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बुधवार, 2 अप्रैल 2014

लोकतांत्रिक मर्यादा को जीत-हार में न बांटें

अब तक के जितने ओपिनियन पोल आए हैं उसमें बिहार में नीतीश कुमार का ग्राफ गिरता दिख रहा है। जदयू के भाजपा से अलग हो जाने के बाद नीतीश और उनके साथियों ने भले जो भी सोचा हो पर अब कहीं न कहीं इस फैसले को लेकर उनकी मुखरता फीकी पड़ी है। अलबत्ता यह चुनाव नतीजे बताएंगे कि बिहार में कौन कितने पानी में है।
बहरहाल, इस सियासी जोड़-तोड़ से बाहर एक बात, जिस पर नीतीश इन दिनों खासा जोर दे रहे हैं। वे कहते हैं, गठबंधन राजनीति के दौर में किसी को यह कहने का हक नहीं है कि उसके पक्ष में हवा बह रही है। यह गठबंधन के दौर में प्रकट हुए समावेशी जनादेश की कहीं न कहीं अवमानना है। इस मुद्दे पर चर्चा महज इसलिए नहीं कि इसे बिहार के मुख्यमंत्री रेखांकित कर रहे हैं बल्कि इसलिए कि यह एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर वाकई विचार होना चाहिए। यही नहीं, इस विमर्श में राजनीति व समाज के सभी वर्गों-इकाइयों में शरीक होना चाहिए। इस विमर्श से जुड़े दो-तीन प्रमुख प्रस्थानबिंदु हैं या यह कह लें कि सवाल हैं। एक तो यही कि 1989 के बाद से देश में किसी एक दल के बहुमत की सरकार नहीं बनी है।
इसी दौर में कांग्रेस और भाजपा ने अपने को बहुमत के बजाय सबसे बड़े दल होने की एक-दूसरे से होड़ लेने लगे। ऐसे में कोई दल या नेता यह कैसे कह सकता है कि उसके पक्ष में पूरे देश में हवा है। इसी तरह सामाजिक न्याय से शुरू होकर अस्मितावादी राजनीति ने जिस तरह भारत के संघीय ढांचे में राज्य सरकारों की भूमिका नए सिरे से रेखांकित की है, वह काफी महत्वपूर्ण है। दिलचस्प है कि इसी दौरान देश में विकास का उदार चरित्र देखने को मिला। नव-विकास के आंध्र से लेकर गुजरात मॉडल तक इसी दौरान सामने आए। इससे पहले तो चर्चा होती थी बस पंजाब-हरियाणा की हरित क्रांति की या फिर केरल में आए एजुकेशनल रिवोल्यूशन की।
इस तथ्य के बाद कोई यह कैसे आरोप लगा सकता है कि गठबंधन की मजबूरियों या अस्थिरता से देश में विकास पटरी से उतर जाता है। पर आज अगर देश की दोनों पार्टियां जनता को इस बात का खौफ दिखा रही हैं कि त्रिशंकु संसद चुनी गई या उन्हें सबसे ज्यादा सीटें नहीं मिलीं तो देश विकास के रास्ते से दूर हो जाएगा तो यह जनता को गुनराह करना नहीं है तो और क्या है।
भारतीय लोकतंत्र की प्रशस्ति गाने में हम काफी आगे रहते हैं। सबसे बड़ा, सबसे प्राचीन, सबसे सघन और सबसे कारगर अगर हमारा गणतंत्र है तो महज इसलिए नहीं कि इतिहास
के कुछ सुलेख उसके नाम दर्ज हैं बल्कि इसलिए कि बीते तीन दशकों में जब पूरी दुनिया में 'उदारता’ की स्वीकृति ने सबको एक छाते में आने के लिए मजबूर कर दिया, हमारे लोकतांत्रिक ढांचे में आज भी विकल्प और विरोध की गुंजाइश बची हुई है। यही नहीं, ऐसा करते हुए जनता और सरकार के बीच रिश्तों को बुनने वाले बुनकर और करघे दोनों दक्षता से लगे हैं। विकास के क्षेत्र में सर्व समावेशी के तकाजे को समझने के लिए अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अगर मजबूर होना पड़ा तो भी इसलिए कि देश में वर्ण, जाति और धर्म से शुरू होने वाली विविधता सोच और विचार के स्तर तक पहुंचती है।
यह अलग बात है कि प्रतिविचारों
और प्रतिधारणाओं के बीच सामंजस्य की ताकत का आज भी हम सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। अगर ऐसा होता तो फिर सियासी जमातों में सत्ता के वर्चस्व की ललक नहीं जगती बल्कि विरोध और अस्वीकार को जीवित रखने के लिए भी वे इतने ही संकल्पित दिखाई देते।
समकालीन राजनीति में इस जुमले को बार-बार उछाला जाता है कि राजनीति तो सत्ता को पाने के लिए ही होती है। जबकि यह सरासर गलत है। बात देश की लोकतांत्रिक विरासत की हम पहले कर चुके हैं, इसलिए इस मुद्दे पर कौटिल्य की एक सूत्रोक्ति का स्मरण जरूरी है। कौटिल्य कहते हैं विरोध की पतवार थामने वाले ही अपनी नाव को मनमुताबिक दिशा में मोड़ सकते हैं। चाणक्य ने ऐसा करके भी दिखाया। विरोध की रणनीति से ही चंद्रगुप्त मगध की सत्ता तक पहुंचा। यही नहीं, इस रणनीति में 'विरोधों का सामंजस्य’ किस तरह समर्थन की 'एकाधिकारवादी सत्ता’ के दंभ से टकराती है, उसे चकनाचूर करती है, इन बातों की गवाही इतिहास देता है।
इसी तरह संख्याबल को सत्ता का
औजार मानना लोकतंत्र की एक स्थिति में तो सही है पर इससे लोकतांत्रिक अवधारणा की दरकार को नहीं समझा जा सकता है। थोड़ा और पीछे लौटें तो महाभारत के कुछ सबक सामने आएंगे। एक पक्ष जिसके पास सामथ्र्य और सत्ता दोनों थी, वह सत्य के आग्रह
के सामने घुटने टेकता है। गांधीवादी मुहावरे
में कहें तो सत्य के लिए जरूरी नहीं कि वह सत्ता के शिविर में ही वास करे बल्कि सत्य तो वहां टिकता है जहां नीयत और इरादे कल्याणकारी होते हैं।
अब सोलहवीं लोकसभा के लिए प्रथम चरण का मतदान शुरू होगा। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने इस दौरान तमाम छोटे-बड़े मुद्दों को जनता के सामने रखा है। इस दौरान वादे-इरादे और नीयत की भी बात कही गई है। पर इस सबके बीच यह बात खटकती है कि विरोध और अस्वीकार के जोखिम के साथ कोई नहीं बढ़ना चाहता। सबने सत्ता का बीजमंत्र ही जपा है। ऐसे में यह जनता के विवेक पर है कि वे अपनी परंपरा और संस्कार से आए लोकतांत्रिक सबकों को कैसे अपने निर्णय में बदलती है। जाहिर है, गठबंधन के दौर की राजनीति की या तो एक और गांठ जनता इस बार खोलेगी या फिर वह देश की सियासी जमातों को कुछ अलग तरीके से आईना दिखाएगी। इस लिहाज से जब सोलहवीं लोकसभा बैठेगी तो उसका कंपोजिशन देखना होगा और तब समझ में यह बात आएगी कि
इस चुनाव से देश में लोकतंत्र की जड़ें पहले से और मजबूत हुई हैं या कमजोर।
आखिर में एक बात और यह कि सूचना क्रांति के प्रतापी दौर में लोकतंत्र का चुनावी भाष्य करने वाले पंडित आपको आज हर जगह बैठे मिल जाएंगे, टीवी चैनलों से अखबारों तक। पर इनमें से बहुत कम ऐसे हैं जो बहुमत-अल्पमत, पक्ष-विपक्ष और वोट शेयर से आगे की बात करते हैं। लोकतंत्र के महायज्ञ में जनता जिन संस्कारों की समिधा लेकर उतरती है, उसे ज्यादा धुली और आग्रहहीन आंखों से देखे जाने की जरूरत है।
जीत और हार के बीच एक तीसरी
रेखा भी जनता हर चुनाव में खींचती है, जिससे पक्ष और विपक्ष दोनों को एक ही अनुशासन में बांधा जा सके। कहने की जरूरत नहीं कि यह अनुशासन व्यापक जनहित का है, लोककल्याण का है।
 

मंगलवार, 25 मार्च 2014

कहां खो गए समर्थन और विरोध के तकाजे


भारतीय गणतंत्र के जब पचास साल पूरे हुए थे तो देशभर में इसको लेकर कई कार्यक्रम हुए थे। ऐसे मौकों को एक पवित्रवादी आग्रह के साथ मनाने की भारतीय परंपरा काफी पुरानी है। गांधी जयंती से लेकर हिंदी दिवस तक ऐसे कई उदाहरण हैं। अलबत्ता ये उदारहरण अपने प्रदेयों और उपोयिगता को लेकर कितने बहुमूल्य हैं, यह भी हम जानते हैं। गणतंत्र के स्वर्णिम सर्ग में दर्ज होने के लिए संसद भी अलग से बैठी। तत्कालीन सांसदों ने लंबी-लंबी तकरीरें कीं। कुछ ने नए संकल्प लिए तो कुछ ने पुराने सबक दोहाराए।
यह अलग बात है कि माननीयों को न तो सबक भूलने में देर लगी और न संकल्प। उन्हीं दिनों दूरदर्शन पर भारतबाला प्रोडक्शन ने एक छोटा सा एडनुमा कार्यक्रम बनाया था, बमुश्किल 3० सेकेंड का। इसमें टीवी स्क्रीन पर एक-एक शब्द करके एक वाक्य उभरता है- चलो हम इस बात पर सहमत हैं कि हम एक दूसरे से असहमत हैं। इसके थोड़े अंतराल के बाद दूसरा वाक्य- असहमति पर सहमति लोकतंत्र की नींव है। अब जबकि 16वीं लोकसभा चुनाव की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है तो इन दो पुराने उल्लेखों से कुछ बातें नए सिरे से समझी जा सकती हैं।
हिंदी साहित्य के प्रखर आलोचक और इतिहासकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल कविता में विरोधों के सामंजस्य की बात करते थे। कविता संवेदनाओं का लोकतंत्र है। इसलिए विरोधों के सामंजस्य की दरकार को एक लोकतांत्रिक दरकार ठहराया जा सकता है। पक्ष और विपक्ष के बीच तटस्थ जैसी स्थिति को न तो महाभारत में कृष्ण ने स्वीकार किया और न ही आधुनिक लोकतंत्र में इस स्टैंड को राइट एप्रोच माना
गया। अलबत्ता देश में अस्मितावादी राजनीति के दौर-दौरे के बीच विरोध से ज्यादा अंतर्विरोध की राजनीतिक ध्वनियों ने लोकतांत्रिक स्पेस को भरा।
बहरहाल, लोकसभा चुनावों में उतरने की पार्टियों और उनके नेताओं की तैयारियों को देखें तो कुछ बातें अभी से साफ हो गई हैं। भले लोकतंत्र के सुलेखवादी विमर्श में हम लाख बातें कहें-समझें पर सत्ता की राजनीति ने समर्थन और विरोध के बीच की लक्ष्मणरेखा को कब का अमान्य कर दिया है। यह सब हो रहा है जीत और सत्तारोहण के गणित के नाम पर। बाजार ने हमें बीते दो दशकों में सिखाया कि जेब में जिसके पैसा है, उसके लिए ही दुनिया है और अब राजनीति हमें सीखा रही है कि जो जीते वही सिकंदर। यानी विरोध का मतलब
अगर हार है तो ऐसा विरोध त्याज्य है। इसी
तरह समर्थन का अर्थ सत्ता नहीं तो फिर ऐसे समर्थन की दरकार और सरोकार दोनों ही बेमानी हैं।
दिल्ली की एक लोकसभा सीट से इस बार आम आदमी पार्टी की तरफ से राजमोहन गांधी चुनाव लड़ रहे हैं। वे काफी विनम्र और विज्ञजन हैं। पर राजनीति तो शुरू ही मजबूरी से होती है। आम आदमी पार्टी में शामिल होने से पहले उनका गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर एक बयान आया था। तब मोदी को भाजपा ने अपना पीएम कैंडिडेट नहीं बनाया था। राजमोहन ने मोदी का बहुत नामोल्लेख तो नहीं किया पर दुनिया की सबसे ऊंची सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा बनाने के उनके अभियान पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि इस अभियान से एक वर्टिकल होड़ शुरू होगी अपने-अपने नेताओं और प्रतीक पुरुषों की भव्य प्रतिमा स्थापित करने की।
कुल मिलाकर सम्मान के नाम पर शुरू होने वाली इस प्रतियोगिता में क्षेत्र और समुदायों के बीच एक ऐसी हिंसक भिड़ंत होगी जो देश और समाज के लिए सर्वथा अनिष्टकारी होगी। राजमोहन के इस बयान की सराहना में भले बहुत हाथ तब नहीं उठे पर उनके विरोध में भी शायद ही कोई बयान आया। पर अब राजमोहन आप के नेता हैं। एक-दो महीने तक उनके विचारों का चरित्र जितना मुक्त था, अब शायद नहीं। तभी तो आप को लेकर और उसके नेता अरविंद केजरीवाल के उतावलेपन को लेकर वह कोई सीधी टिप्पणी करने से बचते हैं यानी उन्होंने जानबूझकर एक चुप्पी ओढ़ रखी है। यानी राजमोहन भी समझते हैं कि अभी जनता से वोट लेने की बारी है। सो अभी नापतौल कर बोलना होगा। समर्थन और विरोध की मुद्रा एकदम से तटस्थ हो गई है।
यह हमारे गणतंत्र का एक ऐसा विरोधाभासी सच है जो गणतंत्र के लिए समर्थन और विरोध की जरूरी दरकार को ही खारिज करते हैं। राजमोहन गांधी का नाम इसलिए नहीं कि वे इसके कोई बहुत बड़े कसूरवार हैं बल्कि इसलिए कि उनके जैसा समझदार और चारित्रिक सुदृढ़ता वाला व्यक्ति भी भारतीय गणतंत्र के इस अंतरविरोध को चुनौती
देने में संकोच करता है। उन्हें छोड़ दें फिर तो राहुल गांधी से लेकर नरेंद्र मोदी तक और दिग्विजय सिंह से लेकर जगदंबिका पाल तक, सभी समर्थन और विरोध के अपने एजेंडे को जब जैसे चाहें बदल देते हैं, रद्द कर देते हैं। सामान्य समझ में यही तो है मौकापरस्ती की राजनीति।
इस बार के चुनावों को लेकर कहा जा रहा था कि ये देश में कुछ मुद्दों को लेकर राजनीतिक जमीन को इतनी ठोस कर देंगे कि अगले कुछ दशकों की देश की राजनीति इसी जमीन पर होगी। इसमें सबसे बड़ा मुद्दा भ्रष्टाचार को माना जा रहा था। जनता से राजनीतिक विमर्श करने वाले सभी लोग इस बात को अपने-अपने तरीके से मान रहे थे। यहां तक कि हाल तक के ओपिनियन पोल में भी भ्रष्टाचार को बड़ा चुनावी मुद्दा माना गया।
पर अगर दलों के टिकट वितरण के आधारों को देखें या फिर दल छोड़ने व नए दल
में शामिल होने के कारणों को देखें तो कम से कम भ्रष्टाचार कहीं से कोई मुद्दा नहीं है। इसी के साथ भ्रष्टाचार के समर्थन और विरोध को लेकर अंतिम रूप से लकीर खींचने की संभावना भी क्षीण हो गई, जिसे लेकर काफी उम्मीदें थीं।
अब ऐसी स्थिति में चुनावी राजनीति से इतर मौकों पर राजनेताओं की उन तकरीरों का क्या, जिसमें देश की लोकतांत्रिक महानता को बनाए और बचाए रखने के लिए खूब सारी बातें होती हैं, शपथें होती हैं। इसी तरह लोकतंत्र की अवधारणा को साफ करने वाली उन बुनियादी बातों का भी क्या जिसमें समर्थन और विरोध के बीच दुराव के बजाय समन्वय की तो बात होती है पर किसी मुद्दे को लेकर तटस्थतावादी घालमेल की कोई गुंजाइश नहीं। मुद्दा भ्रष्टाचार का हो, महंगाई का हो, चुनाव सुधार का हो या फिर विकास का, नहीं लगता कि जनता इस चुनाव में यह निर्णय ले पाएगी कि वह किस मुद्दे पर किसके साथ जाए और किसके विरोध में। जनता की यह मुश्किल ही आज भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसी स्थिति में इस बार के चुनावों में तारीख के हर्फ कितने बदलेंगे, कहना मुश्किल नहीं।
 

मंगलवार, 28 जनवरी 2014

संबोधन में छिपा चिंताओं का समाधानकारी सार

देश ने जब इस बार 65वां गणतंत्र दिवस मनाया तो उसके मन में उल्लास के साथ कई सवाल भी थे। ये सवाल भी कोई रातोंरात पैदा हुए हों, ऐसा नहीं है। अलबत्ता यह जरूर है कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में जिस तरह कुछ मुद्दों और खतरों को रेखांकित किया, उनसे ये सवाल एकदम से सतह पर आ गए। राष्ट्रपति महोदय ने देश के लोकतंत्र को लेकर यह चिंता जताई है कि एक तरफ तो जनता गुस्से में है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी स्तर पर अराजकतावादी आचरण दिख रहे हैं।
सनसनी पैदा करने की गरज से राष्ट्रपति के इस संबोधन की कुछ लोग मन माफिक व्याख्या कर रहे हैं। इसमें मीडिया का भी एक तबका शामिल है। दरअसल, इस स्थिति को समझने के लिए हमें बीते कुछ सालों के घटनाक्रमों को देखना होगा। देश का नागरिक समाज जनता को साथ लेकर इस दौरान एक नए तरह के लोकमत के निर्माण में लगा है। लोकमत निर्माण की यह प्रक्रिया प्रतिक्रियावादी और सुधारवादी दोनों है। प्रतिक्रियावादी इस लिहाज से कि इसमें एक तरफ तो इस बात की खीझ है कि सत्ता और जनता का साझा आचरण बदल गया है। केंद्र से लेकर राज्यों की सरकारें 'जनता का शासन’ चलाने की बजाय 'जनता पर शासन’ कर रही हैं। नतीजतन सरकारी सोच और काम की प्राथमिक शर्त अब न तो लोक कल्याणकारी है और न ही पारदर्शी। इस स्थिति पर देश के प्रथम नागरिक ने भी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा है, 'यदि भारत की जनता गुस्से में है, तो इसका कारण है कि उन्हें भ्रष्टाचार तथा राष्ट्रीय संसाधनों की बर्बादी दिखाई दे रही है।’
देश के नागरिक समाज ने इस स्थिति को बदलने के लिए कुछ लोकतांत्रिक दरकारों और सरोकारों को बार-बार रेखांकित किया है। इसमें सबसे अहम् मुद्दा है प्रातिनिधिक लोकतंत्र के ढांचे को संभव स्तर तक प्रतिभागी बनाना। जनलोकपाल आंदोलन के प्रकटीकरण के पीछे के कारणों को अगर समझें तो साफ होता है कि जनता अपने लिए सुविधा ही नहीं नीति और कानून निर्माण के लिए भी सड़क पर उतर सकती है। महज इतना ही नहीं, सरकार के आगे जनता इस बात का भी लोकतांत्रिक दबाव बना सकती है कि वह महज उसके लिए नहीं बल्कि उसके साथ बैठकर जरूरी फैसले करे।
दिलचस्प है कि अराजनीतिक रूप से चल रही इस तरह की सुधारवादी कोशिश ने अब राजनीतिक विकल्प की भी शक्ल ले ली है। पर एक बड़ी कोशिश के ठोस विकल्प बनने की प्रक्रिया सघन और सुचिंतित होनी चाहिए। दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) की जीत और फिर सरकार बनाने की घटना काफी अफरातफरी भरी रही है। आप ने जिस तरह के वादे जनता से किए और फिर सरकार बनाने के बाद वह जिस तरह अराजक स्थितियों को जन्म दे रही है, उसने कई सवाल खड़े किए हैं।
इस स्थिति पर राष्ट्रपति की टिप्पणी गौरतलब है। उनके ही शब्दों में, 'चुनाव किसी व्यक्ति को भ्रांतिपूर्ण अवधारणाओं को आजमाने की अनुमति नहीं देते हैं। जो लोग मतदाताओं का भरोसा चाहते हैं, उन्हें केवल वही वादा करना चाहिए जो संभव है। सरकार कोई परोपकारी निकाय नहीं है। लोकलुभावन अराजकता, शासन का विकल्प नहीं हो सकती।’
देश की मौजूदा स्थिति और राजनीतिक स्तर पर बदलाव की कम-ज्यादा संभावनाओं के बीच देश के प्रथम नागरिक की टिप्पणियों और चिंताओं पर जब विचार करते हैं तो इससे काफी हद तक समाधान मिलता है। हालांकि यहीं से कुछ नए सवालों का प्रस्थान बिंदु भी तैयार हो जाता है। समाधान की बात यह है कि जैसा कि महामहिम खुद कहते हैं, 'मैं निराशावादी नहीं हूं क्योंकि मैं जानता हूं कि लोकतंत्र में खुद में सुधार करने की विलक्षण योग्यता है। यह ऐसा चिकित्सक है जो खुद के घावों को भर सकता है और पिछले कुछ वर्षों की खंडित तथा विवादास्पद राजनीति के बाद 2०14 को घावों के भरने का वर्ष होना चाहिए।’
सवालों की नई जमीन इस पर तैयार हो गई है कि राष्ट्रपति को अभी ये सारी बातें कहने की जरूरत क्यों पड़ी। क्या इससे पहले का देश का लोकतांत्रिक इतिहास उन चिंताओं से सर्वथा मुक्त रहा, जिस पर आज चिंता जताई जा रही है? क्या देश लोकतांत्रिक संस्थाओं के अवमूल्यन की इमरजेंसी जैसी हिमाकत तक पहुंच गया है? क्या सरकारी अराजकता का नया खतरा 1984 में सिख दंगों के दौरान 'एक बड़ा पेड़ गिरने पर धरती के स्वाभाविक कंपन’ से भी बड़ा है? सवाल यह भी कि लोकतंत्र क्या इतना लकीर का फकीर है कि उसे आंदोलन और बदलाव जैसी स्थितियां या तो असंवैधानिक लगती हैं, या फिर अमर्यादित?
बहरहाल, इस मुद्दे पर यह तो मानकर ही चलना चाहिए कि राष्ट्रपति महोदय ने जो भी बातें कहीं, वह किसी एक घटना, सरकार या पार्टी तक सीमित न होकर संपूर्ण राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण होंगी, नहीं तो अनावश्यक विवाद पैदा होगा। अलबत्ता इस पूरे विमर्श में कुछ चीजें पहले से जरूर साफ होनी चाहिए। एक तो यह कि बीते दो-तीन सालों में जनता एकाधिक बार सरकार के खिलाफ अपने आक्रोश को लेकर सड़कों पर उतरी तो विरोध प्रदर्शन का यह तरीका हर लिहाज से अहिंसक था।
लिहाजा, इतना तो मानना ही पड़ेगा कि कम से कम जनता की मन:स्थिति अब भी हिंसक या अराजक नहीं है। रही दिल्ली की आप की सरकार और उसके कामकाज के तौर-तरीके की तो इस बारे में सर्वसम्मत सराहना की स्थिति तो कतई नहीं है। यह जरूर है कि सरकार और जनता के बीच साझेदारी बढ़ाने के लोकतांत्रिक तकाजे को जरूर आप ने फिर से रेखांकित किया है। क्योंकि कम से कम यूपीए-2 सरकार के कार्यकाल को देखें तो इस दौरान न सिर्फ जनता की नजरों में सरकार की विश्वसनीयता में कमी आई है बल्कि पूरी राजनीतिक जमात की साख पर भी बट्टा लगा है।
सार्वजनिक जीवन की गरिमा में आए इस तरह के ह्रास को सादगी और ईमानदारी जैसी कुछ कसौटियों पर चुनावी चुनौती की पटकथा जिस तरह आप ने दिल्ली में लिखी और आगे लोकसभा चुनाव में उसके विस्तार को लेकर वह जिस तरह से ललक से भरी है, वह थोड़ा सोचने पर मजबूर करती है। आज हर तरफ से आप को इस सवाल से दो-चार होना पड़ रहा है कि उसकी वैचारिक अवधारणा का सार क्या है। कोई क्रांति कम से कम विचार शून्यता से तो नहीं पैदा हो सकती है। ऐसे लोग चुनावी राजनीति में जनता को विकल्प के नाम पर गुमराह भी कर सकते हैं। इस स्थिति पर चिंता महामहिम ने भी जताई है- 'चुनाव किसी व्यक्ति को भ्रांतिपूर्ण अवधारणाओं को आजमाने की अनुमति नहीं देते हैं।’ राष्ट्रपति का यह कथन उन सवालों का जवाब और चिंताओं का समाधानकारी सार है, जिस पर उनकी ही कही कुछ बातों के बाद हर तरफ चर्चा हो रही है।