तक पलने के बाद एक नवजात को दुनिया का मुंह तक देख पाने की वांछित स्थिति और  सुविधाएं मुहैया कराने में सबसे पिछड़ा है।
विकास का यह कोढ़ कम से कम हमारे उद्यम और संपन्नता के आंकड़ों  और दावों को तो किसी सूरत में मानवीय नहीं ठहराते। अच्छी बात यह है कि अब विकास के इस विरोधाभास को सरकार  और  उसके योजनकार भी नकारने की बजाय मानने लगे हैं तभी तो विकास की सरपट और प्रतिस्पर्धी दौर में मैदान मारने के बजाय बात अब हो रही है इन्कलूसिव डेवलपमेंट यानी समावेशी विकास की। पंचायतों के सशक्तिकरण से विकास योजनाओं को अमली जाम पहनाने के तंत्र का जो विकेंद्रित रूप सामने आया है, उससे अब गैरबराबरी वाले विकास की खाई को पाटने में मदद मिल रही है। पर अभी यह आगाज मात्र है। सरकार को अपने प्रयासों को इस दिशा में अभी और सघन और कारगर बनाना पड़ेगा तभी गांव-देहातों में स्वास्थ्य सुविधा की बात करें या जच्चा-बच्चा की सुरक्षा की, हमारे देश-समाज का हर हिस्सा हर लिहाज से संपन्न, सुरक्षित और  विकसित हो सकेगा। 'गरीबी हटाओ' भारतीय लोकतंत्र में लोकप्रियता हासिल करने का अब तक का सबसे कारगर नारा रहा है। दिल्ली में अभी जो सरकार सत्ता में अपनी दूसरी पारी खेल रही है, उसने भी अपनी सफलता की वजह गांव और गरीब तक पहुंचने वाली मनरेगा जैसी योजना को ही माना है। पिछले कई चुनावों में वोटरों ने तमाम दूसरे वादों के बजाय क्षेत्र के विकास को ज्यादा महत्व देकर अपनी मानसिकता और इरादे में आए फर्क को दर्ज कराया है। क्या अगले कुछ सालों में भारत की खुशहाली का वह चेहरा दुनिया के सामने होगा, जिसमें उसका हर वर्ग, हर इलाका इतना संपन्न आैर खुशहाल हो कि उसका कोई विलोमी पक्ष कहीं से भी रेखांकित न हो। अगर उम्मीद की यह तस्वीर अब भी बेरंग और  बेनूर है तो यह सचमुच एक खतरनाक स्थिति है।        

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

रविवार, 6 फ़रवरी 2011

आज देख लें कौन रचाता मौत के संग सगाई है


चौहत्तर आंदोलन का मशहूर गीत है- 'जयप्रकाश का बिगुल बजा तो जाग उठी तरुणाई है।' कवि और सर्वोदय कार्यकर्ता रामगोपाल दीक्षित गीत में एक जगह कहते हैं- 'आज देख लें कौन रचाता मौत के संग सगाई है, तिलक लगाने तुम्हें जवानों क्रांति द्वार पर आई है।' दरअसल, देश के लिए जिंदगी से ज्यादा चमकदार होती है, देश के लिए कुर्बानी। समय, समाज और इतिहास तीनों ही शहादत की इस लाली को सबसे गहरे और सच्चे जज्बे के रूप में स्वीकारते रहे हैं, इन्हें सम्मान देते रहे हैं।
पर स्थिति तब उलट जाती है जब जान न्योछावर करने के आदर्श जज्बे के साथ जानबूझकर खिलवाड़ होता है, राजनीति होती है। पिछले दिनों मुंबई हमले में शहीद हुए शहीद मेजर उन्नीकृष्णन के चाचा के. मोहनन ने जिस आक्रोश से भरकर खुद को आग के हवाले किया, उसे आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता। मोहनन ने वैसे भी राजधानी में वहां जहां देश की सबसे बड़ी पंचायत बैठती है, उससे महज कुछ दूरी पर ही इस अकल्पनीय कृत को अंजाम दिया। आसान है बहुत यह समझना कि उनके भीतर जलते सवालों का रुख किस तरफ था। जैसा कि मौके से बरामद सुसाइड नोट से जाहिर है कि मोहनन 26/11 के मुख्य आरोपी अजमल आमिर कसाब को अब तक फांसी न दिए जाने से खासा खिन्न थे। यह खिन्नता इससे पहले भी जनता की आवाज बनकर सड़कों पर कई बार अलग-अलग शक्लों में फूट चुकी है। यह और बात है कि कसाब को फांसी का मुद्दा अब तक सरकार और उसके विरोधियों के लिए महज पॉलिटिकल माइलेज लेने का वसीला ही ज्यादा रहा है। इसलिए इस मुद्दे पर जो सियासी बहस या प्रतिक्रिया अब तक सामने आई है, उससे जनता में भड़का गुस्सा शांत होने की बजाय और तेज ही हुआ है।
कानून की अपनी मयार्दाए हैं, जिनका पालन लाजमी है। पर उस रवैए का क्या जो इन मर्यादाओं की आड़ में अपना हित साधने से नहीं चूकते। बदकिस्मती से ऐसा करने वाले लोग न सिर्फ सरकार के जवाबदेह पदों पर बैठे हैं बल्कि उनके विरोधियों का रैवया भी तकरीबन ऐसा ही रहा है। 26/11 की घटना को अदालत तक ने 'देश पर आक्रमण' माना है। लिहाजा, इसके आरोपी के साथ बर्ताव को लेकर सरकार की सख्ती साफ दिखनी चाहिए। पर आलम यह है कि सरकार कसाब को फांसी तो दूर इस हमले से सीधे बावस्त पाकिस्तान तक के साथ अपने सलूक को अब तक निर्णायक कसौटी पर नहीं उतर पाई है। यह साफ तौर पर उस शहादत के साथ क्रूर मजाक है, जो देश के लिए कुर्बानी के जज्बे को सर्वापरि मानती है।
मोहनन तकरीबन 99 फीसद जल चुके हैं और शायद ही उनकी सांसें ज्यादा समय तक उनका साथ दें। पर उनके आक्रोश का लावा तब तक धधकता रहेगा, जब तक यह देश न सिर्फ कसाब को फांसी से झूलता देख ले बल्कि देश के खिलाफ उठने वाली हर आवाज, हर हाथ और हर दुस्साहस को उसी की भाषा में जवाब देना नहीं सीख लेता। भूले नहीं होंगे लोग कि जब शहीद उन्नीकृष्णन के घर कुछ औपचारिक आंसू, सांत्वना और फूलमाला लेकर केरल के मुख्यमंत्री अच्युतानंदन पहुंचे थे तो उनके पिता ने कितनी सख्त प्रतिक्रिया जताई थी। इस अपमान से बिफरे मुख्यमंत्री ने यह तक बयान दे डाला था कि अगर यह शहीद उन्नीकृष्णन का घर नहीं होता तो उनके दरवाजे पर कोई  कुत्ता भी नहीं जाता। अच्युतानंदन  को अपने इस बयान को लेकर काफी फजीहत उठानी पड़ी थी। आखिरकार हारकर उन्होंने माफी मांगी। देश के लिए शहीद होने के जज्बे को महज फर्ज अदायगी से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। शहीद की विधवा और परिजन को सिलाई मशीन और फ्रेम में जड़े प्रशस्ति के कुछ शब्द और चांदी-तांबे के कुछ मेडल भर इसकी कीमत नहीं। इस महान जज्बे के कारण जिस पीड़ा और संकट से शहीद के परिजनों को गुजरना पड़ता है, उसका तो बगैर अनुभव के अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। मोहनन ने उस पीड़ा का एहसास सरकार को दिलाने के लिए जो तरीका अपनाया है, वह देश के नाम एक और कुर्बानी है।

सोमवार, 10 जनवरी 2011

सर्दी वादियों में सुलगते सवाल


यह दौर जितना बदलाव का नहीं, उससे ज्यादा अस्थिरता का है। स्थितियों को बदलतीं अस्थिरताएं हमारे आसपास से लेकर अंदर तक पसर चुकी हैं। आलम यह है कि मौसम का बारहमासी चित्त और चरित्र तक अब पहले जैसे नहीं रहे। जेठ की धूप और पूस की रात के परंपरागत अनुभव आज दूर तक खारिज हो चुके हैं। लिहाजा मौसम और प्रकृति के साथ हमारा रिश्ता अब वैसा नहीं रहा, जैसा हमारे पुरखों का था। जलवायु मुद्दे पर विश्व सम्मेलनों से लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रही गैरसरकारी संस्थाएं, पिछले दो दशकों में इस खतरे को लगातार रेखांकित कर रही हैं कि मनुष्य ने अपनी लालच और बेलगाम जरूरतों पर अगर ध्यान नहीं दिया तो जीवन के लिए अनुकूलताएं तय करने वाले कारक एक-एक कर उससे छिनते जाएंगे। पर इस दिशा में कोई पहला, बड़ा और निर्णायक कदम अब तक इसलिए नहीं उठाया जा सका क्योंकि दुनियाभर की सरकारों को उस विकास की ज्यादा फिक्र है, जो उनकी जनता को उपभोग और व्यय का आधुनिक अनुशासन सिखाती है। 
सर्दी का आगाज इस साल भी वैसे तो पिछले कुछ सालों की तरह ही हुआ। इस बार भी सर्दी की शुरुआती दस्तक के साथ खबरें आने लगीं कि इस साल ठंड अपेक्षा से ज्यादा पड़ेगी और पारा गिरने के पुराने कई रिकार्ड धराशायी होंगे। हुआ भी ऐसा ही। दिसंबर बीतते-बीतते सर्दी ने समय को पूरी तरह अपनी गिरफ्त में ले लिया। उन इलाकों से भी पारे के खतरनाक स्तर तक गिर जाने की खबरें आ रही हैं, जो कोल्ड जोन से बाहर माने जाते थे। कश्मीर और हिमाचल में बर्फानी सर्दी ने अपने खतरनाक मंसूबे इस तरह जाहिर किए और यहां पड़ने वाली ठंड से निपटने के पारंपरिक अनुभव और तरीके लाचार साबित हो रहे हैं।
विडंबना ही है कि की तपिश महंगाई की हो या मौसम की बेरहमी, पहली मार पड़ती है गरीबों पर। उसकी ही जिंदगी सबसे पहले दूभर होती है, सबसे पहले उसकी ही सांसें उखड़ती हैं। रहा सवाल, सरकारी प्रयासों और उसकी संवेदनशीलता का तो आज अदालत को यह फिक्र करनी पड़ रही है कि रैनबसेरे न तोड़े जाएं और सड़कों पर जीवन गुजारने को मजबूर लोगों की हिफाजत के लिए सर्दी के मौसम में जगह-जगह अलाव जलाए जाएं। हाड़ तक अकड़ा देने वाली ठंड ने जहां बड़े शहरों की देर रात पार्टियों की रौनकी आंच आैर शराब दुकानों की कतारें बढ़ा दी है, वहीं विकास और सरकार दोनों ही दृष्टि से नजरअंदाज लोगों का हाल बुरा है। सर्दी को सह न पाने के कारण मौत की नींद सोने वालों की अखबारों में बजाप्ता तालिका छप रही है। लेकिन फर्क किसी को नहीं पड़ रहा है। समाज और सरकार दोनों के लिए यह इतनी चौंकाने वाली स्थिति नहीं कि वह अपना चैन लुटाएं।
उधर, बाजार में सर्दी और गरमी दोनों का सामना करने वाले एक से बढ़कर एक उत्पाद आ गए हैं। आप में अगर भोग की परम लिप्सा है और बीच बाजार खड़ा होने की इजाजत आपकी जेब आपको देती है तो फिर मौसम का बदलता बारहमासा भी आपके लिए हर सूरत में सुहाना है, आरामदायक है। पर यह स्थिति ठीक नहीं है। अगर हम अब भी बदले मौसम के खतरे को पढ़ने को तैयार नहीं हैं तो भविष्य के हिस्से हम एक तरफ तो खतरों का बोझ बढ़ा देंगे, वहीं दूसरी तरफ अपनी नीति और नीयत को लेकर ऐतिहासिक रूप से गुनहगार ठहराए जाएंगे। क्योंकि हरित पट्टियों का रकबा लगातार कम होते जाने का खतरा हो या पर्यावरणीय संतुलन को जानबूझकर बिगाड़ने की हिमाकत, इसके नतीजे अगर अभी ही खतरनाक साबित हो रहे हैं तो दूरगामी तौर पर तो ये पूरी तरह असह्य और प्रतिकूल साबित होंगे। लिहाजा, यह समय है निर्णायक रूप से चेतने और कारगर कदम उठाने का। दरकार सिर्फ प्रकृति पर हावी होने की बजाय उसका साथी होने की है। उम्मीद करनी चाहिए कि इस साथ की चाह हम सबके अंदर पैदा होगी।

मंगलवार, 4 जनवरी 2011

चल बसा रामभरोसे


इसे आर्थिक समझ का मुगालता कहें न कहें अव्वल दर्जे की एक आत्मघाती बेवकूफी तो जरूर कहेंगे कि उन्नति और विकास के लिए शहरीकरण को लक्ष्य और लक्षण दोनों स्वीकार करने वाले सिद्धांतकार सरकार के भीतर और बाहर दोनों जगह हैं। और यह स्थिति सिर्फ अपने यहां है ऐसा भी नहीं। पूरी दुनिया को खुले आर्थिक तंत्र की एक छतरी में देखने की भूमंडलीय होड़ के बाद कमोबेश यही समझ हर देश और दिशा में बनी है।
पिछले दिनों दो ऐसी खबरें आई जिसने शहरी समाज और व्यवस्था के बीच से लगातार छिजती जा रही संवेदनशीलता के सवाल को एक बार फिर उभार दिया। 50 साल के घायल रामभरोसे ने एंबुलेंस में ही इसलिए दम तोड़ दिया क्योंकि देश की राजधानी के बड़े-छोटे किसी अस्पताल के पास न तो उसकी इलाज के लिए जरूरी उपकरण थे और न ही वह रहमदिली कि उसे कम से कम उसके हाल पर न छोड़ा जाए। विडंबना ही है कि हेल्थ हेल्पलाइन से लेकर किसी को भूखे न सोने की गारंटी देने वाली देश की राजधानी में एक गरीब और मजबूर की जान की कीमत कुछ भी नहीं।
शहर के अस्पतालों में मरीजों के साथ होने वाले सलूक का सच इससे पहले भी कई बार सामने आ चुका है। जो निजी पांच सितारा अस्पताल अपनी अद्वितीय सेवा धर्म का ढिंढ़ोरा पीटते हैं, वहां तो गरीबों के लिए खैर कोई गुंजाइश ही नहीं है। रही सरकारी अस्पतालों की बात तो आए दिन अपनी पगार और भत्ते बढ़ाने के लिए हड़ताल पर बैठने वाले डॉक्टरों की तरफ से कभी कोई मांग कम से कम मरीजों की उचित देखरेख के लिए तो नहीं ही उठाई गई। उनकी इसी मानसिकता को लेकर एक समकालीन कवि ने डॉक्टरों को पेशेवर रहमदिल इंसान तक कहा। यह अलग बात है कि नई घटना में तो वे ढ़ंग से पेशेवर भी नहीं साबित हुए।
हम जिन घटनाओं का जिक्र कर रहे हैं, उसमें दूसरी घटना एक मेट्रो स्टेशन की है। इस घटना में ऊपरी तौर पर घटित तो कुछ भी नहीं हुआ, हां अंतर्घटना के रूप में देखें-समझें तो रोंगटे जरूर खड़े हो जाते हैं। अपनों से अलग-थलग पड़ चुकी कानपुर से दिल्ली आई एक महिला राजधानी के एक मेट्रो स्टेशन पर इस फिक्र में घंटों बैठी रही कि वह कहां जाए और किससे मदद की गुहार लगाए। उसकी स्थिति देखकर कोई भी उसकी लाचारी को पढ़ सकता था पर उससे कुछ ही कदम की दूरी पर बैठे सुरक्षा जवानों के लिए शहर में आए दिन दिखने वाला यह एक आम माजरा था।
दिलचस्प है कि यह संवेदनहीनता उस शहर के पुलिस और सुरक्षा जवानों की है जिसको लेकर यहां की सरकार अमन-चैन के लंबे-चौडे़ वादे करती है। गनीमत है कि किसी अपराधी तत्व की निगाह उस महिला पर नहीं पड़ी, नहीं तो गैंगरेप के एक से ज्यादा मामलों में अब तक अंधेरे में तीर चला रही सरकार और पुलिस के लिए मुंह छिपाने की एक और बड़ी वजह आज लोगों की चर्चा का विषय होता।
दरअसल, पूरे देश की आबादी के सबसे घने बसाव वाली दिल्ली के लिए कानून-व्यवस्था के जिस अलग और ज्यादा चुस्त तंत्र की दरकार है, उसकी जरूरत केंद्र और स्थानीय सरकार ने महसूस की हो या नहीं, कम से कम उनकी तरफ से इस दिशा में कोई निर्णयात्मक पहल तो नहीं ही की गई। इस जरूरी पहल का रास्ता कभी राजनीति ने काटा तो कभी सरकारी महकमों की गतहाली ने। पर अब स्थिति चेतने की है, नहीं तो सचमुच बहुत देर हो जाएगी।             

रविवार, 26 दिसंबर 2010

विरासत के नाम एक मनमोहन चिंता


भारत का एक राष्ट्र और संस्कृति के रूप में अभ्युदय नया नहीं है। यही नहीं लोक और परंपरा की गोद में दूध पीती यहां की बहुरंगी संस्कृति का कलेवर शुरू से सतरंगी रहा है। दुनियाभर में यही हमारी पहचान भी रही है और  यही हमारी सबसे बड़ी ताकत भी है।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने चिंता जताई है कि बहुसंस्कृति, संयम और भाईचारे की समृद्ध विरासत पर खतरा है और इसे हर हाल में बचाया जाना चाहिए। उन्होंने खासतौर पर बुद्धिजीवियों से अपील की है कि वे इस विरासत को अक्षुण्ण बनाए रखने में योगदान करें। बुद्धिजीवियों की भूमिका और उनकी दरकार को इस तरह स्वीकार करना अगर ऊपरी या रस्मी नहीं है तो मौजूदा स्थितियों में यह बड़ी बात है और स्वागतयोग्य भी। यह और बात है कि विद्वानों और कला-संस्कृति के जानकारों के लिए बना ऊपरी सदन अब इनकी उपस्थिति को मोहताज है। वहां दाखिले के लिए अब दीनारी दमखम चाहिए। सो "संतन को कहां सीकरी सो काम" कहने वाले कैसे वहां पहुंच पाएंगे। 
बहरहाल, बात प्रधानमंत्री के हालिया बयान की। दरअसल, मौजूदा दौर में संबंध, संवेदना और संयम को हर स्तर पर खारिज होते जाने का चलन प्रगाढ़ हुआ है और उसकी जगह जो पनप और पसर रहा है, वह है तात्कालिक उत्कर्ष और समृद्धि का उतावलापन। यहां तक की 21वीं सदी में विश्व शक्ति के रूप में भारत की जिस पहचान को विश्व मानचित्र पर उकेरने के उपक्रम चल रहे हैं, उनमें भी सार्वदेशिकता और सार्वकालिकता की बजाय तात्कालिक उत्कर्ष के तर्क ही ज्यादा हावी हैं। सुखद है कि विकास के ग्लोबल दौड़ में भारत को एक द्रुत धावक के रूप में तैयार करने की ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले मनमोहन सिंह को भी इस खतरे का अंदाजा है कि आगे निकलने की जल्दबाजी में कहीं कुछ बहुत महत्वपूर्ण पीछे न छूट जाए।
मनमोहन मानते हैं कि बहुभाषी, बहुधार्मिक और बहुसंस्कृति वाले इस देश में एकता को बनाए रखने की दरकार है। उन्होंने उस अध्यात्म दर्शन का भी हवाला दिया, जिसके कारण हमारे देश को पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा प्रतिष्ठा हासिल हुई है। भारतीय चित्त, मानस और काल के अध्येता धर्मपाल हों या लोक और परंपरा के कल्याणकारी संबंध की व्याख्या करने वाले वासुदेवशरण अग्रवाल और रामचंद्र शुक्ल। सबने भारतीय समाज में किसी बाजारू या आर्थिक की बजाय लोकादर्शों की संरक्षा और उसे आगे बढ़ाने वाले तत्वों को अन्यतम बताया है। हमारी यह अन्यतमता नए समय में हमारी महत्ता को सबसे काबिल तरीके से सिद्ध कर सकती है।
खतरा सिर्फ एक है कि चरम भोग की घुट्टी पिलाने वाले बाजारवादी मूल्यों के बीच शांति, संयम और समन्वय का धैर्यपूर्ण पाठ पढ़ने की ललक लोगों में कैसे पैदा की जाए। सरकार के मुखिया अगर स्कूल-कॉलेज के सिलेबसों में किसी फेरबदल या शोध अध्ययनों के साथ इस तरह की कोई गुंजाइश देखते हैं तो यह चिंता और चुनौती दोनों का सरलीकरण होगा।
दरअसल, भारत विकास और समृद्धि की जिस लीक पर अभी चल रहा है, वह उसकी आधुनिकता से तो जरूर मेल खाता है पर बुनियादी प्रकृति के खिलाफ है। दुखद है कि इस दुविधा को लेकर संसद और समाज कहीं भी कोई मंथन या बहस नहीं दिखती। अच्छा होता कि भारतीयता की पारंपरिक छवि को नए संभाल के साथ हम आगे बढ़ाते क्योंकि तब हमारी उपलब्धियां न सिर्फ हमारे रंगो-तेवर के मुताबिक होती बल्कि उसमें हमारी शर्तें भी शामिल होती। तब हम दुनिया के रंग में नहीं बल्कि दुनिया हमारे रंग में रंगती।
आगे बढ़कर पलटना खतरनाक है पर खतरनाक रास्ते पर आंख मूंदकर चल पड़ना भी कोई बुद्धिमानी नहीं। हमें यकीन करना चाहिए कि हमारे प्रधानमंत्री बुद्धिमान तो हैं ही, बड़े से बड़े खतरे के खिलाफ खड़े होने में हर लिहाज से सक्षम भी हैं। इसलिए अगर उनकी चिंता बस "मनमोहनी" न होकर जेहनी तौर पर जायज है तो सरकार के सांस्कृतिक सरोकारों की जमीन एक बार फिर हरीभरी हो सकती है। वैसे इस हरियाली की कामना और इसका दर्शन हो निहायत अलग चीचें हैं। यह "कामना" और "दर्शन" अगर एक सीध में आ जाए तो मौजूदा सदी का नया दशक सचमुच कई मायने में क्रांतिकारी साबित हो सकता है।    

बुधवार, 24 नवंबर 2010

ओबामा को क्यों चाहिए गांधी


अमेरिकी राष्ट्रपति का दौरा महज आर्थिक हितों से जुड़ा था या भारत के लिए इसके अन्य निहितार्थ भी थे।  बहस का यह आलम बराक ओबामा की भारत यात्रा के दौरान या उसके बाद नहीं, उनके राष्ट्रपति चुनाव लड़ने और जीतने के समय से ही शुरू हो गया था। और इस सब की चर्चा सिर्फ भारत में ज्यादा रही हो ऐसा भी नहीं है। दिलचस्प है कि इस बारे में बताने या जताने की सबसे ज्यादा होड़ भी अमेरिकी मीडिया में ही दिखी। बहरहाल,  ओबामा का गांधी प्रेम जरूर एक ऐसा मुद्दा है, जिसने राष्ट्रपति चुनाव से लेकर विश्व शांति के अग्रदूत के रूप में नोबेल सम्मान से नवाजे गए इस बिरले राजनेता को न सिर्फ चर्चित बनाए रखा है बल्कि जब वह अपने हालिया भारत दौरे पर थे तो भी सबसे ज्यादा चर्चा इसी विषय को लेकर रही। देश के गांधीजनों से जब इस बाबत बात की गई तो उन्होंने ओबामा के गांधी प्रेम को सराहा तो पर वे इसे एक राष्ट्राध्यक्ष के ह्मदय परिवर्तन होने की कसौटी मानने को तैयार नहीं दिखे। दरअसल, जिन दो कारणों से ओबामा गांधी को नहीं भूलते या उन्हें याद रखना जरूरी मानते हैं, वे हैं गांधी की वह क्षमता जो साधारण को असाधरण के रूप में तब्दील करने व होने की प्रेरणा देता है और वह पाठ जो विश्व को शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के लिए निर्णायक तौर पर जागरूक होने की जरूरत बताता है।
वर्ष 2008 के शुरुआत में जब ओबामा अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए यहां-वहां चुनाव प्रचार कर रहे थे  तो उन्होंने एक लेख में लिखा, '...मैंने महात्मा गांधी को हमेशा प्रेरणास्रोत  के रूप में देखा है क्योंकि वह एक ऐसे बदलाव के प्रतीक हैं, जो बताता है कि जब आम लोग साथ मिल जाते हैं तो वे असाधारण काम कर सकते हैं।" अपनी भारत यात्रा की शुरुआत में उन्होंने एक बार फिर गांधी को भारत का ही नहीं पूरी दुनिया का हीरो बताया। दरअसल, 21वीं सदी में पूंजी के जोर पर विकास की जिस धुरी पर पूरी दुनिया घूमने को बाध्य है, उसमें भय और अशांति का संकट सबसे ज्यादा बढ़ा है। भोग और लालच की नई वैश्विक होड़ और मानवीय सहअस्त्वि का साझा बुनियादी रूप से असंभव है। इसलिए मौजूदा दौर में जिन लोगों को भी गांधी की सत्य, अहिंसा और सादगी चमत्कृत करती है, उन्हें गांधी की उस 'ताबीज" को भी नहीं भूलना चाहिए, जो व्यक्ति और समाज को हर दुविधा और चुनौती की स्थिति में 'अंतिम आदमी" की याद दिलाता है। लिहाजा, ओबामा का गांधी प्रेम शांति और प्रेम की अभिलाषी दुनिया की संवेदना को स्पर्श करने की रणनीति भर नहीं है तो दुनिया के सबसे ताकतवर कहे जाने वाले इस राष्ट्राध्यक्ष को अपनी पहलों और संकल्पों में ज्यादा  दृढ़ और बदलावकारी दिखना होगा। 9/11 के जख्म से आहत अमेरिका को अगर 26/11 का हमला भी गंभीर लगता है और आतंक रहित विश्व परिदृश्य की रचना उसकी प्राथमिकता में शुमार है तो उसका संकल्प हथियारों की खरीद-फरोख्त से ज्यादा मानवीय सौहार्द को बढ़ाने वाले अन्य मुद्दों पर होना चाहिए। इस बाबत अमेरिकी रक्षा मंत्री का हालिया बयान कि भारत उसका सबसे बड़ा रक्षा साझीदार है, परिवर्तन के कोई अच्छे संकेत नहीं देता। इस मामले में कुछ गांधीजनों की तरफ से आई यह प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण है कि गांधी की लोकप्रियता और उनकी प्रासंगिकता को ओबामा से जोड़कर देखना मुनासिब नहीं क्योंकि जब तक हिंसा और भय का आतंक देश-दुनिया को तबाह करता रहेगा गांधी की प्रेरणा और  उसकी जरूरत सभी को महसूस होती रहेगी। हां, ओबामा के बहाने ये प्रेरणा अगर पूरी दुनिया में और तेजी से फैलती है तो यह जरूर स्वागतयोग्य है। 

मंगलवार, 23 नवंबर 2010

कितने गंदे हम


ऐसे समय में जबकि देश में सार्वजनिक जीवन में मलिनता को लेकर बहस की गरमाहट बढ़ी है, ’स्वच्छता‘ का सवाल खड़ा करना कुछ बुनियादी सरोकारों को रेखांकित करने जैसा है। हालिया कुछ आंकड़े हमारे विकास का विरोधाभासी चरित्र उजागर करते है। एक अरब से ज्यादा की आबादी वाले देश में अगर आज भी महज 36 करोड़ लोग ही ऐसे है जो शौचकर्म खुले में नहीं करते तो साफ है कि हमारी वस्तुस्थिति और उन्नति के बीच की खाई खासी चौड़ी है। इस खाई के बड़े और गहरे होने का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि देश में सेलफोन पर बतियाने वालों की गिनती शौचालय का प्रयोग करने वालों से दोगुनी है।
दरअसल, तेजी से हो रहे शहरीकरण ने गांव-देहात के जीवन की न सिर्फ उपेक्षा की है बल्कि एक ऐसी सनक के कंधे पर हाथ रखा है जिसमें कुछ चेहरों की लाली के लिए लाखों-करोड़ों मुरझाए चेहरे उनके हाल पर छोड़ दिये गये है। अच्छी बात यह है कि विकास योजनाओं के एकांगी चरित्र से बचने की सोच सरकार के भीतर भी अब काफी हद तक कारगर शक्ल अख्तियार कर रही है। इसे बेहतर संकेत मानना चाहिए कि विकास और समृद्धि के ऊपरी नारों और वादों की जगह, बिजली, सड़क, शौचालय और पानी जैसे बुनियादी जरूरत के मुद्दे एक बार फिर एजेंडे में बहाल हो रहे है। छूटते जा रहे इन मुद्दों ने जाति और क्षेत्र की राजनीति करने वालों को भी हतोत्साहित किया है।
केंद्र में जब दूसरी बार मनमोहन सरकार आई तब भी माना गया कि रोजगार गारंटी जैसी महात्वाकांक्षी योजनाओं के बूते ही संप्रग लोगों का व्यापक समर्थन हासिल करने में सफल रही। आज सरकार द्वारा जिस समेकित विकास नीति पर जोर दिया जा रहा है, उसकी जरूरत भी इसलिए पड़ी कि विकास की सरपट दौड़ में काफी कुछ छूटता चला गया है। जिन आंकड़ों से हमारे विकास का मलिन चेहरा उजागर हुआ है, उसमें यह भी शामिल है कि देश के दिल्ली और केरल जैसे हिस्सों में बेहतर स्वच्छता सहूलियत का लाभ उठाने वालों का प्रतिशत 90 से ज्यादा है जबकि झारखंड, बिहार, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में स्थिति सबसे खराब है। साफ है कि शिक्षा और शहरीकरण का सीधा रिश्ता स्वास्थ्य और स्वच्छता जैसी बुनियादी सहूलियतों से जुड़ा है। शहरी आबादी का बढ़ता बोझ और पलायन जैसी समस्या के पीछे भी शहर बनाम गांव की स्थिति सबसे बड़ा कारण है।
हमारी लोक परंपरा में स्वच्छता का स्थान काफी ऊंचा है। यह कहीं न कहीं हमारे संस्कारों में भी बीज रूप से शामिल है। हां, अशिक्षा और गरीबी ने देश की आबादी के एक बड़े हिस्से की परिस्थति को इतना मजबूर जरूर कर दिया कि उसे महज दो जून की रोटी के संघर्ष के साथ किसी तरह गुजर-बसर करने की जद्दोजहद में ही अपना सारा सामर्थ्य झोंक देना पड़ता है। अब जबकि सरकार का ध्यान शिक्षा और खाद्य सुरक्षा की तरफ गंभीरता से गया है तो उम्मीद करनी चाहिए कि न सिर्फ देश के संभ्रांत और सभ्य कहे जाने वाले इलाकों बल्कि सुदूर गांव-देहातों में भी शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता की बुनियादी सहूलियतें पहुंचेंगी।