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शनिवार, 14 अप्रैल 2018

बापू तो रहे याद भूल गए बा को!

- प्रेम प्रकाश


बा के  बारे में खुद बापू ने स्वीकार भी किया है कि उनमें दृढ़ता और निर्भीकता उनसे भी ज्यादा थी। बा की पहचान सिर्फ यही नहीं थी कि वे बापू की जीवन संगिनी रहीं। वह एक दृढ़ आत्मशक्ति वाली महिला थीं और गांधीजी की प्रेरणा भी

दो अक्टूबर 2019 को महात्मा गांधी की 150वीं जयंती को लेकर सरकार और समाज दोनों उत्साहित हैं। खासतौर पर पीएम मोदी ने बापू की150वीं जयंती को राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन के लक्ष्य के साथ जोड़कर इसे 2014 से ही चर्चा में ला दिया है। पर यह देश और सरकार दोनों भूल यह गई कि अगले वर्ष बापू के साथ बापू की भी 150वीं जयंती है। यही नहीं, कस्तूरबा (11 अप्रैल 1869 - 22 फरवरी 1942) चूंकि गांधी से 6 माह बड़ी थीं, इसलिए बा की जयंती दो अक्टूबर से पहले 11 अप्रैल को ही मनाई जाएगी।

कस्तूरबा और गांधी आधुनिक विश्व में दांपत्य की सबसे सफल मिसाल हैं। बा के  बारे में खुद बापू ने स्वीकार भी किया है कि उनमें दृढ़ता और निर्भीकता उनसे भी ज्यादा थी। तारीखी अनुभव के तौर पर भी देखें तो बा की पहचान सिर्फ यही नहीं थी कि वे बापू की जीवन संगिनी रहीं। आजादी की लड़ाई में उन्होंने न सिर्फ हर कदम पर अपने पति का साथ दिया, बल्कि यह कि कई बार स्वतंत्र रूप से और गांधीजी के मना करने के बावजूद उन्होंने जेल जाने और संघर्ष में शिरकत करने का फैसला किया। यहां तक गांंधी के अहिंसक संघर्ष की राह में वे गांदी से पहले जेल भी गईं। वह एक दृढ़ आत्मशक्ति वाली महिला थीं और गांधीजी की प्रेरणा भी। उन्होंने नई तालीम को लेकर गांधी के प्रयोग को सबसे पहले अमल में लाई।

इसी तरह चरखा और स्वच्छता को लेकर गांधी के प्रयोग को मॉडल की शक्ल देने वाली कोई और नहीं, बल्कि कस्तूरबा ही थीं। इसको लेकर कई प्रसंगों की चर्चा खुद गांधी ने भी की है। कहना हो तो कह सकते हैं कि शिक्षा, अनुशासन और स्वास्थ्य से जुड़े गांधी के कई बुनियादी सबक के साथ स्वाधीनता संघर्ष तक कस्तूरबा का जीवन रचनात्मक दृढ़ता की बड़ी मिसाल है।

धन्यवाद के पात्र हैं गांधी की लीक पर चले रहे वे कुछ सर्वोदयी, जिन्होंने बा और बापू की प्रेरणा को साझी विरासत के तौर पर जिंदा रखा। इस मौके पर ‘बा-बापू 150’ के नाम से जहां गांधी के इन अनुयायियों ने देशव्यापी यात्रा काफी पहले शुरू कर दी है, वहीं इस अभियान के तहत कुछ और कार्यक्रम भी हो रहे हैं। पर जहां तक रही सरकार और समाज की मुख्यधारा की बात तो शायद उनकी स्मृति से बा की विदायी हो चुकी है। 

सोमवार, 12 मार्च 2018

मौलाना से मिलना... मौलाना को पढ़ना...


 - प्रेम प्रकाश

धर्म और संप्रदाय की छोटी-बड़ी लकीरें खींचकर दुनिया का कोई समाज आगे नहीं बढ़ा है। इस्लाम अमन और मोहब्बत का पैगाम देता है। इस पैगाम को लोगों के दिलों तक पहुंचा रहे हैं मौलाना वहीदुद्दीन खान

‘बेटे, इस्लाम के बारे में भी पढ़ लेना। अभी अपनी पढ़ाई पूरी करो। वैसे भी मुझे लगता है कि गांधी विचार से जुड़े लोगों के लिए अलग से किसी धर्म के बारे में जानने की शायद जरूरत भी नहीं। हम लोग खुद कई अवसरों पर गांधी जी से सीखते हैं। वे शांति के मसीहा थे।’  ...मौलाना वहीदुद्दीन खान के ये कुछ शब्द आज भी अंतर्मन में गूंजते हैं। उन्होंने ये बातें इस्लाम को लेकर मेरी इस जिज्ञासा पर दी थीं कि भारतीय इस्लाम क्या बाकी इस्लाम से जुदा है। कहने की जरूरत नहीं कि उनका कद और उनकी स्वीकृति तब भी इतनी बड़ी थी कि उनकी हर छोटी-बड़ी बातों को लोग गौर से सुनते थे। जहां तक स्मरण है यह वाक्या 1986-87 के आसपास का रहा होगा। दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में उनसे मिला था।
प्रतिष्ठान में प्रकाशित होने वाले मासिक ‘गांधी मार्ग’ में उन दिनों उनके लेख काफी छपते थे। सो, मौलाना के आलेख पहले से पढ़ता रहा था। उन्हें पढ़कर उनके वैचारिक सम्मोहन से दूर रहना मेरे जैसे युवा के लिए इसीलिए भी असंभव था, क्योंकि इस्लाम और अध्यात्म की उनकी व्याख्या खासी आधुनिक और तार्किक होती थी। मुझे याद है कि जब मैं ‘जनसत्ता’ छोड़कर ‘सहारा समय’ में आया, तभी सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आई थी। एक साक्षात्कार के सिलसिले में अनुपम मिश्र से मिलने गांधी शांति प्रतिष्ठान जाना था। अनुपम जी सिर्फ पर्यावरण के ही जानकार नहीं थे। उनसे देश-समाज के विभिन्न विषयों पर बात करते हुए एक नई समझ बनती थी। इस समझ के साथ उनकी भाषा का भी आकर्षण होता था। सच्चर कमेटी की चर्चा पर छूटते ही अनुपम जी ने कहा, इस देश में कठिनाई यह है कि सबको राजनीति ज्यादा समझ में आती है। साठ के दशक से मौलाना वहीदुद्दीन खान इस बात को दोहरा रहे हैं कि मुसलमानों की स्थिति देश में तब तक बेहतर नहीं हो सकती, जब तक उन तक तालीम की रोशनी पूरी तरह नहीं पहुंचेगी। उनकी गुरबत और मुख्यधारा से कटने का असली कारण उनका तालीम से कटे होना है। मदरसों की ‘बंद तालीम’ के भरोसे जिस तरह की इस्लामी कौम बनेगी, उसके बारे में सबको पता है। अब जस्टिस राजेंद्र सच्चर ने मुसलमानों को लेकर अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंपी है तो लोग इस बारे में बात कर रहे हैं। अनुपम जी की ये बातें वैचारिक तौर पर झकझोर देने वाली थी। मौलाना के कार्य और लेखन को लेकर यह सब सुनकर एक नई तरह की जिज्ञासा पैदा हुई।
जिन लोगों को 2006 के आसपास के भारतीय सामाजिक और राजनीतिक हालात का पता होगा, वे इस बात को समझेंगे कि एक ऐसे दौर में जब देश में मुसलमानों के कथित रहनुमाई करने वाले अपनी अल्पसंख्यक पहचान को सियासी परचम की तरह इस्तेमाल करने पर तुले थे और समाज से लेकर संसद तक अस्मितावादी विमर्श चल रहा था, मुस्लिम समाज की वास्तविक स्थिति को सामने रखने वाली सच्चर कमेटी की रिपोर्ट ने किस तरह का तूफान पैदा किया था।
भारतीय समाज में मुसलमानों की हैसियत स्वाधीनता आंदोलन के दौर से लेकर आजादी के समय और उसके बाद किस तरह बदली, इस स्फीति को एक यात्रा की तरह देखें तो मन में कौतुहल पैदा करने वाले कई प्रश्न खड़े होते हैं। ये बेचैनी तब मैंने भी खूब महसूस की थी। एक बार फिर राहत मिली मौलाना वहीदुद्दीन खान को पढ़कर। एक पुस्तिका के रूप में उपलब्ध उनके एक लंबे आलेख में पढ़ा कि भारत विभाजन के बाद मुसलमानों के लिए इस देश में सबसे बड़ी त्रासदी उनका खुद को सियासी तौर पर अल्पसंख्यक उभार के साथ देखना है। बदकिस्मती से इस गलती में मुसलमानों के नेता भी शामिल रहे हैं। भारतीय समाज और संस्कृति में एक समन्वयवादी तत्व शुरू से रहा है। यह तत्व देश के हिंदुओं में भी है।
मौलाना ने इस बात को हिंसक नादानी करार दिया कि भारतीय मुसलमान हिंदुओं से किसी तरह की होड़ लें या फिर उनसे अलगाव या स्पर्धा की कोई राह चुनें। वे हिंदुओं और मुसलमानों की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को बांटकर तो नहीं ही देखते हैं, उलटे इनमें एक-दूसरे को तर-बतर करने वाले अंतरसूत्र देखते हैं। ...तभी तो वे मानते हैं कि अल्पसंख्यक असुरक्षा का भाव मुसलमान समाज को भारत के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास यात्रा से उसे इतनी दूर ले जाएगा कि वे अभाव और हीनता के ऐसे मझधार में फंसेंगे, जिससे निकलना आसान नहीं होगा। मौलाना वहीदुद्दीन खान आज भी अपनी इस समझ पर कायम हैं। वे अपने लेखों के साथ टीवी संदेशों और पोडकास्ट में इस संदेश को दुहराते हैं।
‘जनसत्ता’ अखबार में मैं जब था तो एक सम्मेलन में आरिफ मोहम्मद खान को सुना। कहने को उनका शुमार मुसलमानों के नेता के तौर पर ही होता है, पर वे अपनी इस पहचान के खुद खिलाफ हैं। सम्मेलन में खान ने बताया कि कभी भारत और पाकिस्तान.. दोनों तरफ के मुसलमानों ने खान अब्दुल गफ्फार खान की नहीं सुनी और इसका नतीजा देश विभाजन के समय से लेकर बाद तक के सांप्रदायिक दंगे हैं। आज भी हमारे बीच एक सच की आवाज है। यह आवाज है मौलाना वहीदुद्दीन खान की। खान कहीं न कहीं उन्हीं बातों के प्रति हमें आगाह कर रहे हैं, जो 1947 और उसके बाद हुई।
धर्म और संप्रदाय की छोटी-बड़ी लकीरें खींचकर दुनिया का कोई समाज आगे नहीं बढ़ा है। इस्लाम अमन और मोहब्बत का पैगाम देता है। इस पैगाम को लोगों के दिलों तक पहुंचा
रहे हैं मौलाना वहीदुद्दीन खान। खान को पढ़ना और उन्हें सुनना, अमन और सकून पर यकीन बढ़ाने जैसा है। मौलाना इस यकीन को देश-दुनिया में अपनी तरह से जिस तरह से फैला रहे हैं, उसे देखकर राष्ट्रपिता गांधी की याद आती है। खुद मौलाना भी मानते हैं कि जंगे आजादी के दिनों से उन पर गांधी का रंग चढ़ गया था। निस्संदेह यह रंग बाद में और पक्का... और पाकीजा हुआ। 

सोमवार, 17 नवंबर 2014

ऐसे तो लौटने से रहे महात्मा


समय से हम सब बंधे हैं पर समय को बांधने की भी हमारी ललक रहती है। तभी तो समय को जीने से पहले ही हम उसके नाम का फैसला कर लेते हैं। यह ठीक उसी तरह है, जैसे बच्चे के जन्म के साथ उसका नामकरण संस्कार पूरा कर लिया जाता है। यह परंपरा हमारी स्वाभाविक वृत्तियों से मेल खाती है।
जिस 21वीं सदी में हम जी रहे हैं, उसका आगमन बाद में हुआ नामकरण पहले कर दिया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी इसे कंप्यूटर और सूचना क्रांति की सदी बताते थे। उनकी पार्टी आज भी इस बात को भूलती नहीं और देश को जब-तब इस बात की याद दिलाती रहती है। बहरहाल, बात इससे आगे की। 21वीं सदी के दूसरे दशक में लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के लिए जब सिविल सोसाइटी सड़कों पर उतरी और सरकार के पारदर्शी आचरण के लिए अहिसक प्रयोगों को आजमाया गया तो फिर से एक बार समय के नामकरण की जल्दबाजी देखी गई। भारतीय मीडिया की तो छोड़ें अमेरिका और इंग्लैंड से निकलने वाले जर्नलों और अखबारों में कई लेख छपे, बड़ी-बड़ी हेडिग लगी कि भारत में एक बार फिर से गांधीवादी दौर की वापसी हो रही है, लोकतांत्रिक संस्थाओं के विकेंद्रीकरण और उन्हें सशक्त बनाने के लिए खासतौर पर देशभर के युवा एकजुट हो रहे हैं। सूचना और तकनीक के साझे के जिस दौर को गांधीवादी मूल्यों का विलोमी बताया जा रहा था, अचानक उसे ही इसकी ताकत और नए औजार बताए जाने लगे। नौबत यहां तक आई कि थोड़ी हिचक के साथ देश के कई गांवों-शहरों में रचनात्मक कामों में लगी गांधीवादी कार्यकर्ताओं की जमात भी इस लोक आलोड़न से अपने को छिटकाई नहीं रख सकी। वैसे कुछ ही महीनों के जुड़ाव के साथ इनमें से ज्यादातर लोगों ने अपने को इससे अलग कर लिया।
इस सिलसिले में एक उल्लेख और। भाजपा के थिक टैंक में शामिल रहे सुधींद्र कुलकर्णी ने अपनी किताब 'म्यूजिक ऑफ द स्पीनिग व्हील’ में तो इंटरनेट को गांधी का आधुनिक चरखा तक बता दिया। कुलकर्णी ने अपनी बात सिद्ध करने के लिए तमाम तर्क दिए और यहां तक कि खुद गांधी के कई उद्धरणों का इस्तेमाल किया। कुलकर्णी के इरादे पर बगैर संशय किए यह बहस तो छेड़ी ही जा सकती है कि जिस गांधी ने अपने 'हिद स्वराज’ में मशीनों को शैतानी ताकत तक कहा और इसे मानवीय श्रम और पुरुषार्थ का अपमान बताया, उसकी सैद्धांतिक टेक को कंप्यूटर और इंटरनेट जैसी परावलंबी तकनीक और भोगवादी औजार के साथ कैसे मेल खिलाया जा सकता है।
संयोग से गांधी के 'हिद स्वराज’ के भी सौ साल पूरे हो चुके हैं। इस मौके पर गांधीवादी विचार के तमाम अध्येताओं ने एक सुर में यही बात कही कि इस पुस्तक में दर्ज विचार को गांधी न तब बदलने को तैयार थे और न आज समय और समाज की जो नियति सामने है, उसमें कोई इसमें फ़ेरबदल की गंुजाइश देखी जा सकती है।
अब ऐसे में कोई यह बताए कि साधन और साध्य की शुचिता का सवाल आजीवन उठाने वाले गांधी की प्रासंगिकता और उनके मूल्यों की 'रिडिस्कवरी’ की घोषणा ऐसे ही तपाक से कैसे की जा सकती है? तो क्या गांधी के मूल्य, उनके अहिसक संघर्ष के तरीकों की वापसी की घोषणा में जल्दबाजी की गई। अगर आप देश में 'आप’ की राजनीति पर नजदीकी नजर रख रहे होंगे तो इस सवाल का जवाब आपको जरूर मिल गया होगा।

बुधवार, 22 अक्टूबर 2014

ओबामा का नोबेल गांधी प्रेम


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका दौरे की चर्चा अब भी खत्म नहीं हुई है, कम से कम सोशल मीडिया में तो नहीं ही। पर इस पूरी चर्चा में बहुत कम लोग ऐसे हैं जो इस बहाने अमेरिकी राष्ट्रपति के भारत दौरे को भी याद करने की जहमत उठा रहे हैं। मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए गांधी का गीता भाष्य ले गए थे। दिलचस्प है कि ओबामा भी अपने भारत दौरे के दौरान अपने गांधी प्रेम को भावनात्मक रूप से जाहिर करना नहीं भूले थे। यह अलग बात है कि तब मीडिया ने उनके इंडिया विजिट को इस लिहाज से ज्यादा देखा नहीं। खैर, यह तो रही बीती बात। पर इतना तो आज भी कह सकते हैं कि गांधी प्रेम जरूर एक ऐसा मुद्दा है, जिसने राष्ट्रपति चुनाव से लेकर विश्व शांति के अग्रदूत के रूप में नोबेल सम्मान से नवाजे गए इस बिरले राजनेता को न सिर्फ चर्चित बनाए रखा है बल्कि भारत के संदर्भ में उनकी चर्चा बिना इसके पूरी ही नहीं हो सकती।
अलबत्ता गांधीजनों से बात करें तो उनमें से ज्यादातर ओबामा के गांधी प्रेम को तो सराहते हैं पर वे इसे एक राष्ट्राध्यक्ष के हृदय परिवर्तन होने की कसौटी मानने को तैयार नहीं होते। दरअसल, जिन दो कारणों से ओबामा गांधी को नहीं भूलते या उन्हें याद रखना जरूरी मानते हैं, वे हैं गांधी की वह क्षमता जो साधारण को असाधारण के रूप में तब्दील करने व होने की प्रेरणा देता है और वह पाठ जो विश्व को शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के लिए निर्णायक तौर पर जागरूक होने की जरूरत बताता है।
वर्ष 2००8 के शुरुआत में जब ओबामा अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए यहां-वहां चुनाव प्रचार कर रहे थे तो उन्होंने एक लेख में लिखा, '...मैंने महात्मा गांधी को हमेशा प्रेरणास्रोत के रूप में देखा है क्योंकि वह एक ऐसे बदलाव के प्रतीक हैं, जो बताता है कि जब आम लोग साथ मिल जाते हैं तो वे असाधारण काम कर सकते हैं।’ अपनी भारत यात्रा की शुरुआत में उन्होंने एक बार फिर गांधी को भारत का ही नहीं पूरी दुनिया का हीरो बताया।
दरअसल, 21वीं सदी में पूंजी के जोर पर विकास की जिस धुरी पर पूरी दुनिया घूमने को बाध्य है, उसमें भय और अशांति का संकट सबसे ज्यादा बढ़ा है। भोग और लालच की नई वैश्विक होड़ और मानवीय सहअस्त्वि का साझा बुनियादी रूप से असंभव है। इसलिए मौजूदा दौर में जिन लोगों को भी गांधी की सत्य, अहिसा और सादगी चमत्कृत करती है, उन्हें गांधी की उस 'ताबीज’ को भी नहीं भूलना चाहिए, जो व्यक्ति और समाज को हर दुविधा और चुनौती की स्थिति में 'अंतिम आदमी’ की याद दिलाता है। लिहाजा, ओबामा का गांधी प्रेम शांति और प्रेम की अभिलाषी दुनिया की संवेदना को स्पर्श करने की रणनीति भर नहीं है तो दुनिया के सबसे ताकतवर कहे जाने वाले इस राष्ट्राध्यक्ष को अपनी पहलों और संकल्पों में ज्यादा दृढ़ और बदलावकारी दिखना होगा। 9/11 के जख्म से आहत अमेरिका को अगर 26/11 का हमला भी गंभीर लगता है, पाकिस्तान को मिल रही उसकी शह एक भूल लगती है, आतंक रहित विश्व परिदृश्य की रचना उसकी प्राथमिकता में शुमार है तो उसका संकल्प हथियारों की खरीद-फरोख्त से ज्यादा मानवीय सौहार्द को बढ़ाने वाले अन्य मुद्दों पर होनी चाहिए। क्योंकि ओबामा और वह दुनिया जिसमें वह रहते हैं अपने रक्षार्थ जब भी खड़ी होगी तब गांधी की लाठी ही उनकी टेक बनेगी।

बुधवार, 2 अप्रैल 2014

लोकतांत्रिक मर्यादा को जीत-हार में न बांटें

अब तक के जितने ओपिनियन पोल आए हैं उसमें बिहार में नीतीश कुमार का ग्राफ गिरता दिख रहा है। जदयू के भाजपा से अलग हो जाने के बाद नीतीश और उनके साथियों ने भले जो भी सोचा हो पर अब कहीं न कहीं इस फैसले को लेकर उनकी मुखरता फीकी पड़ी है। अलबत्ता यह चुनाव नतीजे बताएंगे कि बिहार में कौन कितने पानी में है।
बहरहाल, इस सियासी जोड़-तोड़ से बाहर एक बात, जिस पर नीतीश इन दिनों खासा जोर दे रहे हैं। वे कहते हैं, गठबंधन राजनीति के दौर में किसी को यह कहने का हक नहीं है कि उसके पक्ष में हवा बह रही है। यह गठबंधन के दौर में प्रकट हुए समावेशी जनादेश की कहीं न कहीं अवमानना है। इस मुद्दे पर चर्चा महज इसलिए नहीं कि इसे बिहार के मुख्यमंत्री रेखांकित कर रहे हैं बल्कि इसलिए कि यह एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर वाकई विचार होना चाहिए। यही नहीं, इस विमर्श में राजनीति व समाज के सभी वर्गों-इकाइयों में शरीक होना चाहिए। इस विमर्श से जुड़े दो-तीन प्रमुख प्रस्थानबिंदु हैं या यह कह लें कि सवाल हैं। एक तो यही कि 1989 के बाद से देश में किसी एक दल के बहुमत की सरकार नहीं बनी है।
इसी दौर में कांग्रेस और भाजपा ने अपने को बहुमत के बजाय सबसे बड़े दल होने की एक-दूसरे से होड़ लेने लगे। ऐसे में कोई दल या नेता यह कैसे कह सकता है कि उसके पक्ष में पूरे देश में हवा है। इसी तरह सामाजिक न्याय से शुरू होकर अस्मितावादी राजनीति ने जिस तरह भारत के संघीय ढांचे में राज्य सरकारों की भूमिका नए सिरे से रेखांकित की है, वह काफी महत्वपूर्ण है। दिलचस्प है कि इसी दौरान देश में विकास का उदार चरित्र देखने को मिला। नव-विकास के आंध्र से लेकर गुजरात मॉडल तक इसी दौरान सामने आए। इससे पहले तो चर्चा होती थी बस पंजाब-हरियाणा की हरित क्रांति की या फिर केरल में आए एजुकेशनल रिवोल्यूशन की।
इस तथ्य के बाद कोई यह कैसे आरोप लगा सकता है कि गठबंधन की मजबूरियों या अस्थिरता से देश में विकास पटरी से उतर जाता है। पर आज अगर देश की दोनों पार्टियां जनता को इस बात का खौफ दिखा रही हैं कि त्रिशंकु संसद चुनी गई या उन्हें सबसे ज्यादा सीटें नहीं मिलीं तो देश विकास के रास्ते से दूर हो जाएगा तो यह जनता को गुनराह करना नहीं है तो और क्या है।
भारतीय लोकतंत्र की प्रशस्ति गाने में हम काफी आगे रहते हैं। सबसे बड़ा, सबसे प्राचीन, सबसे सघन और सबसे कारगर अगर हमारा गणतंत्र है तो महज इसलिए नहीं कि इतिहास
के कुछ सुलेख उसके नाम दर्ज हैं बल्कि इसलिए कि बीते तीन दशकों में जब पूरी दुनिया में 'उदारता’ की स्वीकृति ने सबको एक छाते में आने के लिए मजबूर कर दिया, हमारे लोकतांत्रिक ढांचे में आज भी विकल्प और विरोध की गुंजाइश बची हुई है। यही नहीं, ऐसा करते हुए जनता और सरकार के बीच रिश्तों को बुनने वाले बुनकर और करघे दोनों दक्षता से लगे हैं। विकास के क्षेत्र में सर्व समावेशी के तकाजे को समझने के लिए अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अगर मजबूर होना पड़ा तो भी इसलिए कि देश में वर्ण, जाति और धर्म से शुरू होने वाली विविधता सोच और विचार के स्तर तक पहुंचती है।
यह अलग बात है कि प्रतिविचारों
और प्रतिधारणाओं के बीच सामंजस्य की ताकत का आज भी हम सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। अगर ऐसा होता तो फिर सियासी जमातों में सत्ता के वर्चस्व की ललक नहीं जगती बल्कि विरोध और अस्वीकार को जीवित रखने के लिए भी वे इतने ही संकल्पित दिखाई देते।
समकालीन राजनीति में इस जुमले को बार-बार उछाला जाता है कि राजनीति तो सत्ता को पाने के लिए ही होती है। जबकि यह सरासर गलत है। बात देश की लोकतांत्रिक विरासत की हम पहले कर चुके हैं, इसलिए इस मुद्दे पर कौटिल्य की एक सूत्रोक्ति का स्मरण जरूरी है। कौटिल्य कहते हैं विरोध की पतवार थामने वाले ही अपनी नाव को मनमुताबिक दिशा में मोड़ सकते हैं। चाणक्य ने ऐसा करके भी दिखाया। विरोध की रणनीति से ही चंद्रगुप्त मगध की सत्ता तक पहुंचा। यही नहीं, इस रणनीति में 'विरोधों का सामंजस्य’ किस तरह समर्थन की 'एकाधिकारवादी सत्ता’ के दंभ से टकराती है, उसे चकनाचूर करती है, इन बातों की गवाही इतिहास देता है।
इसी तरह संख्याबल को सत्ता का
औजार मानना लोकतंत्र की एक स्थिति में तो सही है पर इससे लोकतांत्रिक अवधारणा की दरकार को नहीं समझा जा सकता है। थोड़ा और पीछे लौटें तो महाभारत के कुछ सबक सामने आएंगे। एक पक्ष जिसके पास सामथ्र्य और सत्ता दोनों थी, वह सत्य के आग्रह
के सामने घुटने टेकता है। गांधीवादी मुहावरे
में कहें तो सत्य के लिए जरूरी नहीं कि वह सत्ता के शिविर में ही वास करे बल्कि सत्य तो वहां टिकता है जहां नीयत और इरादे कल्याणकारी होते हैं।
अब सोलहवीं लोकसभा के लिए प्रथम चरण का मतदान शुरू होगा। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने इस दौरान तमाम छोटे-बड़े मुद्दों को जनता के सामने रखा है। इस दौरान वादे-इरादे और नीयत की भी बात कही गई है। पर इस सबके बीच यह बात खटकती है कि विरोध और अस्वीकार के जोखिम के साथ कोई नहीं बढ़ना चाहता। सबने सत्ता का बीजमंत्र ही जपा है। ऐसे में यह जनता के विवेक पर है कि वे अपनी परंपरा और संस्कार से आए लोकतांत्रिक सबकों को कैसे अपने निर्णय में बदलती है। जाहिर है, गठबंधन के दौर की राजनीति की या तो एक और गांठ जनता इस बार खोलेगी या फिर वह देश की सियासी जमातों को कुछ अलग तरीके से आईना दिखाएगी। इस लिहाज से जब सोलहवीं लोकसभा बैठेगी तो उसका कंपोजिशन देखना होगा और तब समझ में यह बात आएगी कि
इस चुनाव से देश में लोकतंत्र की जड़ें पहले से और मजबूत हुई हैं या कमजोर।
आखिर में एक बात और यह कि सूचना क्रांति के प्रतापी दौर में लोकतंत्र का चुनावी भाष्य करने वाले पंडित आपको आज हर जगह बैठे मिल जाएंगे, टीवी चैनलों से अखबारों तक। पर इनमें से बहुत कम ऐसे हैं जो बहुमत-अल्पमत, पक्ष-विपक्ष और वोट शेयर से आगे की बात करते हैं। लोकतंत्र के महायज्ञ में जनता जिन संस्कारों की समिधा लेकर उतरती है, उसे ज्यादा धुली और आग्रहहीन आंखों से देखे जाने की जरूरत है।
जीत और हार के बीच एक तीसरी
रेखा भी जनता हर चुनाव में खींचती है, जिससे पक्ष और विपक्ष दोनों को एक ही अनुशासन में बांधा जा सके। कहने की जरूरत नहीं कि यह अनुशासन व्यापक जनहित का है, लोककल्याण का है।
 

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

स्वराज पर बहस से भागती हैं पार्टियां

आम आदमी पार्टी की दिल्ली की सरकार जनलोकपाल बिल के नाम पर चली गई। वैसे एक और बिल को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की कैबिनेट ने मंजूरी दी थी और अगर जनलोकपाल बिल को विधानसभा की हरी झंडी मिल भी जाती तो पूरी संभावना थी कि कांग्रेस और भाजपा के साथ आप के बीच इस मुद्दे पर रार मचती। जनलोकपाल बिल को तो लेकर खैर देश भर में पिछले कम से कम तीन सालों से चर्चा हो रही है पर स्वराज बिल को लेकर कभी कोई गंभीर बहस नहीं हुई। न ही आप की तरफ से ऐसी कोई पहल हुई और न ही दूसरे दलों ने इस बारे में कोई दिलचस्पी अपनी तरफ से दिखाई।
दरअसल, भ्रष्टाचार के खिलाफ सशक्त कानून की दरकार तो महसूस इसलिए की जा रही है कि बीते कुछ दशकों में सरकारी लूट और घोटाले इतने बढ़ गए कि इसे नवविकास की अवधारणा का एक जरूरी तत्व तक बताया जाने लगा। खासतौर पर यूपीए-2 सरकार के कार्यकाल में जिस तरह भ्रष्टाचार के एक के बाद नए मामले खुले उससे यह बहस आम हो गई कि इसके खिलाफ कठोर कानूनी पहल तो होनी ही चाहिए। यह अलग बात है कि यह मांग सरकार के अंदर स्वाभाविक रूप से उठनी चाहिए थी पर इसके लिए सिविल सोसायटी की अगुआई में जनता सड़कों पर उतरी। सरकार को मजबूरन इसके लिए तैयार होना पड़ा पर सिविल सोसायटी के जनलोकपाल बिल के ड्राफ्ट को मानने के बजाय सरकारी दखल की अनुकूलता वाला बिल संसद ने पास कर दिया।
अब जबकि देश एक बार फिर से पांच साल के लिए केंद्र की अगली सरकार चुनने जा रहा है तो यह सवाल मौजू हो गया है कि भ्रष्टाचार अगर मौजूदा डेमोक्रेटिक सिस्टम का साइड इफेक्ट है, इसे कानूनी तौर पर रोकने के बजाय व्यवस्थागत परिवर्तन के तौर पर क्यों न देखा जाए। आप की सरकार दिल्ली में इसी दरकार को पूरा करने के लिए स्वराज बिल लाना चाहती थी। चूंकि इसका कोई फाइनल या प्रस्तावित ड्राफ्ट लोगों के सामने नहीं है, इसलिए उसके प्रवधानों पर बहुत बारीकी से कोई बात नहीं हो सकती। हां, विधानसभा चुनाव के दौरान आम आदमी पार्टी की तरफ से जो विस्तृत चुनाव घोषणा पत्र लाया गया था, उसमें इस बारे में जरूर कुछ बातें कही गई हैं। आम आदमी पार्टी की सोच इस मामले में तो जरूर सराहनीय कही जाएगी कि वह कम से कम सैद्धांतिक रूप से सत्ता के केंद्रीय वर्चस्व को तोड़कर एक विकेंद्रित ढांचे की बात करती है।
यह सोच पंचायत राज के प्रयोग से आगे की बात इस लिहाज से है कि इसमें मुहल्ला सभाएं या रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशंस (आरडब्ल्यूए) महज कुछ सरकारी योजनाओं को लागू कराने वाले इंस्ट्रÔमेंट भर नहीं होंगे बल्कि अपने इलाके के विकास से लेकर न्याय और सुरक्षा तक का दारोमदार उनके हाथों में होगा। यही नहीं, अगर क्षेत्र के लोग बहुमत से यह तय करते हैं कि उनके पार्षद या विधायक उनकी अपेक्षाओं के मुताबिक काम नहीं करते तो उन्हें वापस भी बुलाया जा सकता है यानी राइट टू रिकॉल।
गौरतलब है कि जनलोकपाल आंदोलन के दौरान समाजसेवी अण्णा हजारे देश में लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के लिए जो एजेंडा जनता के साथ शेयर करते थे, उसमें चुनाव सुधार और लोकतंत्र के विकेंद्रित ढांचे की बात खासतौर पर करते थे। बल्कि वे तो यहां तक कहते थे कि जनलोकपाल बिल के बाद इन्हीं मुद्दों को लेकर संघर्ष करेंगे। अण्णा की इन बातों से ही कहींन कहीं देश में 21वीं सदी के दूसरे दशक के आगाज के साथ वैकल्पिक राजनीति को लेकर भी एक बहस शुरू हुई। यह अलग बात है इस बहस में बहुत ज्यादा दिलचस्पी न तो मीडिया ने दिखाई और न ही जनता ने। ऐसा संभवत: इसलिए भी हुआ कि यह मुद्दा भ्रष्टाचार विरोध की तरह 'कैची’ नहीं था।
शुक्र मानना चाहिए आम आदमी पार्टी और उसके कुछ नेताओं का कि उन्होंने विचार और मुद्दे के स्तर पर इस दरकार को न सिर्फ जीवित रखा बल्कि अपने चुनावी एजेंडे में भी इसे शामिल किया। यह अलग बात है कि अवधारणात्मक रूप से आप का स्वराज भी विकेंद्रित लोकतांत्रिक व्यवस्था का सटीक मॉडल नहीं है। यह पहल अपनी बनावट में क्रांतिकारी जरूर ठहराई जा सकती है पर यह उस सोच से काफी दूर है जिसके लिए पहले गांधी ने और फिर विनोबा और जयप्रकाश ने राजनीति की जगह 'लोकनीति’ की बात की थी। आप का स्वराज सैद्धांतिक रूप से इस प्रश्न का तो उत्तर देता है कि संसद या सरकार की सर्वोच्चता जनता के ऊपर नहीं हो सकती। पर केंद्रीय सत्ता अपने अधिकारों में कटौती कर एक विकेंद्रित ढांचा खड़ा करे या विकेंद्रित ढांचे के तहत काम कर रही लोकतांत्रिक संस्थाएं अपने लिए एक नियामक केंद्रीय सत्ता का निर्माण करें, आप इसका न तो उत्तर देती है और न ही यह सवाल उसके लिए जरूरी है। दरअसल, ये दोनों दो स्थितियां हैं और दोनों में एक बड़ा बुनियादी फर्क है।
गांधी जिस तरह के लोकतंत्र की बात करते हैं, उसमें केंद्र से चैरिटी के रूप में लोकतांत्रिक सत्ता का विकेंद्रीकरण नहीं होता बल्कि स्वावलंबी और स्वदेशी की ताकत पर खड़ी हुई ग्राम पंचायतें या स्थानीय निकाय, राष्ट्र और राज्य के रूप में अपनी शिनाख्त को मुकम्मल बनाने के लिए एक केंद्रीय नियामक संस्था का गठन करते हैं। असल में लोकतंत्र को लेकर समझ और सोच का यह फर्क प्रातिनिधिक और प्रतिभाग के लोकतंत्र के बीच का अंतर है।
दुर्भाग्य से देश में लोकतंत्र की बनावट को लेकर बहस और आंदोलन की गुंजाइश को जानबूझकर केंद्रीकृत सत्ता की राजनीति करने वाली सियासी जमातों ने कभी आगे नहीं बढ़ने दिया। कांग्रेस को भंग कर लोक सेवक संघ की गांधी की वसीयत को नेहरू-गांधी परिवार ने याद करने का साहस नहीं दिखाया तो बाद में जयप्रकाश की संपूर्ण क्रांति में शामिल हुए सियासी दलों ने 'जनता सरकार’ की उनकी परिकल्पना को साकार नहीं होने दिया। आप ने इस निराशा से आगे एक आशावादी पहल को जरूर आकार दिया है पर वह जिस तरह की अराजक जल्दबाजी में दिख रही है, उससे उनसे बहुत उम्मीद करना बेमानी होगा।
एक बात और यह कि देश का नया जन-गण-मन परिवर्तन की छटपटाहट से भरा है और यह बीते सालों में कई मौकों पर देखने को मिला है। कमी है तो एक ऐसे सूत्रधार की और समन्वित पहल की जिसमें परिवर्तन का मतलब सरकार बदलने से आगे लोकतांत्रिक तकाजों को नए सिरे से जांचना-परखना और स्थिर करना हो। फिर इसके लिए विधान से लेकर संवधिान तक जो भी बदलना पड़े, उसे बदला जाए। नए भारत का नया गणतंत्र बदलावों की ऐसी बड़ी संभावनाओं को सरजमीं पर उतरने की बाट न जाने कब से जोह रहा है।
 

शनिवार, 7 दिसंबर 2013

सलाम मदीबा

नेल्सन मंडेला के बारे में जिक्र करते हुए महात्मा गांधी का नाम स्वाभाविक तौर पर आता है। पर बीसवीं सदी के इन दोनों महानायकों को सीधे तौर पर एक-दूसरे की छाया बता देना एक असावधान कृत्य होगा। फिर दो बड़ी शख्सियतों का ऐसे भी आमने-सामने रखकर मूल्यांकन करना उनके साथ ज्यादती है। मंडेला निश्चत तौर पर गांधीवादी परंपरा के बड़े नायक थे। उनके संघर्ष ने साम्राज्यवाद और नस्लभेद की चूलें हिला दीं। दक्षिण अफ्रीका आज अगर विश्व के बाकी देशों के साथ बैठकर विकास और समृद्धि की बात कर रहा है तो इसके पीछे मंडेला का तीन दशक से भी लंबा संघर्ष है।
नस्लवाद साम्राज्यवाद का ऐतिहासिक तौर पर सबसे कारगर औजार रहा है। जब गांधी दक्षिण अफ्रीका में थे तो रंगभेदी घृणा के वे खुद शिकार हुए थे। दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए इस घृणा और हिंसा के खिलाफ लोगों को जागरूरक करने और संगठित संघर्ष शुरू करने का पहला श्रेय गांधी को ही है। बाद में संघर्ष की इस विरासत ने वहां एक राष्ट्रीय आंदोलन का रूप लिया।
मंडेला को इस बात का श्रेय जाता है कि दबे-सताए लोगों को संघर्ष की राह पर आगे बढ़ाने और फिर निर्णायक सफलता हासिल करने तक धैर्य और संयम बनाए रखना कितना जरूरी है, यह सीख उन्होंने अपने आचरण से दी। इस तरह का सकर्मक नायकत्व हासिल करना बड़ी उपलब्धि है। मंडेला आज अगर पूरी दुनिया में अन्याय और मानवीय दुराव के खिलाफ संघर्ष करने वालों के हीरो हैं तो अपनी इसी धैर्यपूणã शपथ के कारण।
27 साल का जीवन जेल की सलाखों के पीछे बीताने के बावजूद अपने संघर्ष की अलख को जलाए रखना कोई मामूली बात नहीं है। 199० में जब वे जेल से रिहा हुए तो देखते-देखते दुनिया के हर हिस्से में अन्याय के खिलाफ संघर्ष और क्रांतिकारी-वैचारिक गोलबंदी के जीवित प्रतीक बन गए। एक ऐसे दौर में जब दुनिया भले कहने को एक छतरी में खड़ी हो पर लैंगिक और नस्ली विभेद से लेकर मानवाधिकार हनन तक के मामले हमारी तमाम तरक्की और उपलब्धि को सामने से आंखें दिखा रहे हैं, संघर्ष के प्रतीक और नायक का बने और टिके रहना बहुत जरूरी है। आज अगर मंडेला हमारे बीच नहीं हैं तो सबसे बड़ा संकट यही है कि संघर्ष और व्यक्तित्व के करिश्माई मेल को देखने के लिए अब हमारी आंखें कहां टिकेंगी। संकट की इस घड़ी में आन सान स ूकी की तरफ बरबस ध्यान जाता है। हमारे लिए यह संतोष की बात है कि सू की हमारे बीच अभी हैं।
बहरहाल, एक बार फिर से जिक्र गांधी और मंडेला की। गांधी और मंडेला के बीच तमाम साम्य के बीच कुछ मौलिक भेद भी हैं। गांधी जिस तरह के'सत्यान्वेषी’ रहे उसमें सत्य-प्रेम और करुणा का साझा पहली शर्त है। इसकी अवहेलना करके गांधीवादी मूल्यों की बात नहीं की जा सकती। अलबत्ता, गांधी के कई अध्येताओं ने भी जरूर यह कबूला है कि यह एक ऐसा आदर्शवाद है, जिसे मानवीय दुर्बलताओं के बीच एक प्रवृत्ति की शक्ल देना कोई साधारण बात नहीं।
मंडेला के यहां गांधी का धैर्य और अटूट संघर्ष तो है पर वे साधन और साध्य की शुचिता के मामले में गांधी से थोड़े अलग खड़े दिखाई पड़ते हैं। इस अंतर को जैसे ही हम रेखांकित करते हैं तो हमारी समझ में यह बात आती है कि गांधी जिस रास्ते पर चले उस पर चलने वाले वे संभवत: अकेले पथिक थे। आइंस्टीन के शब्द भी हैं कि आने वाली नस्लों को तो यह भरोसा भी न हो कि हाड़-मांस के देह में गांधी जैसा व्यक्तित्व कभी जन्मा भी होगा।
मंडेला ने अपने जीवन में गांधी का स्मरण कई मौकों पर किया। वे महात्मा को एक शक्ति देने वाले प्रेरक व्यक्तित्व के रूप में देखते थे। पर खुद मंडेला ने भी अपने को 'दूसरा गांधी’ कहे या माने जाने के नजरिए को एक भावुक सोच भर माना। उनके कई संस्मरणों में ऐसा जिक्र आता भी है। मंडेला के आगे एक ही मकसद था उस धरती को नस्लवादी जड़ता से मुक्त कराना, जो उनकी मातृभूमि है। आज अगर 'मदीबा’ दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपिता हैं, तो इसलिए क्योंकि आधुनिक विश्व के नक्शे पर इस देश को उन्होंने वह स्थान दिलाया, जिससे वह लंबे समय तक वंचित रहा था। दक्षिण अफ्रीका के इस महान सपूत ने तारीख के उन हर्फों को लिखा है, जिसने मनुष्य और मनुष्य के बीच खिंची हर लकीर को पूरी तरह अमान्य ठहरा दिया है।
 

शनिवार, 26 अक्टूबर 2013

महानायक और लोकनायक के बीच

भारत के लिए आज चुनौती क्या है? इस सवाल का जवाब ही यह साफ करेगा कि हम देश और समाज को लेकर किस तरह की चेतना से भरे हैं। वह चेतना जो पूरी तरह बाजार प्रायोजित है या फिर ऐसी चेतना जो विचार और समाज को एक सीध में देखने की चुनौती सामने रखती है। अभी-अभी ग्यारह अक्टूबर बीता है। इस दिन कई महानायक एक साथ चर्चा में रहे। सबसे ज्यादा चर्चा में रहे मिलेनियम स्टार का रुतबा हासिल कर चुके अमिताभ बच्चन। बिग बी का यह जन्मदिन है। क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर चर्चा में इसलिए रहे क्योंकि उन्होंने ट्वेंटी-2० और एकदिनी क्रिकेट के बाद टेस्ट क्रिकेट से भी अपनी विदाई की तारीख की घोषणा कर दी। इन दोनों नामों के साथ दो नाम या तो छूट गए या फिर इनकी चर्चा लोगों ने जरूरी ही नहीं समझी। इस चूक या नासमझी में मीडिया और न्यू मीडिया भी शामिल रहा, जिसे पिछले दो-तीन सालों से यह मुगालता रहा है कि वह देश में लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के लिए अपनी पहल को एक्टिविज्म की हद तक ले जाने का जोखिम मोल ले रहा है। छूट गए ये दो नाम हैं जयप्रकाश नारायण और नानाजी देशमुख। ग्यारह अक्टूबर को इनकी भी जयंती थी। जेपी को जनता ने ही कभी लोकनायक कहा था तो नानाजी आधुनिक राजनीति में संत छवि को जीने और निभाने वाले रहे। 
21वीं सदी के दूसरे दशक के आगाज के साथ भारतीय लोकतंत्र को सशक्त करने वाले कुछ शुभ संकेत प्रकट हुए। सड़कों पर तिरंगा लेकर देश के नवनिर्माण के लिए उतरने वाले नौजवानों की ललक में भले बहुत गंभीरता न हो और पर इस ललक की प्रासंगिकता और ईमानदारी पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है। इस ललक के आलोक में ही देश में छह दशक बाद यह स्थिति आई कि हम देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और उसकी बुनियादी अवधारणा के साथ बहसीय मुठभेड़ कर सकें। इस मुठभेड़ ने ही यह साफ किया कि जो व्यवस्था राजनीतिक पथभ्रष्टता और भ्रष्टाचार की महामारी फैलाने की मशीनरी बन गई है, उसके कायम रहते राष्ट्रीय विकास और नवनिर्माण जैसे किसी लक्ष्य तक पहुंचने का संकल्प कैसे पूरा हो सकता है। 
जिस नई पीढ़ी की वैचारिक-सामाजिक संलग्नता को लेकर हम तरह-तरह के आग्रह-पूर्वाग्रह पाले बैठे हैं, उस फेसबुकिया पीढ़ी ने आगे आकर यह साफ किया कि सेक्स, सक्सेस और सेंसेक्स से आगे उसकी उड़ान देश और समाज के रचनात्मक उन्नयन से भी जुड़ी है। देश की युवाशक्ति की यह नई शिनाख्त राष्ट्रनिर्माण में उनकी प्रासंगिक भूमिका की नई पटकथा की तरह है, जिसमें अभी कई घटनाक्रम जुड़ने बाकी हैं। यहां तक की कहानी का क्लाइमेक्स तक आना अभी बाकी है। 
 अरब में बसंत का आना भले एक सुखद उत्तरआधुनिक परिघटना हो पर भारत में बसंत की कल्पना समाज और संस्कृति के बीच एक परंपरागत अनुशीलन है। पुराने पत्तों का झरना और नए पत्तों को आना हमारे लिए जीवन की नित-नूतन कल्पना की तरह है। इसमें निर्माण और विसर्जन का अलगाव नहीं है बल्कि यह एक सहअस्तित्ववादी जीवनदृष्टि है। अच्छी बात यह है कि सीख के ये पुराने सुलेख आज भी नष्ट नहीं हुए हैं, बचे हुए हैं। कसूर हमारा है कि बाजार का इश्तेहार तो हमारी जुबान पर चढ़ जाते हैं पर तारीख के कुछ जरूरी हर्फ पढ़ने की फुर्सत हमें नहीं। अभी टीवी पर एक विज्ञापन खूब चल रहा है जिसमें नेता और राजनीति में बदलाव के लिए माहौल को बदलने की बात जोर-शोर से की जाती है। विज्ञापन का संदेश है कि पुराने माहौल और पुरानी राहों ने अगर हमें निराश किया है तो निश्चित रूप से नए परिवेश और नए पथ की बात होनी चाहिए। यहां तक तो विज्ञापन की सैद्धांतिक टेक समझ में आती है पर क्षोभ तब यह होता है जब पता चलता है यह सब दिखाया-समझाया इसलिए जा रहा है क्योंकि एक महंगा प्लाई कवर बेचना है। जिस दौर में डेमोक्रेसी भी एड मैनेजमेंट का एक जरूरी सब्जेक्ट है, उस दौर के लिए इतनी बात तो जरूर कही जा सकती है लोकतंत्र की बेहतरी के लिए एक जरूरी रचनात्मक हस्तक्षेप की भूमिका बन चुकी है। अब तो बस इसके आगे के अध्याय लिखे जाने हैं। 
जेपी बिहार आंदोलन के दिनों में अकसर कहा करते थे कि जनता को 'कैप्चर ऑफ पावर’ के लिए नहीं बल्कि 'कंट्रोल ऑफ पावर’ के लिए संघर्ष करना चाहिए। यही बात आज प्रकारांतर से अण्णा हजारे कह रहे हैं। यही नहीं राजनीति की जगह लोकनीति और सत्ता के विकेंद्रीकरण की बात अब फिर से होने लगी है। असंतोष की बात यह है कि लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के इन जरूरी मुद्दों को गिनाने वाले मुंह और खुले मंच तो आज कई हैं पर आमतौर पर इनका सरलीकृत भाष्य ही परोसा जाता है। 
यह सरलीकरण खतरनाक इसलिए है क्योंकि इसमें एक्टिविज्म और मार्केट फोर्सेज की सरपरस्ती को एक साथ स्वीकार है। यह मलेरिया के मच्छर और उसके टीके को एक साथ लेकर चलने जैसी स्थिति है। यह एक छल है। यह छल ही है जो एक तरफ तो अमिताभ और सचिन के स्टारडम को पाए की तरह खड़ा करता है, वहीं दूसरी तरफ लोकनायक जैसी शख्सियत को भूलने की चालाक दरकार को भी अमल में लाता है। बदलाव न तो बिकाऊ हो सकता है और न चलताऊ। इसे एक चैरिटी की तरह भी आप नहीं चला सकते हैं। बदलाव एक कसौटी है जो विचार, उसकी दरकार और आचरण को एक कलेक्टिव एक्शन की शक्ल देता है। आज अगर कुछ मिसिंग है तो यही कलेक्टिव एक्शन। 
जेपी की लोकनीति और उसके लिए बनी लोक समिति ने कार्यकारी रूप में अपना प्रभाव भले न छोड़ा हो पर उनका यह सबक तो आज भी प्रासंगिक है कि ग्रामसभा से लोकसभा तक का लोकतांत्रिक पिरामिड देश में उलटा खड़ा है। इसमें सत्ता का केंद्र और इसकी नियामक ताकतें प्रातिनिधिक लोकतंत्र के नाम पर दिल्ली, मुंबई या लखनऊ, पटना जैसी राजधानियों में हैं। 
ग्राम पंचायतों का सशक्तिकरण देश में लोकतंत्र के प्रातिनिधिकता के ढ़ांचे को प्रत्यक्ष सहभागिता के ढ़ांचे में बदल सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि विधानसभा या लोकतसभा की तरह ग्रामसभा कभी विघटित नहीं होती। इसका अस्तित्व हमेशा कायम रहता है और संबंधित क्षेत्र के अठारह साल से ऊपर के सभी नागरिक इसके आजीवन सदस्य हैं। नीति और विधि की दरकारों को सरकारें अगर इस विकेंद्रित लोकतांत्रिक इकाई के सहभाग से तय करें तो इसमें पूरे देश का लोकतांत्रिक सहभाग होगा और यह नीतियों और कानूनों के अमल का स्पष्टधरातल तैयार करेगा। जेपी ने बिहर आंदोलन के दौरान ये बातें चीख-चीखकर कहीं। आज अण्णा हजारे और उनके साथ या अलग हुई जमातें चुनाव सुधार और लोकतांत्रिक सुधार का जो एजेंडा देश के सामने रख रहे हैं, उसमें भी ये बातें शामिल हैं। पर न तो देश का मीडिया और न ही देश में पिछले दो-तीन दशकों में तैयार हुई एक्टिविस्टों की जमात इन बातों को जनता के बीच खुलकर सामने ला पा रही हैं, उन्हें समझा पा रही हैं। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि हम अपने आइकनों को गढ़ने और उन्हें मान्यता देने में फौरी और बाजारवादी तकाजों की गिरफ्त में होते हैं। जबकि एक देश के जीवन में परंपरा और इतिहास के भी कुछ सबक जरूरी हैं। जेपी ऐसे ही एक सबक का नाम है, जिनको भूलने का मतलब लोकतांत्रिक सुधार की प्रक्रिया को एक तदर्थ नियति की तरफ ले जाएगा। क्या राहुल गांधी या नरेंद्र मोदी जैसे नायक इस तदर्थवाद के खतरे को समझेंगे? 


सोमवार, 17 जून 2013

गांधी नहीं जाना चाहते थे अमेरिका


यह एक अजीब बात है कि महात्मा गांधी कभी अमेरिका नहीं गए। यही नहीं अपने वहां कभी न जाने के फैसले को लेकर उन्होंने अमेरिका को लेकर काफी तल्ख टिप्पणी भी की था। अमेरिका ने जब दूसरे विश्व युद्ध के दौरान 1945 में जापान पर एटम बम बरसाया तो मानवता के खिलाफ इस क्रूरतम कार्रवाई को लेकर लोग उनकी प्रतिक्रिया जानना चाहते थे। खासतौर पर उनके कई अमेरिकी समर्थकों ने उनसे बार-बार पूछा कि अमेरिकी मानसिकता को लेकर वे विश्व को कोई संदेश क्यों नहीं देते।
महात्मा से ऐसे प्रश्न करने का मकसद था कि दुनिया भर में एक संदेश जाए कि अहिंसा का यह पुजारी अमेरिका के इस कृत्य की किन शब्दों में भर्त्सना करता है। लोगों को आशा थी कि कि गांधी अगर ऐसा कुछ कहेंगे तो दुनिया में हिंसा के खिलाफ एक जागरूकता तो पैदा भी होगी अमेरिका में भी लोग हिंसक कृत्यों के खिलाफ एक मानसिकता बनेगी। पर गांधी ने इससे ज्यादा कुछ नहीं कहा कि वे इस जीवन में कभी अमेरिका नहीं जाना चाहेंगे। यह बात उन्होंने किस सख्त लहजे में कही इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अमेरिकी हुक्मरानों के साथ अमेरिकियों के लिए भी यह कहा कि ये पैसे को भगवान की तरह पूजने वाले लोग हैं।
लिहाजा, ऐसे देश में जाने और वहां के लोगों से संवाद करने का वे कभी सोचते भी नहीं है। अपनी इस टिप्पणी के साथ गांधी यह भी जोड़ते हैं कि शायद अमेरिका को लेकर उनकी राय और भावनाओं को दुनिया अभी नहीं समझे। शायद गांधी ने आज के उस दौर की कल्पना तभी कर ली थी जब विकास और आधुनिकता की सारी समझ अमेरिकी रंग में रंगी दिखती है। आज अमेरिका पढ़ाई से लेकर नौकरी और मौज-मस्ती के लिए एक फाइनल डेस्टिनेशन की तरहभारत समेत दुनिया के और मुल्कों में देखा जा रहा है। गांधी की बात अमेरिका को लेकर हमें अपनी धारणा बनाने से भले न रोक पाए, पर सचेत तो वह करता ही है कि हमारी हिमायत जिस तरफ झुकी है, वह देश और उससे जुड़ी सोच क्या कल्याणकारी है।

रविवार, 29 अप्रैल 2012

अग्नि मिसाइल और नीलाम गांधी

यह न सिर्फ एक विडंबना है बल्कि एक विरोधाभासी विडंबना है। जहां गांधी से जुड़ी कुछ चीजों की नीलामी पर कुछ लोगों का ह्मदय भर आ रहा है तो वहीं अपने सैन्य बेड़े में शामिल होने जा रही अग्नि-5 मिसाइल की मारक क्षमता का विस्तार जानकर देशवासियों का सीना फख्रसे चौड़ा हो रहा है। एक तरफ हमारा मोह और हमारी आस्था उस अहिंसक मूल्यों की विरासत के प्रति है, जिसके प्रतीकों तक का अगर अनादर हो तो असहज हो उठते हैं, वहीं दूसरी तरफ आवेग, उन्माद, उत्तेजना और भय पैदा करने वाली ताकतों के और सबल होने को हम सीधे देशभक्ति के जज्बे से जोड़ते हैं।
दक्षिण अफ्रीका में मोहनदास के महात्मा बनने की परिस्थतियों पर औपन्यासिक कृति 'पहला गिरमिटिया' लिखने वाले गिरिराज किशोर को तो लंदन में गांधी से संबंधित कुछ चीजों की नीलामी इतनी नागवार गुजरी कि वह नीलामी रोकने में सरकारी नाकामी पर अपना पद्मश्री सम्मान राष्ट्रपति को लौटाने पर आमादा हो उठे। गिरिराज के आहत होने को समझा जा सकता है पर यह आहत प्रतिक्रिया जिस तरह फूट रही है, वह कहीं से गले नहीं उतरती। गांधी के गुजरात में नए टूरिज्म सर्किट को गांधी के नाम से जोड़ा गया। गुजरात पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए अमिताभ बच्चन के जो विज्ञापन इन दिनों टीवी पर चल रहे हैं, उनमें बच्चन के हाथ में चरखा तक पकड़ाई गई है, उन्हें साबरमती आश्रम के बारे में बताते हुए दिखाया गया है।
मुझे नहीं लगता कि अब तक किसी को यह विज्ञापन, इसका मकसद और इसके प्रस्तोता को लेकर कोई बड़ी शिकायत रही है। जबकि सचाई यह है कि बच्चों के लिए कैडबरी के मिल्क चॉकलेट को लेकर जब शिकायतें आईं तो बच्चन ने कुछेक दिनों-महीनों की खामोशी के बाद चॉकलेट कंपनी की दलीलों के साथ जाना पसंद किया आैर विज्ञापन में पप्पू के पास होने की मीठी खुशी मनाते रहे। बात गुजरात की निकली है तो जान लें कि वहां शराब पर पाबंदी है और यह पाबंदी भी गांधी के नाम पर ही मन-बेमन से ढोई-निभाई जा रही है। पर्यटक अगर चाहें तो उन्हें शराब मिल सकती है। बहुत आसानी से गुजरात की समुद्री सीमा के पार जाकर वैधानिक चेतावनी सीमा से पार पा लिया जाता है। यह सब वहां सरकार की आंख के नीचे ही नहीं बल्कि उसकी पूरी जानकारी आैर व्यवस्था में चल रहा है।     
यह भी एक संयोग ही है कि विदेश में नीलामी की खबर के बाद देश में ही गांधी भवन के नीलाम होने की खबर आनी शुरू हो गई है। कोलकाता के बेलियाघाट में हैदरी मंजिल गांधी भवन के नाम से मशहूर है। 1947 के सांप्रदायिक दंगों के दौरान गांधी ने यहीं उपवास रखा था। यह ऐतिहासिक भवन पिछले 50 सालों से एक बैंक के पास गिरबी है आैर वह अब इसकी नीलामी करने जा रहा है। यह नीलामी रूक भी सकती है क्योंकि पश्चिम बंगाल विरासत आयोग के साथ कोलकाता नगर निगम ने इस भवन की हिफाजत का फैसला किया है।
एक ऐसे दौर में जब भौतिक प्रतिस्पर्धा जैसे आत्मघाती हिंसक मूल्यों को हम जीवनचर्या का हिस्सा आैर विकास का द्योतक मान चुके हैं, यह हास्यास्पद ही लगता है कि हम गांधी को लेकर अपनी भावुक चिंता प्रकट करें। अभी एक बच्चे ने आरटीआई के जरिए सरकार से यह पूछ डाला कि ऐतिहासिक रूप से गांधी को कब राष्ट्रपिता माना गया। सरकार के पास इस सवाल का कोई दस्तावेजी जवाब नहीं था। कल को भारत अपने लोगों के जीवन में अहिंसक चेतना के कोई लक्षण दिखा पाने में अगर असमर्थ दिखे, तो हैरत नहीं होनी चाहिए। 
साफ है कि यहां बड़ा मुद्दा यह नहीं कि हमारा देश अपने राष्ट्रपिता को लेकर कितना संवेदनशील है। बड़ा सवाल यह है कि महत्व किसका ज्यादा है- गांधी विचार का,उनके अहिंसक जवन दर्शन का, उनके पढ़ाए रचनात्मक विकास के पाठ का या या सिर्फ उनके स्मृतिचिह्नों का। गांधी एक युगपुरुष हैं और उन्होंने अपने जीवन को इतने कामों में लगाया, इतनी जगहों पर बिताया, इतने लोगों के साथ जुड़े कि उसका कोई अंतिम लेखाजोखा तैयार ही नहीं किया जा सकता। 20वीं सदी का यह महात्मा 21वीं सदी में एक किंवदंति बन चुका है। यही कारण है हरेक की चेतना पर एक मानवीय दस्तक देने वाले गांधी का सामना करने को आज कोई तैयार नहीं है। क्योंकि किंवदंतियां जीवन और समाज की चर्चा में तो जीवित रहती हैं पर उनके किसी काम की नहीं होतीं। गांधी विचार तो बाजारू नहीं हो सकता पर उसके समर्थन और विरोध का आज एक बड़ा बाजार है। बाजारवादी दौर में यह बाजार भी खूब फल-फूल रहा है। और इस बाजार में एक से एक गिरिराज और किशोर अपनी सुविधा, अपना मुनाफा तलाश रहे हैं।   

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011

महात्मा की लीक पर ब्रह्मचारी प्रतीक


गांधी के ब्रह्मचर्य  प्रयोग पर सवाल और विवाद की धुंध आज भी छटी नहीं है। किताबें जो महात्मा के जीवन को लेकर लगातार आ रही हैं, उनमें उनके इस प्रयोग को हॉट सेक्सुअल टॉपिक  की तरह उठाया गया है। किताब को बेस्ट सेलर का तमगा दिलाने के लिए लेखकों ने गांधी के लिखे पत्र और लेख तो क्या हर उस वाक्य को खंगाला है जहां कहीं भी उन्होंने किसी महिला का नाम लिया है या फिर उनको लेकर शब्दों और भावों में किसी तरह की लैंगिक संवेदना के संकेत मिले हैं। गांधी अपने किए को लेकर खासे खुले थे। उनके 'गोपन' का यह 'ओपन' उनके जीवन संदर्भों और प्रयोगों को समझने में जितने कारगर नहीं हुए, उससे ज्यादा इनका इस्तेमाल विषय को विषयी बनाने में किया गया। नहीं तो यह कतई नहीं होता कि आत्मानुशासन को अपनी अहिंसक जीवनशैली का सबसे जरूरी औज़ार की तरह इस्तेमाल करने वाले महात्मा के जीवन को हम महज एक सेक्सुअल बिहेवेरियल लेबोरेटरी की तरह देखते।
बहरहाल गांधी और ब्रह्मचर्य से शुरू हुई चर्चा में बात एक नए और सामयिक संदर्भ की।  टीवी पर बिग बॉस का सीजन फाइव शुरू हो चुका है। उधर, बॉलीवुड के नए और उभरते कलाकार प्रतीक बब्बर इन दिनों अपनी फिल्म के हिट होने के लिए एक अनोखी प्रतिज्ञा के लिए चर्चा में हैं।  बिग बॉस की रियलिटी का धरातल पिछले सीजन में जितना बदला था, नए सीजनमें वह बदलाव प्रायोगिक हिमाकतों की नई दहलीज छू रहा है। शो का पौरुष और चारित्रिक बल बनाए रखने का जिम्मा शक्ति कपूर को दिया गया है तो, वहीं उनकी जिम्मेदारी का इम्तहान लेने के लिए बारह यौवनाओं का हुजूम इकट्ठा किया गया है। पिछले सीजन में लिहाफ की हलचल देखकर दर्शकों ने प्रेमी युगल की अंदरूनी कार्रवाई के रोमांच का अनुभव किया था। नए सीजन में अंदरूनी हलचल को खुले में लाने की मंशा साफ जाहिर होती है। पर तारीफ करनी होगी उन सितारे होस्ट्स की जिन्होंने शो की मेजबानी का फैसला तो बतौर प्रोफेशनल किए पर शक्ति कपूर की बिग बॉस के घर में एंट्री से पहले न तो उनसे कोई सीधी बात की और न ही दर्शकों से उनका कोई औपचारिक परिचय कराया। और तो और उनकी एंट्री के बाद बगैर उनका नाम लिए यहां तक कह दिया कि अच्छा हुआ बिग बॉस ने उन्हें (शक्ति को) अपने घर बुला लिया, नहीं तो वे किसी के घर जाने लायक नहीं थे। करीब 700 फिल्में करने के बाद एक सिने आर्टिस्ट का कद जितना दमदार और ऊंचा होना चाहिए था शक्ति ने उसे अपने ढीले कैरेक्टर के कारण ही कहीं न कहीं गंवाया है। देखना अब यह होगा कि इस रियलिटी शो में वे इस दाग को कुछ कम करना पसंद करेंगे या और ज्यादा दागदार हो जाएंगे।
शक्ति के बाद बात प्रतीक प्रसंग की। यह प्रसंग हमारे समय की युवा चेतना को समझने का नया प्रस्थान बिंदु भी बन सकता है। प्रतीक बब्बर हिंदी सिनेमा का नया चेहरा तो हैं ही उन्होंने कुछ ही दिनों और कुछ ही फिल्मों के बाद एक प्रतिभाशाली कलाकार की शिनाख्त पा ली है। प्रतीक ने अपनी नई रिलीज होने वाली फिल्म 'माई फ्रेंड पिंटो' की सफलता की कामना कुछ अनूठे अंदाज में की। उन्होंने यह प्रण उठाया है कि जब तक उनकी फिल्म रिलीज नहीं हो जाती, वे सेक्स नहीं करेंगे। दिलचस्प है कि यह प्रण एक युवा और अविवाहित कलाकार का  है। आमतौर पर सितारे अपनी फिल्म की सफलता के लिए दरगाहों और मंदिरों की दहलीज चूमते हैं पर प्रतीक इस मामले में सबसे अलग निकले। बताया जा रहा है कि अपने प्रण को जोखिम में नहीं डालने के लिए वे एहतियाती तौर पर बॉलीवुड. की आए दिन होने वाली लेट नाइट पार्टियों और फंक्शनों में जाने से बच रहे हैं।
प्रतीक का प्रण कहीं न कहीं उनकी और उनके जैसे युवाओं की जिंदगी की सच को भी बेबाकी से बयां करता है। मेल-मुलाकात और दोस्ती के दायरे में आज सब कुछ जायज है, कुछ भी वज्र्य या त्याज्य नहीं। यह दायरा न सिर्फ नए संबंधों के नए धरातल को चौड़ा और मजबूत कर रहा है बल्कि तरोताजगी से भरी उस युवा मानसिकता को भी बयां करता है, जो संबंध, परिवार और परंपरा की लीक को अपनी सीख के साथ बदल रहा है।
ऊपर बयां किए गए सारे हवाले हमारे सामने कई सवाल उठाते हैं। हमारे समय की ताकत और दिलचस्पी किन बातों में है? समाज और देश की सरहद लांघ चुके नफरत के दौर में प्रेम जिन अंत:करणों में आज भी महफूज है, उनके लिए इसका महत्व क्या है? क्या संबंधों का दैहिक तकाजा इतना भारी है कि उसके लिए संयम की कसौटी का सर्वथा त्याग जरूरी मांग हो गया है? ऐसा क्यों है कि देह को लेकर संदेह को मिटाने वाले हिमायतियों में हम, हमारे समय और हमारे समाज से भी आगे वह बाजार है जिसकी भूमिका को लेकर अपने तरह के संदेहों का जाला आज भी बना हुआ है।
एक बात जो इस पूरे संदर्भ में कही जा सकती है कि सेक्स, सक्सेस और सेंसेक्स के दौर में संबंध और संवेदना के हवाले भी बदल गए हैं। ये आत्मीय प्रसंग अपनी धीरता और गंभीरता को गंवाते जा रहे हैं। फौरीपन के नशे ने कॉफी और प्रेम दोनों को चुस्कीदार जायके में बदल दिया है। मन का सफर लंबी डग से नहीं पूरा किया जा सकता और फौरी आवेग से हासिल होने वाला स्पर्श दैहिक ही हो सकता है आत्मीय तो कदापि नहीं। तभी तो आत्मानुशासन की धीरता के हमारे समय के सबसे बड़े पैरोकार महात्मा को भी लोगों ने नहीं बख्शा। हम अपने समय और उसकी संवेदना को किस 'शक्ति' और किस 'प्रतीक' से बयां करना चाहेंगे, यह हमारे ऊपर है। 

बुधवार, 24 नवंबर 2010

ओबामा को क्यों चाहिए गांधी


अमेरिकी राष्ट्रपति का दौरा महज आर्थिक हितों से जुड़ा था या भारत के लिए इसके अन्य निहितार्थ भी थे।  बहस का यह आलम बराक ओबामा की भारत यात्रा के दौरान या उसके बाद नहीं, उनके राष्ट्रपति चुनाव लड़ने और जीतने के समय से ही शुरू हो गया था। और इस सब की चर्चा सिर्फ भारत में ज्यादा रही हो ऐसा भी नहीं है। दिलचस्प है कि इस बारे में बताने या जताने की सबसे ज्यादा होड़ भी अमेरिकी मीडिया में ही दिखी। बहरहाल,  ओबामा का गांधी प्रेम जरूर एक ऐसा मुद्दा है, जिसने राष्ट्रपति चुनाव से लेकर विश्व शांति के अग्रदूत के रूप में नोबेल सम्मान से नवाजे गए इस बिरले राजनेता को न सिर्फ चर्चित बनाए रखा है बल्कि जब वह अपने हालिया भारत दौरे पर थे तो भी सबसे ज्यादा चर्चा इसी विषय को लेकर रही। देश के गांधीजनों से जब इस बाबत बात की गई तो उन्होंने ओबामा के गांधी प्रेम को सराहा तो पर वे इसे एक राष्ट्राध्यक्ष के ह्मदय परिवर्तन होने की कसौटी मानने को तैयार नहीं दिखे। दरअसल, जिन दो कारणों से ओबामा गांधी को नहीं भूलते या उन्हें याद रखना जरूरी मानते हैं, वे हैं गांधी की वह क्षमता जो साधारण को असाधरण के रूप में तब्दील करने व होने की प्रेरणा देता है और वह पाठ जो विश्व को शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के लिए निर्णायक तौर पर जागरूक होने की जरूरत बताता है।
वर्ष 2008 के शुरुआत में जब ओबामा अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए यहां-वहां चुनाव प्रचार कर रहे थे  तो उन्होंने एक लेख में लिखा, '...मैंने महात्मा गांधी को हमेशा प्रेरणास्रोत  के रूप में देखा है क्योंकि वह एक ऐसे बदलाव के प्रतीक हैं, जो बताता है कि जब आम लोग साथ मिल जाते हैं तो वे असाधारण काम कर सकते हैं।" अपनी भारत यात्रा की शुरुआत में उन्होंने एक बार फिर गांधी को भारत का ही नहीं पूरी दुनिया का हीरो बताया। दरअसल, 21वीं सदी में पूंजी के जोर पर विकास की जिस धुरी पर पूरी दुनिया घूमने को बाध्य है, उसमें भय और अशांति का संकट सबसे ज्यादा बढ़ा है। भोग और लालच की नई वैश्विक होड़ और मानवीय सहअस्त्वि का साझा बुनियादी रूप से असंभव है। इसलिए मौजूदा दौर में जिन लोगों को भी गांधी की सत्य, अहिंसा और सादगी चमत्कृत करती है, उन्हें गांधी की उस 'ताबीज" को भी नहीं भूलना चाहिए, जो व्यक्ति और समाज को हर दुविधा और चुनौती की स्थिति में 'अंतिम आदमी" की याद दिलाता है। लिहाजा, ओबामा का गांधी प्रेम शांति और प्रेम की अभिलाषी दुनिया की संवेदना को स्पर्श करने की रणनीति भर नहीं है तो दुनिया के सबसे ताकतवर कहे जाने वाले इस राष्ट्राध्यक्ष को अपनी पहलों और संकल्पों में ज्यादा  दृढ़ और बदलावकारी दिखना होगा। 9/11 के जख्म से आहत अमेरिका को अगर 26/11 का हमला भी गंभीर लगता है और आतंक रहित विश्व परिदृश्य की रचना उसकी प्राथमिकता में शुमार है तो उसका संकल्प हथियारों की खरीद-फरोख्त से ज्यादा मानवीय सौहार्द को बढ़ाने वाले अन्य मुद्दों पर होना चाहिए। इस बाबत अमेरिकी रक्षा मंत्री का हालिया बयान कि भारत उसका सबसे बड़ा रक्षा साझीदार है, परिवर्तन के कोई अच्छे संकेत नहीं देता। इस मामले में कुछ गांधीजनों की तरफ से आई यह प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण है कि गांधी की लोकप्रियता और उनकी प्रासंगिकता को ओबामा से जोड़कर देखना मुनासिब नहीं क्योंकि जब तक हिंसा और भय का आतंक देश-दुनिया को तबाह करता रहेगा गांधी की प्रेरणा और  उसकी जरूरत सभी को महसूस होती रहेगी। हां, ओबामा के बहाने ये प्रेरणा अगर पूरी दुनिया में और तेजी से फैलती है तो यह जरूर स्वागतयोग्य है। 

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

बा-बापू और अंत:वस्त्र


गांधीजी की लंगोट चर्चिल तक को अखरती थी क्योंकि इस सादगी का उनके पास कोई तोड़ नहीं था। सो गुस्से में वे गांधी का जिक्र आते ही ज्यादा सिगार पीने लगते और उन्हें नंगा फकीर कहने लगते। आए दिन गांधीजी की ऐनक, घड़ी और चप्पल की नीलामी की खबरें आती रहती हैं। सरकार से गुहार लगाई जाती है कि गांधी हमारे हैं और उनकी सादगी के उच्च मानक गढ़ने में मददगार चीजों को भारत में ही रहना चाहिए। कुछ महीने पहले मीडिया वालों ने अहमदाबाद में उस विदेशी शख्स को खोज निकाला जो गांधीजी की ऐसी चीजों का पहले तो जिस-तिस तिकड़म से संग्रह करता और फिर उन्हें करोड़ों डॉलर के नीलामी बाजार में पहुंचा देता।  फिर नीलामी आज सिर्फ गांधीजी के सामानों की नहीं हो रही। यहां और भी बहुत कुछ हैं। पुरानी से पुरानी शराब की बोतल से लेकर शर्लिन चोपड़ा की हीरे जड़ी चड्ढ़ी तक। खरीदार दोनों के हैं, सो बाजार में कद्र भी दोनों की  है। यानी नंगा फकीर बापू और हॉट बिकनी बेब शर्लिन दोनों एक कतार में खड़े हैं।
हमारे दौर की सबसे खास बात यही है कि यहां सब कुछ बिकता है- धर्म से लेकर धत्कर्म तक। आप अपने घर बटोर-बटोर कर खुशियां लाएं, इसके  लिए झमाझम ऑफर और सेल की भरमार है। इस बाबत आप और जानकारी बढ़ाना चाहें तो 24 घंटे आपका पीछा करने वाले रेडियो-टीवी-अखबार तो हैं ही। गुजरात के समुद्री किनारों पर जो नया टूरिज्म इंडस्ट्री डेवलप हो रहा है, वह अपने सम्मानित अतिथियों को गांधी के मिनिएचर चरखे और अंगूर की बेटी का आकर्षण एक साथ परोसता है। बस इतना लिहाज रखा जाता है कि क्रूज पर शराब तभी परोसी जाती हैं, जब वह गुजरात की सीमा से बाहर निकल आते हैं। गुजरात सीमा के भीतर ऐसा नहीं  किया जा सकता क्योंकि वहां शराबबंदी है। यानी आत्मानुशासन का जनेऊ पहनना जरूरी है पर उसे उतारकर उसके  साथ खिलवाड़ की भी पूरी छूट है।
ये बाजार द्वारा की गई मेंटल कंडिशनिंग का ही नतीजा है कि कल तक जिसे हम महज अंत:वस्त्र कहकर निपटा देते थे, उनका बाजार किसी भी दूसरे परिधान के मुकाबले ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है।  मां की ममता पर भारी पहने वाले डिब्बाबंद दूध का इश्तेहार बनाने वाले आज अंत:वस्त्रों को सेकेंड स्किन से लेकर सेक्स सिंबल तक बता रहे हैं। जैनेंद्र की एक कहानी में नायक अपना अंडरबियर-बनियान बाहर अलगनी पर सुखाने में संकोच करता है कि नायिका देख लेगी। आज नायक तो नायक नायिकाएं और लेडी मॉडल स्टेज से लेकर टीवी परदे तक इन्हें धारण कर ग्लैमर दुनिया की चौंध बढ़ाती हैं।
बालीवुड की मशहूर कोरियोग्राफर सरोज खान कहती हैं, "सब कुछ हॉट हो गया, अब कुछ भी नरम या मुलायम नहीं रहा। गुजरे जमाने की हीरोइनों के नजर झुकाने और फिर अदा के उसे उठाते हुए फेर लेने से जितनी बात हो जाती थी, वह आज की हीरोइनों के पूरी आंख मार देने के बाद भी नहीं  बनती।'  साफ है कि देह दर्शन के तर्क ने लिबासों की भी परिभाषा बदल दी। और इसी के साथ बदल गई हमारी अभिव्यक्ति और सोच-समझ की तमीज भी। पचास शब्द की खबर के लिए पांच कॉलम की खबर छापने का दबाव किसी अखबार की एडिटोरियल गाइडलाइन से ज्यादा मल्लिका और राखी जैसी बिंदास बालाओं का मुंहफट बिंदासपन बनाता है। रही पुरुषों की बात तो नंगा होने से आसान उन्हें नंगा देखने के लिए उकसाता रहा है। तभी तो महिलाओं के अंत:वस्त्र के बाजार का साइज पुरुषों के के मुकाबले कई  गुना है।  यह सिलसिला इंद्रसभा से लेकर आईपीएल ग्राउंड तक देखा जा सकता है। "अंत:दर्शन' अब "अनंतर' तक सुख देता है और पुरुष मन के इस सुख के लिए महिलाओं को फीगर से लेकर कपड़ों तक की बारीक काट-छांट करनी पड़ रही है।
बात चूंकि गांधी के नाम से शुरू हुई इसलिए आखिर में बा को भी याद कर लें।  खरीद-फरोख्त और चरम भोग के परम दौर की इस माया को नमन ही करना चाहिए कि उसकी दिलचस्पी न तो बा की साड़ी में है और न ही उसकी जिंदगी में। अव्वल यह अफसोस से ज्यादा सुकूनदेह है। और ऐसा अब भी है, यह किसी गनीमत से कमतर नहीं।