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बुधवार, 2 अप्रैल 2014

केजरी के झाडू पर मंदिरों में रोक

आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल एक नई मुसीबत में फंस गए हैं। इस बार मुसीबत उनके लिए वाराणसी से आई है। खबर है कि वहां के पंडितों के कड़े एतराज के बाद राज्य निर्वाचन आयोग ने केजरीवाल और उनके समर्थकों के केजरी के झाडू पर मंदिरों में रोक के साथ मंदिरों में प्रवेश पर रोक लगा दी गई है। यह रोक वाराणसी में चुनाव संपन्न हो जाने तक लागू रहेगी। वैसे स्थानीय प्रशासन के सूत्रों की मानें तो यह रोक बाद में भी लागू रह सकती है।
इससे पहले केजरीवाल जब 25 मार्च को वाराणसी पहुंचे थे तो उन्होंने सबसे पहले वहां गंगा स्नान किया था। इसके बाद वे पूजा अर्चना के लिए प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर गए थे। बताया जाता है कि इस दौरान उनके कई समर्थकों ने हाथों में केजरी के झाडू पर मंदिरों में रोक और तिरंगा थाम रखे थे। सोशल मीडिया पर इस संबंध में एक वीडियो के वायरल हो जाने के बाद यह मामला तूल पकड़ने लगा।
मामले ने तब गंभीर मोड़ ले लिया जब स्थानीय पंडितों ने केजरीवाल व उनके समर्थकों के ऐसा करने पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। भाजपा की वाराणसी इकाई ने भी पंडितों के विरोध को जायज ठहराया और उसका समर्थन किया। इस सिलसिले में पिछले दिनों में वहां कई जगहों पर प्रदर्शन भी किए गए और आप नेताओं के पुतले फूंके गए।
काशी के पंडितों के एक संगठन ने इस बाबत राज्य निर्वाचन आयोग को भी एक शिकायती चिट्ठी लिखी थी, जिस पर जांच के बाद आयोग ने अपना फैसला सुनाया है। मंदिरों में
केजरी के झाडू पर मंदिरों में रोक
के साथ जाने पर रोक की खबर आने पर केजरीवाल ने ट्विटर पर कहा है कि यह सब भाजपा समर्थकों द्बारा वाराणसी के चुनाव को मुद्दे से भटकाने की कोशिश है। हालांकि केजरीवाल ने आयोग के निर्णय को चुनौती नहीं दी है पर यह खतरा जरूर जताया है कि इससे वाराणसी के लोकसभा चुनाव में विरोधियों द्बारा धार्मिक भावना भड़काने की उनकी आशंका सही साबित हुई है।
आप के प्रवक्ता और नई दिल्ली की चांदनी चौक सीट से चुनाव लड़ रहे आशुतोष ने कहा है कि
केजरी के झाडू पर मंदिरों में रोक गंदगी का नहीं बल्कि सफाई का प्रतीक है, इसलिए इस पर रोक का कोई तुक नहीं बैठता है। वहीं भाजपा की प्रदेश इकाई का कहना है कि सवाल केजरी के झाडू पर मंदिरों में रोक का नहीं है बल्कि आप के चुनाव चिह्न का है। पार्टी की तरफ से मीडिया को जारी विज्ञप्ति में राज्य चुनाव आयोग की इस बात के लिए तारीफ की गई है कि उसने समय रहते एक सही और जरूरी फैसला लिया है।
इस मामले में सपा और बसपा की तरफ से अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। वैसे अंदरखाने की खबर यह है कि आयोग के इस फैसले की सभी आप विरोधियों ने सराहना ही की है।
इस बीच, सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर दो तरह की राय आ रही हैं। कुछ लोग इसे वाराणसी में मोदी के खिलाफ बढ़ी चुनौती के खिलाफ एक बड़ी साजिश का हिस्सा मान रहे हैं, तो कुछ लोगों का यह कहना है कि यह एक जरूरी और सही फैसला है। आप नेताओं और उनके समर्थकों के
केजरी के झाडू पर मंदिरों में रोक
के साथ मंदिरों में प्रवेश पर रोक लगाकर राज्य निर्वाचन आयोग ने वाराणसी के चुनाव को निर्विवादित बनाने की कोशिश की है, जिसकी सराहना होनी चाहिए। बहरहाल, आगे यह मामला और तूल पकड़ सकता है।




सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

केजरीनोमिक्स

कोई भी नया आंदोलन अपनी प्रकृति में बहुत मुक्त होता है। पर यह खुलापन तभी तक रहता है जब तक आंदोलन से जुड़े विचार और संगठन को आकार नहीं मिल जाए। आम आदमी पार्टी (आप) के अभ्युदय और उसके पीछे की पृष्ठभूमि को समझें तो यह बात और साफ होगी। भ्रष्टाचार को लेकर एक सशक्त कानून की मांग के साथ शुरू हुआ आंदोलन देखते-देखते संगठन और विचार के अनुशासन में ढलता गया। इस स्वाभाविकता में किसी तरह की विसंगति देखने की जरूरत नहीं है पर इतनी टिप्पणी तो करनी ही पड़ेगी कि विचारधारा और संगठन की औपचारिकता में ढलने से पहले इस आंदोलन के नेताओं को कोई भी बात कहने में बहुत सोचना नहीं पड़ता था। वे भ्रष्टाचार की बात छेड़कर देश के साढ़े छह दशक की गणतंत्रीय यात्रा और मौजूदा राजनीति व पार्टी सिस्टम पर अंगुली उठा देते थे। पर अब जबकि यह पार्टी चुनावी राजनीति का बकायदा हिस्सा है तो उसे भी अन्य सियासी जमातों की तरह ही देखा जा रहा है और पूछा जा रहा है कि वह देश के विकास के बारे में क्या सोचती है, उसकी अर्थनीति क्या है, वह मुक्त बाजार व्यवस्था की हिमायती है या नहीं आदि।
हमलावर रहे विरोधी दलआप पर उनके विरोधी दलों की तरफ से बार-बार यह हमला किया जाता रहा कि यह एक कन्फ्यूज्ड पार्टी है, इसकी कोई स्पष्ट विचारधारा नहीं है, खासतौर पर आर्थिक मोर्चे पर देश को कैसे तरक्की की राह पर ले जाएं, इस बारे में पार्टी के पास पहले से तैयार कोई ब्लूप्रिंट नहीं है। पर आज स्थिति बदल गई है। एक 'कन्फ्यूज्ड’ और 'अराजक’ ठहराई जाने वाली पार्टी ने धीरे-धीरे देश और समाज से जुड़े तमाम सवालों और सरोकारों पर अपना रुख साफ करना शुरू कर दिया है। अलबत्ता भ्रष्टाचार का पूर्ण निषेध जरूर आज भी आप का कोर एजेंडा है पर पार्टी अब अर्थव्यवस्था, विकास और सरकारी कामकाज को लेकर प्राथमिकताओं पर खुलकर अपनी राय जाहिर कर रही है। यह देश के लिए भी काफी सुखद है। क्योंकि इससे पहले इस पार्टी के गठन और चुनावी राजनीति पर इसके असर को लेकर ही कयासबाजी ज्यादा होती थी, इसके वैचारिक स्टैंड को लेकर बहुत बात नहीं हो पाती थी।
अर्थ से परहेज मुश्किलयहां एक बात और समझने की है मौजूदा दौर में अमेरिका में बराक ओबामा हों या भारत में नरेंद्र मोदी अथवा अरविंद केजरीवाल, उनके नेतृत्व का आकलन इसी बात पर ज्यादा होगा कि उनका इकोनमिक विजन क्या है और वे इसे सरजमीं पर उतारने के लिए क्या कुछ करते हैं। इस दरकार को खारिज कर कोई भी आगे नहीं बढ़ सकता। यह बात आज देश में सबसे ज्यादा किसी को समझ में आ रही है तो वह हैं अरविंद केजरीवाल।
दिल्ली में जब उन्होंने सरकार बनाई तो उन्होंने मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआई को मंजूरी के शीला सरकार के फैसले को पलट दिया था। इसके बाद दिल्ली में बिजली के वितरण के काम में लगी निजी कंपनियों पर भी उन्होंने खुलेआम भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। बाद में कंपनियों के लेखा की जांच का जिम्मा भी उन्होंने कैग को दे दिया। सरकार गिरने से पहले केजरीवाल ने गैस की कीमत में प्रस्तावित बढ़ोत्तरी को लेकर उन्होंने एक साथ केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली और रिलांयस इंडस्ट्रीज के मालिक मुकेश अंबानी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था।
आशंकित थे उद्यमीऐसे में देश भर में खासतौर पर उद्यमियों के बीच यह आशंका तेजी से फैली की कि क्या आप सचमुच इतनी अराजक है कि वह अर्थ और विकास के इंजन को भी पटरी से उतार दे। आप ने भले ये सब कदम ये सोचकर उठाए हों कि इससे उन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकप्रियतावादी राजनीति करने में मदद मिलेगी, पर बाद में पार्टी को यह समझने में देर नहीं लगी कि उसे इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ सकता है। फिर क्या था अरविंद केजरीवाल देश के उन शीर्षस्थ उद्योगपतियों के बीच पहुंच गए, जिनके मंच से अपनी बात कहना नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी से लेकर देश के किसी भी नेता के लिए सर्वाधिक गौरव और संतोष का विषय होता है।
सीआईआई के मंच पर 17 फरवरी को वित्तमंत्री पी. चिदंबरम संसद में अंतरिम बजट पेश कर रहे थे और इसी दिन भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के मंच पर अरविंद केजरीवाल देश के चोटी के उद्यमियों को यह समझा रहे थे कि न तो वे और न उनकी पार्टी उद्योग जगत के खिलाफ है। इसे उन्होंने जानबूझकर किया जाने वाला दुष्प्रचार करार दिया। उन्होंने जो बातें वहां साफ कीं, उनमें सबसे अहम था कि वे निजी क्षेत्र का देश के विकास में अहम रोल मानते हैं।
यही नहीं उन्होंने यहां तक कहा कि यह क्षेत्र अपनी क्षमता और ऊर्जा के मुताबिक आज देश में इसलिए परफॉर्म नहीं कर पा रहा क्योंकि सरकार की व्यवस्था भ्रष्ट है। भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की बात कहने वाले केजरीवाल ने साफ किया कि उद्यमियों की बिरादरी में महज कुछेक लोग ही हैं जो भ्रष्ट तरीके से काम करते हैं। यही नहीं उन्होंने देशभर के उद्यमियों को आप के साथ जुड़ने का खुला न्योता भी दिया। केजरीवाल की इन बातों से इतना तो साफ है कि खुद को अराजक तक कहने वाले नेता को भी इतना पता है कि उसके अनर्थकारी सोच से परिवर्तन की उसकी मुहिम एक सीमित दूरी से आगे नहीं बढ़ सकती।
गंवाया मौका वैसे ये सब तो रहीं कहने-सुनने भर की बातें। ये ठीक है कि अब एक मौका है कि लोग आप के बारे में बात करते हुए उसके आर्थिक चिंतन की भी बात करेंगे। ऐसा करते हुए तटस्थ मन:स्थिति के लोग जहां आलोचकीय विवेक दिखलाएंगे, वहीं दलीय राजनीति के दिग्गज अब अर्थ के मोर्चे पर भी आप को पटखनी देना चाहेंगे। दिलचस्प है कि आप की सोच और विचारधारा को लेकर अब तक एक ही एसिड टेस्ट हुआ है और वह है दिल्ली में उसकी 49 दिन की सरकार। लिहाजा, निजी कंपनियों को लेकर भरोसा दिखाने और ईमानदार राजनीति की चाहे जितनी बातें केजरीवाल कर लें और उसे अपनी घोषणा में दर्ज दिखा दें, उन पर अमल वे कैसे करते हैं अभी यह देखना बाकी है।
इसलिए गिराई सरकारदिल्ली में कुछ और दिन तक सरकार चलाकर वे अपना परफामेर्ंस रिकार्ड देश के आगे रख सकते थे पर उन्होंने जानबूझकर ऐसा नहीं किया। क्योंकि इतनी सी बात तो अरविंद केजरीवाल भी जानते हैं आदर्श का उद्घोष भले गगनभेदी हो पर उसका आचरण एक मुश्किल चुनौती है। आप इस चुनौती पर खरा उतरने में कितनी अराजक होती है या कितना सफल-
असफल यह पूरे देश के साथ देश का उद्योग जगत भी देखना चाहेगा।
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आप ने समझाया अपना अर्थव्यापार और डकैती
हम पूंजीवाद के खिलाफ नहीं बल्कि साठगांठ वालÞ पूंजीवाद के खिलाफ हैं। हमÞं उस वक्त निराशा हाÞती है जब 1.5 लाख कराÞड़ के स्पÞक्टàम एक हफ्तÞ के भीतर 6,००० कराÞड़ मÞं बÞच दिए जातÞ हैं। इसÞ व्यापार नहीं बल्कि डकैती कहतÞ हैं।
सरकार का कामहमारे दÞश मÞं कुछ ऐसÞ उद्याÞगपति हैं जाÞ असल मÞं उद्याÞगपति या व्यापारी नहीं हैं बल्कि वÞ दÞश काÞ लूट रहÞ हैं । हम उनके खिलाफ हैं, न कि आप सबके खिलाफ। यदि व्यापार पर ताला लगा दिया जाएगा ताÞ राÞजगार कौन पैदा करेगा। व्यापार करना सरकार का काम नहीं है, उसÞ ताÞ प्रशासन पर पूरा ध्यान दÞना चाहिए।
न्याय के नाम पर अन्याय
मुकदमÞबाजी मÞं कमी लानÞ की जरूरत है और खासतौर पर ऐसी मुकदमÞबाजी मÞं कमी की जरूरत है जिसमÞं मुकदमा सरकार की तरफ सÞ दायर किया जाता है। हमारी न्यायिक व्यवस्था काफी जटिल है। इसÞ जानबूझकर लुंज-पुंज बनाया गया है। यह समझना काÞई मुश्किल काम नहीं है कि यदि आप ज्यादा जजाÞं की नियुक्ति करेंगÞ, ज्यादा अदालतÞं खाÞलÞंगÞ ताÞ पिछलÞ 2० साल सÞ लंबित मुकदमÞ छह महीनÞ मÞं निपटाए जा सकतÞ हैं। मैं समझता हूं कि इससÞ स्थिति मÞं काफी हद तक सुधार आएगा।
मनमोहन पर तंज
दुनिया के बÞहतरीन आर्थिक विशÞषज्ञ हमारे प्रधानमंत्री मनमाÞहन सिंह हैं। यूपीए के पिछलÞ 1० साल के शासनकाल मÞं आपनÞ सर्वश्रेष्ठ आर्थिक नीतियां दÞखीं पर सबसÞ बड़ी कमी ईमानदार राजनीति की रही। ईमानदार राजनीति न हाÞनÞ की वजह सÞ उन आर्थिक नीतियाÞं काÞ लागू नहीं किया जा सका।
मंत्रियों पर वार
मनमोहन सिंह की कैबिनÞट मÞं ऐसÞ कई मंत्री हैंं जिन्हाÞंनÞ हार्वर्ड यूनिवर्सिटी सÞ अर्थशास्त्र की पढ़ाई की है, ताÞ ऐसÞ मÞं अच्छी आर्थिक नीतियाÞं की कमी नहीं थी। पर हमारे दÞश मÞं उद्याÞगपति और व्यापारी दुखी हैं। वÞ दुखी क्याÞं हैं?
ईमानदार राजनीति की कमी रही है। न ताÞ भाजपा और न कांग्रेस नÞ ईमानदार राजनीति की।
अच्छा प्रशासन दे सरकार
पहलÞ दजर्Þ के नागरिकाÞं काÞ तीसरे दजर्Þ का प्रशासन मिल रहा है। आज सबसÞ अहम मुद्दा प्रशासन है। ईमानदार एवं दक्ष प्रशासन वक्त की मांग है। सरकार का काम व्यापार करना नहीं है, उसÞ 'गवर्नेंस’ करना चाहिए।
विकास का मतलब
दÞश की सभी व्यापारिक गतिविधियां निजी हाथाÞं मÞं हाÞनी चाहिए। कई पार्टियां और सरकारें कहती हैं कि वÞ विकास का काम कर रही हैं पर विकास का काम सरकारें नहीं, व्यापार के जरिए लाÞग करतÞ हैं।
सरकार की भूमिका
सरकार की भूमिका की परिभाषा तय करनÞ का वक्त आ गया है। किसी भी सरकार के लिए तीन काम करना काफी जरूरी हाÞता है। पहला, सरकार का काम नागरिकाÞं काÞ सुरक्षा प्रदान करना है । दूसरा, नागरिकाÞं काÞ न्याय प्रदान करना और तीसरा भ्रष्टाचार-मुक्त प्रशासन दÞना है। लÞकिन दुर्भाग्यवश काÞई भी पार्टी यÞ बातÞं नहीं कर रही।
दलों के दावों पर सवाल
तमाम पार्टियां ऐसा दावा करती हैं कि वे विकास देंगी। मैं जानना चाहता हूं कि वे ऐसा कैसÞ करंÞगी जबकि नागरिक असुरक्षित महसूस कर रहÞ हैं। ऐसÞ मÞं क्या काÞई विकास हाÞ सकता है? क्या ऐसÞ माहौल मÞं व्यापार किया जा सकता है?
इंस्पेक्टर और लाइसेंस राज
आयकर विभाग का एक इंस्पÞक्टर भी बडÞè-बड़े उद्याÞगपतियाÞं काÞ मुश्किल मÞं डाल सकता है। आप इंस्पÞक्टर और लाइसÞंस राज के सख्त खिलाफ हैं। हम पूरी व्यवस्था पर फिर सÞ विचार करना चाहतÞ हैं।
निजी क्षेत्र से उम्मीद
सरकार के पास नौकरियां नहीं हैं। देश में नई नौकरियां सृजित करना आसान नहीं है, इसलिए हमें अपने युवाओं को कारोबार से जोड़ना होगा। कॉलेजों में ऐसी व्यवस्था करनी होगी जिससे छात्रों को अपने आइडिया पर काम करने का मौका मिल सके । आने वाले दिनों में निजी क्षेत्र ही देश के युवाओं को नौकरियां देने की स्थिति में होगा।
बेईमानी की वजह
देश के 99 प्रतिशत लोग ईमानदारी से काम-धंधा करना चाहते हैं लेकिन ऐसा माहौल नहीं है इसी वजह से लोगों को बेईमानी करनी पड़ती है। मौजूदा नीतियों और प्रक्रियाओं को सरल बनाना होगा। खुद पहल करके ऐसी नीतियां बनानी होंगी जिससे कारोबार बढ़े।
निजीकरण से नहीं रुकेगा भ्रष्टाचार
निजीकरण से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा। अगर सरकार भ्रष्ट है तो निजी क्षेत्र भी काम नहीं करेगा। भ्रष्टाचार लालच से आता है और लालच मोटी तनख्वाह से भी कम नहीं होती। भ्रष्टाचार की शुरुआत चुनाव के लिए पैसे लेने से होती है। भ्रष्टाचार रोकने के लिए डर जरूरी है। मोटी तनख्वाह के बाद भी हमारे देश में कई ऐसे मंत्री हैं, जो भ्रष्ट हैं। किसी भी मंत्री की सीटीसी एक-दो करोड़ से कम नहीं होगी लेकिन एक मंत्री एक ठेके में 5००-5०० करोड़ रुपये की रिश्वत लेता है। कांग्रेस और बीजेपी का पैसा बेनामी का है और इसी वजह से इन पार्टियों के लोग अपने पैसे का हिसाब देने से डरते हैं।
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करके भी दिखाएं
सीआईआई की बैठक के बाद जब देश के प्रमुख उद्योगपति आदी गोदरेज से इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने इतना भर कहा कि अच्छा है कि आप ने अपनी बातें हम लोगों के बीचकर आकर रखीं। पर वे इन तमाम बातों को क्रियान्वित कैसे करते हैं या कितना कर पाते हैं, अभी यह देखना बाकी है। दिलचस्प है कि आदी की प्रतिक्रिया में न तो केजरीवाल के लिए कोई सराहना के शब्द हैं और न ही नाहक आलोचना के। हां, इतना जरूर है कि आप को बात और जज्बात से आगे अब कार्यक्रम और क्रियान्वयन पर जोर देना होगा।
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लगाया जा सकता है दांव
हां, मैं अरविद केजरीवाल का फैन हूं। मैं उनके विचारों से काफी प्रभावित भी हूं। मुझे सच में नहीं पता कि चुनावी हवा किस ओर बह रही है लेकिन मुझे केजरीवाल के नेतृत्व क्षमता पर पूरा भरोसा है। देश भ्रष्टाचार के कारण परेशान है। आपको आरटीओ में अपनी गाड़ी के लिए नंबर रजिस्टर्ड कराने तक के लिए घूस देनी पड़ती है। अंत में नेता पर ही आकर बात रुकती है। मुझे लगता है कि अरविद केजरीवाल ऐसे नेता हैं, जिस पर दांव लगाया जा सकता है।
-राजीव बजाज, बजाज ऑटो के मैनेजिग डायरेक्टर
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भ्रष्टाचार की योजनाएं
 हमें स्वराज चाहिए। हर वर्ष विकास के नाम पर दिल्ली में बैठकर नेता और अफसर बेतुकी योजनाएं बनाते हैं। लाखों, करोड़ों रुपए खर्च कर दिए जाते हैं। यह पैसा जनता तक पहुंचने के बजाय भ्रष्टाचारियों की जेबों में चला जाता है। हमें ऐसा विकास नहीं चाहिए। स्वराज होगा तो जनता विकास खुद कर लेगी। स्वराज मतलब जनता का राज। अपने गांव, अपने शहर, अपने मोहल्ले के बारे में सीधे जनता निर्णय ले। संसद और विधानसभाओं में पारित होने वाले कानून भी जनता की मर्जी से
बनाए जाएं।
(अपनी पुस्तक 'स्वराज’ में अरविंद केजरीवाल)

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

स्वराज पर बहस से भागती हैं पार्टियां

आम आदमी पार्टी की दिल्ली की सरकार जनलोकपाल बिल के नाम पर चली गई। वैसे एक और बिल को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की कैबिनेट ने मंजूरी दी थी और अगर जनलोकपाल बिल को विधानसभा की हरी झंडी मिल भी जाती तो पूरी संभावना थी कि कांग्रेस और भाजपा के साथ आप के बीच इस मुद्दे पर रार मचती। जनलोकपाल बिल को तो लेकर खैर देश भर में पिछले कम से कम तीन सालों से चर्चा हो रही है पर स्वराज बिल को लेकर कभी कोई गंभीर बहस नहीं हुई। न ही आप की तरफ से ऐसी कोई पहल हुई और न ही दूसरे दलों ने इस बारे में कोई दिलचस्पी अपनी तरफ से दिखाई।
दरअसल, भ्रष्टाचार के खिलाफ सशक्त कानून की दरकार तो महसूस इसलिए की जा रही है कि बीते कुछ दशकों में सरकारी लूट और घोटाले इतने बढ़ गए कि इसे नवविकास की अवधारणा का एक जरूरी तत्व तक बताया जाने लगा। खासतौर पर यूपीए-2 सरकार के कार्यकाल में जिस तरह भ्रष्टाचार के एक के बाद नए मामले खुले उससे यह बहस आम हो गई कि इसके खिलाफ कठोर कानूनी पहल तो होनी ही चाहिए। यह अलग बात है कि यह मांग सरकार के अंदर स्वाभाविक रूप से उठनी चाहिए थी पर इसके लिए सिविल सोसायटी की अगुआई में जनता सड़कों पर उतरी। सरकार को मजबूरन इसके लिए तैयार होना पड़ा पर सिविल सोसायटी के जनलोकपाल बिल के ड्राफ्ट को मानने के बजाय सरकारी दखल की अनुकूलता वाला बिल संसद ने पास कर दिया।
अब जबकि देश एक बार फिर से पांच साल के लिए केंद्र की अगली सरकार चुनने जा रहा है तो यह सवाल मौजू हो गया है कि भ्रष्टाचार अगर मौजूदा डेमोक्रेटिक सिस्टम का साइड इफेक्ट है, इसे कानूनी तौर पर रोकने के बजाय व्यवस्थागत परिवर्तन के तौर पर क्यों न देखा जाए। आप की सरकार दिल्ली में इसी दरकार को पूरा करने के लिए स्वराज बिल लाना चाहती थी। चूंकि इसका कोई फाइनल या प्रस्तावित ड्राफ्ट लोगों के सामने नहीं है, इसलिए उसके प्रवधानों पर बहुत बारीकी से कोई बात नहीं हो सकती। हां, विधानसभा चुनाव के दौरान आम आदमी पार्टी की तरफ से जो विस्तृत चुनाव घोषणा पत्र लाया गया था, उसमें इस बारे में जरूर कुछ बातें कही गई हैं। आम आदमी पार्टी की सोच इस मामले में तो जरूर सराहनीय कही जाएगी कि वह कम से कम सैद्धांतिक रूप से सत्ता के केंद्रीय वर्चस्व को तोड़कर एक विकेंद्रित ढांचे की बात करती है।
यह सोच पंचायत राज के प्रयोग से आगे की बात इस लिहाज से है कि इसमें मुहल्ला सभाएं या रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशंस (आरडब्ल्यूए) महज कुछ सरकारी योजनाओं को लागू कराने वाले इंस्ट्रÔमेंट भर नहीं होंगे बल्कि अपने इलाके के विकास से लेकर न्याय और सुरक्षा तक का दारोमदार उनके हाथों में होगा। यही नहीं, अगर क्षेत्र के लोग बहुमत से यह तय करते हैं कि उनके पार्षद या विधायक उनकी अपेक्षाओं के मुताबिक काम नहीं करते तो उन्हें वापस भी बुलाया जा सकता है यानी राइट टू रिकॉल।
गौरतलब है कि जनलोकपाल आंदोलन के दौरान समाजसेवी अण्णा हजारे देश में लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के लिए जो एजेंडा जनता के साथ शेयर करते थे, उसमें चुनाव सुधार और लोकतंत्र के विकेंद्रित ढांचे की बात खासतौर पर करते थे। बल्कि वे तो यहां तक कहते थे कि जनलोकपाल बिल के बाद इन्हीं मुद्दों को लेकर संघर्ष करेंगे। अण्णा की इन बातों से ही कहींन कहीं देश में 21वीं सदी के दूसरे दशक के आगाज के साथ वैकल्पिक राजनीति को लेकर भी एक बहस शुरू हुई। यह अलग बात है इस बहस में बहुत ज्यादा दिलचस्पी न तो मीडिया ने दिखाई और न ही जनता ने। ऐसा संभवत: इसलिए भी हुआ कि यह मुद्दा भ्रष्टाचार विरोध की तरह 'कैची’ नहीं था।
शुक्र मानना चाहिए आम आदमी पार्टी और उसके कुछ नेताओं का कि उन्होंने विचार और मुद्दे के स्तर पर इस दरकार को न सिर्फ जीवित रखा बल्कि अपने चुनावी एजेंडे में भी इसे शामिल किया। यह अलग बात है कि अवधारणात्मक रूप से आप का स्वराज भी विकेंद्रित लोकतांत्रिक व्यवस्था का सटीक मॉडल नहीं है। यह पहल अपनी बनावट में क्रांतिकारी जरूर ठहराई जा सकती है पर यह उस सोच से काफी दूर है जिसके लिए पहले गांधी ने और फिर विनोबा और जयप्रकाश ने राजनीति की जगह 'लोकनीति’ की बात की थी। आप का स्वराज सैद्धांतिक रूप से इस प्रश्न का तो उत्तर देता है कि संसद या सरकार की सर्वोच्चता जनता के ऊपर नहीं हो सकती। पर केंद्रीय सत्ता अपने अधिकारों में कटौती कर एक विकेंद्रित ढांचा खड़ा करे या विकेंद्रित ढांचे के तहत काम कर रही लोकतांत्रिक संस्थाएं अपने लिए एक नियामक केंद्रीय सत्ता का निर्माण करें, आप इसका न तो उत्तर देती है और न ही यह सवाल उसके लिए जरूरी है। दरअसल, ये दोनों दो स्थितियां हैं और दोनों में एक बड़ा बुनियादी फर्क है।
गांधी जिस तरह के लोकतंत्र की बात करते हैं, उसमें केंद्र से चैरिटी के रूप में लोकतांत्रिक सत्ता का विकेंद्रीकरण नहीं होता बल्कि स्वावलंबी और स्वदेशी की ताकत पर खड़ी हुई ग्राम पंचायतें या स्थानीय निकाय, राष्ट्र और राज्य के रूप में अपनी शिनाख्त को मुकम्मल बनाने के लिए एक केंद्रीय नियामक संस्था का गठन करते हैं। असल में लोकतंत्र को लेकर समझ और सोच का यह फर्क प्रातिनिधिक और प्रतिभाग के लोकतंत्र के बीच का अंतर है।
दुर्भाग्य से देश में लोकतंत्र की बनावट को लेकर बहस और आंदोलन की गुंजाइश को जानबूझकर केंद्रीकृत सत्ता की राजनीति करने वाली सियासी जमातों ने कभी आगे नहीं बढ़ने दिया। कांग्रेस को भंग कर लोक सेवक संघ की गांधी की वसीयत को नेहरू-गांधी परिवार ने याद करने का साहस नहीं दिखाया तो बाद में जयप्रकाश की संपूर्ण क्रांति में शामिल हुए सियासी दलों ने 'जनता सरकार’ की उनकी परिकल्पना को साकार नहीं होने दिया। आप ने इस निराशा से आगे एक आशावादी पहल को जरूर आकार दिया है पर वह जिस तरह की अराजक जल्दबाजी में दिख रही है, उससे उनसे बहुत उम्मीद करना बेमानी होगा।
एक बात और यह कि देश का नया जन-गण-मन परिवर्तन की छटपटाहट से भरा है और यह बीते सालों में कई मौकों पर देखने को मिला है। कमी है तो एक ऐसे सूत्रधार की और समन्वित पहल की जिसमें परिवर्तन का मतलब सरकार बदलने से आगे लोकतांत्रिक तकाजों को नए सिरे से जांचना-परखना और स्थिर करना हो। फिर इसके लिए विधान से लेकर संवधिान तक जो भी बदलना पड़े, उसे बदला जाए। नए भारत का नया गणतंत्र बदलावों की ऐसी बड़ी संभावनाओं को सरजमीं पर उतरने की बाट न जाने कब से जोह रहा है।
 

मंगलवार, 28 जनवरी 2014

संबोधन में छिपा चिंताओं का समाधानकारी सार

देश ने जब इस बार 65वां गणतंत्र दिवस मनाया तो उसके मन में उल्लास के साथ कई सवाल भी थे। ये सवाल भी कोई रातोंरात पैदा हुए हों, ऐसा नहीं है। अलबत्ता यह जरूर है कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में जिस तरह कुछ मुद्दों और खतरों को रेखांकित किया, उनसे ये सवाल एकदम से सतह पर आ गए। राष्ट्रपति महोदय ने देश के लोकतंत्र को लेकर यह चिंता जताई है कि एक तरफ तो जनता गुस्से में है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी स्तर पर अराजकतावादी आचरण दिख रहे हैं।
सनसनी पैदा करने की गरज से राष्ट्रपति के इस संबोधन की कुछ लोग मन माफिक व्याख्या कर रहे हैं। इसमें मीडिया का भी एक तबका शामिल है। दरअसल, इस स्थिति को समझने के लिए हमें बीते कुछ सालों के घटनाक्रमों को देखना होगा। देश का नागरिक समाज जनता को साथ लेकर इस दौरान एक नए तरह के लोकमत के निर्माण में लगा है। लोकमत निर्माण की यह प्रक्रिया प्रतिक्रियावादी और सुधारवादी दोनों है। प्रतिक्रियावादी इस लिहाज से कि इसमें एक तरफ तो इस बात की खीझ है कि सत्ता और जनता का साझा आचरण बदल गया है। केंद्र से लेकर राज्यों की सरकारें 'जनता का शासन’ चलाने की बजाय 'जनता पर शासन’ कर रही हैं। नतीजतन सरकारी सोच और काम की प्राथमिक शर्त अब न तो लोक कल्याणकारी है और न ही पारदर्शी। इस स्थिति पर देश के प्रथम नागरिक ने भी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा है, 'यदि भारत की जनता गुस्से में है, तो इसका कारण है कि उन्हें भ्रष्टाचार तथा राष्ट्रीय संसाधनों की बर्बादी दिखाई दे रही है।’
देश के नागरिक समाज ने इस स्थिति को बदलने के लिए कुछ लोकतांत्रिक दरकारों और सरोकारों को बार-बार रेखांकित किया है। इसमें सबसे अहम् मुद्दा है प्रातिनिधिक लोकतंत्र के ढांचे को संभव स्तर तक प्रतिभागी बनाना। जनलोकपाल आंदोलन के प्रकटीकरण के पीछे के कारणों को अगर समझें तो साफ होता है कि जनता अपने लिए सुविधा ही नहीं नीति और कानून निर्माण के लिए भी सड़क पर उतर सकती है। महज इतना ही नहीं, सरकार के आगे जनता इस बात का भी लोकतांत्रिक दबाव बना सकती है कि वह महज उसके लिए नहीं बल्कि उसके साथ बैठकर जरूरी फैसले करे।
दिलचस्प है कि अराजनीतिक रूप से चल रही इस तरह की सुधारवादी कोशिश ने अब राजनीतिक विकल्प की भी शक्ल ले ली है। पर एक बड़ी कोशिश के ठोस विकल्प बनने की प्रक्रिया सघन और सुचिंतित होनी चाहिए। दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) की जीत और फिर सरकार बनाने की घटना काफी अफरातफरी भरी रही है। आप ने जिस तरह के वादे जनता से किए और फिर सरकार बनाने के बाद वह जिस तरह अराजक स्थितियों को जन्म दे रही है, उसने कई सवाल खड़े किए हैं।
इस स्थिति पर राष्ट्रपति की टिप्पणी गौरतलब है। उनके ही शब्दों में, 'चुनाव किसी व्यक्ति को भ्रांतिपूर्ण अवधारणाओं को आजमाने की अनुमति नहीं देते हैं। जो लोग मतदाताओं का भरोसा चाहते हैं, उन्हें केवल वही वादा करना चाहिए जो संभव है। सरकार कोई परोपकारी निकाय नहीं है। लोकलुभावन अराजकता, शासन का विकल्प नहीं हो सकती।’
देश की मौजूदा स्थिति और राजनीतिक स्तर पर बदलाव की कम-ज्यादा संभावनाओं के बीच देश के प्रथम नागरिक की टिप्पणियों और चिंताओं पर जब विचार करते हैं तो इससे काफी हद तक समाधान मिलता है। हालांकि यहीं से कुछ नए सवालों का प्रस्थान बिंदु भी तैयार हो जाता है। समाधान की बात यह है कि जैसा कि महामहिम खुद कहते हैं, 'मैं निराशावादी नहीं हूं क्योंकि मैं जानता हूं कि लोकतंत्र में खुद में सुधार करने की विलक्षण योग्यता है। यह ऐसा चिकित्सक है जो खुद के घावों को भर सकता है और पिछले कुछ वर्षों की खंडित तथा विवादास्पद राजनीति के बाद 2०14 को घावों के भरने का वर्ष होना चाहिए।’
सवालों की नई जमीन इस पर तैयार हो गई है कि राष्ट्रपति को अभी ये सारी बातें कहने की जरूरत क्यों पड़ी। क्या इससे पहले का देश का लोकतांत्रिक इतिहास उन चिंताओं से सर्वथा मुक्त रहा, जिस पर आज चिंता जताई जा रही है? क्या देश लोकतांत्रिक संस्थाओं के अवमूल्यन की इमरजेंसी जैसी हिमाकत तक पहुंच गया है? क्या सरकारी अराजकता का नया खतरा 1984 में सिख दंगों के दौरान 'एक बड़ा पेड़ गिरने पर धरती के स्वाभाविक कंपन’ से भी बड़ा है? सवाल यह भी कि लोकतंत्र क्या इतना लकीर का फकीर है कि उसे आंदोलन और बदलाव जैसी स्थितियां या तो असंवैधानिक लगती हैं, या फिर अमर्यादित?
बहरहाल, इस मुद्दे पर यह तो मानकर ही चलना चाहिए कि राष्ट्रपति महोदय ने जो भी बातें कहीं, वह किसी एक घटना, सरकार या पार्टी तक सीमित न होकर संपूर्ण राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण होंगी, नहीं तो अनावश्यक विवाद पैदा होगा। अलबत्ता इस पूरे विमर्श में कुछ चीजें पहले से जरूर साफ होनी चाहिए। एक तो यह कि बीते दो-तीन सालों में जनता एकाधिक बार सरकार के खिलाफ अपने आक्रोश को लेकर सड़कों पर उतरी तो विरोध प्रदर्शन का यह तरीका हर लिहाज से अहिंसक था।
लिहाजा, इतना तो मानना ही पड़ेगा कि कम से कम जनता की मन:स्थिति अब भी हिंसक या अराजक नहीं है। रही दिल्ली की आप की सरकार और उसके कामकाज के तौर-तरीके की तो इस बारे में सर्वसम्मत सराहना की स्थिति तो कतई नहीं है। यह जरूर है कि सरकार और जनता के बीच साझेदारी बढ़ाने के लोकतांत्रिक तकाजे को जरूर आप ने फिर से रेखांकित किया है। क्योंकि कम से कम यूपीए-2 सरकार के कार्यकाल को देखें तो इस दौरान न सिर्फ जनता की नजरों में सरकार की विश्वसनीयता में कमी आई है बल्कि पूरी राजनीतिक जमात की साख पर भी बट्टा लगा है।
सार्वजनिक जीवन की गरिमा में आए इस तरह के ह्रास को सादगी और ईमानदारी जैसी कुछ कसौटियों पर चुनावी चुनौती की पटकथा जिस तरह आप ने दिल्ली में लिखी और आगे लोकसभा चुनाव में उसके विस्तार को लेकर वह जिस तरह से ललक से भरी है, वह थोड़ा सोचने पर मजबूर करती है। आज हर तरफ से आप को इस सवाल से दो-चार होना पड़ रहा है कि उसकी वैचारिक अवधारणा का सार क्या है। कोई क्रांति कम से कम विचार शून्यता से तो नहीं पैदा हो सकती है। ऐसे लोग चुनावी राजनीति में जनता को विकल्प के नाम पर गुमराह भी कर सकते हैं। इस स्थिति पर चिंता महामहिम ने भी जताई है- 'चुनाव किसी व्यक्ति को भ्रांतिपूर्ण अवधारणाओं को आजमाने की अनुमति नहीं देते हैं।’ राष्ट्रपति का यह कथन उन सवालों का जवाब और चिंताओं का समाधानकारी सार है, जिस पर उनकी ही कही कुछ बातों के बाद हर तरफ चर्चा हो रही है।