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सोमवार, 14 नवंबर 2016

नोटबंदी के अलावा भी थे विकल्प



- प्रेम प्रकाश
अगर सरकार और समाज की व्यवस्था को लेकर सोच सुधारवादी नहीं रही तो हम समय के प्रवाह से कट जाएंगे। इसी तरह व्यवस्था के फैसले पर सवाल खड़े करने के अधिकार की जगह अगर जनता पर महज रजामंदी जाहिर करने का दबाव हो तो यह लोकतंत्र के लिए अशुभ संकेत है। इस सैद्धांतिक टेक के साथ नोटबंदी के सरकार के हालिया फैसले पर गौर करें तो इसे फौरी तौर पर सराहने वाले भी अब कहने लगे हैं कि सरकार ने यह फैसला जल्दबाजी में लिया है। बेहतर होता कि सरकार फैसले के इस विकल्प तक पहुंचने से पहले पर्याप्त सोच-विचार करती। आलम यह है कि फैसले के चार दिन बाद भी स्थिति लगातार असामान्य बने हुए हैं। बैंकों और एटम मशीनों के आगे घंटों कतार में खड़ी जनता का सब्र आक्रोेश मंे बदले लगा है। यह आक्रोश अगर विस्फोटक शक्ल अख्तियार करता है तो कानून व्यवस्था की स्थिति को संभालना आसान नहीं रह जाएगा। सड़कों से लेकर मंडियों तक लूटपाट जैसी घटनाएं तो फैसले के दूसरे-तीसरे दिन से ही सामने आने लगी हैं। 
ऐसे में यह सवाल तो सरकार से पूछा ही जाना चाहिए कि आखिर नोटबंदी के बड़े एलान से पहले उसने ऐसी पक्की व्यवस्था क्यों नहीं कि जिससे आमजनों को हो रही परेशानी से बचाया जा सके। यह भी कि क्या यह कालाधन से निपटने का एकमात्र मुफीद तरीका रह गया था? क्योंकि कई विशेषज्ञ भी इस बात को कह रहे हैं कि सरकार के पास तमाम ऐसी जानकारियां हैं, जिससे वे अवैध धन इकट्ठा करने वालों के गिरेबान सीधे पकड़ सकती है। रहा बड़े नोटों का सवाल तो इस पर रोक की मांग पुरानी है। दिलचस्प है कि अपने नए फैसले में भी सरकार इन्हें बंद करने के बजाय सिर्फ बदल रही है। यही नहीं, पांच सौ और हजार के बाद वह दो हजार का नया नोट प्रचलन में ला रही है। इस तरह यह कार्रवाई बड़े नोटों को चलन से बाहर करने का तो कतई नहीं है। हां, सरकार के फैसले से कालाधन के नाम पर फर्जी नोटों पर कार्रवाई की दलील तो समझ में आती है पर इससे अवैध धन जमा करने के रास्तों और जुगाड़ों पर नकेल कसेगी, यह समझ से परे है। जहां तक सवाल है पुराने बड़े नोटों को अमान्य करने का तो इस काम को भी एकबारगी या क्रमिक तौर पर छपाई बंद करने का विकल्प ज्यादा बेहतर होता। इससे धीरे-धीरे बड़े नोट खुद ब खुद प्रचलन से बाहर हो जाते। पर सरकार ने ऐसा न कर एक ऐसा फैसला किया जिसमें घुन और गेंहू साथ-साथ पिस रहे हैं। ये तमाम सवाल मौजूदा हालात में इसलिए जरूरी हैं क्योंकि सरकार की तरफ से अब भी कोई ऐसा आश्वासन नहीं कि वह आमजनों की परेशानी के साथ बिगड़े हालात पर जल्द काबू पा लेगी। 
आठ दिसंबर की रात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विमुद्रीकरण की घोषणा की तो अगले दो दिनों में एटीएम के साथ बैंकों के सामान्य कामकाज का एक तरह से भरोसा देश को दिलाया था। पर चार दिन बाद आलम यह है कि सरकार की तरफ से यह सफाई आने लगी कि कि दैनिक जरूरतें पूरी करने के लिए खुले पैसे की समस्या से जूझ रहे आम आदमी की तकलीफें दूर होने में उम्मीद से अधिक समय लग सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि जारी किए गए 5०० और 2,००० रुपये के नए नोटों के लिए देशभर के दो लाख एटीएम मशीनों को रीसेट करना होगा। वित्तमंत्री अरुण जेटली से जब पूछा गया कि अब जब वे एटीएम मशीनों के सामान्य तौर पर काम करने को लेकर दो से तीन हफ्ते का वक्त लगने की बात कह रहे हैं तो सरकार सरकार ने पहले से एटीएम मशीनों में ये बदलाव क्यों नहीं किए। इस पर जेटली की दलील है कि इससे सरकार का चकित करने वाले कदम की गोपनीयता खत्म हो जाती। पर इस गोपनीयता को बनाए रखने के लिए आम लोगों के सब्र की परीक्षा लेने का विकल्प ही क्यों सरकार को पसंद आया, इसका सीधा जवाब सरकार की तरफ से कोई नहीं दे रहा। 
इस प्रक्रिया की जटिलता और इसमें लगने वाले समय का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि किसी एटीएम मशीन को रीकन्फीगर करने के लिए एक तकनीशियन को खुद एटीएम मशीन जाना होगा। इस तरह किसी एक मशीन को रीकन्फीगर करने में अमूमन चार घंटे का समय लग सकता है। इसका मतलब है कि देश भर की दो लाख एटीएम मशीनों को रिकन्फीगर करने में आठ लाख घंटे लगेंगे। इस काम के लिए बड़ी संख्या में तकनीशियनों को इकट्ठा करना भी चुनौती ही है। लिहाजा, यह सवाल तार्किक तौर पर और मजबूत होता है कि कथित कालेधन से निपटने के लिए सरकार ने एक ऐसा रास्ता क्यों चुना जिससे समाज का हर तबका इस कदर परेशानहाल है कि उसे पता भी नहीं कि वे इससे कब तक और कैसे बाहर निकलेंगे। 
तथ्यात्मक तौर पर देखें तो देश में कुल 17 लाख करोड़ की करेंसी में 8.2 लाख करोड़ (5०० के नोट) और 6.7 लाख करोड़ (1००० के नोट) पूरी करेंसी का 86 फीसदी हैं, जो अब प्रचलन से बाहर हो गए हैं। इससे पैदा होने वाले संकट का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि देश में नगदी नोटों से आम जनता की अर्थव्यवस्था चलती है, जबकि बड़े लोग बैंकिग प्रणाली से कारोबार करते हैं। सरकार चाहती तो ऐसे में 2.7 लाख करोड़ के रोजाना बैंकिग ट्रांजेक्शन और सालाना 8०० लाख करोड़ के बैंकिग कारोबार में बड़े लेनदेन को सीधे अपने स्कैन पर ले सकती थी और जांच के बाद संबंधित लोगों-कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई कर सकती थी। 
सीबीआई डायरेक्टर एपी सिह ने फरवरी 2०12 में यह बताया था कि कालाधन के नाम पर लगभग 3० लाख करोड़ रुपए विदेशों में जमा हैं। 2०14 के लोकसभा चुनाव के समय भाजपा ने इस धन को देश में लाने की बात कही थी। पर अब इस वादे को पूरा करने के बजाय सरकार देश की मुद्रा व्यवस्था को बदलने की एक ऐसी कार्रवाई कर रही है जो जनता को बैठे-बिठाए मुसीबत में डालने वाली है। जबकि सरकार के सामने दूसरे विकल्प भी थे। हाल के पनामा लीक्स में देश के 5०० रसूखदार तथा एचएसबीसी में 1,195 लोगों के पास कालाधन होने का पता चला था। इसी तरह कुछ बड़े उद्योगपतियों द्बारा बैलेंसशीट में गड़बड़ी करके सरकारी बैंकों से 15 लाख करोड़ रुपए से अधिक का लोन लिया गया जिसमें अधिकांश एनपीए में तब्दील हो गया है। और तौ और रिजर्व बैंक का खुद का आंकड़ा है कि पिछले 44 वर्षों में एक्सपोर्ट और ओवर इनवाइसिग के माध्यम से बड़ा घोटाला हुआ है जो कुल जीडीपी का एक चौथाई हो सकता है। सरकार चाहती तो ऐसे बड़े समूहों और उद्योगपतियों के फारेंसिक तथा सीएजी ऑडिट कराने का फैसला कर सकती थी। इससे देश में एक नए कारोबारी वित्तीय अनुशासन को अमल में लाने का श्रेय भी सरकार को मिलता। पर उसने ऐसा नहीं करके बेकसूर आम जनता के लिए परेशानी बढ़ाने वाला फैसला लिया। 
साफ है के कालाधन के खिलाफ सार्थक और अचूक कार्रवाई के बजाय सरकार एक ऐसे कदम को तरजीह दे रही है जिसका फायदा वह राजनीतिक लोकप्रियता के लिए कर सके। पर कालेधन को लेकर प्रचारित इस निर्भीकता का एक नतीजा यह भी है कि ट्विटर पर प्रधानमंत्री मोदी के 3,13,312 फॉलोअर्स ने उनका साथ छोड़ दिया है। बेहतर होगा कि सरकार अपने खिलाफ जा रही इन प्रतिक्रियाओं को खारिज करने के बजाय इन्हें गंभीरता से ले। 

सोमवार, 9 सितंबर 2013

ऐसे तो बनने से रहा वेलफेयर स्टेट


क्या देश वेलफेयर स्टेट बनने की तरफ लौट रहा है? दरअसल, यह सवाल या बहस का मुद्दा नहीं है बल्कि यह तो उस गफलत का नाम है जो बड़े तार्किक तरीके से लोगों के मन में उतारी जा रही है। सूचना, शिक्षा और रोजगार के अधिकार (मनरेगा) के बाद खाद्यान्न सुरक्षा को लेकर अपनी प्रतिबद्धता दिखाकर मनमोहन सरकार ने इस गफलत या मुगालते को बतौर सियासी हथियार और चोखा कर लिया है। वैसे देश में जो आर्थिक सूरत है, उसमें इस मेगा योजना के कारण कहीं पूरी इकोनमी ही धराशायी न हो जाए, यह खतरा भी कई अर्थ पंडितों को दिख रहा है। बहरहाल, राजनीति और सरोकारों की भावुक समझ रखने वालों को तो यह लग ही सकता है कि एक सरकार अगर स्कूल में गरीब बच्चों के खाने से लेकर उसके परिवार के लिए काम और रोटी तक की फिक्र कर रही है तो इस व्यवस्था को कल्याणकारी क्यों न कहा जाए। इस भावुक दरकार पर खरा उतरने से पहले जरूरी है यह समझ लेना कि सामथ्र्य देने या बांटने में नहीं बल्कि शक्ति, अधिकार और उद्यम का विकेंद्रित ढांचा खड़ा करने में है।
बदकिस्मती से ये मुद्दा अलग-अलग संदर्भों में आजादी के समय भी खड़ा हुआ, फिर जयप्रकाश आंदोलन के दौरान और हाल में सिविल सोसाइटी द्बारा। पर तीनों ही मौकों पर सरकार और उसकी केंद्रित शक्ति को थामने की सियासी लालसा रखने वाली जमात ने इसकी अनदेखी की। दरअसल, इस दरकार पर खरा उतरने का मतलब है जनता पर राज करने और फिर उस पर कृपा बरसाने की राजसी शैली का खारिज होना।
इस संबंध में एक प्रसंग की चर्चा जरूरी है। गांधी ने जो राष्ट्र निर्माण की कल्पना की थी, उसे उनके आलोचक अव्यावहारिक और थोथा आदर्शवाद बताते रहे हैं। आर्थिक समझ को लेकर तो गांधी को आमतौर पर गंभीरता से लिया ही नहीं जाता। पर वस्तुत: ऐसा है नहीं। दरअसल, राष्ट्रपिता को लेकर ऐसा मानस बनाने वालों में वे तमाम लोग शामिल हैं, जिन्हें सत्ता के गलियारे में अपनी आवाजाही बनाए रखना सबसे जरूरी जान पड़ता है। सत्ता की ताकत से न तो लोकतंत्र की ताकत बढ़ती है और न ही इससे कोई कल्याणकारी मकसद हासिल किया जा सकता है। गांधी ने इसीलिए आजादी मिलते ही कांग्रेस के विसर्जन की भी बात कही थी। उनके अनन्य और प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जेसी कुमारप्पा की एक किताब है-'द इकोनमी ऑफ परमानेंस’। दुनियाभर के आर्थिक विद्बानों के बीच इस किताब को बाइबिल सरीखा दर्जा हासिल है। आज अमत्र्य सेन और ज्यां द्रेज सरीखे अर्थशास्त्री जिस कल्याणकारी विकास की दरकार को सामने रखते हैं, उसके पीछे का तर्क कुमारप्पा की आर्थिक अवधारणा की देन है। कुमारप्पा इस किताब में साफ करते हैं कि विकेंद्रित स्तर पर 'संभव स्वाबलंबन’ को मूर्त ढांचे में तब्दील किए बिना देश की आर्थिक सशक्तता की मंजिल हासिल नहीं की जा सकती है। पर निजी क्षेत्र की केंद्रित पूंजी की अठखेली के लिए 'सेज’ बिछाने वाली सरकारों को इन सरोकारों से कहां मतलब कि जनता तक मदद के हाथ पहुंचने से ज्यादा जरूरी है, वह भरोसा और हक, जिसमें वह अपने बूते अपनी जिम्मेदारियों का वहन कर सके।
समावेशी विकास का जो नया जुमला देश में उछला है, उसके पीछे वजह यही रही है कि वर्टिकल ग्रोथ के दौर में विकास की चादर इतनी सिकुड़ती चली गई कि देश की बड़ी आबादी का हिस्सा उससे बाहर ही रह गया। आंकड़ों में किसानों की आत्महत्या और गरीबी की जो भयावह तस्वीर उभरी है, वह विकास की उदारवादी व्यवस्था पर सामने से उंगली उठाती है। नागरिक अस्मिता को महज एक उपभोक्ता की हैसियत में बदल देने वाले मनमोहनों से पूछना चाहिए कि आजादी के आसपास जब डॉलर और रुपए की हैसियत तकरीबन बराबर थी, फिर अर्थ के कल्याणकारी मार्ग को छोड़कर महज आवारा निजी पूंजी के लिए उदार राह क्यों चुनी गई? क्या यह एक बड़ी आबादी वाले देश की श्रमशक्ति और पुरुषार्थ के प्रति अविश्वास नहीं है कि उनके बूते विकास की तस्वीर मुकम्मल नहीं हो सकती।
ऐतिहासिक रूप से देखें तो आजादी के बाद सरकार की जो नीतिगत समझ थी उसमें विकास को सार्वजनिक उपक्रमों के जरिए वह आगे बढ़ा रही थी, उस दौरान भी कल्याणकारी अर्थव्यवस्था और राज व्यवस्था की बात होती थी। दस साल पहले तक सरकारी पाठ्यपुस्तकों में इस बारे में सैद्धांतिक समझ विकसित करने के लिए बच्चों के लिए अलग से पाठ तय थे। पर बाजार का दौर आते-आते देश की पूरी व्यवस्था ने जो बड़ी करवट ली, उसमें पुरानी लीक नई सीख के आगे छोटी पड़ गई। नई दरकारों ने नए सरोकारों की जमीन तैयार कर दी। शुरुआत यहां से हुई कि जनकल्याणकारी होने के नाम पर सरकार अपने कंधे पर अतिरिक्त बोझ न उठाए। तालीम की सरकारी व्यवस्था से लेकर सार्वजनिक उपक्रमों की उपेक्षा ने देश में निजी क्षेत्र की ताकत को रातोंरात खासा बढ़ा दिया।
अब तो आलम यह है कि बिजली-पानी-सड़क मुहैया कराने तक में सरकार ने अपने हाथ समेटने शुरू कर दिए हैं। बात इतने पर ही थमती तो भी गनीमत थी। सरकार ने तो बजाप्ते निजी समूहों के लिए जमीन अधिग्रहण से लेकर तमाम वित्तीय सहूलियतें देने की जवाबदेही अपने कंधों पर उठा रखी है।
गरीबों की फिक्रमंदी में तारीख रचने का दंभ भरने वाली यूपीए सरकार से कोई पूछे कि जिस एजेंडे को वह जनहित में लागू करने में जुटी है क्या वह जनता के स्तर पर या उसकी मांग पर तय हुए हैं। जनता अपना सरोकार जिन मुद्दों पर दिखा ही नहीं रही है सरकार उस पर आगे क्यों बढ़ रही है? फिर इसे कोई महज वोट पॉलिटिक्स कहे तो इसमें गलत क्या है? सस्ता राशन या मुफ्त भोजन का लालच एक वोटर को महज वोटर कहां रहने देता है। कम से कम पिछले चार सालों में देश को जिन मुद्दों ने सबसे ज्यादा झकझोरा है, उनमें भ्रष्टाचार, महंगाई और महिला असुरक्षा का मुद्दा सबसे ऊपर रहा। इन मुद्दों को लेकर जनता एकाधिक बार सड़कों पर उतरी और वह भी बिना किसी सियासी छतरी में खड़े हुए बिना। उनके हाथों में कुछ था तो बस कुछ मांगें और मार्मिक आह्वान की तख्तियां या फिर तिरंगा। पर इनमें से किसी मुद्दे से मुठभेड़ को सरकार तैयार नहीं है। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लोकपाल संस्था को खड़ा करने की उसकी कवायद का तो हश्र यही है कि सरकार अपने अब तक के कार्यकाल में खुद कई बड़े भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरती रही है। आलम यह है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने दागी चरित्र के लोगों की सांसदी-विधायकी जाने की बात कही और उनके चुनाव लड़ने तक पर सवाल उठा दिए तो सरकार तो क्या पूरी पॉलिटिकल क्लास उसके तोड़ को लेकर सहमत हो गई। नैतिकता के इतने मजबूत जोड़ के साथ वेलफेयर तो दूर, कुछ भी फेयर रहना मुश्किल है।

शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

आहत रुपया

आपकी अंटी में मेरी मौजूदगी नई नहीं है। नई बात तो है वह गिरावट जो मेरी हैसियत में आई है। मंडी-हाट में मेरी आमद-रफ्त पुरानी है। पर अब तो जिक्र बाजार का होता है। मंडियों की गद्दियों पर बैठने वाले सेठ-साहूकार तो बीते जमाने की बात हो गए। अब तो मेरी हैसियत का 'अर्थ’ बताते हैं बाजार के पंडित। अर्थ आज पूरी एक व्यवस्था है।
भूमंडलीकरण की छतरी के नीचे बैठे तमाम आर्थिक दिग्गज जब यह बताते हैं कि मेरी सेहत तारीखी तौर पर बिगड़ रही है तो हैरत मुझे भी होती है। मैं नहीं चाहता कि मुझे कोई जल्द स्वस्थ होने की शुभकामना दे पर इतनी कामना तो मेरी भी है कि मेरे आगे यह साफ हो कि क्या मैं सचमुच काफी कमजोर हो गया हूं या फिर कोई मुझसे ज्यादा मजबूत है इसलिए उसके सामने मुझे पिद्दी बताया जा रहा है। मैं जानता हूं आंखों पर बड़े फ्रेम का चश्मा चढ़ाकर मेरा बुखार मापने वाले मुझे बस जल्द स्वस्थ होने की शुभकामना ही देंगे। वे यह नहीं बताएंगे कि मुझे जिन महाबलियों के आगे लगातार कमजोर सिद्ध किया जा रहा है, उनकी बढ़ी ताकत के पीछे राज क्या है।
मैं कोई मूढ़ नहीं बल्कि तालीमशुदा हूं। मुझसे यह बात छिपी नहीं कि मेरा कद और मेरी वकत डॉलर के मुकबले आंकी जा रही है। यह मुकाबला मेरा चुनाव नहीं है। मुझे इस मुकाबले में उतरना पसंद भी नहीं। मैं तो उलटे सवाल करना चाहूंगा देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का दिलासा दिलाने वाले तमाम 'मनमोहनों’ से कि उन्होंने मेरी इज्जत दूसरों के सामने यों क्यों उछाली। देश की आजादी के आसपास तो डॉलर की भी वही हैसियत थी जो मेरी। फिर पिछले छह दशकों और खासकर हालिया दो-तीन दशकों में ऐसा क्या हो गया कि डॉलर दुनियाभर की मुद्राओं के लिए एक पैमाना बन गया। क्या यह मुनासिब है? और यह मुनासिब है तो बगैर मेरी ताकत के यह देश आर्थिक महाशक्ति होने का दावा क्या हवा में कर रहा है। अगर देश की मुद्रा की इकाई ही कमजोर है तो फिर वह देश समृद्धि और विकास की दहाई, सैकड़ा, हजार... की दूरी कैसे पूरी कर सकता है। यह अर्थ का ज्ञान नहीं अनर्थ करने की सनक है। और मुझे ऐसे सनकी अगर बख्श ही दें तो अच्छा होगा।
जब कभी मेहनत और पसीने का फल होने की इज्जत मुझे दी जाती है तो मेरे साथ मेरे धारकों को भी फL और संतोष होता है, अपने स्वाबलंबन का, अपने पुरुषार्थ का। आज तो मेरे चेहरे को भी काला-सफेद कर दिया गया है। कई तिजोरियों में मैं काले धन के तौर पर सिसक रहा हूं तो कहीं सफेद होने के बावजूद गरीबी रेखा के नीचे दुबके रहने पर मजबूर हूं।
एक शिकायत मेरी उन तर्कवीरों से भी हैं जो अपनी अगाध राष्ट्र आस्था के नाम पर यह सवाल उछाल रहे हैं कि क्या कमजोर रुपया मतलब कमजोर राष्ट्र है? मैं खुद के कभी सोने या तांबे-पीतल होने को लेकर कोई अकड़ नहीं रखता। पर इतना मुझे भी पता है कि अगर देश के तिरंगे को कमजोर कहने की हिमाकत राष्ट्रीय अपराध है, देश की सेना को कायर कहना राष्ट्रद्रोह है तो देश के करोड़ों मेहनतकशों की कमाई की कीमत को भी कमतर आंकना राष्ट्रीय जुर्म है।
मेरी जन्मकुंडली और हैसियत का हिसाब रखने वाले उस दिन बहुत खुश थे जब मुझे नाम और छवि को पीछे महज एक 'चिह्न’ का दर्जा दिया गया। पांच मार्च 2००9 का वह दिन मनाया तो वैसे मेरे अभिनंदन दिवस के रूप में था पर यह दिन मेरे लिए क्षोभ से भर देने वाला रहा। जिस दौर में डॉलर की पूरी इकोनमी डूब रही थी, मैंने देश को 'अर्थवान’ बनाए रखा। आज उसी कुबड़े डॉलर के चिह्न के आगे मुझे एक कमजोर हैसियत के साथ पस्तहाल दिखाया जाता है तो यह आघात लगता है। बहरहाल यह देश के तिजोरी मंत्री और प्रधानमंत्री पर ही है कि वे मेरी हैसियत और रुतबे से डॉलर को और कितना खेलने देते हैं?

http://www.nationalduniya.com/

रविवार, 20 मई 2012

चीन है नया गोताखोर


वैश्विक अर्थव्यवस्था के सुस्त पड़ने को लेकर अब तक भारत में चिंता ऊपरी थी पर रुपए के डॉलर के मुकाबले रिकार्ड स्तर तक गोता लगाने से चिंता यहां भी गहरा गई है। डॉलर से लेकर यूरोजोन तक की इकोनमी इसकी जद में पहले ही आ चुकीहैं। हां, चीन और भारत को लेकर एक उम्मीद यह जरूर जताई जा रही थी पर अब इन दोनों देशो के हालत भी पहले की तरह बेहतर नहीं रहे। रुपए के कमजोर होने और उससे पहले एस एंड पी और मूडीज की जो नई रेटिंग आई है, उसमें कहीं न कहीं भारतीय अर्थव्यवस्था के पटरी से उतरने का खतरा जताया गया है।
जहां तक सवाल चीन का है तो जिस विदेश व्यापार के बूते वह अब तक एक सक्षम इकोनमी की मिसाल बना रहा है, उसे लेकर अब वहां चुनौतियां बढ़ गई हैं। हाल तक वहां की सरकार यही जता रही थी कि बीते महीनों में उसके लिए बढ़े संकट वैश्विक बाजार की बढ़ी चुनौतियों की देन हैं। पर नहीं लगता कि महज बाहर की गड़बडि़यों की वजह से ही चीनी अर्थव्यवस्था की जड़ें हिली हैं। दरअसल, चीन की शासन व्यवस्था के साथ उसकी अर्थव्यवस्था को लेकर विरोधाभासी राय शुरू से रही है। पूरी दुनिया को एक छतरी के नीचे ला देने वाले बाजारवादी दौर में जहां यह विरोधभास बढ़ा, वहीं इस दौरान चीनी अर्थव्यवस्था का एक नया रूप दुनिया को देखने को मिला।
पहले इलेक्ट्रानिक्स जैसे कुछेक क्षेत्रों में अपनी उत्पादकता और स्तरीयता के लिए जाना जानेवाला देश अचानक आम जरूरत की तमाम चीजों के सस्ते और उन्नत विकल्प मुहैया कराने वाला देश बन गया। फिर यह सब चीन ने बिल्कुल वैसे ही नहीं किया, जैसे उदारवादी अर्थव्यवस्था की पैरोकारी करने वाले दूसरे मुल्कों ने किया। बताया यही गया कि चीन में साम्यवादी शासन भले हो अधिनायकवादी चरित्र का और लोकतांत्रिक व मानवाधिकारवादी कसौटियों पर चाहे उसकी जितनी खिल्ली उड़ाई जाए, पर उसकी अर्थव्यवस्था केंद्रित न होकर विकेंद्रित जमीन पर ही फल-बढ़ रही है। यह प्रयोग वहां हाल तक सफल भी रहा है। वैश्विक मंदी के कारण 2009 में जहां पूरी दुनिया की जीडीपी का औसत नकारात्मक दिखा, उस दौरान भी चीन ने तकरीबन नौ फीसद का विकास दर हासिल किया।
पर अब यह आर्थिक मजबूती चीन में भी दरक रही है। वहां श्रम और कच्चे माल की लागत एकदम से बढ़ गई है। विदेशों से मांग न होने से भी उत्पादन पर असर पड़ा है। सरकार अपने स्तर पर इस स्थिति से उबड़ने के भरसक उपाय तो कर रही है पर स्थिति अब काबू होने की सूरत से ज्यादा बिगड़ चुकी है। स्थानीय स्तर पर छोटे-मध्यम श्रेणी के उद्योगों की तरफ से रियायती कर्ज की जो बड़ी मांग एकदम से उठी है, उसे पूरा करने में सरकार के हाथ-पांव फूल रहे हैं।
चीनी वाणिज्य मंत्रालय तक आज खुद ही यह मान रहा है कि जो स्थिति और चुनौतियां  हैं, वह खतरे की आशंका से बहुत ज्यादा बड़ी हैं। ऐसे में भारत और चीन में जो स्थितियां बन रही है वह अगर आगे भी जारी रहती है तो यह विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाली दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के ढहने का खामियाजा भी बड़ा होगा और वैश्विक भी।

मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

गरीब हम हैं इसलिए कि तुम अमीर हो गए


भारत की गिनती जरूर आज दुनिया में चीन के बाद सबसे ज्यादा सुरक्षित और संभावनाओं से भरे इकोनमी के रूप में होती है पर देश के भीतर विकास को लेकर वर्गीय अंतर खतरनाक तरीके से बढ़ गया है। तभी अपने देश में अब सीधे विकास को लेकर बात नहीं हो रही बल्कि इसके समावेशी आयाम पर सर्वाधिक बल दिया जा रहा है। आर्थिक सोच में आया यह फर्क अकारण नहीं है।
वित्त राज्यमंत्री नमोनारायण मीणा ने संसद में ग्लोबल वेल्थ इंटेलीजेंस फर्म के हालिया सर्वे की चर्चा में बताया कि देश के चोटी के सर्वाधिक 8200 अमीर लोगों के पास करीब 945 अमेरिकी डॉलर की दौलत है, जो देश की अर्थव्यवस्था का तकरीबन 70 फीसद हिस्सा है। साफ है कि धन और साधन के असमान वितरण की चुनौती एक खतरनाक स्थिति की ओर इशारा कर रही है।
कुछ महीने पहले आए 'हंगामा' रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ था कि देश में 14 करोड़ नौनिहालों का बचपन महज इस कारण असुरक्षित और बीमार है क्योंकि वे कुपोषित हैं। अभी कुछ ही दिन हुए हैं, जब योजना आयोग की तरफ से आए निर्धनता तय करने के अतार्किक पैमाने पर संसद से लेकर सड़क तक शोर मचा। आयोग ने अपनी रपट में शहरी क्षेत्रों में रोजाना 28.65 और देहाती इलाकों में 22.42 रुपए खर्च करने वालों को गरीबी रेखा से ऊपर माना है। कहने की जरूरत नहीं कि यह आमजन के प्रति एक तंग नजरिया है।
भूले नहीं हैं लोग आज भी अर्जुन सेनगुप्ता कमेटी की उस चर्चित रपोर्ट को जिसमें दावा किया गया था कि देश की 77 फीसद आबादी 20 रुपए रोजाना से कम पर अब जीवन गुजारने को विवश है। आज जब वित्तमंत्री कड़े फैसले लेने की दरकार पर जोर देते हैं तो इसमें यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि कड़े फैसले का मतलब अब भी कर ढांचा और आयात-निर्यात नीति आदि में बदलाव मात्र हैं तो यह विकास की असमानता को तो दूर करने वाली अर्थनीति तो साबित होने से रही।
समावेशी अर्थ विकास का दर्शन अगर आज भी सरकारी जुमलेबाजी का हिस्सा भर है तो आगे देश में गरीबी-अमीरी की खाई और बढ़ेगी ही। पिछले कुछ महीनों में भारत सहित दुनिया भर में आर्थिक मोर्चे पर चिंताएं सघन हुई हैं। चार साल पहले की विश्व मंदी एक बार फिर से सिर उठा रही है और इस बार इसकी चपेट में डॉलर से लेकर यूरोजोन तक की इकोनमी के आने का अंदेशा है। ऐसे में भारत को अपने आर्थिक विकास को वर्टिकल से हॉरिजेंटल ग्रोथ की तरफ फोकस करना होगा।

रविवार, 8 अप्रैल 2012

समृद्धि के इकहरेपन के कारण

1991 से ग्लोबल विकास की दौड़ में शामिल भारत भले आज एक दमदार अर्थव्यवस्था के रूप में पूरी दुनिया में देखा जाता हो पर देश के अंदरूनी हालात अब भी खासे विरोधाभासी हैं। सुपर इकोनोमिक पावर होने की हसरत रखने वाले देश की आधी आबादी आज भी खुले में शौच को मजबूर है। इसके उलट 63.2 फीसद आबादी ऐसी है, जो मोबाइल फोन का इस्तेमाल करती है। साफ है कि विकास के नए आग्रहों ने जहां जनजीवन में स्थान बनाया है, वहीं गरीबी और पिछड़ेपन की चंगुल से अब भी लोग पूरी तरह निकल नहीं पाए हैं। गनीमत है कि गुजरे 20 सालों में विकास के इस गाढ़े होते विरोधाभास और वर्गीय अंतर को अब हमारी सरकार भी कबूलती है। समावेशी विकास की सरकारी हिमायत के पीछे कहीं न कहीं यह कबूलनामा ही है।
जनगणना-2011 के आंकड़ों के विश्लेषण में कहीं न कहीं यह तथ्य भी रेखांकित हुआ है कि देश में एक तरफ सुविधाओं के अधिकतम उपभोग की होड़ पैदा हुई है, वहीं कई ऐसे इलाके और तबके भी हैं, जहां लोगबाग आज भी विकास के बुनियादी सरोकार तक से कटे हुए हैं। देश के 49 फीसद घरों में अगर आज भी खाना पकाने के लिए सूखी लकडि़यों का इस्तेमाल होता है और नल से पेयजल की पहुंच मात्र 43 फीसद लोगों तक है, तो साफ है कि हमारी विकास नीति देश की तकरीबन आधी आबादी की जिंदगी का अंधेरा दूर करने में विफल रही है। जनगणना आंकड़ों के विश्लेषण में यह बात साफ झलकती है कि पानी-बिजली-सड़क जैसे आधाराभूत क्षेत्रों में अब भी हम काफी पीछे हैं।
मसलन, 2005 में बड़े जोर-शोर से राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतिकरण योजना की शुरुआत हुई थी। योजना का लक्ष्य 87 फीसद बगैर बिजली की सुविधा वाले घरों तक बिजली पहुंचाने की थी पर आलम यह है कि अब भी सैकड़ों गांव ऐसे हैं, जहां तक या तो यह योजना नहीं पहुंची है या फिर काम अधूरा है। पेयजल उपलब्धता आैर सफाई-स्वच्छता से संबंधित कार्यक्रमों की भी यही हालत है। दरअसल, यह स्थिति इसलिए भी है क्योंकि पिछले कुछ सालों में सरकार का ध्यान विकेंद्रित के बजाय केंद्रित विकास की तरफ ज्यादा रहा है।
नतीजा यह कि एक तरफ देशभर में अरबपतियों की गिनती लगातार बढ़ती जा रही है, वहीं कम से कम 14 करोड़ बच्चे ऐसे हैं जो कुपोषण का शिकार हैं। यह विरोधाभासी अंतर हमारे विकास और समृद्धि के इकहरेपन के कारण है। सरकार अब वर्ष 2020 को लक्ष्य करके देश को समावेशी विकास लक्ष्य की ओर ले जाने की तैयारी कर रही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अगले कुछ सालों में विकास का उजाला सबके हिस्से में आएगा।        

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

'सत्य' भी हो यह रिकार्ड 'तथ्य'


आंकड़े तथ्य होते हैं और तथ्य तात्कालिक। रही सत्य की बात तो इसके पीछे तथ्य इतना ही है कि इसका आधार और सार दोनों सार्वकालिक, सार्वकालिक और कल्याणकारी होते हैं। बहरहाल, बात उस तथ्य की जो आंकड़े की शक्ल में एक बार फिर हमारे सामने आया है। सरकार खुश है बहुत यह घोषणा करते हुए कि वर्ष 2010-11 के बीच खाद्यान का रिकार्ड उत्पादन होगा। अगर यह अनुमान अचूक तथ्यगत आधारों पर है तो इसका सकारात्मक असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी आने वाले हफ्ते-महीनों में दिखना शुरू हो जाएगा।
एक तरफ जहां खाद्य मुद्रास्फीति की दर गिरने की संभावना जताई जा रही है, वहीं दूसरी तरफ खाद्य सुरक्षा बिल जैसे अटके मामलों पर सरकारी कदम अब तेजी से बढ़ेंगे, यह उम्मीद भी की जा रही है। पर ये सारी स्थितियां अनुमानित हैं, अभी इन्हें यथार्थ होना है। जहां तक अनाज उत्पादन में स्वावलंबी होने की बात है तो ये स्थिति देश के लिए नई नहीं है। हरित क्रांति के बाद मौसम की जब-तब की बेरुखी को छोड़ दें तो किसानों की मेहनत और पुरुषार्थ हमेशा रंग लाई है। हां, यह जरूर है कि अब हमारा स्वावलंबन रिकार्ड उपलब्धि का आंकड़ा दर्ज करा रहा है।
2010-11 के जुलाई से जून के बीच  23.58 करोड़ टन का अनुमानित खाद्यान्न उत्पादन, ऐसा ही एक रिकार्ड है। इससे पहले देश में 2008-09 में सबसे ज्यादा 23.44 लाख टन खाद्यान का उत्पादन हुआ था। बीच के दो साल में मौसम की मार से अनाज उत्पादन गिरा, सरकारी तर्क यही है और सरकार के बाहर भी इस तर्क पर तकरीबन सहमति है। बीते दो सालों में खाने-पीने की चीजों की महंगाई का रोना कमोबेश आम जनता रोती रही है। बीते 19 मार्च को समाप्त हुए सप्ताह में भी जो खाद्य मुद्रास्फीति की दर रिकार्ड की गई है, वह 9.5 फीसद है। जाहिर है महंगाई का बोझ कुछ कम हुआ है पर अब भी यह सामान्य दर से ज्यादा है। ऐसे में अगर खाने-पीने की चीजें महंगी होती हैं तो सरकार खाद्यान की कमी या उसके वितरण में गड़बड़ी का बहाना आसानी से नहीं बना पाएगी।
साफ है कि आने वाले दिनों में यह बहुत कुछ सरकारी प्रयासों पर ही निर्भर करेगा कि वह रिकार्ड खाद्यान्न उत्पादन को आम उपलब्धता के रूप में किस तरह तब्दील कर पाएगी। रही बात खाद्य सुरक्षा बिल का तो यह मुद्दा सरकार के एजेंडे में तो जरूर लगातार टंगा हुआ है पर अब भी इसका एक असरकारी कदम के रूप में क्रियान्वयन बाकी है। अनाज उत्पादन में स्वाबलंबी होना और रिकार्ड उपलब्धि की तरफ बढ़ना सरकार को इस दिशा में भी फौरी कार्रवाई के लिए अगर प्रेरित करता है तो यह एक आदर्श स्थिति होगी। पर दुर्भाग्य से खाद्य सुरक्षा बिल के लटकने के पीछे मूल कारण अनाज की उपल्बधता की बजाय वह सरकारी तंत्र है, जो आज तक यह तय ही नहीं कर पाया कि गरीबी का स्तर तय करने का मान्य पैमाना क्या हो और इसके तहत लाभान्वितों की अंतिम संख्या कितनी मानी जाए।
सरकार और राज्य आज तक इस बात पर भिड़ रहे हैं कि बीपीएल परिवारों की सही संख्या क्या है। राज्य ज्यादा केंद्रीय अनुदान की चक्कर में इसे बढ़ाकर पेश करते हैं तो केंद्र के लिए यह मानना नाक कटाने जैसा होता है कि उसके लाख प्रयासों के बावजूद देश में तंगहालों की गिनती बढ़ी है। दरअसल आंकड़ों में 'अनर्थ' को 'अर्थपूर्ण' दिखाने की जुगत अभी इस बात के लिए तैयार ही नहीं है कि सारी आर्थिक सफलता और उन्नति के बीच समाज का एक बड़ा तबका आज भी अनाज, अक्षर और आवास के लिए मोहताज है। रिकार्ड अनाज उत्पादन का सार्थक मतलब तभी है जब ये मोहताजी हमारा मुंह न चिढ़ाए। सरकार का रिकार्ड इस मोहताजी के खिलाफ भी बने तो फिर उसे आंकड़ों के कसीदे अपनी तरफ से पढ़ने की शायद जरूरत भी न पड़े। क्योंकि तब उसकी सफलता 'तथ्य' को लांघकर 'सत्य' हो जाएगी।