मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

खाकी पर भारी खादी

देश में इन दिनों सियासत खूब गरमाई हुई है। लोकसभा चुनाव को लेकर सियासी दल ही सिर्फ अपने पत्ते फेंटने में नहीं लगे हैं बल्कि समाज के विभिन्न हिस्सों-तबकों में भी इसको लेकर दिलचस्पी खासी बढ़ गई है। सब कह रहे हैं कि इस बार का चुनाव देश की राजनीतिक धारा को वैकल्पिक मोड़ देगा, सो चुनावी मैदान में क्रांतिकारी मंसूबे के साथ कई अराजनीतिक पृष्ठभूमि के लोग भी कूद रहे हैं। ऐसे ही नामों में एक बड़ा नाम है सत्यपाल सिंह का। सिंह ने अपनी सियासी पारी के लिए मुंबई पुलिस कमिश्नर के पद से इस्तीफा दे दिया है। माना जा रहा है कि वह भाजपा या आम आदमी पार्टी के टिकट पर अपने गृह राज्य उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ सकते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम पर सत्यपाल सिह का कहना इतना भर है कि वह राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता और विश्व शांति के लिए काम करना चाहते हैं। उनके ही शब्दों में, 'मैंने अभी यह तय नहीं किया है कि मैं किस पार्टी में शरीक होऊंगा। आपको दो से तीन दिन में इसके बारे में जानकारी मिल जाएगी।’ वैसे सत्यपाल भले अपने मुंह से कुछ न कहें पर उनको लेकर कयासबाजी खूब चल रही है। सूत्रों की मानें तो वे भाजपा के टच में हैं और पार्टी उन्हें उत्तर प्रदेश के मेरठ या बागपत सीट से लोकसभा उम्मीदवार बना सकती है। बता दें कि इससे पहले उन्होंने इशरतजहां एनकाउंटर केस में गुजरात हाईकोर्ट की एसआईटी की अगुवाई करने से इनकार कर दिया था।
इन संभावनाओं को पर लगने के पीछे कुछ और वजहें भी हैं। भाजपा सूत्रों की मानें तो पार्टी के बड़े नेताओं के साथ सिह की बातचीत पहले ही हो चुकी है। उनका भाजपा में शामिल होना तकरीबन तय है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि पिछले दिनों उनकी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिह व पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी के साथ बातचीत हो चुकी है। इस बातचीत के बाद भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने अमित शाह को सिह से संपर्क साधने के लिए कहा था। सत्यपाल सिह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के भी करीबी बताए जाते हैं। वैसे उन्हें आम आदमी पार्टी से भी मुंबई से लोकसभा चुनाव लड़ने का ऑफर मिला है, ऐसी खबरें भी मीडिया के कुछ हल्कों में चल रही हैं।
29 नवंबर 1955 में मेरठ के बसौली में पैदा हुए सत्यपाल सिह की स्कूली पढ़ाई बागपत में हुई। इसके बाद उन्होंने मेरठ से रसायन विज्ञान में एमएससी और फिर एमफिल किया। रसायन शास्त्र के वैज्ञानिक बनने की ओर बढ़ रहे सिह पीएचडी करना चाहते थे, लेकिन अचानक उनका मूड बदल गया और उन्होंने आईपीएस की तैयारी शुरू कर दी। इस बीच वे ऑस्ट्रेलिया चले गए और वहां पर एमबीए करने लगे। एमबीए करने के दौरान भी उन्होंने आईपीएस बनने के लक्ष्य को छोड़ा नहीं। वापस भारत आए तो लोक प्रशासन में एमए किया और फिर इसी विषय में पीएचडी में दाखिला लिया। इसी दौरान उन्होंने आईपीएस की तैयारी तेज कर दी और परीक्षा पास कर ली।
सत्यपाल सिह महाराष्ट्र पुलिस में कई पदों पर रह चुके हैं। मुंबई का पुलिस कमिश्नर बनाए जाने से पहले वह महाराष्ट्र के एडिशनल डीजीपी (लॉ एंड ऑर्डर) थे। इसके पहले वह पुणे और नागपुर के पुलिस कमिश्नर भी रह चुके हैं। इसके अलावा डेप्युटेशन पर वह सीबीआई में भी काम कर चुके हैं।
धर्म और अध्यात्म में तो खासतौर पर उनकी गहरी रुचि है। उन्होंने अध्यात्म व नैतिक मूल्यों पर कई किताबें भी लिखी हैं। पिछले साल उनकी किताब 'तलाश इंसान की’ का विमोचन अमिताभ बच्चन और जावेद अख्तर ने किया था।
बहरहाल, एक बात तो तय है कि सिंह ने जिस उम्मीद के साथ अपनी सियासी पारी खेलने का मन बनाया होगा, उसके पूरे होने के इस बार के लोकसभा चुनाव में आसार काफी हैं। अलबत्ता यह इस बात पर जरूर निर्भर करेगा कि वह किस पार्टी का झंडा थामते हैं। एक बात और यह कि सत्यपाल सिंह जैसे लोग अगर सियासी मैदान में उतर रहे हैं तो इससे देश की राजनीति के साफ-सुथरा और प्रभावी होने के आसार काफी बढ़
गए हैं।

परिवर्तन का दारोमदार महज आप पर नहीं


संभावनाओं के पूरे होने से ज्यादा जरूरी है, उनका बने रहना। जीवन और समाज का संभावना रहित होना खतरनाक है। ये बातें आज भारतीय राजनीति के संदर्भ में समझनी जरूरी है। इन दिनों देश में राजनीति काफी गरमाई हुई है। दो-तीन महीने में लोकसभा चुनाव होने हैं। दल और विचार की साझा ताकत सत्ता के गणित के आगे कमजोर पड़ रही है। बदलाव और विकल्प की सामयिक दरार को रेखांकित करने से तो किसी सियासी जमात को गुरेज नहीं है, पर इस पर पूरा जोर भी किसी का नहीं है। यह सब संभावनाओं के बड़े कैनवस को फिर से पुराने रंगों और चित्रों से भर जाने के अंदेशे की तरह है।
इस पूरी स्थिति को समझने के लिए थोड़ा पीछे मुड़कर देखें तो कई बातें साफ होंगी। बीते तीन सालों में भ्रष्टाचार को लेकर जो देशभर में आक्रोश दिखा, उसकी अगुवाई करने वाले नागरिक समाज के एक धड़े ने अपने सांगठनिक सामथ्र्य को राजनीतिक दल का रूप दिया। पर सत्ता तक पहुंचकर सत्तावादी आचरण को बदलने की अधीरता ने एक बड़ी कोशिश को कुछ ही महीनों में पटरी से उतार दिया। आम आदमी पार्टी के कार्यकताã और शुभचिंतक भी अब उससे कट रहे हैं। सदस्यता अभियान के नाम पर करोड़ का आंकड़ा छूने का दावा जरूर किया जा रहा है पर कमिटेड वर्क फोर्स के नाम पर पार्टी के पास गिनती के नाम हैं। यही नहीं महिला अस्मिता जैसे मुद्दे पर पार्टी की सोच और उसकीसरकार के मंत्री के आचरण की हर तरफ कठोर निंदा हो रही है। पार्टी के संस्थापक सदस्याओं में से एक मधु भादुड़ी सीधा आरोप लगा रही हैं कि पार्टी को कुछ लोगों ने हाईजैक कर लिया है। पार्टी के अंदर चुनाव जीतने और सत्ता की राजनीति करने का पागलपन इस कदर बढ़ गया है कि भिन्न स्वरों और वैकल्पिक रायों को पार्टी के अंदर कोई सुनने को तैयार नहीं है।
मधु आगे बढ़कर यहां तक कहती हैं कि इस पार्टी में और बातें तो छोड़ दीजिए महिलाओं को 'इंसान’ तक नहीं समझा जा रहा। गौरतलब है कि मधु आप के राष्ट्रीय अधिवेशन में खिड़की एक्सटेंशन में आधी रात को दिल्ली सरकार के कानून मंत्री सोमनाथ भारती की अगुवाई में हुए महिलाओं के खिलाफ आपत्तिजनक सलूक के मामले को उठाना चाहती थीं। उनकी मांग और मंशा इतनी भर थी कि पार्टी को इस मामले में अपनी चूक मान लेनी चाहिए और खुद से आगे बढ़कर माफी मांगनी चाहिए। पर माफी की बात तो दूर उन्हें इस मामले में पार्टी फोरम पर अपनी पूरी बात कहने तक से रोका गया।
आप से निकाले गए विधायक विनोद कुमार बिन्नी की राजनीतिक पृष्ठभूमि और उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को देखते हुए उनके उठाए सवालों को अगर एक किनारे कर भी दें तो भी एक बात तो साफ जाहिर हो रही है कि इस पार्टी ने अपने लिए जो उच्च राजनीतिक मानदंड तय किए थे, वह आज उस पर खुद खरी नहीं उतर रही है। ऐसा नहीं होता तो सरकार बनाने और तमाम अहम मुद्दों पर जनता की राय से अपना रुख तय करने वाली पार्टी अपने विधायक को बिना जनता से राय लिए कम से कम बाहर का रास्ता नहीं दिखाती।
आप को लेकर ये सारी बातें इसलिए क्योंकि उसके उदय और संघर्ष की परिघटना ने ही देश में राजनीतिक बदलाव और विकल्प की संभावना को रेखांकित किया था। भूले नहीं हैं लोग कि जब इस पार्टी ने दिल्ली में डेढ़ दशक से चल रही कांग्रेस सरकार को महज आठ सीट तक सीमित कर दिया तो राहुल गांधी ने मीडिया के सामने आकर बयान दिया कि आप से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। खासकर उसने जिस तरह कम समय में लोगों को अपने से जोड़ा। आज उसी राहुल गांधी की तरफ से अखबारों में विज्ञापन छप रहा है- 'अराजकता नहीं प्रशासन सुधार’। साफ है कि निशाने पर सीधे-सीधे खुद को अराजक कहने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनकी सरकार है। इससे पहले गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति भी परोक्ष रूप से दिल्ली सरकार के कामकाज पर टिप्पणी कर चुके हैं।
दरअसल, अब सवाल यह नहीं है कि क्या आम आदमी पार्टी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा और इतिहास बदलने की जल्दबाजी में देश में लोकतांत्रिक परिवर्तन की एक बड़ी संभावना हाशिए पर खिसकती जा रही है, खारिज होती जा रही है? नया सवाल तो यह है कि क्या संभावना और उसके बूते परिवर्तन की ऐतिहासिक पटकथा लिखने का लाइसेंस सिर्फ आप और उसके मुट्ठी भर नेताओं के पास है। पिछले एक महीने में दिल्ली की सड़कों से लेकर सचिवालय के अंदर-बाहर दिखी नौटंकी ही क्या देश के भविष्य के चित्र हैं? निश्चित रूप से इसका जवाब नहीं है।
देश में परिवर्तन की गहराती संभावनाओं की बात इसलिए नहीं शुरू हुई कि ऐसा सिविल सोसायटी की नुमाइंदगी करने वाले कुछ लोग या कोई पार्टी ऐसा कह रही थी। दरअसल, इसके पीछे बीते कुछ सालों में देश की सड़कों पर बार-बार खुलकर प्रकट हुई वह जनाकांक्षा रही, जिसने लोकतंत्र में जन साझीदारी की दरकार के लिए सियासी जमातों के आगे खासा दबाव बनाया। बाकी दलों औरआप में फर्क बस यह रहा कि बाकी ने इस सामयिक दरकार को गंभीरता से नहीं लिया और आप ने इसे अपना एजेंडा बना लिया। यह अलग बात है कि सत्ता की राजनीति में उतरी यह नई पार्टी भी अब अपने इस एजेंडे को लेकर पहले की तरह गंभीर नहीं है।
यह स्थिति उन तमाम दलों के लिए चूक सुधार के एक मौके की तरह है जो कल तक आप के सियासी उदय को अपने लिए कहीं न कहीं खतरा मान रहे थे। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी से लेकर कांग्रेस के सबसे लोकप्रिय ठहराए जाने वाले नेता राहुल गांधी को इस बाबत खासतौर पर ध्यान देना चाहिए। इन दोनों नेताओं पर ही कहीं न कहीं दारोमदार है कि वे लोकसभा चुनाव के एजेंडे को क्या शक्ल देते हैं। जनता पर नहीं बल्कि जनता के साथ मिलकर शासन चलाना, सत्ता का विकेंद्रीकरण और भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर पहल के साथ अगर देश की दोनों चोटी की पार्टियां अपनी तैयारी और सोच के साथ इस बार जनता के सामने वोट मांगने जाएं तो यह जनभावना के अनुरूप होगा। साथ ही यह देश में पारंपरिक की जगह वैकल्पिक राजनीति के प्रयोग की बड़ी मुश्किल से बनी संभावना को एक अंजाम तक पहुंचाने के ऐतिहासिक अभिक्रम से जुड़ने जैसा भी होगा।
चुनाव के दौरान स्वार्थपूणã गठजोड़ और एक दूसरे के खिलाफ तीखे व घटिया आरोप-प्रत्यारोप का अतिवाद अब निश्चित रूप से दरकना चाहिए। इतिहास और विचार के तमाम सुलेखों को अपने नाम दर्ज होने का दावा करने वाली देश की दोनों महत्वपूर्ण पार्टियों को यह साहस दिखाना चाहिए कि वे एक-दूसरे से बेहतर संभावना के नाम पर भिड़ें न कि घटिया सियासी सलूक के नाम पर।
 

मंगलवार, 28 जनवरी 2014

अरब की स्त्री और फेकी

भारत बाजार के लिए भले पिछले दो दशकों में ज्यादा उदार हुआ हो पर विचार के क्षेत्र में उसकी उदारता काफी पहले से रही है। भारतीय चिंतन का चरित्र समन्वयवादी इसलिए है क्योंकि नए विचारों का हमने हमेशा खुले हाथों से स्वागत किया है। बहरहाल, ये बातें यहां इसलिए क्योंकि हम चर्चा करने जा रहे हैं एक ऐसी लेखिका की जो भारतीय नहीं हैंऔर न ही भारतीय जीवन और समाज को लेकर उन्होंने कोई उल्लेखनीय कार्य किया है। पर उन्हें पढ़ने-सुनने के लिए यहां के प्रबुद्ध लोगों में गजब का आकर्षण है।
दरअसल, हम बात कर रहे हैं ब्रितानी लेखिका और पत्रकार शिरीन एल फेकी की। शिरीन का अरब की महिलओं को लेकर अध्ययन काफी चर्चित रहा है। उनकी किताब है 'सेक्स एंड दी सिटेडेल : इंटीमेट लाइफ इन ए चेंजिग अरब वर्ल्ड’। इसमें उन्होंने अरब की महिलाओं के जीवन के अंतरंग अनुभवों को बेबाकी से सामने रखा है। दिलचस्प है कि महिलाओं को लेकर अरब का समाज आज भी बहुत खुला नहीं है। वहां पर्दा प्रथा जैसी तमाम मध्यकालीन परंपराएं और मान्यताएं आज भी प्रचलन में हैं, जो वहां की महिलाओं को बाहरी दुनिया में खुलकर सांस लेने से रोकती हैं।
शिरीन पिछले दिनों जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में शिरकत करने आई थीं। वहां एक संवाद सत्र में उन्होंने कहा कि लोगों को उनका काम इसलिए आकर्षक लगता है क्योंकि इसका केंद्रीय विषय सेक्स है। पर यह उनके काम को महत्वहीन करने वाला नजरिया है। इस तरह के नजरिए के कारण महिलाओं के जीवन से जुड़ी कई समस्याओं और उनके उत्पीड़न के मुद्दों को सही तरीके से समझने की कोशिश अनावश्यक रूप से प्रभावित होती है।
फेकी ने कहा कि सेक्स पर बातें करते हुए मैंने अरब दुनिया में पांच वर्ष बिताए हैं। कई लोग यह सोच सकते हैं कि यह दुनिया का बेहतरीन काम है। पर ऐसा नहीं है क्योंकि वे अरब की महिलाओं की जिंदगी के उन पन्नों को खोलना चाहती थीं, जिसके बारे में आमतौर पर बात नहीं होती है।
अपने बारे में फेकी बताती हैं कि वे ब्रितानी जरूर हैं पर उनकी परवरिश वहां नहीं हुई। उनके पिता वेल्स के और मां मिस्त्र की हैं। मां-पिता के कनाडा चले जाने के कारण उनकी पढ़ाई भी बाहर ही हुई। सितंबर 2००1 में अमरीका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए आतंकवादी हमला होने तक उन्होंने अरब दुनिया के साथ कभी कोई जुड़ाव महसूस नहीं किया था। पर इसके बाद इस्लामी मुल्कों, खासतौर पर अरब की महिलाओं के जीवन को लेकर उनके मन में कई तरह की जिज्ञासा और सवाल पैदा हुए।
फेकी को जब 'द इकोनामिस्ट’ अखबार के लिए स्वास्थ्य संवाददाता के रूप में काम करने का मौका मिला तो उन्होंने एचआईवी पर एक महत्वपूर्ण स्टोरी की। इसी क्रम में पुरातनपंथी मूल्यों वाले अरब मुल्कों की महिलाओं के साथ उन्हें बातचीत का मौका मिला।
फेकी का मानना है कि समाज का व्यवहार शयनकक्ष के बंद दरवाजे के पीछे जो कुछ घटित होता है, उससे गहरे तौर पर जुड़ा होता है। पर लोग इश बात को गहराई से नहीं समझते हैं।
अरब की महिलाएं इस लिहाज से बाकी दुनिया से कतई अलग नहीं हैं कि प्यार और संवेदना को लेकर उनका दिलो दिमाग किसी और तरह की बनावट का है। बल्कि सच तो यह है कि यहां की महिलाओं की जीवन के कुछ कोमल अनुभवों को लेकर आपबीती इतनी खुरदरी और उत्पीड़न भरी है कि उसके बारे में जानकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
फेकी कहती हैं कि अरब मुल्कों की महिलाओं के बारे में आमतौर पर जिस तरह की बातें की जाती हैं, वह सचाई से निहायत परे हैं। अगर आज आधी दुनिया लैंगिक समानता और देह पर अधिकार जैसे महिलावादी तकाजों पर मुट्ठी बांध रही हैं तो उसमें अरब की महिलाओं का संघर्ष अलग से रेखांकित होना चाहिए। फेकी भी इस तकाजे को ही अपना लेखकीय मिशन मानती हैं।

संबोधन में छिपा चिंताओं का समाधानकारी सार

देश ने जब इस बार 65वां गणतंत्र दिवस मनाया तो उसके मन में उल्लास के साथ कई सवाल भी थे। ये सवाल भी कोई रातोंरात पैदा हुए हों, ऐसा नहीं है। अलबत्ता यह जरूर है कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में जिस तरह कुछ मुद्दों और खतरों को रेखांकित किया, उनसे ये सवाल एकदम से सतह पर आ गए। राष्ट्रपति महोदय ने देश के लोकतंत्र को लेकर यह चिंता जताई है कि एक तरफ तो जनता गुस्से में है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी स्तर पर अराजकतावादी आचरण दिख रहे हैं।
सनसनी पैदा करने की गरज से राष्ट्रपति के इस संबोधन की कुछ लोग मन माफिक व्याख्या कर रहे हैं। इसमें मीडिया का भी एक तबका शामिल है। दरअसल, इस स्थिति को समझने के लिए हमें बीते कुछ सालों के घटनाक्रमों को देखना होगा। देश का नागरिक समाज जनता को साथ लेकर इस दौरान एक नए तरह के लोकमत के निर्माण में लगा है। लोकमत निर्माण की यह प्रक्रिया प्रतिक्रियावादी और सुधारवादी दोनों है। प्रतिक्रियावादी इस लिहाज से कि इसमें एक तरफ तो इस बात की खीझ है कि सत्ता और जनता का साझा आचरण बदल गया है। केंद्र से लेकर राज्यों की सरकारें 'जनता का शासन’ चलाने की बजाय 'जनता पर शासन’ कर रही हैं। नतीजतन सरकारी सोच और काम की प्राथमिक शर्त अब न तो लोक कल्याणकारी है और न ही पारदर्शी। इस स्थिति पर देश के प्रथम नागरिक ने भी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा है, 'यदि भारत की जनता गुस्से में है, तो इसका कारण है कि उन्हें भ्रष्टाचार तथा राष्ट्रीय संसाधनों की बर्बादी दिखाई दे रही है।’
देश के नागरिक समाज ने इस स्थिति को बदलने के लिए कुछ लोकतांत्रिक दरकारों और सरोकारों को बार-बार रेखांकित किया है। इसमें सबसे अहम् मुद्दा है प्रातिनिधिक लोकतंत्र के ढांचे को संभव स्तर तक प्रतिभागी बनाना। जनलोकपाल आंदोलन के प्रकटीकरण के पीछे के कारणों को अगर समझें तो साफ होता है कि जनता अपने लिए सुविधा ही नहीं नीति और कानून निर्माण के लिए भी सड़क पर उतर सकती है। महज इतना ही नहीं, सरकार के आगे जनता इस बात का भी लोकतांत्रिक दबाव बना सकती है कि वह महज उसके लिए नहीं बल्कि उसके साथ बैठकर जरूरी फैसले करे।
दिलचस्प है कि अराजनीतिक रूप से चल रही इस तरह की सुधारवादी कोशिश ने अब राजनीतिक विकल्प की भी शक्ल ले ली है। पर एक बड़ी कोशिश के ठोस विकल्प बनने की प्रक्रिया सघन और सुचिंतित होनी चाहिए। दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) की जीत और फिर सरकार बनाने की घटना काफी अफरातफरी भरी रही है। आप ने जिस तरह के वादे जनता से किए और फिर सरकार बनाने के बाद वह जिस तरह अराजक स्थितियों को जन्म दे रही है, उसने कई सवाल खड़े किए हैं।
इस स्थिति पर राष्ट्रपति की टिप्पणी गौरतलब है। उनके ही शब्दों में, 'चुनाव किसी व्यक्ति को भ्रांतिपूर्ण अवधारणाओं को आजमाने की अनुमति नहीं देते हैं। जो लोग मतदाताओं का भरोसा चाहते हैं, उन्हें केवल वही वादा करना चाहिए जो संभव है। सरकार कोई परोपकारी निकाय नहीं है। लोकलुभावन अराजकता, शासन का विकल्प नहीं हो सकती।’
देश की मौजूदा स्थिति और राजनीतिक स्तर पर बदलाव की कम-ज्यादा संभावनाओं के बीच देश के प्रथम नागरिक की टिप्पणियों और चिंताओं पर जब विचार करते हैं तो इससे काफी हद तक समाधान मिलता है। हालांकि यहीं से कुछ नए सवालों का प्रस्थान बिंदु भी तैयार हो जाता है। समाधान की बात यह है कि जैसा कि महामहिम खुद कहते हैं, 'मैं निराशावादी नहीं हूं क्योंकि मैं जानता हूं कि लोकतंत्र में खुद में सुधार करने की विलक्षण योग्यता है। यह ऐसा चिकित्सक है जो खुद के घावों को भर सकता है और पिछले कुछ वर्षों की खंडित तथा विवादास्पद राजनीति के बाद 2०14 को घावों के भरने का वर्ष होना चाहिए।’
सवालों की नई जमीन इस पर तैयार हो गई है कि राष्ट्रपति को अभी ये सारी बातें कहने की जरूरत क्यों पड़ी। क्या इससे पहले का देश का लोकतांत्रिक इतिहास उन चिंताओं से सर्वथा मुक्त रहा, जिस पर आज चिंता जताई जा रही है? क्या देश लोकतांत्रिक संस्थाओं के अवमूल्यन की इमरजेंसी जैसी हिमाकत तक पहुंच गया है? क्या सरकारी अराजकता का नया खतरा 1984 में सिख दंगों के दौरान 'एक बड़ा पेड़ गिरने पर धरती के स्वाभाविक कंपन’ से भी बड़ा है? सवाल यह भी कि लोकतंत्र क्या इतना लकीर का फकीर है कि उसे आंदोलन और बदलाव जैसी स्थितियां या तो असंवैधानिक लगती हैं, या फिर अमर्यादित?
बहरहाल, इस मुद्दे पर यह तो मानकर ही चलना चाहिए कि राष्ट्रपति महोदय ने जो भी बातें कहीं, वह किसी एक घटना, सरकार या पार्टी तक सीमित न होकर संपूर्ण राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण होंगी, नहीं तो अनावश्यक विवाद पैदा होगा। अलबत्ता इस पूरे विमर्श में कुछ चीजें पहले से जरूर साफ होनी चाहिए। एक तो यह कि बीते दो-तीन सालों में जनता एकाधिक बार सरकार के खिलाफ अपने आक्रोश को लेकर सड़कों पर उतरी तो विरोध प्रदर्शन का यह तरीका हर लिहाज से अहिंसक था।
लिहाजा, इतना तो मानना ही पड़ेगा कि कम से कम जनता की मन:स्थिति अब भी हिंसक या अराजक नहीं है। रही दिल्ली की आप की सरकार और उसके कामकाज के तौर-तरीके की तो इस बारे में सर्वसम्मत सराहना की स्थिति तो कतई नहीं है। यह जरूर है कि सरकार और जनता के बीच साझेदारी बढ़ाने के लोकतांत्रिक तकाजे को जरूर आप ने फिर से रेखांकित किया है। क्योंकि कम से कम यूपीए-2 सरकार के कार्यकाल को देखें तो इस दौरान न सिर्फ जनता की नजरों में सरकार की विश्वसनीयता में कमी आई है बल्कि पूरी राजनीतिक जमात की साख पर भी बट्टा लगा है।
सार्वजनिक जीवन की गरिमा में आए इस तरह के ह्रास को सादगी और ईमानदारी जैसी कुछ कसौटियों पर चुनावी चुनौती की पटकथा जिस तरह आप ने दिल्ली में लिखी और आगे लोकसभा चुनाव में उसके विस्तार को लेकर वह जिस तरह से ललक से भरी है, वह थोड़ा सोचने पर मजबूर करती है। आज हर तरफ से आप को इस सवाल से दो-चार होना पड़ रहा है कि उसकी वैचारिक अवधारणा का सार क्या है। कोई क्रांति कम से कम विचार शून्यता से तो नहीं पैदा हो सकती है। ऐसे लोग चुनावी राजनीति में जनता को विकल्प के नाम पर गुमराह भी कर सकते हैं। इस स्थिति पर चिंता महामहिम ने भी जताई है- 'चुनाव किसी व्यक्ति को भ्रांतिपूर्ण अवधारणाओं को आजमाने की अनुमति नहीं देते हैं।’ राष्ट्रपति का यह कथन उन सवालों का जवाब और चिंताओं का समाधानकारी सार है, जिस पर उनकी ही कही कुछ बातों के बाद हर तरफ चर्चा हो रही है।

सोमवार, 27 जनवरी 2014

जन गण का नया मन


इन दिनों भारतीय राजनीति को कई चीजें एक साथ मथ रही हैं। भारतीय लोकतंत्र के लिए यह एक सुखद लक्षण भी है क्योंकि एक तरफ जागरूक लोकतंत्र अपनी केंद्रीय उपस्थिति के लिए मचल रहा है तो वहीं परंपरागत की जगह नई राजनीतिक परंपरा की भी बात हो रही है। अगले कुछ महीनों में लोकसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में भारतीय जन गण के नए मन के साथ करवट बदलती देश की राजनीति पर प्रेम प्रकाश की कवर स्टोरी
भारतीय जन-गण का नया मन बदलाव और संभावनाओं के साझे से बना है। देशकाल से जुड़े तमाम सरोकारों के साथ अहिंसा और आंदोलनों का नया मेल भारतीय गणतंत्र में कोई नया अध्याय जोड़े या न जोड़े पर इसने देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर कुछ सामयिक दरकारों को जरूर रेखांकित कर दिया है।
दरअसल, 21वीं सदी के दूसरे दशक में लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के लिए जब सिविल सोसाइटी सड़कों पर उतरी और सरकार के पारदर्शी आचरण के लिए अहिंसक प्रयोगों को आजमाया गया तो इस बदले सूरते हाल को एक क्रांतिकारी संभावना के तौर पर हर तरफ देखा गया। मीडिया में तो खासतौर पर इसकी चर्चा रही। अमेरिका और यूरोप से निकलने वाले जर्नलों और अखबारों में कई लेख छपे, बड़ी-बड़ी हेडिंग लगीं कि भारत में फिर से गांधीवादी दौर की वापसी हो रही है, लोकतांत्रिक संस्थाओं के विकेंद्रीकरण और उन्हें सशक्त बनाने के लिए खासतौर पर देशभर के युवा एकजुट हो रहे हैं।
दिलचस्प है कि सूचना और तकनीक के साझे के जिस दौर को गांधीवादी मूल्यों का विलोमी बताया जा रहा था, अचानक उसे ही इसकी ताकत और नए औजार बताए जाने लगे। नौबत यहां तक आई कि थोड़ी हिचक के साथ देश के कई गांवों-शहरों में रचनात्मक कामों में लगी गांधीवादी कार्यकर्ताओं की जमात भी इस लोक आलोड़न से अपने को छिटकाई नहीं रख सकी। वैसे कुछ ही महीनों के जुड़ाव के बाद इनमें से ज्यादातर लोगों ने अपने को इससे अलग कर लिया।
सवालों-सरोकारों की नई जमीन
गौरतलब है कि देश में लोकतांत्रिक सशक्तिकरण का जो दौर शुरू हुआ है, उसमें कुछ सवाल और मुद्दे बार-बार उठाए जा रहे हैं। क्या लोकतंत्र में जनता की भूमिका सिर्फ एक दिनी मतदान प्रक्रिया में शिरकत करने भर से पूरी हो जाती है? एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद सर्वोच्च संस्था है पर क्या उसकी यह सर्वोच्चता जनता के भी ऊपर है? क्या सरकार और संसद सिर्फ नीतियों और योजनाओं का निर्धारण जनता के लिए करेंगे या फिर इस निर्णय प्रक्रिया में जनता की भी स्पष्ट भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए? केंद्रीकृत सत्ता लोकतांत्रिक विचारधारा के मूल स्वभाव के खिलाफ है तो फिर उसका पुख्ता तौर पर विकेंद्रीकरण क्यों नहीं किया जा रहा है? पंचायती राज व्यवस्था को अब तक सरकार की तरफ से महज कुछ विकास योजनाओं को चलाने की एजेंसी बनाकर क्यों रखा गया है, उसका सशक्तिकरण क्यों नहीं किया जा
रहा है?
ये तमाम वे मुद्दे और सवाल हैं, जो बीते कुछ सालों में जनता के बीच उभरे, खुली बहस का हिस्सा बने। जनता के मूड को देखते हुए या तो ज्यादातर राजनीतिक दलों और उनके नेताओं ने इनका समर्थन किया या फिर विरोध की जगह एक चालाक चुप्पी साध ली।
पारदर्शी सरकारी कामकाज और उस पर निगरानी के लिए अधिकार संपन्न लोकपाल की नियुक्ति जैसे सवालों पर तो संसद तक ने अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दी। चुनाव सुधार के मुद्दे पर भी तकरीबन एक सहमति हर तरफ दिखी। पर अब जबकि लोकसभा चुनाव होने हैं तो इनमें से शायद ही कोई मुद्दा हो, जो किसी राजनीतिक दल के चुनावी एजेंडे में शुमार हो। इस बार भी चुनावी वादे के नाम पर कच्ची-पक्की सड़कों के या तो किलोमीटर गिनाए जाएंगे या फिर मुफ्त अनाज या लैपटॉप बांटने के लालची वादे।
अण्णा आंदोलन से छिटक कर बनी आम आदमी पार्टी जरूर इनमें से कुछ मुद्दों को लेकर दिल्ली विधानसभा चुनाव में उतरी है, पर उनकी महत्वाकांक्षा और जल्दबाजी से उनके आदर्शवादी कदमों की व्यावहारिकता पर सवाल उठते हैं। दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने के बाद भी अरविंद केजरीवाल जिस तरह अपनी पूरी कैबिनेट के साथ धरने पर बैठ गए, वह आम आदमी का नाम लेकर बनी पार्टी और उसके नेताओं के अराजकतावादी इरादों को साफ करता है।
परिवर्तन फैशनेबल चीज नहीं
गौरतलब है कि जिन सवालों, सरोकारों और मुद्दों के सामयिक जनतांत्रिक तकाजों से देश की परंपरागत सियासी जमातें ठीक से कनेक्ट नहीं कर पा रही हैं, उसकी वजह एक ही है। यह वजह है 'परिवर्तन’ को लेकर समझ। दरअसल, परिवर्तन कोई फैशनेबल चीज नहीं, जिसे जब चाहे प्रचलन में ला दिया और जब चाहे प्रयोग से बाहर कर दिया। फिर यह टू मिनट नूडल्स भी नहीं कि बस कुछ ही समय में बस जो चाहा हासिल कर लिया। इसलिए जिस राजनीतिक व्यवस्था ने पिछले छह दशकों से ज्यादा के समय में अपनी मजबूत पकड़ बना रखी है, उसकी बाहें मरोड़ना कोई आसान बात नहीं। बात करें 'आप’ की तो वह इनमें से कुछ मुद्दों को उठाती जरूर है पर इसे लेकर उसका कंसर्न भी बहुत जेनुइन नहीं जान पड़ता। वैसे इस पार्टी को बने अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है, लिहाजा अभी से उसके बारे में एक निराशावादी राय बना लेना भी ठीक नहीं होगा।
सेमीफाइनल तो देखा अब फाइनल देखिए
देश का नया जनमानस क्या सोच रहा है और उसकी पसंद-नापसंद क्या है, इसका अंदाजा हाल में दिल्ली, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे को देखकर लगाया जा सकता है। हालांकि इन राज्यों के साथ पूर्वोत्तर के राज्य मिजोरम के भी चुनाव हुए थे पर उसकी चर्चा यहां हम नहीं कर रहे हैं। उत्तर और मध्य भारत के चार सूबों के चुनावी नतीजे को देखकर कहा जा सकता है कि जनता को अब 'ठग प्रवृत्ति’ की राजनीति के जाल में आसानी से नहीं फंसाया जा सकता है। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस को यह भरम हो चला था कि जिस तरह वह केंद्र में मनरेगा जैसी मेगा लोक कल्याणकारी योजना के बूते वह दोबारा सत्ता में आई, वह जादू वह राज्यों में भी चला पाएगी। मुफ्त अनाज बांटने की उसकी अफरातफरी में लाई गई योजना अगर जनता के बीच बेअसर साबित हुई तो इसलिए क्योंकि भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दे पर सरकार के पास कहने के लिए कुछ नहीं था।
नरेंद्र मोदी इस मामले में अपने तमाम सियासी प्रतिद्बंद्बियों पर इसलिए भी भारी पड़े क्योंकि उनके पास विकास और सुशासन का गुजरात मॉडल है। इसलिए वह जब जनता के बीच जाते हैं तो करके दिखाएंगे के साथ करके दिखाया वाले भरोसे से बोलते हैं। जेल में बंद नेताओं को चुनाव लड़ने का हक दिलाने वाले सरकारी बिल को फाड़कर रद्दी की टोकड़ी में फेंकने की बात करने वाले कांग्रेस के युवराज तमककर भले लाख बड़ी बातें करें पर उनकी कथनी का सपोर्ट न तो केंद्र में उनकी पार्टी की अगुवाई वाली सरकार करती है और न ही राज्यों में उनकी सरकारें।
दिल्ली चूंकि पिछले कम से कम तीन सालों में भ्रष्टाचार और निर्भया कांड के विरोध में सड़कों पर उतरी सिविल सोसायटी के गुस्से का चश्मदीद भी रही, इसलिए यहां के चुनाव परिणाम में एक अलग रेखांकित करने वाली बात दिखी। दिल्ली में कांग्रेस बुरी तरह पराजित हुई और आप ने अपने प्रदर्शन से सबको चौंकाया। भूला नहीं है देश वह दृश्य जब निर्भया की मौत के बाद जंतर मंतर पर उसकी तस्वीर के आगे मोमबत्ती जलाने आईं तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को जनता के गुस्से का इस तरह सामना करना पड़ा कि सुरक्षाकर्मियों को उन्हें वहां से काफी मशक्कत से सुरक्षित बाहर निकालना पड़ा। दिल्ली में भाजपा की चूक यह रही कि वह इस जनाक्रोश को उस तरह अपने पक्ष में इनकैश नहीं करा सकी, जैसी सिविल सोसाइटी के बीच से निकली एक नई पार्टी ने।
बात करें मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की तो यहां कांग्रेस विपक्ष में थी। वह चाहती तो अपने को एक साफ-सुथरे विकल्प के रूप में जनता के सामने ला सकती थी। पर जनता ने परिवर्तन का रास्ता शायद इसलिए नहीं चुना क्योंकि उसनेनए सपनों और वादों-इरादों की बजाय कर्मठ सरकारों का हाथ मजबूती से थामे रखना जरूरी समझा।
लोकप्रिय ही नहीं तत्पर भी
भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी आज हर दूसरे दिन देश के किसी हिस्से में वहां के लोगों को संबोधित कर रहे हैं। उन्हें सुनने न सिर्फ उनके समर्थक बल्कि स्थानीय लोग भी बड़ी तादाद में आ रहे हैं। कई जगहों पर तो लोग शुल्क देकर उन्हें सुनने आ रहे हैं। भारतीय राजनीति में किसी नेता को लेकर इस तरह का आकर्षण काफी समय बाद देखने को मिल रहा है।
हाल में संपन्न विधानसभा चुनावों के दौरान मोदी चुनावी राज्यों के अलावा यूपी, बिहार, हरियाणा, पंजाब, जम्मू-कश्मीर भी गए। ऐसा वे इसलिए भी कर रहे हैं क्योंकि लोकसभा चुनाव को लेकर एजेंडे को वह अपनी तरफ से समय से पहले ही शक्ल दे देना चाहते हैं। यह जोखिम नहीं बल्कि एक साहसिक पहल है। अगर खुद को आप देश के मुकम्मल नेता की तरह जनता के बीच ला रहे हैं तो फिर आपका मानस और आपकी तैयारी भी मुकम्मल होनी ही चाहिए। पिछले दिनों दिल्ली में जब वे भाजपा कार्यकर्ताओं की रैली में बोले तो बिजली, सड़क, पानी से लेकर उद्योग, पर्यटन और अर्थव्यवस्था तक पर अपनी सोच और चाह को रखा।
यही नहीं उन्होंने भारतीय जन-गण के नए मन तक भी पहुंचने की भरसक कोशिश की। कहा कि सरकार की योजनाएं और कार्यक्रम तब तक सफल नहीं हो सकते जब तक उसमें जन भागीदारी न हो। अपनी यह बात कहते हुए वे प्रातिनिधिक की बजाय प्रतिभागी लोकतांत्रिक ढांचे की दरकार को भी कबूला। साफ है कि वे चुनावी राजनीति के परंपरावादी खांचे से खुद भी बाहर निकलने को तत्पर हैं। उनकी यह तत्परता लोकसभा चुनाव में उनकी रणनीतिक कुशलता भी साबित हो सकती है।

बुधवार, 22 जनवरी 2014

आप नहीं बदलाव का सारथी


बीते तीन-चार दिनों के घटनाक्रम में देश की राजनीति ने अपने लिए नई व्याख्या और विमर्श की चौहद्दी को और बढ़ा दिया है। निराश वे लोग ज्यादा हैं जिन्हें अब भी लोकतंत्र की व्यवस्था 'इनक्लूसिव’ की जगह 'इंपोजिंग’ ही पसंद आ रही है। 21वीं सदी का दूसरा दशक देश में जिस तरह के लोकतांत्रिक तकाजे को बहस के केंद्र में लेकर आया है, उसकी बुनियादी दरकार ही यही है कि जनकल्याण का ढिंढ़ोरा पीटकर सियासी रोटियां सेंकने के दिन बीत गए। अब तो विकास का कोरा नारा भी व्यापक लोकमत के निर्माण में कारगर औजार साबित होगा, ऐसा कहना जोखिम भरा है। ये तमाम स्थितियां एक ही सवाल को बार-बार रेखांकित कर रही हैं कि जनता और सरकार का अस्तित्व एक दूसरे से जुदा या एक के ऊपर एक की बजाय साझा क्यों नहीं हो सकता? और अगर ऐसा नहीं हो सकता तो फिर लोकतंत्र में लोक की उपस्थिति कहां है और किस भूमिका के साथ है?
जिन बीते तीन-चार दिनों की हम बात कर रहे हैं उसमें एक तरफ कांग्रेस पार्टी और उनके सबसे लोकप्रिय करार दिए जाने वाले नेता राहुल गांधी बार-बार ये समझाने में लगे रहे कि उनकी सरकार ने जनता को जितना अधिकार संपन्न बनाया है, उसके लिए जितने प्रत्यक्ष लाभाकरी कदम उनकी सरकार ने उठाए हैं, उतना किसी ने नहीं किया है। आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी अपनी इन उपलब्धियों के नाम पर जनता से वोट के रूप में अपने लिए श्रेय चाह रही है।
2००9 में जब कांग्रेस की अगुवाई में यूपीए दोबारा सत्ता में आई थी तो सबने एक तरफ से कहा था कि मनरेगा का जादू काम कर गया। अब जबकि इस साल फिर चुनाव होने हैं तो मनरेगा जैसी मेगा योजना तो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी है। यही नहीं इस दौरान यूपीए-एक और दो के कार्यकाल के कई बड़े घोटाले और वित्तीय अनियमितताओं के मामले भी इस दौरान सामने आए। सूचना के अधिकार कानून के तहत एक के बाद एक खुलासे हुए कि सरकार जिस तरह काम कर रही है, उसमें भ्रष्टाचार से चुनौती से निपटने का कोई कारगर मैकेनिज्म नहीं है। एकाधिक मामलों में सीएजी ने कहा कि फैसले लेने के तरीके में ही नहीं मंशा में भी गलतियां हुई हैं। ऐसे में 'पॉवर वैक्यूम’ से लेकर 'पॉलिसी पैरालाइज’ तक के तमगे सरकार को मिले। फिर इस बीच जिस तरह जनता महंगाई और विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार से जूझती रही, उससे कुल मिलाकर एक मोहभंग की स्थिति पैदा हुई।
दिलचस्प है कि राहुल गांधी इन स्थितियों के बावजूद चीजों को कामचलाऊ तरीके से समझना चाह रहे हैं। सुधार और परिवर्तन के नाम पर वे महज रफ्फूगिरी से काम चलाना चाहते हैं। अपनी गलतियों और असफलताओं को वे उपलब्धियां गिनाकर ढकना चाहते हैं। यह एक आत्मघाती सोच है। पहले उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में फिर राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और दिल्ली में जिस तरह पार्टी को मुंह की खानी पड़ी, उससे कांग्रेस उपाध्यक्ष की आंख अब तक खुल जानी चाहिए थी।
इस मोहभंग का भाजपा अपने तरीके से लाभ उठाना चाहती है। नरेंद्र मोदी के दबंग और सम्मोहक नेतृत्व को सामने लाकर पार्टी को लगता है कि केंद्र में दस साल की सत्ता की केंद्रित जड़ता को वह तोड़ देगी। मोदी अपनी तरह से विकास की बात करते हैं, देश के लोगों खासतौर पर युवाओं के पुरुषार्थ में भरोसा दिखलाते हैं, साथ भी बिजली, सड़क, पानी, उद्योग और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में गुजरात में किए गए अपने सफल प्रयोगों से लोगों में इस बार के चुनाव में परिवर्तन का विकल्प अपनी तरफ स्थिर करने का यत्न करते हैं। रविवार को दिल्ली के रामलीला मैदान में जब वे बोलने के लिए खड़े हुए तो उनकी नजर में देश के नवनिर्माण का एक पूरा ब्लू प्रिंट था। उन्होंने लंबा भाषण ही नहीं दिया, तकरीबन सभी मुद्दों पर अपनी राय और सोच भी सबके सामने रखी।
पर भाजपा और कांग्रेस दोनों ही एक बात में चूक कर रही है। वह चूक यह है कि जिस मतदाता के पास आखिरकार उन्हें जाना है, उसकी बदली सोच को रीड करने में दोनों से कहीं न कहीं भूल हो रही है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के प्रदर्शन के बाद मीडिया से लेकर देश में बहस के तमाम चौपालों पर अगर यह बात हो रही है कि देश वैकल्पिक राजनीति की तरफ बढ़ रहा है तो यह बात देश की दोनों बड़ी पार्टियों को न सिर्फ समझ में आनी चाहिए बल्कि इसका फर्क उनकी कार्यनीति और आचरण में भी आना चाहिए। सिर्फ यह कह देना कि प्रातिनिधिक की जगह प्रतिभाग के लोकतंत्र की तरफ हम कदम बढ़ाएंगे, काम नहीं चलेगा। देश की जनता के इस आंदोलनात्मक रुझान को पार्टियों को अपने विजन और एक्शन दोनों में ट्रांसलेट करके दिखाना होगा।
दोनों दलों को याद रखना पड़ेगा कि बीते तीन-चार सालों में जनता अगर एकाधिक बार भ्रष्टाचार और महिला असुरक्षा के खिलाफ उतरी है तो यह कौल किसी पार्टी या नेता का नहीं था। देश की सिविल सोसाइटी ने अपने को आगे किया और देश में व्यवस्था परविर्तन की छटपटाहट को सड़क पर ला दिया। आम आदमी पार्टी इसी छटपटाहट का नतीजा है। यह पार्टी अपनी नीति और एजेंडे को लेकर आज जरूर कंफ्यूज्ड जरूर दिखाई पड़ती है पर उसके उन्नयन में कहीं न कहीं वैकल्पिक राजनीति की तलाश शामिल है।
आप से घबराए दलों के लिए शुक्र की बात यह है कि विचार और संगठन के स्तर पर उसकी लड़खड़ाहट साफ तौर पर जाहिर हो रही है। दिल्ली में सरकार बनाने के बाद गवर्नेंस के स्तर पर उसे उम्दा प्रदर्शन करके मिसाल पेश करनी चाहिए थी पर वह अब एक अराजकतावादी राह पर है। आप दिल्ली विधानसभा चुनाव के रिफ्लेक्शन को लोकसभा चुनाव में भी देखना चाहती है। इसलिए वह और उसकी सरकार फिर से सड़क पर प्रतिरोधी तेवर के साथ दिखना चाह रही है। यह आप की रणनीति कम असफलता ज्यादा है। यह उस उम्मीद के साथ भी नाइंसाफी है, जो आप ने लोगों के मन में राजनीतिक बदलाव के नाम पर जगाई थी।
पर आप के भटकाव के बावजूद यह कहीं से साबित नहीं होता कि देश की राजनीति में विकल्प का खाली स्पेस भरने की दरकार ही खारिज हो गई। भारतीय जन-गण का नया मन परंपरावादी राजनीति से वाकई तंग आ चुका है। देश की राजनीति में एक नई ताजी बयार को महसूस करने की तड़प मुट्ठियां बांध चुकी हैं। इन बंधी मुट्ठियों की ताकत को समझना होगा। भाजपा और कांग्रेस की मुश्किल यह है कि वह एक ही तरह के पॉलिटिकल कल्चर में कहीं न कहीं ढ़ल चुकी हैं। नई स्थितियों में जनता के बीच, जनता के साथ और जनता के बल पर ये पार्टियां अगर अपनी ताकत को गुणित नहीं करती हैं तो वह अपने सामथ्र्य के साथ बेईमानी करेंगी। खासतौर पर यह उम्मीद भाजपा को लेकर ज्यादा है क्योंकि वह केंद्र में पिछले दस सालों से सत्ता से बाहर है। वह देश के नागरिक समाज के साथ बेहतर संवाद कर अपनी संभावना में जादुई पंख लगा सकती है।
एक बात और यह कि परिवर्तन का पेटेंटे किसी एक नेता या आदमी के नाम पर दर्ज नहीं होता है। इसलिए सिविल सोसायटी की सक्रियता और आप के उभार को लेकर घबड़ाई हुई प्रतिक्रिया वही लोग दे रहे हैं, जिन्हें लग रहा है कि जनता इस उभार के साथ बंधक की तरह साथ है। दरअसल, देश में जनतांत्रिक सशक्तिकरण एक सामयकि दरकार है और इस दरकार को अपने सारोकारों में शामिल कर जो भी दल या नेता आगे बढ़ेंगे जनता उसके साथ होगी।
 

सोमवार, 20 जनवरी 2014

फेयर-अफेयर मेहर

मेहर तरार। कल तक यह नाम भले अनसुना-अनजाना सा था। पर अब ऐसा नहीं है। यह नाम आज भारत और पाकिस्तान से लेकर दुबई तक पूरे मीडिया जगत की सुर्खियों में है। अलबत्ता यह जरूर है कि खुद मेहर को भी यह लोकप्रियता बहुत रास आ रही है, ऐसा आप नहीं कह सकते हैं। उस पर आरोप भी लगा कि वह पांच मिनट की सस्ती लोकप्रियता के लिए मर्यादा की सीमाएं लांघ रही है। उसे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई का एजेंट तक ठहराया गया। मेहर चाहे जैसी भी है, उसने चाहे जो भी किया है पर इतना तो जरूर कह सकते हैं कि वह अपने इस अफसाने को इस दुखांत तक तो शायद नहीं ही ले जाना चाहती है, जहां आज यह पहुंच चुका है। सच कहें तो जिन वजहों से मेहर की चर्चा आज हर तरफ है, उसकी कल्पना शायद उसने भी नहीं की होगी। शुरुआत में उसका नाम आया केंद्रीय मानव संसाधन राज्य मंत्री शशि थरूर के साथ उसके कथित अफेयर को लेकर। बाद में इस मामले में थरूर की स्वर्गीय पत्नी सुनंदा पुष्कर कूद पड़ीं।
सोशल मीडिया के जरिए चली इस लड़ाई में सुनंदा और मेहर ने एक दूसरे को खूब खरी खोटी सुनाई। एक तरफ उलाहना यह था कि कोई उनके पति पर डोरे डाल रहा है तो दूसरी तरफ से जवाब यह था कि यह सब कोरी बकवास है। आज जबकि सुनंदा इस दुनिया में नहीं हैं तो इससे मेहर भी कम दुखी नहीं हैं। सुनंदा की मौत के बाद जो कुछ शुरुआती प्रतिक्रियाएं ट्विटर के जरिए आईं, उसमें मेहर की तरफ से जताया गया अफसोस भी शामिल था। मेहर पाकिस्तान के लाहौर में रहती हैं। वह स्वतंत्र पत्रकार हैं और मशहूर अखबार 'डेली टाइम्स’ में काम कर चुकी हैं। दो मार्च 1968 को पाकिस्तान के लाहौर में जन्मी मेहर की शुरुआती पढ़ाई लाहौर के ही प्रेजेंटशन कॉलेज में हुई। इसके बाद उसने वहीं के किनैड़ कॉलेज से इंग्लिश लिटरेचर से एमए की डिग्री हासिल की।
शशि थरूर से अपने अफेयर को लेकर मेहर ने माना है कि वह उनसे दो बार मिल चुकी हैं। थरूर से उनकी पहली मुलाकात भारत में हुई और दूसरी बार वह दुबई में उनसे मिली थी। पर इससे ज्यादा शशि थरूर और अपने रिलेशन के बारे में कुछ भी मानने से इनकार करती है। जबकि सुनंदा ने जो खुलासे किए हैं ट्विटर पर उसमें मेहर शशि को पाने के लिए मचलती दिखती हैं। दरअसल यह पूरा मामला शशि थरूर के एक ट्वीट से शुरू हुआ, जिसमें एक पाकिस्तानी पत्रकार से उनके अफेयर की बात कही गई थी। बाद में पता चला कि शशि थरूर की जगह उनकी पत्नी इस तरह के ट्विट कर रही थीं। अफेयर की बात सामने आने पर मेहर ने कहा था कि वह एक मां हैं और उनके लिए परिवार पहली प्रथामिकता है। इस विवाद के बाद मेहर ने अपनी प्रोफाइल में खुद को एक मां और पत्रकार बताया।
मेहर पाकिस्तानी पंजाबी हैं। दुनिया भर में घूमने वाली मेहर अपनी फोटो भी ट्विटर पर शेयर करती रहती हैं। वह भारतीय फिल्मों और संगीत की दीवानी हैं और हिदी गानों के नए वीडियो अक्सर शेयर करती रहती है। हालांकि अब उनका नाम जिस दुखद प्रसंग से जुड़ गया है, उसमें कहना मुश्किल है कि वर्चुुअल वर्ल्ड को लेकर उसका आकर्षण यों ही बरकरार रहेगा कि नहीं।