सोमवार, 20 अप्रैल 2026

लैंगिक भेदभाव और मातृत्व

- प्रेम प्रकाश

भारत में मां को त्याग, समर्पण और अनंत जिम्मेदारियों के प्रतीक के रूप में महिमामंडित किया जाता है, लेकिन इस छवि के पीछे एक असहज सच छिपा है—बच्चों के लालन-पालन और शिक्षा का लगभग पूरा दायित्व आज भी महिलाओं के कंधों पर ही क्यों है? अच्छी बात यह है कि एक ऐसे दौर में जब संसद ऐतिहासिक नारी शक्ति वंदन अधिनियम पास करने जा रहा है, मातृत्व की भूमिका को लेकर भी गहरे सवाल खड़े हो रहे हैं। यह लैंगिक समानता और न्याय की दृष्टि से एक बड़ा बदलाव है जिसे हम अपने समय में देख रहे हैं, महसूस कर रहे हैं। आज पब्लिक डोमेन में इस बात को बढ़ा-चढ़ाकर और खासे तार्किक व स्पष्ट रूप से कहने वाले कई लोग हैं कि जब तक परिवार में बच्चों की देखभाल को महिलाओं का स्वाभाविक काम मानने की सोच नहीं बदलेगी, तब तक न तो महिलाओं की वास्तविक स्वतंत्रता संभव है और न ही एक संतुलित समाज का निर्माण।

भारत में घर के भीतर होने वाला श्रम बच्चों की देखभाल, उनकी पढ़ाई, पोषण से लेकर भावनात्मक विकास महिलाओं का दायित्व तकरीबन अनपेड और अनविजिवल है। यह काम आर्थिक आंकड़ों में नहीं दिखता, लेकिन इसकी अहमियत किसी भी औपचारिक नौकरी से कम नहीं है। इस संबंध में महिला अधिकारों की आजीवन लड़ाई लड़ने वाली रोज़ा लक्जमबर्ग का यह वक्तव्य खासा चर्चित रहा है कि जिस दिन औरतों के श्रम का हिसाब होगा, इतिहास की सबसे बड़ी धोखाधड़ी पकड़ी जाएगी।  

दरअसल, समस्या यह है कि इस अदृश्य श्रम का सबसे बड़ा हिस्सा महिलाओं के हिस्से में आता है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और संयुक्त राष्ट्र की महिला इकाई जैसी विश्व की कई संस्थाओं की रिपोर्टें लगातार यह बताती रही हैं कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में कई गुना अधिक समय अनपेड केयर वर्क करती हैं। भारत के संदर्भ में यह असंतुलन और भी गहरा है, जहां सामाजिक अपेक्षाएं महिलाओं को प्राइमरी केयरगिवर के रूप में स्थापित कर देती हैं। इन सबका असर केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि महिलाओं के करियर और आर्थिक स्वतंत्रता पर सीधा पड़ता है। 

अशोका यूनिवर्सिटी के एक चर्चित अध्ययन के अनुसार भारत में लगभग आधी कामकाजी महिलाएं 30 वर्ष की उम्र के आसपास नौकरी छोड़ देती हैं और इसका सबसे बड़ा कारण बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी है। यह आंकड़ा किसी व्यक्तिगत पसंद का नहीं, बल्कि उस सामाजिक ढांचे का प्रतिबिंब है, जिसमें महिलाओं से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने पेशेवर जीवन से पहले परिवार को प्राथमिकता दें, जबकि पुरुषों पर ऐसी कोई बाध्यता नहीं होती।

हमारे समाज में अच्छी मां की जो परिभाषा गढ़ी गई है, वह इतनी कठोर और एकतरफा है कि वह महिला की बाकी सभी पहचानों को पीछे छोड़ देती है। एक आदर्श मां वह मानी जाती है जो हर समय बच्चे के लिए उपलब्ध हो, उसकी हर जरूरत का ध्यान रखे और अपने व्यक्तिगत सपनों को पीछे छोड़ दे। इसके उलट, पिता की भूमिका अक्सर केवल आर्थिक जिम्मेदारियों तक सीमित कर दी जाती है। यह असमानता केवल महिलाओं पर जरूरत से ज्यादा मानसिक और शारीरिक बोझ नहीं डालती, बल्कि बच्चों की सोच को भी उसी दिशा में ढाल देती है। वे बचपन से ही यह मानने लगते हैं कि घर और देखभाल की जिम्मेदारी महिलाओं की है, जबकि पैसे कमाना पुरुषों का काम है।

बच्चों की देखभाल के इस स्त्रीकरण का व्यापक आर्थिक प्रभाव भी है। भारत में महिलाओं की श्रम भागीदारी दर पहले से ही चिंताजनक रूप से कम है, और इसका एक बड़ा कारण यही असमान केयर बर्डन है। विश्व बैंक सहित कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं यह मानती हैं कि यदि महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़े, तो देश की जीडीपी में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। लिहाजा, सरकार औऱ समाज दोनों को इस बात को समझना होगा कि जब महिलाएं अपने जीवन के सबसे उत्पादक वर्षों में बच्चों की देखभाल के कारण नौकरी छोड़ने को मजबूर होती हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत नुकसान नहीं, बल्कि राष्ट्रीय क्षति भी है।

महिला हित में उठी जागरूक आवाजों की यह देन है कि “डिफेमिनाइजेशन ऑफ चाइल्डकेयर” की अवधारणा पर विभिन्न मंचों पर बात हो रही है। यह अवधारणा न सिर्फ समस्या पर विचार करती है बल्कि इसके लिए समाधान भी सुझाती है। यह जागरूक अवधारणा इस दरकार को गहरे तौर पर रेखांकित कर रही है कि बच्चों की देखभाल को केवल महिलाओं की जिम्मेदारी मानने की सोच को खत्म करना और इसे परिवार व समाज की साझा जिम्मेदारी के रूप में स्थापित करना समय की मांग है। अलबत्ता इस दरकार को पूरा होने के लिए यह जरूरी होगा कि इसके लिए जरूरी सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया में पुरुष सक्रिय रूप से शरीक हों। क्योंकि बिना इसके लैंगिक समानता का आदर्श कोरा कागजी ही बना रहेगा। 

आज स्थिति यह है कि महिलाओं पर केवल बच्चों की देखभाल ही नहीं, बल्कि उनकी शिक्षा, होमवर्क, स्कूल से जुड़े संवाद और भावनात्मक मार्गदर्शन की जिम्मेदारी भी अधिक होती है। यह “डबल बर्डन” उन्हें लगातार थकान, तनाव और कई बार बर्नआउट की स्थिति में पहुंचा देता है। कामकाजी महिलाएं दिनभर नौकरी करने के बाद घर लौटकर दूसरी शिफ्ट में प्रवेश करती हैं, जहां उनसे वही अपेक्षाएं की जाती हैं जो एक पूर्णकालिक गृहिणी से की जाती हैं।

लिहाजा, इस समस्या का समाधान केवल नीतियों से नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता में बदलाव से संभव है। पितृत्व अवकाश को बढ़ावा देना, कार्यस्थलों पर लचीली नीतियां लागू करना, और क्रेच व डे-केयर जैसी सुविधाओं का विस्तार करना जरूरी कदम हैं, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है सोच में बदलाव। जब तक मां का स्वाभाविक कर्तव्य जैसी धारणाएं समाज के भीतर गहराई से जमी रहेंगी, तब तक कोई भी नीति पूरी तरह प्रभावी नहीं हो पाएगी। बच्चों को बचपन से ही यह सिखाना होगा कि घर और परिवार की जिम्मेदारियां साझा होती हैं, न कि किसी एक लिंग की।

महिलाओं के सशक्तिकरण की चर्चा अक्सर शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक भागीदारी तक सीमित रह जाती है, लेकिन असली कसौटी घर के भीतर तय होती है। यदि एक महिला को अपने ही घर में बराबरी का अधिकार नहीं मिलता, तो बाहर की उपलब्धियां भी अधूरी रह जाती हैं। “वुमन डेवलपमेंट” से “वुमन-लेड डेवलपमेंट” की बात तब ही सार्थक होगी, जब महिलाएं केवल देखभाल की भूमिका तक सीमित न रहकर निर्णय लेने और नेतृत्व की प्रक्रिया में बराबरी से भाग लें।

आखिरकार सवाल यही है कि क्या हम बच्चों के लालन-पालन को एक साझा सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में देखने को तैयार हैं, या हम इसे अब भी महिलाओं के त्याग और कर्तव्य के रूप में ही देखते रहेंगे? जब तक इस प्रश्न का ईमानदार उत्तर नहीं खोजा जाएगा, तब तक हर मां के भीतर एक अधूरी पहचान बनी रहेगी और समाज अपनी आधी संभावनाओं को यूं ही खोता रहेगा।

(दैनिक भास्कर 15.04.26)



शुक्रवार, 2 अगस्त 2024

विकल्पहीनता के विरोध का विमर्श

- प्रेम प्रकाश

विकल्पहीन नहीं है दुनिया - किशन पटनायक

नीदरलैंड्स इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंस की सोशल न्यूरोलॉजिस्ट एमिली कैस्पर ने एक दिलचस्प शोध किया है। कैस्पर जानना चाहती थीं कि सत्ता के विरोध का निर्णय लोग निर्भीकता से करते हैं या ऐसा करते हुए वे किसी भय से दबे होते हैं। शोध के नतीजे से यह बात जाहिर हुई है कि अनजाने ही सत्ता के साथ सहमति की मनोवैज्ञानिक स्वाभाविकता हाल के दौर में बढ़ी है। अपने शोध अध्ययन की व्याख्या करते हुए कैस्पर कहती हैं कि बगैर उचित प्रशिक्षण और जागरुकता के लोग सत्ता के खिलाफ अपनी असहमति को खुले विरोध के मोर्चे तक ले जाने से भागते हैं। कैस्पर के अध्ययन और उसके नतीजे को अगर भारत के मौजूदा हालात से जोड़कर देखें तो विमर्श का एक नया आधार विकसित हो सकता है।

इस आधार को विकसित करने की पहल में पहला संदर्भ अगर मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव के 325 के मुकाबले 126 वोटों के भारी अंतर से गिरने का लें तो इस परिणाम का प्रोजेक्शन सीधे 2019 के लोकसभा चुनाव पर करने के बजाय, इस पूरी स्थिति को इतिहास की रोशनी में धैर्य के साथ देखना होगा। भारतीय संसद के इतिहास में पहला अविश्वास प्रस्ताव पंडित जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में अगस्त 1963 में जेबी कृपलानी ने रखा था। तब इस प्रस्ताव के पक्ष में केवल 62 वोट पड़े थे और विरोध में 347 वोट पड़े थे। पर इस प्रस्ताव का महत्व महज इसलिए कम नहीं हो जाता कि वह गिर गया, बल्कि इसकी अहमियत इसलिए है क्योंकि इससे देश में कहीं न कहीं विपक्षी राजनीति की वह सैद्धांतिकी तय हुई, जिसे गैर-कांग्रेसवाद के रूप में हम जानते हैं। विपक्षी राजनीति की यह सैद्धांतिक धुरी आज भी कायम है। बस उसका नाम बदलकर गैर-भाजपावाद हो गया है। देश में राजनीतिक विरोध का यह सैद्धांतिक तकाजा विपक्ष और जनता दोनों के सामने है। लिहाजा इस तकाजे पर कौन अपनी भूमिका कैसे तय करता है, यह ज्यादा बड़ा सवाल है।

लोकतंत्र में विकल्पहीनता की बात एक खतरनाक स्थिति है। इसलिए आज जब नरेंद्र मोदी की विकल्पहीनता पर बहस के कई सिरे एक साथ खुले हैं तो उसमें हमें लोकतंत्र के कुछ बुनियादी सरोकारों की भी फिक्र करनी चाहिए। कैस्पर ने भी अपने अध्ययन में इस खतरे का जिक्र किया है। अंग्रेजी में इस खतरनाक स्थिति के लिए ‘टीना’ नाम से एक टर्म काफी लोकप्रिय है और इन दिनों काफी इस्तेमाल भी हो रहा है। ‘टीना’ यानी ‘देअर इज नो अल्टरनेटिव’। यहां यह साफ हो जाना चाहिए कि सत्ता और उसे हासिल करने का गणित ही लोकतंत्र में सब कुछ नहीं है। आज भी इस मुल्क की तारीख में अगर महात्मा गांधी से लेकर राममनोहर लोहिया, जेबी कृपलानी और जयप्रकाश नारायण जैसे राजनेताओं के नामों के आगे उनके लोकतांत्रिक संघर्ष और राजनीतिक विवेक के कई-कई उल्लेख दर्ज हैं तो इसलिए क्योंकि उनके लिए लोकतंत्र में शक्ति का केंद्र सत्ता नहीं बल्कि लोकशक्ति है। 

कैस्पर ने अपने अध्ययन का संदर्भ बड़ा रखा है। लिहाजा उसके आधार पर अगर भारतीय राजनीतिक स्थिति का हम मूल्यांकन कर रहे हैं तो हमें तात्कालिकता से आगे एक बड़े परिप्रेक्ष्य में विमर्श को ले जाना होगा। पहली बात तो यही कि यह शोध अध्ययन कहीं न कहीं इस बात को रेखांकित करता है कि दुनिया भर में सत्ता का ढांचा हाल के दशकों में मजबूत हुआ है। लिहाजा उसके खिलाफ विरोध की जमीन तैयार करना और उस जमीन पर टिक कर खड़ा होना एक बड़ी चुनौती बन गई है। अमेरिका से लेकर भारत तक जिस तरह सत्ता और राजनीति का सूर्य एक साथ दक्षिणायन हुआ है, उसने सत्ता पर अधिकार के लोकतांत्रिक संघर्ष को सीधे-सीधे राजनीतिक वर्चस्व में बदल दिया है। इस बदलाव ने लोकतंत्र के बुनियादी सत्य को भी पीछे धकेला और आगे आ गया है ‘पोस्ट ट्रूथ'। 

‘पोस्ट ट्रूथ’ यानी सत्य से ज्यादा प्रभावी प्रचार और शोरगुल। प्रचार का यह शोर बीते चार वर्षों में हर तरफ सुना जा सकता है। कैस्पर जिसे सत्ता की मजबूती के तौर पर देख रही हैं, वह सत्ता से ज्यादा उस सोच की मजबूती है कि जिसमें सरकारें विरोध और हस्तक्षेप के हर लोकतांत्रिक स्पेस को खत्म कर अपने शक्तिशाली होने के भान को पुष्ट करती हैं। किसी नेतृत्व को लेकर विकल्पहीनता का भान अगर सुनियोजित और प्रचारित है तो फिर इस पोस्ट ट्रूथ फिनोमेना को लोकतंत्र के बुनियादी सरोकारों को मिल रही चुनौती के रूप में देखना होगा। 

आखिर में एक बात यह कि 2019 का लोकसभा चुनाव निश्चित तौर पर अहम है, पर यह वर्ष देश के लिए अपने राष्ट्रपिता की 150वीं जयंती मनाने का भी होगा। संघर्ष और सद्भाव के बीच सत्य और अहिंसा जैसे उच्च मूल्यों को जीनेवाले देश में नेतृत्व और विकल्प की बात अगर महज व्यक्तिवादी चौंध में खो जाए तो यह विचार और मूल्य के स्तर पर बहुत बड़ी स्फीति होगी। 

(लेख 2019 के लोकसभा चुनाव के संदर्भ में लिखा गया था। अब 2024 के चुनाव नतीजे भी सामने हैं। पर लोकतंत्र में विकल्प को लेकर चिंताएं अब भी उसी तरह कायम हैं।)

गुरुवार, 18 जुलाई 2024

सिनेमा का प्रगतिशील हमराही


याद आएगा फिल्म भी 

संघर्ष का है कारगर उपकरण 

छिड़ेगा जब भी

दो बीघा जमीन से जुड़ा

हक और संघर्ष का प्रकरण

सिनेमा सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं है बल्कि यह सामाजिक-सांस्कृतिक  प्रगतिशीलता से भी गहरे स्तर पर जुड़ा रहा है। इस लिहाज से कोई सिनेमा के इतिहास को देखे तो उसे संस्कृति के सफरनामे के कई रोचक पड़ाव मिलेंगे। भारत में सिनेमा और सामाजिक-सांस्कृतिक साझे की जब भी बात होगी तो बिमल राय का जिक्र जरूर होगा। वे एक ऐसे फिल्मकार रहे जिन्होंने हिंदुस्तानी सिनेमा के साथ हॉलीवुड तक को भी प्रेरित-प्रभावित किया। दूरदर्शिता देखिए इस फिलम्कार की कि वे रवींद्रनाथ ठाकुर के ‘जन गण मन’ के राष्ट्रीय गान बनने से पहले इसे 1945 में आई अपनी फिल्म ‘हमराही’ में पेश कर चुके थे। उनके फिल्मी सफरनामे को देखें तो इसमें 1953 का साल अहम है। इस साल आई  फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ ने दुनियाभर के फिल्मकारों का ध्यान अपनी ओर खींचा था। बिमल दा के निर्देशन में बनी इस फिल्म से भारत में सार्थक, रचनात्मक और प्रगतिशील सिनेमा का न सिर्फ सघन दौर शुरू हुआ बल्कि फिल्म निर्माण की ऐसी संस्कृति विकसित हुई जिसमें सिनेमा, साहित्य और समाज तीनों एक-दूसरे के सर्वाधिक करीब आए। 

गौरतलब है कि दूसरे विश्वयुद्ध में फासीवाद ने इटली के समाज की परतें उधेड़ कर रख दी थीं। मुसोलिनी के खौफ से जहां अन्य फिल्मकार सब हरा-हरा ही दिखा रहे थे तो रॉबर्ट रोसेलिनी, वित्तोरियो डी सिका और विस्कोंती जैसे कुछ फिल्मकार भी थे जो समाज में उपजे वर्ग संघर्ष को दिखा रहे थे। सिनेमा और नव-यथार्थवाद की कहानी यहीं से शुरू होती है। शोषित और शासक के बीच के द्वंद्व को संवेदना के तमाम स्तरों पर स्पर्श करने वाली नव-यर्थाथवादी फिल्मों का भारतीय संदर्भ बिमल दा के नाम के साथ शुरू होता है। भारतीय संदर्भ में इस संघर्ष को सबसे पहले दिखाती उनकी फिल्म ‘उदेर पाथेय’(1944) ने बांग्ला सिनेमा में तूफान ला दिया था। 12 जुलाई, 1909 को ढाका में जन्मे बिमल राय की फिल्मी पारी बतौर फोटोग्राफर शुरू हुई थी। अपने शुरुआती संघर्ष वाले दिनों में 1935 में प्रदर्शित प्रथमेश चंद्र बरुआ की ‘देवदास’ और 1937 में आई फिल्म ‘मुक्ति’ के लिए फोटोग्राफी का जिम्मा बिमल दा ने ही संभाला था। वैसे ये उनके सिनेमा के सपने सजाने की शुरुआत भर थी। 1944 तक आते-आते कैमरे से कलाकारी करने वाले बिमल दा ‘लाइट, कैमरा और एक्शन’ बोलने को तैयार थे। फिल्मकार के तौर पर उन्होंने अपनी पहली बांग्ला फिल्म बनाई ‘उदेर पाथेय’, जिसकी चर्चा हम पहले कर चुके हैं।

1942 में बॉम्बे टॉकीज के लिए उन्होंने ‘मां’ जैसी कामयाब फिल्म बनाई लेकिन उनकी असल पहचान बनकर पर्दे पर उतरी ‘दो बीघा जमीन’। इस फिल्म ने बिमल दा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान दी। समाजवाद से प्रेरित और सिनेमा के सर्वहारा की आवाज उठाने वाले बिमल दा पर व्यावसायिक फिल्में बनाने का जबरदस्त दबाव रहा। पर यह उनका ही कमाल था कि बॉक्स ऑफिस की जरूरत को ध्यान में रखते हुए भी वे अपने मनपसंद विषयों पर फिल्म बना लेते थे। ‘नौकरी’और ‘मधुमती’ इसी का नतीजा थीं।  आगे उन्होंने आगा हश्र कश्मीरी की कहानी ‘यहूदी की लड़की’ से प्रेरित होकर ‘यहूदी’ बनाई। जात-पात व छूत-अछूत के मुद्दे पर ‘सुजाता’ हो या लोकतंत्र पर व्यंग्य करती ‘परख’ या फिर स्त्री केंद्रित विषय पर बनी ‘बंदिनी’, ये सारी फिल्में उनकी रचनात्मक विविधता को साधने के कौशल को जाहिर करती हैं। बिमल दा ने सलिल चौधरी, ऋषिकेश मुखर्जी, ऋत्विक घटक, कमल बोस, नबेंदु घोष और गुलजार जैसे हीरे हिंदी सिनेमा को दिए। उनका फिल्मी सफर भारतीय सिनेमा के तारीखी सुलेख की तरह आज भी देखा-पढ़ा जाता  है। 

जन्म : 12 जुलाई, 1909

निधन : 08 जनवरी, 1966

शुक्रवार, 28 जुलाई 2023

एनइपी से संस्कृति और सफलता दोनों से जुड़ रहे हैं छात्र : शोभा


गाजियाबाद, 28 जुलाई। नई शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 ने छात्रों को मातृभाषा के साथ अपनी संस्कृति और संस्कारों के साथ गहरे तौर पर जोड़ा है। साथ ही इससे वैश्विक स्तर पर छात्रों को बड़ी सफलता भी मिल रही है। ये बातें केंद्रीय विद्यालय क्रमांक-1, वायुसेना स्थल, हिंडन में नई शिक्षा नीति 2020 के क्रियान्वयन की तीसरी वर्षगांठ पर आयोजित कार्यक्रम में विद्यालय की प्राचार्या शोभा शर्मा ने कहीं। उन्होंने कहा कि एनइपी 2020 से छात्रों की रचनात्मकता का विकास हुआ है। छात्र अब अध्ययन के साथ कौशल विकास और अपनी रचनात्मक अभिरुचियों में उत्साह के साथ हिस्सा ले रहे हैं। 

इस कार्यक्रम में डीएवी स्कूल के प्राचार्य मनोज ठाकुर और डीआईओएस रुचि ने भी हिस्सा लिया। इस मौके पर कई शिक्षाविदों और शिक्षकों की उपस्थिति में छात्रों ने एनइपी को लेकर अपने अनुभव सुनाए। इस अवसर पर शोभा शर्मा ने कहा कि नई शिक्षा नीति ने भारत में शिक्षा प्रणाली की गुणवत्ता को नई ऊंचाई दी है। इसमें तकनीकी शिक्षा पर बल देने के साथ-साथ भारत की सांस्कृतिक विरासत और धरोहर से बच्चों को जोड़ने की बात की गई है। उन्होंने नई शिक्षा नीति से बच्चों में रचनात्मकता के विकास को एक बड़ी उपलब्धि बताया। 


केंद्रीय विद्यालय क्रमांक-1, वायु सेना स्थल हिंडन की प्राचार्या ने कहा कि उनका विद्यालय एनइपी से जुड़े मानदंडों और सुझावों को अपने शिक्षण से मौलिक तौर पर जोड़ने में अग्रणी रहा है। इस कारण विद्यालय के छात्रों और शिक्षकों की राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तरों पर प्रशस्ति भी हुई है। 

मुख्य अतिथि के रूप में कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मनोज ठाकुर ने बताया कि एनइपी में रटने के बजाय अनुभवात्मक शिक्षा पर बल दिया गया है, जो विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी है। कार्यक्रम की विशिष्ट अतिथि श्रीमती रुचि ने कहा कि उत्तर प्रदेश के सरकारी विद्यालयों में राष्ट्रीय शिक्षा नीति का अनुपालन के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि ‘निपुण’ जैसे कार्यक्रमों को प्रदेश में विधिवत रूप से संचालित किया जा रहा है। 

इस अवसर पर उपस्थित मीडियाकर्मियों ने छात्रों और शिक्षकों के साथ बातचीत और परिसर का भ्रमण कर एनइपी के क्रियान्वयन से जुड़े विविध कार्यों और गतिविधियों को देखा। सबने विद्यालय के शिक्षण और उससे जुड़े क्रियाकलाप की सराहना की

सोमवार, 16 जनवरी 2023

 जाना हिंदी के एक और मैनेजर का

- प्रेम प्रकाश

आपातकाल का अंधेरा तब थोड़ा दूर था, पर नेहरू युग जरूर किताब के पन्नों में प्रगतिशील आलोचकीय निकष पर आ चुका था। अगर नहीं थकी और झुकी थी तो हिंदी पत्रकारिता की वह असाधारण कलम, जिसने आजादी के आंदोलन के दौरान हासिल यशस्विता को इस दौरान भी विचार और लोकतंत्र की हिमायत में बहाल रखा। श्री कृष्ण किशोर पांडेय जी अब हमारे बीच नहीं रहे। हिंदी के घर-परिवार और संस्कार के बीच प्रखर आलोचक मैनेजर पांडेय के बाद शोक की यह दूसरी बड़ी खबर है। यह खबर और इससे जुड़ा संयोग और इस विदाई का पूरा समकाल नई चिंताओं और सवालों को जन्म देता है। यह हिंदी विमर्श और अभिव्यक्ति के एक और मैनेजर का जाना है, सर्द थपेड़ों के बीच एक और अलाव का ठंडा पड़ना है।

स्वर्णीय केके पांडेय का जीवन एक ऐसे प्रतिबद्ध हिंदी पत्रकार का सफरनामा है, जो 1968 से 2005 तक भरपूर सक्रियता के साथ अखबार के उस कक्ष को प्रतिष्ठा देता रहा, जिसे संपादकीय कक्ष कहा जाता है। मेरे जैसे पत्रकार के लिए उनकी स्मृति को नमन ऐसे विशाल वटवृक्ष के नीचे खड़ा होना है, जहां प्रशांत ऊर्जा की शालीन अनुभूति एक अक्षर मनोदशा को रचती है। उनके निधन पर सोशल मीडिया पर जिस तरह के संस्मरण लिखे जा रहे हैं, उन्हें लोग जिस लगाव और कचोट के साथ याद कर रहे हैं, वे ये जाहिर करते हैं कि पत्रकारिता की कम से कम दो पीढ़ी उनसे गहरे तौर पर जुड़ी रही। यह जुड़ाव पत्रकारिता के बदलते दौर में छपे शब्दों की अस्मिता को बहाल रखने के प्रशिक्षण के साथ हिंदी की अभिव्यक्ति और उसके सामर्थ्य को नए समकाल में ढालने की ईमानदार कोशिश थी।

गौरतलब है कि श्री कृष्ण किशोर पांडेय जब ‘हिंदुस्तान’ जैसे शीर्षस्थ अखबार के संपादकीय पृष्ठ को विचार और विमर्श के केंद्र में ला रहे थे, तब हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता पूरे लय में थी तो साथ ही खोजी पत्रकारिता की जमीन तेजी से पक रही थी। पत्र-पत्रिकाओं पर ताले झूलने का शोक तब किसी आशंका के गर्भ में भी नहीं था। हां, कई दूरद्रष्टा जरूर काल के क्षितिज पर छाते धुंधलके की बात कहने लगे थे। यह दौर अपने पूरे विस्तार में कुलदीप नैयर, बीजी वर्गीज, राजेंद्र माथुर, कमलेश्वर, धर्मवीर भारती, प्रभाष जोशी और सुरेंद्र प्रताप सिंह जैसी शख्सियतों की पत्रकारिता की लाजवाब पारी का साक्षी रहा।

इस दौरान दूरदर्शन ने जहां आंखें खोलीं, एशियाड दूसरी बार भारत लौटा, वहीं आगे चलकर श्रीमति इंदिरा गांधी के करिश्माई दौर का पटाक्षेप भारतीय राजनीति का सबसे दिलचस्प घटनाक्रम साबित हुआ। इतने सारे बदलावों और आगाजों के बीच कलम उठाना और अखबारी विमर्श का कंपास स्थिर करना आसान नहीं था। भाषाई संस्कार और हिंदी की अपनी धज और परंपरा के मुताबिक यह चुनौती कितनी बड़ी होगी, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हिंदी सिनेमा का महानायक तब तक ‘पुष्पा के आंसू’ पर शोकाकुल होने के बजाय जमाने की नाइंसाफियों के खिलाफ सुलगते लावे की तरह एंग्री यंग मैन बन चुका था। बदलाव का दूसरा सिरा साहित्य को छू रहा था। हिंदी की किस्सागोई नई कहानी और कविताई नई कविता की शिनाख्त के साथ अपने होने को नई प्रतिबद्धता के सांचे में ढाल रही थी, नई चुनौतियों के बीच संवेदनशील सरोकारों को रच रही थी। कुल मिलाकर रचनात्मकता की दुनिया की हलचल हिंदी को नए प्रस्थान की ओर ले जा रही थी।

जिन लोगों ने भी उन्नत गौर ललाट और तिलकित भाल से सुशोभित पांडेय जी के साथ काम किया, उनके लिखने-पढ़ने की समझ और शैली को नजदीक से देखते-समझते रहे, वे ये बताते हैं कि उन्होंने भारतीय समाज और राजनीति के उत्तरायण और दक्षिणायन के बजाय उसके मध्याह्न को ज्यादा अहम माना। इसलिए विचार के तीखे कोणों के बजाए उन्होंने विमर्श और विरासत की दोमट मिट्टी पर अक्षर फूल खिलाए, नए समकोण खड़े किए।

इस अक्षर वाटिका की बड़ी बात यह रही कि इसमें नए चटख रंग और तासीर के फूलों ने हिंदी और हिंदुस्तान दोनों को एक साथ महकाया। नए कलम उठाने वालों ने लिखने के जोखिम और दायित्व को समझा। और इस तरह तैयार हुई नए लेखकों और पत्रकारों की एक पूरी खेंप। यह वह खेंप है जो भाषा से खिलवाड़, दो-तीन जीबी डेटा और अफवाह के दोस्ताने के बीच लिखने की मर्यादा को बचाए रखने के लिए अंतिम लश्कर के तौर पर आज भी कार्य कर रही है। 

इसके बाद हिंदी की बिंदी और मान को बचाए रखने के लिए न तो कोई लश्कर बचेगा और न ही बचेगा कोई संघर्ष। केके पांडेय की स्मृति और प्रेरणा को नमन के साथ यह बड़ा संकट बिल्कुल सामने दिख रहा है। बड़ी बात होगी कि इस संकट और अंधकार के बीच कहीं से एक नया कृष्ण किशोर होने की संभावना प्रकट हो। यह संभावना और इसके लिए बची-खुची उम्मीद हिंदी के पुराने कंगूरों और नए चबूतरों पर दीयों के बलने की अंतिम उम्मीद है। यह उम्मीद फलीभूत हो और इससे जुड़ा बोध चिरायु हो, ऐसी कामना है।

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2022

गजल और जल


- प्रेम प्रकाश

गरज बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला, निदा फाजली की इस गजल को कई गायकों ने गाया है। पर किसी ने भी इसे चढ़े स्वर में नहीं गाया। सबने इसे प्रार्थना की तरह गाया, अजान की तरह तान भरी। दिलचस्प है कि कोस-कोस पर पानी और बोली का फर्क भांपने वाले देश में पानी कभी ऐसा मसला नहीं रहा, जिसकी चर्चा अलग से हो या उसे लेकर खूब सिर धुना जाए। पानी का जिक्र करते हुए हर तरह की तल्खी से बचने वाले भारतीय समाज के लिए जल हमेशा से एक सांस्कृतिक मसला रहा है। अच्छी बात यह है कि समाज और परंपरा के हिस्से लंबे समय से दर्ज यह समझ अब सरकारों के भी काम आ रही है। भारत जैसे देश में स्वच्छता और पानी का मुद्दा आज योजना से आगे मिशन की शक्ल ले रहा है तो इसलिए कि विकास की नीति और पहल हर लिहाज से समावेशी और संवेदनशील होने की दरकार से लैस हो, इस समझ पर खरा होने की चुनौती लगातार महसूस की जा रही है। यह भी कि खासतौर पर हवा और पानी के मुद्दे अब हमारे रोज के जीवन का हिस्सा हैं। सेंसेक्स का ऊपर या नीचे जाना हमें उतना नहीं प्रभावित करता जितना हवा-पानी की शुद्धता और उपलब्धता से जुड़े सूचकांक। अकेले पानी की बात करें तो हम दो मुल्कों की चर्चा के साथ पिछले तीन दशक में इस मुद्दे को देखने-समझने की दृष्टि में आए फर्क को ज्यादा बेहतर तरीके से समझ सकते हैं। पानी को मुद्दा या मसला से आगे मिशन तक पहुंचने के सफरनामे के एक छोर पर खड़ा है सिंगापुर तो दूसरी छोर पर भारत। एक खासा छोटा देश और दूसरा बड़ी आबादी और भौगोलिक विविधता वाला मुल्क।     

बात पहले सिंगापुर की, फिर भारत की। दुनियाभर में सैर-सपाटे के लिए सबसे पसंदीदा ठिकाने और ‘बिजनेस डेस्टिनेशन’ के रूप में सिंगापुर का नाम पूरी दुनिया में है। तीन दशक पहले जब पूरी दुनिया में ‘डिजिटिलाइजेशन’ का जोर बढ़ा तो दुनिया भर की कंपनियों ने अपने उत्पाद को यहीं से पूरी दुनिया में भेजना और प्रचारित करना सबसे बेहतर माना। पर जैसा कि आज वहां के युवाओं को भी लगता है कि सिंगापुर की एक दूसरी पहचान भी है, जो ज्यादा प्रेरक है, ज्यादा मौजू है। एक ऐसे दौर में जब जल प्रबंधन को लेकर पूरी दुनिया में तमाम तरह के उपायों की बात हो रही हैं उसमें सिंगापुर की चर्चा खासतौर पर होती है। विश्व में जल प्रबंधन के जितने भी मॉडल हैं, उसमें सिंगापुर का मॉडल अव्वल माना जाता है। आने वाले चार दशकों के लिए आज सिंगापुर के पास पानी के प्रबंधन को लेकर ऐसा ब्लूप्रिंट है, जिसमें जल संरक्षण से जल शोधन तक पानी की किफायत और उसके बचाव को लेकर तमाम उपाय शामिल हैं। सिंगापुर की खास बात यह भी है कि उसका जल प्रबंधन शहरी क्षेत्रों के लिए खास तौर पर मुफीद है। ग्रामीण आबादी वाले इलाकों में सिंगापुर का मॉडल शायद ही ज्यादा कारगर हो।  

बहरहाल, सिंगापुर के सामने लंबे समय तक यह सवाल रहा कि एक शहर-राष्ट्र जिसके पास न तो कोई प्राकृतिक जल इकाई है, न ही पर्याप्त भूजल भंडार है, जिसके पास इतनी भूमि भी नहीं कि वह बरसात के पानी का भंडारण कर सके, आखिर वह अपनी 50 लाख से ऊपर की आबादी की प्यास को कैसे बुझाए। दक्षिण पूर्वी एशियाई देश सिंगापुर का जोहार नदी (अब मलेशिया का हिस्सा) से जुड़ा 50 वर्ष पुराना अनुबंध समाप्त हो चुका है। गौरतलब है कि सिंगापुर अपनी कुल जल आपूर्ति का 40 फीसद पड़ोसी देश मलेशिया से आयात करता है। आयातित पानी का मूल्य बहुत ही कम है, क्योंकि मलेशिया ने पिछले पांच दशकों में पानी के दाम ही नहीं बढ़ाए। 

इस बीच, सिंगापुर की राष्ट्रीय जल एजंसी ‘पब्लिक यूटिलिटी बोर्ड’ (पीयूबी) 2060 तक पानी की मांग की स्वयं पूर्ति कर पाने के लिए चौबीसों घंटे कार्य कर रही है। इसका लक्ष्य है कि वह सिंगापुर की मलेशिया पर पानी की निर्भरता को सिर्फ कम ही न करे, बल्कि उसे समाप्त भी कर दे। इसके लिए उसने जल प्राप्ति की तीन पद्धतियों पर कार्य करने का निश्चय किया है। ये हैं- गंदे पानी का पुन: शुद्धिकरण, समुद्री जल का खारापन कम करना और वर्षा जल का अधिकतम संग्रहण। 

सिंगापुर से भारत सीख तो सकता है पर इस देश की आबादी और भूगोल ज्यादा मिश्रित और व्यापक है। फिर हमारे यहां पानी के अभाव से ज्यादा बड़ा सवाल उसके संग्रहण और वितरण का है। किसी भी क्षेत्र में पानी की उपलब्धता का यह कतई मतलब नहीं कि आसापास के घरों में भी पानी पहुंच रहा हो। लिहाजा पानी को लेकर भारतीय दरकार और सरोकार सिंगापुर से खासे भिन्न हैं। अलबत्ता इसे भारतीय राजनीति में प्रकट हुए साकारात्मक बदलाव के साथ सरकारी स्तर पर आई नई योजनागत समझ भी कह सकते हैं कि अब स्वच्छता और घर-घर नल से जल की पहुंच जैसा मुद्दा साल के एक या दो दिनों नारों-पोस्टरों में जाहिर होने वाली कामना और सद्भावना से आगे सरकार की घोषित प्राथमिकता है। 

इस संदर्भ में आगे चर्चा से पहले यह देखना-समझना भी जरूरी है कि आधुनिक भारत की गाथा हमें स्वाधीनता बाद के 75 सालों की यात्रा नहीं कराती बल्कि यह हमें उस दौर में ले जाती है जब देश में स्वाधीनता की ललक के साथ वह ‘नवजागरण’ भी अंगड़ाई ले रहा था, जो जीवन और प्रकृति के प्रति समझ और आचरण का एक जिम्मेदार और प्रतिबद्ध मानस रच रहा था। नवजागरण का यह मानस आज भी हमारी पंरपराओं और प्रेरणाओं में जीवंत है। इसे बुद्धिमानी ही कहेंगे कि 2014 में लाल किले से तिरंगा फहराते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महात्मा गांधी का स्मरण किया और स्वच्छता के मुद्दे को सरकार और समाज दोनों के एजंडे में शामिल कराने में बड़ी कामयाबी हासिल की। यह देश में राजनीति के उस बदले आधार और सूचकांक का भी संकेत था, जिसमें आगे यह साफ-साफ तय हुआ कि सुशासन का मुद्दा महज सरकारी दफ्तरों में फाइलों के तेजी से आगे बढ़ने और योजनागत खर्चों में शून्य की गिनती बढ़ते जाने का नाम भर नहीं है। स्वच्छता के बाद जिस तरह पानी के मुद्दे को 2019 में भारत सरकार जल जीवन मिशन के तौर पर लेकर सामने आई, वह यह दिखाता है विकास का रंग हरा या धूसर के साथ साथ नीला भी होना चाहिए। 

सिंगापुर का जिक्र हम पहले कर चुके हैं। खासतौर पर पानी के मुद्दे को वहां जिस तरह बेहतर संग्रहण और वितरण के साथ तय किया गया, उससे यह भी जाहिर हुआ कि बाजार और विकास से उत्तर-आधुनिक दरकारों पर खरा उतरने के लिए हवा-पानी जैसे मुद्दे पर एक दीर्घकालिक समझ और नीति के साथ सामने आना होगा। बीसवीं सदी के आखिरी दशक से शुरू हुआ वैश्वीकरण का जोर भारत में भी पहले गुरुग्राम, नोएडा, बंगलुरु और हैदराबाद जैसे नए-पुराने शहरों में बिजनस हब के निर्माण और वैश्विक कारोबारी मॉडल के तौर पर सामने आया। पर यह सिलसिला लंबा नहीं चला। एक तरफ शहर और गांव की दूरी बढ़ी, वहीं लोकतांत्रिक आकांक्षा के तहत देश के ग्रामीण इलाके से यह आवाज उठनी शुरू हुई कि उन्हें पहले तो विकास के बुनियादी सरोकारों के साथ जोड़ा जाए ताकि तालीम और रोजगार के क्षेत्र में उभर रही नई संभावनाओं का वे भी बराबरी के साथ हिस्सा बन सकें। इस लिहाज से जल जीवन मिशन के मकसद और उससे जुड़ी चुनौतियों की चर्चा इसलिए जरूरी है क्योंकि यह दिखाता है कि शासन और राजनीति के सूर्य को आज हम उत्तरायण और दक्षिणायन बताकर अपनी सियासी समझ पर चाहे जितना इतरा लें, हम उस सच्चाई और बदलाव को समझने से दूर रहेंगे जिसने इस दौरान तारीखी इबारत लिखी है। इस मिशन के तहत 15 अगस्त 2019 से 19 अप्रैल 2022 तक अगर देश के ग्रामीण इलाकों में लगभग साढ़े नौ करोड़ पानी के नए कनेक्शन दिए गए हैं, राज्य सरकारों के बीच 2024 से पहले सफलता के शत-फीसद  लक्ष्य को हासिल करने को लेकर एक स्वस्थ होड़ छिड़ी है, तो यह देश में राजनीति और शासन का भी वह बदला चेहरा है, जिसे देखने के लिए नए और धुले चश्मे की दरकार है। दलगत राजनीति और धर्म-संप्रदाय को देखने-पहचानने में माहिरों को अगर यह बदलाव नहीं दिख रहा तो यह बदलती दुनिया के साथ बदलते भारत को देखने का एक तंग नजरिया ही कहलाएगा। वह दिन दूर नहीं जब भारत के नक्शे में बच्चे जब रंग भरें तो वे हरित भारत की पारंपरिक छवि के साथ स्वच्छ-सजल भारत के सपने को साकार होते देख नीले रंग का भी खुशी-खुशी इस्तेमाल करें।


बुधवार, 20 फ़रवरी 2019

हिंदी की नामवरी ठाठ

अक्षर स्मृति
डॉ. नामवर सिंह (1927-2019)

- प्रेम प्रकाश
एक ऐसे दौर में जब किसी भी तरह के विमर्श और प्रतिरोध को नासमझ वाचालता और असभ्य प्रतिक्रियाओं का फौरी आखेट चुनौती दे रहा है, हिंदी के आलोचकीय विवेक को लोकिप्रियता और स्वीकृति के सबसे ऊंचे आसन तक ले जाने वाले नामवर सिंह का न होना महज एक खबर नहीं है। दरअसल, स्वाधीन भारत की हिंदी चेतना को लोक और परंपरा के साझे के साथ समझने की चुनौती बड़ी रही है। इस बड़ी चुनौती का महत्व आज की तारीख में तब ज्यादा समझा सकता है, जब भाषा, कला और संस्कृति के पूरे विवेक को ही आवारा पूंजी की ताकत गौरजरूरी करार देने पर तुली है। इस चुनौती को स्वीकार करते हुए हिंदी साहित्य के रचनात्मक विकास के साथ इस भाषा से जुड़ी संपूर्ण सांस्कृतिक निर्मिति को नामवर जी ने जो आलोचकीय धार दी, वह अद्वीतीय है। 
नामवर सिंह का जन्म 1927 में हुआ था। उनकी तरुणाई और देश की स्वाधीनता को अगर एक साथ देखें तो उस स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है, जब देश के साथ एक प्रखर युवा मन अपनी भाषा, संस्कृति और इतिहास की गोद में अपनी नई शिनाख्त की छटपटाहट से जूझ रहा होगा। गौरतलब है कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ 1929 में लिख चुके थे। यानी देश की स्वाधीनता के साथ देश की सबसे प्रमुख भाषा के साहित्य और इतिहास का आलोचकीय निकष गढ़ा जा चुका था। यही नहीं ‘लोकमंगल’ और ‘परंपरा’ जैसे बीज शब्दों के साथ हिंदी रचनात्मकता को देखने-परखने के उपकरण सामने आ चुके थे। आगे अगर कोई चुनौती थी तो इन आलोचकीय उपकरणों के साथ हिंदी की रचनात्मक अस्मिता को और गहरे पहचानने की, उसे नए संदर्भों और नए मुहावरों से लैस करने की।
बड़ी बात यह भी है कि रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी और रामविलास शर्मा के यहां हिंदी साहित्य की जो आलोचना भक्तिकाल, छायावाद और राष्ट्रीय भावधारा तक आते-आते ठहर जाती है। जाहिर है कि आजादी के बाद के भारतीय समाज के विरोधाभासी यथार्थों के बीच रचे गए नए साहित्य को लेकर आलोचकीय समझ बनाने की चुनौती बड़ी थी। नामवर जी अपने जिन आलोचकीय प्रतिमानों के कारण लोकिप्रय रहे और हिंदी आलोचना के शिखर आलोचक होने तक की स्वीकृति अपने जीते-जी पा गए, उन प्रतिमानों का एक सिरा अगर लोक और परंपरा के मस्तूलों से बंधा है, तो वहीं उसमें समाकालीन जीवन संदर्भों के बीच प्रगतिशील संवेदनात्मक तत्वों को पहचाने का आलोचकीय विवेक भी है।   
हिंदी साहित्य के साथ पूरे हिंदी समाज के लिए यह वाकई बड़े शोक की घड़ी है। हमारे दौर के महत्वपूर्ण कवियों में शामिल मंगलेश डबराल ने कहा भी कि यह हिंदी के प्रतिमानों की विदाई का त्रासद समय है। सोलह महीनों के छोटे से अंतराल में कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह, विष्णु खरे, कृष्णा सोबती और अब नामवर सिंह के निधन से जो जगहें खाली हुई हैं वे हमेशा खाली ही रहेंगी।
बनारसे के एक छोटे से गांव जायतपुर में जन्मे नामवर सिंह की चर्चा के साथ दो बातें हमेशा जुड़ी रहेंगी। एक तो उनकी भाषा से लेकर पूरे व्यक्तित्व को अपने गहन में लेनेवाला बनारसीपन और दूसरा अपने गुरु आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी से मिली आलोचकीय सीख को अमिट और अपराजेय बनाए रखने की उनकी जीवट जद्दोजहद। उनके व्यक्तित्व के ये दोनों रंग खासे ठेठ हैं। यहां तक कि नामवर जी खुद अपने जीवन संघर्षों के बीच भी इस ठेठ ठसक के साथ ही जीवट बने रहे।
आज पूरे देश में विश्वविद्यालयों में हिंदी विभागों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। नामवर सिंह को भुलाया इसिलए भी नहीं जा सकता क्योंकि उन्होंने स्वाधीन भारत में हिंदी आलोचना और विमर्श के केंद्र में विश्वविद्यालयों को लाने की दरकार को सबसे पहले समझा था। नए दौर में उच्च शिक्षा केंद्रों में हिंदी को प्रतिष्ठा दिलाए बगैर हिंदी ज्ञान परंपरा का विकास असंभव है, वे इस बात को समझते थे। देश के सबसे प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विश्विविद्यालय में अपनी अगुआई में भारतीय भाषा केंद्र की स्थापना कराने और फिर उसे आकादमिक स्वीकृति दिलाने में उनका अध्यापकीय योगदान ऐतिहासिक है।
‘नई कविता’ और ‘नई कहानी’ को लेकर हिंदी आलोचना का जो नया प्रतिमान लेकर नामवर सिंह लेकर आए, वह नए भारतीय समाज और संस्कार के लिए भी एक मार्गदर्शक सिद्धांत की तरह है। यह सिद्धांत हमें लगातार इस बात के लिए आगाह करता रहेगा कि लोक, परंपरा और आधुनिकता हमारी संस्कृति के आलग-आलग टापू नहीं बल्कि एक ऐसी साझी विरासत हैं, जिसमें से एक का भी अलगाव हमें भाषा, समाज और संस्कृति के मजबूत साझेपन से अलग-थलग कर देगा। यह भी कि बात सैद्धांतिक प्रतिबद्धता की हो कि सामाजिक सुधार के आंदोलनात्मक तकाजों की, इनके लिए हमें कहीं और ताकने-निहारने की जरूरत नहीं बल्कि इनके बीज संस्कार हमारी परंपराओं में पहले से हैं।
आज जब नामवर जी हमारे बीच नहीं हैं, तो जो एक बात हमें सबसे ज्यादा सालेगी वह यह कि भाषा को सारस्वत रूप से धन्य करने वाली ऐसी नामवरी प्रतिभा अब हमारे बीच नहीं होगी, जिसने विमर्श और आलोचना को लेखन और पठन-पाठन के साथ वाचिक रूप से लगातार सशक्त बनाए रखा, उसे लगातार नई धार और तेवर देता रहा। 
‘छायावाद’, ‘इतिहास और आलोचना’, ‘दूसरी परंपरा की खोज’, ‘कविता के नए प्रतिमान’, ‘कहानी नई कहानी’ जैसे लोकप्रिय पुस्तकों के लेखक के साथ हमारे समय में हिंदी की अस्मिता को गरिमा और स्वीकृति की सबसे समादृत पहचान को खोना, हिंदी भाषा से आगे पूरी हिंदी संस्कृति के लिए एक बड़ा आघात है। यह आघात इसलिए भी बड़ा है क्योंकि हमारे दौर का लोकतांत्रिक सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्श आज गहरे संकट में है। संकट की इस घड़ी में नामवर जी के लिखे-कहे की ताकत हमारी चेतना और विवेक के हौसले को हारने नहीं देगी, इस उम्मीद के साथ डॉ. नामवर सिंह को असंख्य हिंदी जनों का साझा नमन।

शनिवार, 26 जनवरी 2019

जिद्दी प्रतिरोध की अक्षर दुनिया


- प्रेम प्रकाश

भारत में महिला लेखन के जरिए स्त्री संघर्ष, चेतना और अस्मिता की जो अक्षर दुनिया पिछले कुछ दशकों में आबाद हुई है, उस दुनिया में रचनात्मक हस्तक्षेप की जो सबसे बड़ी धुरी है, उसे चिन्हित करने में कृष्णा सोबती का बड़ा योगदान रहा है। कृष्णा जी ने महिलावादी आंदोलन की वैश्विकता के बीच स्त्री, समाज और परंपरा को अपने तरीके से एक सीध में रखकर देखा। 1950 में कहानी ‘लामा’ से साहित्यिक सफर शुरू करने वाली इस महान लेखिका ने महिला पक्ष के साथ अपने समय के हस्तक्षेप को भी काफी निर्भीक तरीके से लिखा और बोला। इसलिए उनके लेखन और जीवन की रचनात्मक चौहद्दी को बांधना आसान नहीं है।

उनके लेखन में अगर किसी पहाड़ी नदी की तरह आधी दुनिया की हहराती संवेदना है तो समय और समाज की उस चिंता से भी वह हरसंभव मुठभेड़ करती हैं, जिसके लिए कलम को सीधे-सीधे आंदोलन और प्रतिरोध का हथियार बनना पड़ता है।

यह नहीं कि आज जब कृष्णा सोबती हमारे बीच नहीं हैं, तो उनके लेखन और जीवन को लेकर हम भावनात्मक रूप से अतिरिक्त रूप से विवश या सम्मोहन का शिकार हुए जा रहे हैं, बल्कि यह तो उनके जीते-जी ही हो गया था कि समकालीन भारतीय साहित्य की कोई भी कतार बगैर उनके नाम के पूरी नहीं होती है। उनकी नाक पर चढ़े बड़े ऐनक में हम सब अपनी दुनिया को आलोचकीय विवेक के साथ देखने-समझने के आदी बहुत पहले हो गए हैं।

उनकी स्मृति को प्रणाम करते हुए हम अगर उस दौर की स्थितियों को देखें-समझें, जब वो अपनी स्वीकृति और उभार के लिए संघर्ष कर रही थीं तो साफ दिखता है कि नई कहानी आंदोलन के भीष्म साहनी और कमलेश्वर से लेकर राजेंद्र यादव जैसे नामवर सितारों के बीच एक लेखिका कैसे अपने जिद्दी महिला किरदारों के साथ कथा और जीवन का एक नया साझा रचने का जोखिम उठाती है। हिंदी संवेदना की अक्षर दुनिया में यह एक बड़ा मोड़ ही नहीं, एक साहसी हस्तक्षेप भी था। मृदुला गर्ग से लेकर ममता कालिया, नासिरा शर्मा और उनके बाद की कथाकारों तक यह दुनिया अगर लागातार आबाद और सघन होती चली गई तो इसलिए क्योंकि इस विस्तार को कृष्णा जी पाठकों के बीच बड़ी स्वीकृति दिला चुकी थीं। हिंदी आलोचना ने इस रचनात्मक स्वीकृति के दमखम को भले देर-सबेर पहचाना हो पर स्त्री विमर्श का समकालीन सर्ग आज अगर एक बड़ी आलोचकीय दरकार का नाम है तो इसलिए क्योंकि इसने जीवन और लेखन के पुरुषवादी मिथ को निणार्यक रूप से तोड़ दिया है।

कृष्णा जी को पिछले साल ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा गया था। इससे पहले उपन्यास ‘जिंदगीनामा’ के लिए उन्हें वर्ष 1980 का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। उन्हें 1996 में अकादमी के उच्चतम सम्मान साहित्य अकादमी फेलोशिप से भी नवाजा गया था। इसके अलावा पद्मभूषण, व्यास सम्मान, शलाका सम्मान जैसे अलंकरण उनकी यशस्विता को बढ़ाते हैं। उन्होंने अपने लेखन से हिंदी की कम से कम दो पीढ़ियों को रचनात्मक संवेदना से जोड़ा है। उनके कालजयी उपन्यासों में ‘सूरजमुखी अंधेरे के’, ‘दिलोदानिश’, ‘जिंदगीनामा’, ‘ऐ लड़की’, ‘समय सरगम’, ‘मित्रो मरजानी’, ‘जैनी मेहरबान सिंह’, ‘हम हशमत’, ‘बादलों के घेरे’ ने कथा साहित्य को अप्रतिम ताजगी और स्फूर्ति प्रदान की है।

उनकी रचनात्मक सक्रियता के आखिरी दिनों में आई ‘बुद्ध का कमंडल लद्दाख’ और ‘गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान’ जैसी पुस्तकें ये दिखाती हैं कि वह मौजूदा देशकाल और परिस्थिति को देखते-समझते हुए किस तरह अपने रचनात्मक शिल्प और कथ्य को लगातार विचार और लोकतंत्र की हिफाजत के औजार के तौर पर मांज रही थीं।

18 फरवरी 1924 को गुजरात (वर्तमान पाकिस्तान) में जन्मीं कृष्णा सोबती हमेशा साहसपूर्ण रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए जानी जाती रहेंगी। निजी जिंदगी से लेकर अपने शब्दों की दुनिया को वे लगातार इस काबिल बनाए रखने में सफल रहीं, जिस कारण उनके प्रति सम्मान रखने वालों का समाज हर तरह के इकहरेपन का अतिक्रमण करता है। दिलचस्प है कि यह अतिक्रमण खुद उनके जीवन और लेखन का भी हिस्सा रहा है। 94 साल का जीवन जिस दुनिया में उन्होंने जिया, उसमें जब-जब कोई महिला आजादख्याली की बात करेगी, जब-जब लेखकों-बौद्धिकों की जमात अभिव्यक्ति की निर्भीक आजादी की बात करेगी, तब-तब उनकी स्मृति हमें रचनात्मक ऊर्जा से समृद्ध करती रहेगी।

शनिवार, 14 अप्रैल 2018

बापू तो रहे याद भूल गए बा को!

- प्रेम प्रकाश


बा के  बारे में खुद बापू ने स्वीकार भी किया है कि उनमें दृढ़ता और निर्भीकता उनसे भी ज्यादा थी। बा की पहचान सिर्फ यही नहीं थी कि वे बापू की जीवन संगिनी रहीं। वह एक दृढ़ आत्मशक्ति वाली महिला थीं और गांधीजी की प्रेरणा भी

दो अक्टूबर 2019 को महात्मा गांधी की 150वीं जयंती को लेकर सरकार और समाज दोनों उत्साहित हैं। खासतौर पर पीएम मोदी ने बापू की150वीं जयंती को राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन के लक्ष्य के साथ जोड़कर इसे 2014 से ही चर्चा में ला दिया है। पर यह देश और सरकार दोनों भूल यह गई कि अगले वर्ष बापू के साथ बापू की भी 150वीं जयंती है। यही नहीं, कस्तूरबा (11 अप्रैल 1869 - 22 फरवरी 1942) चूंकि गांधी से 6 माह बड़ी थीं, इसलिए बा की जयंती दो अक्टूबर से पहले 11 अप्रैल को ही मनाई जाएगी।

कस्तूरबा और गांधी आधुनिक विश्व में दांपत्य की सबसे सफल मिसाल हैं। बा के  बारे में खुद बापू ने स्वीकार भी किया है कि उनमें दृढ़ता और निर्भीकता उनसे भी ज्यादा थी। तारीखी अनुभव के तौर पर भी देखें तो बा की पहचान सिर्फ यही नहीं थी कि वे बापू की जीवन संगिनी रहीं। आजादी की लड़ाई में उन्होंने न सिर्फ हर कदम पर अपने पति का साथ दिया, बल्कि यह कि कई बार स्वतंत्र रूप से और गांधीजी के मना करने के बावजूद उन्होंने जेल जाने और संघर्ष में शिरकत करने का फैसला किया। यहां तक गांंधी के अहिंसक संघर्ष की राह में वे गांदी से पहले जेल भी गईं। वह एक दृढ़ आत्मशक्ति वाली महिला थीं और गांधीजी की प्रेरणा भी। उन्होंने नई तालीम को लेकर गांधी के प्रयोग को सबसे पहले अमल में लाई।

इसी तरह चरखा और स्वच्छता को लेकर गांधी के प्रयोग को मॉडल की शक्ल देने वाली कोई और नहीं, बल्कि कस्तूरबा ही थीं। इसको लेकर कई प्रसंगों की चर्चा खुद गांधी ने भी की है। कहना हो तो कह सकते हैं कि शिक्षा, अनुशासन और स्वास्थ्य से जुड़े गांधी के कई बुनियादी सबक के साथ स्वाधीनता संघर्ष तक कस्तूरबा का जीवन रचनात्मक दृढ़ता की बड़ी मिसाल है।

धन्यवाद के पात्र हैं गांधी की लीक पर चले रहे वे कुछ सर्वोदयी, जिन्होंने बा और बापू की प्रेरणा को साझी विरासत के तौर पर जिंदा रखा। इस मौके पर ‘बा-बापू 150’ के नाम से जहां गांधी के इन अनुयायियों ने देशव्यापी यात्रा काफी पहले शुरू कर दी है, वहीं इस अभियान के तहत कुछ और कार्यक्रम भी हो रहे हैं। पर जहां तक रही सरकार और समाज की मुख्यधारा की बात तो शायद उनकी स्मृति से बा की विदायी हो चुकी है। 

मंगलवार, 3 अप्रैल 2018

दलित मुद्दे पर भाजपा का इनकाउंटर

- प्रेम प्रकाश





एस-एसटी एक्ट को लेकर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर पैदा हुआ असंतोष अब पूरी तरह से राजनीतिक रंग ले चुका है। विरोधी दलों को लगता है कि भाजपा की सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति को दलित अस्मिता के संघर्ष को सड़कों पर तेज करके काउंटर किया जा सकता है

जिन राजनीति और समाज विज्ञानियों को यह लगता था कि मंडलवादी राजनीति का एक्सटेंशन मुश्किल है, उनके लिए दो अप्रैल 2018 का राष्ट्रव्यापी घटनाक्रम नींद से जगाने वाला है। एससी-एसटी एक्ट के संबंध में बीते 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में दलित और आदिवासी संगठनों की तरफ से आयोजित भारत बंद का व्यापक असर हुआ। बंद के दौरान हिंसा भी हुई। खासतौर पर राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, गुजरात, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर में हिंसा और आगजनी की कई घटनाएं हुई। दिलचस्प है कि एक्ट पर फैसला सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया है। केंद्र सरकार ने तो इसके खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल की है। फिर भी बंद और विरोध के निशाने पर केंद्र सरकार रही। उसी के खिलाफ नारे लगे और उसी की नीतियों और मंशा को लेकर सवाल उठे, सड़कों पर असंतोष दिखा।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम-1989 के दुरुपयोग को रोकने को लेकर गाइडलाइन जारी की थी। यह सुनवाई महाराष्ट्र के एक मामले में हुई थी। ये गाइडलाइंस फौरन लागू हो गई थी। इसके तहत अब शिकायत के बावजूद सरकारी कर्मचारियों की गिरफ्तारी सिर्फ सक्षम अथॉरिटी की इजाजत से होगी और अगर आरोपी सरकारी कर्मचारी नहीं है, तो उनकी गिरफ्तारी एसएसपी की इजाजत से होगी। यही नहीं, इस मामले में अग्रिम जमानत पर मजिस्ट्रेट विचार करेंगे और अपने विवेक से जमानत मंजूर या नामंजूर करेंगे। इस अदालती फैसले का आधार कहीं न कहीं यह है कि एनसीआरबी 2016 की रिपोर्ट बताती है कि देशभर में जातिसूचक गाली-गलौच के 11,060 शिकायतें दर्ज हुईं। जांच में 935 झूठी पाई गईं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दलित संगठनों को लगता है कि कहीं न कहीं सरकार उसे मिले न्यायिक सुविधा या अधिकार के कटौती के पक्ष में है। जबकि जिस मामले में सर्वोच्च अदालत ने नया फैसला सुनाया है, उसमें सरकार कहीं से भी पार्टी नहीं है। बावजूद इसके सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एससी/एसटी एक्ट के फैसले पर फिर से विचार करने के लिए एक याचिका दायर की। पर कोर्ट ने सोमवार यानी भारत बंद के एलान के दिन इस पर फौरन सुनवाई से मना कर दिया।
दरअसल, यह पूर मामला अब कहीं न कहीं राजनीतिक रंग ले चुका है। विरोधी दलों को लगता है कि भाजपा की सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति को दलित अस्मिता के संघर्ष को सड़कों पर तेज करके काउंटर किया जा सकता है। इस सियासी वार-प्रतिवार के पीछे एक बड़ी वजह 2019 का लोकसभा चुनाव है। यही वजह है कि महज 13 दिन के भीतर इस मामले पर तकरीबन सारा विपक्ष एक सुर में बोलता दिखा।
गैरतलब है कि देश में एससी-एसटी की आबादी 20 करोड़ और लोकसभा में इस वर्ग से 131 सांसद आते हैं। जाहिर है कि इस वर्ग के साथ हर दल के हित जुड़े हैं। यहां तक कि भाजपा के भी सबसे ज्यादा 67 सांसद इसी वर्ग से हैं। साफ है कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से बड़ा गणित कहीं न कहीं दलित और पिछड़ों की राजनीति का है। भाजपा का कसूर सिर्फ इतना है उनके और संघ परिवार के कुछ नेताओं ने जिस तरह आरक्षण और जाति के मुद्दे पर जिस तरह के बयान दिए हैं, उससे विपक्ष को दलितों-पिछड़ों को यह कहने-समझाने में मदद मिली है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार आरक्षण सहित इस वर्ग के कई संवैधानिक सम्मत अधिकारों पर कैंची चलाने की मंशा रखती है। अलबत्ता इस धारणा का खंडन खुद प्रधानमंत्री तक ने कई बार किया। पर खासतौर पर जिस तरह से भाजपा के त्रिपुरा में सत्तारूढ़ होने के बाद बिहार, प. बंगाल, यूपी, राजस्थान, कर्नाटक से लेकर केरल तक देश का राजनीतिक-सामाजिक घटनाक्रम बदला है, उसने भाजपा विरोध का एक नया मंच खड़ा कर दिया है। यह मंच दलित राजनीति का है, मंडलवादी राजनीति के आक्रामक और हिंसक एक्सटेंशन का है।   

सोमवार, 2 अप्रैल 2018

पोस्ट ट्रुथ के दौर में बिहार का ट्रुथ

- प्रेम प्रकाश



कई राजनीति विज्ञानी इस बात को भारतीय राजनीति में डेवलप हुए उस नए पैटर्न के तौर पर देखते हैं, जिसमें जाति और अस्मिता के नाम पर होने वाली सियासी गोलबंदी को तोड़ने के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को जानबूझकर तूल दिया जाता है। सवाल यह भी है कि सत्ता पर काबिज होने का यदि यही गणित और यही पैटर्न है तो फिर भारतीय लोकतंत्र के बहुलतावादी चरित्र का क्या होगा?


इन दिनों देश के कई सूबों में सांप्रदायिक तनाव की आंच इतनी तेज है कि पर्व-त्योहारों का शायद ही कोई ऐसा मौका बीतता है, जब समाज के दो समुदायों के बीच हिंसा की खबरें न आती हों। खासतौर पर बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में आए दिन ऐसी घटनाएं घट रही हैं, जो सीधे-सीधे कुछ सियासी दलों द्वारा प्रायोजित सांप्रदायिक उकसावे वाले कृत्य हैं। इस सांप्रदायिक झुलस का शिकार केरल और कर्नाटक जैसा राज्य भी है। केरल में विधानसभा चुनाव तो खैर 2021 में होने हैं पर कर्नाटक में मई में ही चुनाव होने हैं। कई राजनीति विज्ञानी इस बात को भारतीय राजनीति में डेवलप हुए उस नए पैटर्न के तौर पर देखते हैं, जिसमें जाति और अस्मिता के नाम पर होने वाली सियासी गोलबंदी को तोड़ने के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को जानबूझकर तूल दिया जाता है। सवाल यह भी है कि सत्ता पर काबिज होने का यदि यही गणित और यही पैटर्न है तो फिर भारतीय लोकतंत्र के बहुलतावादी चरित्र का क्या होगा?
पिछले दिनों बिहार में भागलपुर में हिंदू नववर्ष पर निकले जुलूस के दौरान दो गुटों के बीच हिंसक भिड़ंत हो गई। देखते-देखते इस भिड़ंत ने हिंसक सांप्रदायिक टकराव की शक्ल ले ली। इसके बाद जब रामनवमी का त्योहार आया तो यह टकराव न सिर्फ और ज्यादा भड़का बल्कि इसके नाम पर खुलकर सियासी रोटियां सेंकी जाने लगी। रामनवमी पर हिंसा और आगजनी की खबरें बिहार से लगे पश्चिम बंगाल से भी आईं। स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि अब भी इन दोनों सूबों में शांति और सौहार्द की स्थिति बहाल होना सरकार और समाज के आगे एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। जो हालात अभी बिहार और पश्चिम बंगाल में हैं, वो स्थितियां समय-समय पर देश के बाकी सूबों में भी पैदा होती रहती हैं। आलम यह है कि गूगल सर्च इंजन के न्यूज सेक्शन में मात्र ‘रामनवमी’ शब्द लिखने पर जो पांच लाख से ज्यादा वेब पन्ने खुलते हैं, उसमें सबसे ज्यादा खबरें हिंसा, आगजनी और भड़काने वाले बयानों को लेकर हैं।
भारतीय समाज और राजनीति की सांस्कृतिक स्फीति का यह सच निस्संदेह काफी भयावह है। यकीन नहीं होता कि यह उस देश की सच्चाई है जिसने स्वाधीनता के लिए संघर्ष से पहले सांस्कृतिक पुनर्जागरण को अपने लिए जरूरी माना। आज इस पुनर्जागरण से दूर भारत एक बार फिर उस सांप्रदायिक झुलस की तरफ बढ़ता जा रहा है, जिसका शिकार वह 1947-48 के दौर में हुआ था। तब गनीमत यह थी कि अगर देश में एक तरफ सांप्रदायिक विभाजन पैदा करने वाली बर्बर प्रवृतियां थीं, तो वहीं दूसरी तरफ समाज और राजनीति की मुख्यधारा सामाजिक-सांस्कृतिक समन्वय को बहाल रखने के लिए हर लिहाज से प्रतिबद्ध थी। दुर्भाग्य से प्रतिबद्धता का यह चरित्र आज सियासी जमातों में तो नहीं ही दिखता है, राजनीतिक दुष्प्रभावों से सामाजिक चरित्र भी लगातार हिंसक और अराजक होता जा रहा है। यह स्थिति आगे अगर इसी तरह ढलाव की तरफ खिसकती गई तो आगे भारतीय समाज और संस्कृति का वह चारित्रिक साझा बहाल रख पाना मुश्किल होगा, जिसमें एक तरफ बहुलतावादी छटा दिखती है, तो वहीं दूसरी तरफ समावेशी गुण भी।
हिंदी साहित्य के सर्वाधिक मान्य इतिहासकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने साहित्य, संस्कृति और समाज के साझे को समझने के लिए ‘लोक’ और ‘परंपरा’ के रूप में दो सूत्र दिए हैं। भारत की बहुलतावादी संस्कृति में जब हम समन्वय के तत्वों की खोज करते हैं तो ये दो पद हमारी सबसे ज्यादा मदद करते हैं। इतिहास में बहुत पीछे न जाते हुए जब हम स्वाधीनता आंदोलन के दौरान प्रकट हुई राष्ट्रीय एकता का संदर्भ देखते हैं तो हमें सबसे पहले लोकमान्य तिलक याद आते हैं। दिलचस्प है कि देश जब 20वीं सदी के मुहाने पर खड़ा था, तो तिलक जैसे राष्ट्रवादियों की सबसे बड़ी चिंता यही थी कि भारतीय जनमानस को कैसे राष्ट्रीयता और स्वाधीनता के सवाल पर एकजुट किया जाए। इसके लिए उन्होंने लोक और परंपरा की गोद में पगी भारतीय सांस्कृतिक चेतना को आधार बनाया और गणेशोत्सव को एक सार्वजनिक लोक उत्सव का रूप दिया। तिलक यह बात तब सोच रहे थे जबकि 1893 में पुणे और बंबई में दंगे हुए थे। यहां तक कि कांग्रेस का भी उदारवादी कहा जाने वाला एक बड़ा धरा इस मुद्दे पर तिलक के साथ नहीं था। दरअसल, तिलक भारतीय जनमानस के उस बोध को कहीं न कहीं समझ चुके थे कि समाज और राष्ट्र के व्यापक सवालों पर लोगों को तब तक एकजुट नहीं किया जा सकता, जब तक इसकी सांस्कृतिक प्रेरणा व्यापक तौर पर नहीं जगेगी।
कहना मुश्किल है कि एक ऐसे दौर में जब ‘सत्य’ भी इस तरह ‘विकृत’ हो गया है कि उसे मौलिक रूप में पहचानना मुश्किल है, तिलक जैसा विवेक भारतीय राजनीतिक और सांस्कृतिक चिंतन का सकर्मक हिस्सा कैसे बनेगा। ग्लोबल दौर में इस सवाल की तह भी कहीं न कहीं ग्लोबल है और इसे गहराई से समझने की जरूरत है। 16 नवम्बर, 2016 को ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी की तरफ से यह घोषणा की गई कि ‘पोस्ट ट्रुथ’ साल का सबसे चर्चित शब्द रहा है। यह शब्द और संदर्भ वही है, जिसकी सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विकृति के तौर पर बात हम पहले कर चुके हैं। गौरतलब है कि 1992 में सर्बियन-अमेरिकन नाटककार स्टीव तेसिच ने एक निबंध लिखा। इस निबंध में ‘पोस्ट ट्रुथ’ शब्द का उपयोग पहली बार यह दर्शाने के लिए किया गया कि ‘सच अब उतना प्रासंगिक नहीं रहा।’ भारत से लेकर अमेरिका तक आज जिस तरह का उद्दंड राष्ट्रवाद और अपनी कथित सांस्कृतिक अस्मिता को बनाए-बचाए रखने के नाम पर जिस तरह की उपद्रवी युक्तियां सियासी जमातों द्वारा अपनाई जा रही हैं, उसे देखकर यह चिंता कंठ तक पहुंच जाती है कि सत्ता प्रतिष्ठानों पर काबिज होने की होड़ में समाज और संस्कृति का मंगलकारी योग कहीं लंबे समय के लिए तिरोहित न हो जाए। क्योंकि जनमत के लिए अगर वाकई वस्तुगत तथ्यों पर अराजक धार्मिक-सांस्कृतिक अपील हावी हो जाए, तो शांति और विवेक की धीरपूर्ण बातें अनसुनी ही रह जाएंगी। भारत से लेकर यूरोप और अमेरिका तक इस तरह की परिस्थिति को ही जानकार ‘पोस्ट ट्रुथ’बता रहे हैं। भारतीय संदर्भ में इसे राजनीति के सूर्य के लगातार दक्षिणायन होते जाने के घटनाक्रम के तौर पर भी देख सकते हैं। धार्मिक अंहकार और विस्तार को जिस तरह राष्ट्रवादी दोशाला ओढ़ाया जा रहा है, उससे देश में बीते कुछ सालों में विग्रहवादी विमर्श और अराजक मानसिकता को बल मिला है। यह विमर्श और यह मानसिकता अगर इसी तरह सिर उठाती रहीं तो आगे भी हमें इस स्थिति के लिए तैयार होना पड़ेगा कि कभी गाय के नाम पर, कभी धर्म परिवर्तन के नाम पर, कभी पर्व-त्योहारों के नाम पर, कभी बहुसंख्यक अस्मिता के नाम पर तो कभी एक जैसे खानपान और पहनावे के नाम पर हमारे आसपास का माहौल लगातार गरमाता रहेगा। इस गरमाहट को शांत करने की फिक्र अगर जल्द ही एक राष्ट्रीय दरकार और चेतना की शक्ल नहीं लेती है तो भारतीय समाज और लोकतंत्र की मौलिक शिनाख्त और उसकी समन्वयवादी विलक्षणता की रक्षा मुश्किल होगी। इसके लिए सबसे पहली आवश्यकता राजनीति के ऊपर समाज का नैतिक अनुशासन कायम करने की है। क्योंकि न सिर्फ भारत में बल्कि दुनिया में कहीं भी जब-जब राजनीति और सत्ता की हांक पर सामाजिक चरित्र गढ़ा गया है, इंसानियत शर्मसार हुई है। लिहाजा, भविष्य में उम्मीद की कोई किरण फूटेगी तो वो समाज के बीच से फूटेगी, न कि राजनीतिक गलियारों से।

शनिवार, 17 मार्च 2018

थ्योरी से ज्यादा डॉयलोग पर भरोसा


- प्रेम प्रकाश

स्टीफन हॉकिंग की सबसे अच्छी बात यह थी कि वे डायलॉग में विश्वास करते थे। बहस करना उनकी आदत में शामिल नहीं था
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विज्ञान दुरूह नहीं बल्कि खासा दिलचस्प है। हमारे दौर में इस बात को जिस शख्सियत ने अपने कार्य और विचार से सबसे प्रभावशाली तरीके से समझाया, वे थे महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग। हॉकिंग ने विज्ञान के क्षेत्र में अपने काम से दुनियाभर में करोड़ों युवाओं को विज्ञान पढ़ने के लिए प्रेरित किया। अलबत्ता हॉकिंग ने विज्ञान की नजर से ही भगवान, पृथ्वी पर इंसानों का अंत और एलियनों के अस्तित्व पर अपनी बात पुरजोर अंदाज में रखी। यह निर्भीकता इसलिए भी अहम है क्योंकि गैलिलियो की तरह हॉकिंग को भी इपने इन बयानों के लिए धार्मिक संस्थाओं की ओर से विरोध का सामना भी करना पड़ा था।

ईश्वर के अस्तित्व को नकारा 
स्टीफन हॉकिंग ने अपनी किताब 'द ग्रांड डिजाइन' में भगवान के अस्तित्व को सिरे से नकारा है। उन्होंने एक नए ग्रह की खोज के बारे में बात करते हुए हमारे सौरमंडल के खास समीकरण और भगवान के अस्तित्व पर सवाल उठाया। साल 1992 में एक ग्रह की खोज की गई थी, जो हमारे सूर्य की जगह किसी अन्य सूर्य का चक्कर लगा रहा था। हॉकिंग ने इसका ही उदाहरण देते हुए कहा, ‘ये खोज बताती है कि हमारे सौरमंडल के खगोलीय संयोग- एक सूर्य, पृथ्वी और सूर्य के बीच में उचित दूरी और सोलर मास, सबूत के तौर पर ये मानने के लिए नाकाफी हैं कि पृथ्वी को इतनी सावधानी से इंसानों को खुश करने के लिए बनाया गया था।’

गुरुत्वाकर्षण से बनी सृष्टि
उन्होंने सृष्टि के निर्माण के लिए गुरुत्वाकर्षण के नियम को श्रेय दिया। हॉकिंग कहते हैं, ‘गुरुत्वाकर्षण वह नियम है, जिसकी वजह से ब्रह्मांड अपने आपको शून्य से एक बार फिर शुरू कर सकता है और करेगा भी। ये अचानक होने वाली खगोलीय घटनाएं हमारे अस्तित्व के लिए जिम्मेदार हैं। ऐसे में ब्रह्मांड को चलाने के लिए भगवान की जरूरत नहीं है।’ हॉकिंग को इस बयान के लिए ईसाई धर्म गुरुओं की ओर से विरोध का सामना करना पड़ा।

ब्रह्मांड और एलियन
स्टीफन हॉकिंग ने दुनिया के सामने ब्रह्मांड में एलियनों के अस्तित्व को लेकर कड़ी चेतावनी दी थी। उन्होंने अपने लैक्चर 'लाइफ इन द यूनिवर्स' में भविष्य में इंसानों और एलियन के बीच मुलाकात को लेकर अपनी राय रखी थी। भौतिक शास्त्र के इन महान वैज्ञानिक ने कहा था, ‘अगर पृथ्वी पर जीवन के पैदा होने का समय सही है तो ब्रह्मांड में ऐसे तमाम तारे होने चाहिए जहां पर जीवन होगा। इनमें से कुछ तारामंडल धरती के बनने से 5 बिलियन साल पहले पैदा हो चुके होंगे।’ इस सवाल पर कि ऐसे में गैलेक्सी में मशीनी और जैविक जीवन के प्रमाण तैरते क्यों नहीं दिख रहे हैं। अब तक कोई पृथ्वी पर कोई क्यों नहीं आया और इस पर कब्जा क्यों नहीं किया गया, हॉकिंग ने कहा, ‘मैं ये नहीं मानता कि यूएफओ में आउटर स्पेस के एलियन होते हैं। मैं सोचता हूं कि एलियन का पृथ्वी पर आगमन खुल्लमखुल्ला होगा और शायद हमारे लिए ये अच्छा नहीं होगा।’

चौंकाने वाला एलान
हॉकिंग ने पृथ्वी पर इंसानियत के भविष्य को लेकर चौंकाने वाला एलान किया था। उन्होंने कहा था, ‘मुझे विश्वास है कि इंसानों को अपने अंत से बचने के लिए पृथ्वी छोड़कर किसी दूसरे ग्रह को अपनाना चाहिए और इंसानों को अपना वजूद बचाने के लिए अगले 100 सालों में वो तैयारी पूरी करनी चाहिए जिससे पृथ्वी को छोड़ा जा सके।’

नार्लीकर की स्मृति में हॉकिंग
भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. जयंत विष्णु नार्लीकर ने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में हॉकिंग के साथ पढ़ाई की थी। इसके बाद साइंस से संबंधित कई ग्लोबल सम्मेलनों में दोनों की मुलाक़ात होती रही। डॉ. नार्लीकर के अनुसार, ‘कॉलेज के दिनों में वो स्टीफन हॉकिंग के साथ टेबल टेनिस के मैच भी खेल चुके हैं।’ कॉलेज की उन यादों पर उन्होंने कई दिलचस्प जानकारियां हॉकिंग के बारे में दी। उन्होंने बताया कि वे मुझसे साल दो साल जूनियर ही थे। वो बाकी आम स्टूडेंट्स की तरह ही थे। उस वक़्त कोई उनकी प्रतिभा के बारे में नहीं जानता था। लेकिन कुछ सालों के भीतर ही लोगों को ये अंदाज़ा हो गया था कि स्टीफन में कुछ खास बात है।

कैंब्रिज में हॉकिंग
डॉ. नार्लीकर के शब्दों में, ‘मुझे याद है कि ब्रिटेन की रॉयल ग्रीनविच शोध विद्यालय ने साल 1961 में एक साइंस सम्मेलन आयोजित किया था। वहां स्टीफन हॉकिंग से पहली बार मेरी सीधी मुलाकात हुई थी। उस वक्त वह ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे। मैं एक छात्र ही था, लेकिन मुझे वहां एक लेक्चर देने के लिए बुलाया गया था। लेक्चर शुरू होने के कुछ देर बाद ही मैंने पाया कि एक स्टूडेंट है जो बहुत ज़्यादा सवाल कर रहा है। वो थे स्टीफन हॉकिंग। उन्होंने मुझ पर सवालों की बौछार कर दी थी। वो ब्रह्मांड के विस्तार के बारे में जानना चाहते थे. वो जानना चाहते थे कि बिग बैंग थियोरी है क्या?’
हॉकिंग पीएचडी करने के लिए कैंब्रिज यूनिवर्सिटी गए थे। उस वक़्त तक लोगों को समझ आ चुका था कि हॉकिंग के मस्तिष्क की क्षमता कितनी है। उनकी पीएचडी की थीसिस पढ़कर सब हैरान रह गए थे। अपनी थीसिस में ब्रह्मांड के विस्तार के बारे में उन्होंने कई बेहद दिलचस्प बातें लिखी थीं। उन्होंने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में बतौर प्रोफेसर क़रीब 30 साल काम किया। ब्लैक होल पर उनकी रिसर्च को सबसे ज़्यादा पहचान मिली।

डॉयलोग पर यकीन
उनकी सबसे अच्छी बात थी कि वे डायलॉग में विश्वास करते थे। बहस करना उनकी आदत में शामिल नहीं था। डॉ. नार्लीकर बताते हैं कि कैंब्रिज में उनके साथ मैंने विज्ञान के कई सिद्धांतों पर कई बार चर्चा की, लेकिन कभी हमारे बीच गर्म बहस नहीं हुई. हमने हमेशा एक दूसरे से सीखा ही। अपनी बीमारी की वजह से बीते कई सालों से स्टीफनलेक्चर नहीं दे पा रहे थे, लेकिन लोगों की जिज्ञासाओं और उनके सवालों के जवाब वे कई माध्यमों से देते रहे।’ हॉकिंग इस बात को जोर देकर कहते थे कि दुनिया किसी ईश्वर के इशारे पर नहीं चलती। भगवान कुछ नहीं है और संभावना है कि इस विश्व के अलावा भी कोई दुनिया हो। लोगों को हमेशा ये उनकी कल्पना ही लगी। स्टीफनके पास भी इसे साबित करने के लिए कोई पुख़्ता सबूत नहीं थे। लेकिन उन्होंने मरते दम तक इसे साबित करने की कोशिश की। उनकी इस ललक का सम्मान किया जाना चाहिए।

राहुल की लाइन से अलग बोल रहे हैं खडगे



- प्रेम प्रकाश

कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में राहुल जहां भाजपा को भय और तोड़ने वाली पार्टी बता रहे हैं तो वहीं खडगे कांग्रेस को संघ-भाजपा से सीखने के लिए कह रहे हैं
   
यूपी की दो सीटों पर उपचुनाव में भाजपा की हार से देश में राजनीतिक पारा भले चढ़ा दिखता हो, पर इस गरमाहट से भारतीय राजनीति का चरित्र का बहुत बदलने जा रहा है, एेसा कम से कम फिलहाल तो नहीं दिख रहा। यूपी में अगला उपचुनाव कैराना सीट पर होगा। खबर है कि उपचुनावों से भागने वाली इस बार बसपा वहां भाजपा से भिड़ने के मूड है। फूलपुर और गोरखपुर के नतीजे अगर कैराना में भी दोहरा दिए जाते हैं तो भी यह सवाल अपनी जगह कायम रहेगा कि भाजपा के खिलाफ विपक्ष की गोलबंदी का बड़ा आधार क्या होगा और इसकी अगुवाई क्या कांग्रेस करने में सफल होगी।
दिल्ली में अभी 2019 के चुनावी समर की तैयारी के लिए कांग्रेस का तीन दिवसीय सम्मेलन चल रहा है। राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद यह कांग्रेस का पहला राष्ट्रीय अधिवेशन है। हाल में जो भी चुनाव-उपचुनाव हुए हैं, उसमें कांग्रेस को शिकस्त ही खानी पड़ी है। आगे अगर कर्नाटक भी उसके हाथ से निकला तो बड़े सूबे के तौर पर उसके पास बस पंजाब रह जाएगा। इसलिए यूपी-बिहार की सोशल इंजीनियरिंग से बसपा-सपा औ राजद भले अपनी प्रांतीय पकड़ सुधार लें, इससे आगे वे विपक्ष के किसी राष्ट्रीय गठजोड़ की उम्मीद नहीं जगाते हैं। रही कांग्रेस की बात तो वह इस उम्मीद में भले है कि 2019 के पहले उसकी छतरी के नीचे सारा विपक्ष आ जाएगा। पर इसके लिए उसकी जो तैयारी और समझ है, वह एक फिर निराशा पैदा करती है।
पार्टी के अधिवेशन में लोकसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने पार्टी कार्यकर्ताओं से अपील की है कि भाजपा और संघ कार्यकर्ताओं की तरह वे भी कर्नाटक में घर-घर जाएं। जबकि इससे पहले कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि वे नफरत और डर फैलाने वाली नहीं बल्कि प्रेम और भरोसा जगाने वाली पार्टी हैं। उन्होंने कांग्रेस और भाजपा की राजनीतिक संस्कृति में बुनियादी अंतर बताया। सवाल यह है कि एक ही पार्टी के भीतर नेताओं के बीच जब यह साफ नहीं है कि वे चुनावी मैदान में उतरने से पहले किन बातों पर जोर देंगे और चुनावों में जीत के लिए उनकी बुनियादी रणनीति क्या होगी, वह पार्टी अगर देश के आगे राजनीतिक बदलाव और सत्ता परिवर्तन की उम्मीद जगाती है, तो यह भी साफ दिख रहा है कि इस उम्मीद के खिलाफ विरोधाभास खुद उनके अपने भीतर है।   
एक तरफ तो अधिवेशन के उद्घाटन भाषण में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी यह कह गए कि आज देश में गुस्सा फैलाया जा रहा है, देश को बांटा जा रहा है। हिंदुस्तान के एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से लड़वाया जा रहा है। हमारा काम जोड़ने का है। कांग्रेस का हाथ निशान ही देश को जोड़ कर रख सकता है। दूसरी तरफ उनकी ही पार्टी के दूसरे नेता यह कह रहे हैं कि चुनावी जीत के लिए उन्हें भाजपा-संघ का मॉड्यूल अपनाना चाहिए। साफ है कि कांग्रेस अगर अपने इतिहास के सबसे बुरे दिन में है तो यहां से उबरने का रास्ता उसे अभी तक नहीं सूझ रहा है।
जुमलों और भाषणों के भरोसे न तो राजनीति बदलाव संभव है और न ही सत्ता के शिखर तक पहुंचा जा सकता है। आज की तारीख में यह बात अगर देश में किसी राजनीतिक दल को सबसे ज्यादा समझने की जरूरत है तो वह देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस है।


बुधवार, 14 मार्च 2018

मुरझाए कमल की माला पहनने से क्यों भाग रहे मोदी जी!


- प्रेम प्रकाश

एक दिन पहले चर्चा इस बात की थी कि कैसे सोनिया गांधी के बुलावे पर 20 दलों के नुमाइंदे जुटे और अगले दिन सुबह से खबर का जोर इस पर था कि यूपी-बिहार के उपचुनाव में मोदी मैजिक नहीं चला

भारतीय राजनीति में तात्कालिकता का तत्व काफी हावी हो रहा है और यह दो स्तरों पर हो रहा है। एक तो राजनीति का मैदान और पाला रातोंरात बदल रहे हैं, वहीं राजनीतिक व्याख्या का तर्क और विमर्श भी अधीर जुमलेबाजी में बदल गया है। तभी तो दो दिन पहले तक पूर्वोत्तर में भाजपा की बढ़ी पकड़ को लेकर न्यूज एंकरों और पत्रकारों में यह बताने की होड़ लगी थी कि भाजपा की राजनीति और उसका चुनाव प्रबंधन कैसे अचूक तरीके से काम करता है। कोई मोदी-शाह की जोड़ी को एेतिहासिक बता रहा था तो कोई इस मौके को देश की सबसे पुरानी पार्टी के अध्यक्ष को पप्पू बताने का एक और मौका बता रहा था। पर यह सारी सूरत 48 घंटे बीतते-बीतते एकदम से पलट गई। एक दिन पहले चर्चा इस बात की थी कि कैसे सोनिया गांधी के बुलावे पर 20 दलों के नुमाइंदे जुटे और अगले दिन सुबह से खबर का जोर इस पर था कि यूपी-बिहार के उपचुनाव में मोदी मैजिक नहीं चला।

भाजपा शिविर में उपचुनावों में मिली बड़ी शिकस्त को लेकर बेचैनी भले हो, पर वे इस हार का ठीकरा अपने सबसे बड़े नेता नरेंद्र मोदी के सिर नहीं फोड़ना चाहते। मतगणना के दौरान से ही यह जाहिर होने लगा कि यूपी में हार का ठीकरा सीएम योगी और डिप्टी सीएम केशव मौर्या के सिर फूटेगा, तो वहीं बिहार में नीतीश के गले में हार की माला डाली जाएगी। अच्छा तो यह होता कि नरेंद्र मोदी न सही, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह आगे बढ़कर यह कहते कि चुनावी रणनीति में वे इस बार वाकई चूक गए।
इसके उलट उपचुनाव के नतीजे वाले दिन मौन धारण किए हुए अमित शाह बिना किसी तामझाम के पार्टी मुख्यालय पहुंचे। उनके चेहरे से हंसी गायब थी। कुछ दिन पहले ही वे त्रिपुरा चुनाव में भाजपा  की ऐतिहासिक जीत के बाद पार्टी अध्यक्ष लाव-लश्कर के साथ मुख्यालय पहुंचे थे। यही नहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तब वहां मौजूद पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं को संबोधित भी किया था। मोदी पूर्वोत्तर की जीत को पार्टी के वास्तुशास्त्र के हिसाब से दुरुस्त बता रहे थे और कह रहे थे कि डूबते सूर्य का रंग भले गुलाबी हो पर उगते सूर्य का रंग भगवा होता है। यह भगवा रंग अब जब यूपी और बिहार के उपचुनाव में बुरी तरह धूल से सन गया हो तो पलटकर उनसे सवाल पूछा जाना चाहिए कि वास्तु दोष तो ठीक हो गया था, फिर भगवा रंग सांझ की लाली में कैसे बदल गया। पर सबको मालूम है कि खूब बोलने वाले पीएम इस मुद्दे पर कुछ नहीं बोलेंगे।

दरअसल उपचुनाव के नतीजे से राजनीतिक दृष्टि से जो बात सबसे अहम है, वह यह कि एनडीए का कुनबा अब धीरे-धीरे ढह रहा है, उसे नए साथी नहीं मिल रहे और पुराने छोड़कर जा रहे हैं। वहीं भाजपा के खिलाफ विपक्ष की बड़ी मोर्चेबंदी की जमीन 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले तैयार हो रही है। यह जमीन राष्ट्रीय और प्रादेशिक स्तर पर कैसे बनेगी, इसका जवाब देना अभी टेठी खीर है। पर यह तो अभी से कहा जा सकता है कि 2019 में विरोधी वोटों के बंटवारे की वह खुशी शायद भाजपा को न मिले, जो उसे 2014 में नसीब हुई थी। एेसे में उसकी जीत का सूर्य अगर देखते-देखते ढलने लग जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। यूपी में बुआ-भतीजे की दोस्ती और बिहार में राजद के नेतृत्व में जातीय गणित ने जो शतरंज बिछाई है, उसमें कुछ और मोहरे अभी अपनी चाल चलेंगे। देखना दिलचस्प होगा कि इन चालों से सियासी शतरंज का खेल कितना पलटता है। 

सोमवार, 12 मार्च 2018

मौलाना से मिलना... मौलाना को पढ़ना...


 - प्रेम प्रकाश

धर्म और संप्रदाय की छोटी-बड़ी लकीरें खींचकर दुनिया का कोई समाज आगे नहीं बढ़ा है। इस्लाम अमन और मोहब्बत का पैगाम देता है। इस पैगाम को लोगों के दिलों तक पहुंचा रहे हैं मौलाना वहीदुद्दीन खान

‘बेटे, इस्लाम के बारे में भी पढ़ लेना। अभी अपनी पढ़ाई पूरी करो। वैसे भी मुझे लगता है कि गांधी विचार से जुड़े लोगों के लिए अलग से किसी धर्म के बारे में जानने की शायद जरूरत भी नहीं। हम लोग खुद कई अवसरों पर गांधी जी से सीखते हैं। वे शांति के मसीहा थे।’  ...मौलाना वहीदुद्दीन खान के ये कुछ शब्द आज भी अंतर्मन में गूंजते हैं। उन्होंने ये बातें इस्लाम को लेकर मेरी इस जिज्ञासा पर दी थीं कि भारतीय इस्लाम क्या बाकी इस्लाम से जुदा है। कहने की जरूरत नहीं कि उनका कद और उनकी स्वीकृति तब भी इतनी बड़ी थी कि उनकी हर छोटी-बड़ी बातों को लोग गौर से सुनते थे। जहां तक स्मरण है यह वाक्या 1986-87 के आसपास का रहा होगा। दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में उनसे मिला था।
प्रतिष्ठान में प्रकाशित होने वाले मासिक ‘गांधी मार्ग’ में उन दिनों उनके लेख काफी छपते थे। सो, मौलाना के आलेख पहले से पढ़ता रहा था। उन्हें पढ़कर उनके वैचारिक सम्मोहन से दूर रहना मेरे जैसे युवा के लिए इसीलिए भी असंभव था, क्योंकि इस्लाम और अध्यात्म की उनकी व्याख्या खासी आधुनिक और तार्किक होती थी। मुझे याद है कि जब मैं ‘जनसत्ता’ छोड़कर ‘सहारा समय’ में आया, तभी सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आई थी। एक साक्षात्कार के सिलसिले में अनुपम मिश्र से मिलने गांधी शांति प्रतिष्ठान जाना था। अनुपम जी सिर्फ पर्यावरण के ही जानकार नहीं थे। उनसे देश-समाज के विभिन्न विषयों पर बात करते हुए एक नई समझ बनती थी। इस समझ के साथ उनकी भाषा का भी आकर्षण होता था। सच्चर कमेटी की चर्चा पर छूटते ही अनुपम जी ने कहा, इस देश में कठिनाई यह है कि सबको राजनीति ज्यादा समझ में आती है। साठ के दशक से मौलाना वहीदुद्दीन खान इस बात को दोहरा रहे हैं कि मुसलमानों की स्थिति देश में तब तक बेहतर नहीं हो सकती, जब तक उन तक तालीम की रोशनी पूरी तरह नहीं पहुंचेगी। उनकी गुरबत और मुख्यधारा से कटने का असली कारण उनका तालीम से कटे होना है। मदरसों की ‘बंद तालीम’ के भरोसे जिस तरह की इस्लामी कौम बनेगी, उसके बारे में सबको पता है। अब जस्टिस राजेंद्र सच्चर ने मुसलमानों को लेकर अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंपी है तो लोग इस बारे में बात कर रहे हैं। अनुपम जी की ये बातें वैचारिक तौर पर झकझोर देने वाली थी। मौलाना के कार्य और लेखन को लेकर यह सब सुनकर एक नई तरह की जिज्ञासा पैदा हुई।
जिन लोगों को 2006 के आसपास के भारतीय सामाजिक और राजनीतिक हालात का पता होगा, वे इस बात को समझेंगे कि एक ऐसे दौर में जब देश में मुसलमानों के कथित रहनुमाई करने वाले अपनी अल्पसंख्यक पहचान को सियासी परचम की तरह इस्तेमाल करने पर तुले थे और समाज से लेकर संसद तक अस्मितावादी विमर्श चल रहा था, मुस्लिम समाज की वास्तविक स्थिति को सामने रखने वाली सच्चर कमेटी की रिपोर्ट ने किस तरह का तूफान पैदा किया था।
भारतीय समाज में मुसलमानों की हैसियत स्वाधीनता आंदोलन के दौर से लेकर आजादी के समय और उसके बाद किस तरह बदली, इस स्फीति को एक यात्रा की तरह देखें तो मन में कौतुहल पैदा करने वाले कई प्रश्न खड़े होते हैं। ये बेचैनी तब मैंने भी खूब महसूस की थी। एक बार फिर राहत मिली मौलाना वहीदुद्दीन खान को पढ़कर। एक पुस्तिका के रूप में उपलब्ध उनके एक लंबे आलेख में पढ़ा कि भारत विभाजन के बाद मुसलमानों के लिए इस देश में सबसे बड़ी त्रासदी उनका खुद को सियासी तौर पर अल्पसंख्यक उभार के साथ देखना है। बदकिस्मती से इस गलती में मुसलमानों के नेता भी शामिल रहे हैं। भारतीय समाज और संस्कृति में एक समन्वयवादी तत्व शुरू से रहा है। यह तत्व देश के हिंदुओं में भी है।
मौलाना ने इस बात को हिंसक नादानी करार दिया कि भारतीय मुसलमान हिंदुओं से किसी तरह की होड़ लें या फिर उनसे अलगाव या स्पर्धा की कोई राह चुनें। वे हिंदुओं और मुसलमानों की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को बांटकर तो नहीं ही देखते हैं, उलटे इनमें एक-दूसरे को तर-बतर करने वाले अंतरसूत्र देखते हैं। ...तभी तो वे मानते हैं कि अल्पसंख्यक असुरक्षा का भाव मुसलमान समाज को भारत के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास यात्रा से उसे इतनी दूर ले जाएगा कि वे अभाव और हीनता के ऐसे मझधार में फंसेंगे, जिससे निकलना आसान नहीं होगा। मौलाना वहीदुद्दीन खान आज भी अपनी इस समझ पर कायम हैं। वे अपने लेखों के साथ टीवी संदेशों और पोडकास्ट में इस संदेश को दुहराते हैं।
‘जनसत्ता’ अखबार में मैं जब था तो एक सम्मेलन में आरिफ मोहम्मद खान को सुना। कहने को उनका शुमार मुसलमानों के नेता के तौर पर ही होता है, पर वे अपनी इस पहचान के खुद खिलाफ हैं। सम्मेलन में खान ने बताया कि कभी भारत और पाकिस्तान.. दोनों तरफ के मुसलमानों ने खान अब्दुल गफ्फार खान की नहीं सुनी और इसका नतीजा देश विभाजन के समय से लेकर बाद तक के सांप्रदायिक दंगे हैं। आज भी हमारे बीच एक सच की आवाज है। यह आवाज है मौलाना वहीदुद्दीन खान की। खान कहीं न कहीं उन्हीं बातों के प्रति हमें आगाह कर रहे हैं, जो 1947 और उसके बाद हुई।
धर्म और संप्रदाय की छोटी-बड़ी लकीरें खींचकर दुनिया का कोई समाज आगे नहीं बढ़ा है। इस्लाम अमन और मोहब्बत का पैगाम देता है। इस पैगाम को लोगों के दिलों तक पहुंचा
रहे हैं मौलाना वहीदुद्दीन खान। खान को पढ़ना और उन्हें सुनना, अमन और सकून पर यकीन बढ़ाने जैसा है। मौलाना इस यकीन को देश-दुनिया में अपनी तरह से जिस तरह से फैला रहे हैं, उसे देखकर राष्ट्रपिता गांधी की याद आती है। खुद मौलाना भी मानते हैं कि जंगे आजादी के दिनों से उन पर गांधी का रंग चढ़ गया था। निस्संदेह यह रंग बाद में और पक्का... और पाकीजा हुआ। 

अलग झंडा क्यों चाहिए कर्नाटक सरकार को!


- प्रेम प्रकाश

नब्बे के दशक से जोर पकड़ी अस्मितावादी राजनीति 2014 तक आते-आते हांफने लगी। बिहार विधानसभा चुनाव में इसका नया प्रभावी संस्करण देखने को जरूर मिला, पर आज नीतीश और लालू जिस तरह राजनीति के दो छोर पर खड़े हैं, उसने इस संस्करण की आगामी संभावना को पूरी तरह ढहा दिया। कहने को उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा की नई दोस्ती भी अस्मितावादी राजनीति के इसी संस्करण की नकल है, पर इसका एक तो रकबा अभी बहुत कम है, दूसरे दोनों दल की तरफ से अभी इस बारे में बहुत कुछ साफ होना बाकी है। इन सारे घटनाक्रमों के बीच क्षेत्रीय अस्मिता की जमीन को बीते एक वर्ष से जिस तरह कर्नाटक में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी सींचने में लगी है, वह एक खतरनाक संकेत है।

तमिलनाडु के साथ कावेरी जल विवाद के बाद कर्नाटक ने अपना अलग झंडा तैयार कर लिया है। कर्नाटक में इसी वर्ष अप्रैल-मई में चुनाव होने हैं। वहां कांग्रेस का जो रुख है, उसमें क्षेत्रीय अस्मिता और राष्ट्रवाद का चुनावी संघर्ष पहली बार जमीन पर आमने-सामने होगा। ताज्जुब है कि राष्ट्रवादी राजनीति के सामने क्षेत्रीय स्वाभिमान और अस्मिता की जो सियासी जमीन पूर्वोत्तर राज्यों, प. बंगाल, तमिलनाडु और केरल में भी नहीं तैयार हो सकी, उसका उदाहरण कर्नाटक बनने जा रहा है। देश के इन तमाम सूबों में क्षेत्रीय राजनीति का एक अपना गणित जरूर रहा है, पर इस गणित से राष्ट्रवादी घोड़े पर सवार भाजपा का विजय रथ रोकने के लिए कोई सियासी प्रयोग अगर कहीं सीधे तौर पर आजमाई जा रही है, तो आज की तारीख में देश का वह अकेला राज्य कर्नाटक है।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने दांव खेला है, उसने निस्संदेह भाजपा की उलझनें बढ़ा दी हैं। सिद्धारमैया ने कर्नाटक के लिए एक झंडे का डिजाइन कैबिनेट से पास कराया है, जिसको अब वह केंद्र सरकार को भेजने जा रहे हैं ताकि इसको संवैधानिक मंजूरी मिल सके। कन्नड़ संगठनों के साथ अपने कैंप दफ्तर में बैठक के दौरान सिद्धारमैया ने इस झंडे को दिखाया, जो तीन रंगों का है। झंडे में ऊपर पीली पट्टी, बीच में सफेद और नीचे लाल पट्टी है। बीच में सफेद पट्टी पर राज्य का प्रतीक चिन्ह गंद्दु भेरुण्डा (दो बाज) बना है। अपने दांव को किसी संवैधानिक चुनौती से बचाने और अलगाववादी हिमाकत से अलग दिखाने की कोशिश में सिद्धारमैया कह रहे हैं वे इस झंडे को राष्ट्रीय ध्वज से नीचे ही फहराएंगे।

पर जिस तरह सिद्धारमैया इस पूरे प्रकरण को बता रहे हैं, उसमें उनकी मंशा को पढ़ना आसान है। वे जब कहते हैं कि उनका यह झंडा कन्नड़ अभिमान के लिए है और तकराबन सभी कन्नड़ संगठनों का समर्थन उन्हें इसके लिए हासिल है, तो साफ दिख जाता है कि वे एक बड़ा सियासी दांव खेल रहे हैं। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले झंडे को लेकर सामने आने की टाइमिंग भी इसी बात की तरफ इशारा कर रही है। 

दिलचस्प है कि कर्नाटक कई तरह की राजनीति की प्रयोगशाला पहले से रहा है। सरकारी भ्रष्टाचार के भी बड़े-बड़े मामले वहां उठे हैं। पर राज्य के लिए अलग झंडे की मांग उठाकर वहां की कांग्रेस सरकार ने जो हिमाकत की है, उसका खामियाजा कांग्रेस की सियासी नैतिकता को तो अपनी तरह से उठाना ही पड़ेगा। देश में इन दिनों प. बंगाल और जम्मू-कश्मीर से लेकर उत्तर-पूर्व के कुछ राज्यों और केरल में जिस तरह की अशांति है, उसका प्रतिफलन अगर अलग-अलग या साझे तौर पर देश के आगे एक नए क्षेत्रीयतावादी या प्रांतवादी संकट के तौर पर सामने आए तो यह देश की अखंडता के लिए वाकई बहुत बड़ी चुनौती होगी। यह चुनौती कैसी बड़ी हो सकती है, वह आंध्र सरकार के विशेष राज्य का दर्जा मांगने से शुरू हुई सियासी लपट के देखते-देखते बिहार तक पहुंचने के घटनाक्रम के तौर पर भी समझा जा सकता है। मूर्तिभंजक पागलपन के दौर में क्षेत्रीय अस्मिता के नाम पर भड़काने वाली मानसिकता के प्रकटीकरण से राष्ट्रीय सद्भाव के बुरी तरह चोटिल होने का खतरा है।

भारत में राष्ट्रवादी दरकारों और उसके उसूलों को लेकर बहस आजादी मिलने से पहले ही शुरू हो गई थी। एक समय जब देश के पहले गृहमंत्री सरदार पटेल रियासतों के विलय के लिए कठिन चुनौतियों का समाना कर रहे थे तो एक तरह से यह राष्ट्रीय सम्मति भी बनी थी कि देश की भौगोलिक, राजनीतिक एकता के लिए तमाम ऐसे विवादों को एक किनारे रखना होगा, जिससे देश की संघवादी रचना कमजोर हो सकती है। पर दुर्भाग्य से अस्सी-नब्बे के दशक के बाद से देश में राजनीतिक स्फीति इतनी ज्यादा हुई कि सत्ता की सीढ़ी बनाने के लिए सियासी जमातें और उनके नेता आज किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार हैं। बीते सालों में विधानसभाओं में बजाप्ता प्रस्ताव लाए और पास किए गए हैं कि उन आतंकियों को क्षमादान मिले, जिसे देश की न्यायिक व्यवस्था आजीवन कारावास या फांसी की सजा सुना चुकी है। याकूब मेनन, अफजल गुरु से लेकर देविंदर पाल सिंह भुल्लर के लिए सियासी आंसू रोने वालों को कभी यह फिक्र नहीं रही कि उनकी इस हिमाकत का देर-सबेर देश को कितनी बड़ी कीमत चुकानी होगी।   

यहां एक बात जो और समझनी है, वह यह कि बीते चार सालों में देश की राजनीति का सूर्य पूरी तरह से दक्षिणायन हो चुका है। देश की राजनीति में यह बड़ा शिफ्ट है। जिस कांग्रेस के खिलाफ कभी डॉ. राम मनोहर लोहिया सरीखे नेताओं को विपक्षी मोर्चा तैयार करने और फिर उसे चुनावी समर में शिकस्त से बचाने में पसीने छूट जाते थे, उस कांग्रेस का जनाधार आज इतना कमजोर हो चुका है कि नेहरू-गांधी परिवार का नेतृत्व भी चाहकर कुछ नहीं कर पा रहा है। ज्यादा बुरी स्थिति यह है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी अपने खिलाफ बने इस माहौल को समझने-परखने के बजाय उन तिकड़मों पर भरोसा कर रही है, जो उन्हें जड़मूल से और कमजोर कर देगी।

बहरहाल, अगर बात करें कर्नाटक की तो वहां अलग झंडे की मांग को लेकर जो कुछ भी हुआ, वह गंभीर मामला होने के साथ हास्यास्पद भी है। एक तो भारत जिस देश का संघीय राष्ट्र है, उसमें संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत विशेष दर्जा सिर्फ जम्मू-कश्मीर को ही प्राप्त है। इसलिए सिर्फ जम्मू कश्मीर के पास ही अपना अलग झंडा है। अलग झंडे की मांग एक तरह से अलग राष्ट्रीयता की मांग की तरह है, जिसे कम से कम देश की मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था के तहत मंजूरी नहीं मिल सकती। ऐसी कुछ मांगें आरक्षण जैसे मसलों पर भी आई हैं, जिसमें चुनावी फायदे के लिए राजनीतिक दलों ने जनता के बीच जाकर यह वादा कर दिया कि वह संवैधानिक और घोषित न्यायिक व्यवस्था और सीमा से बाहर जाकर भी कुछ समुदायों को आरक्षण देंगे। अलबत्ता इस चुनावी दांव में यह समझ भी शामिल रहती है कि ऐसा कुछ चाहकर भी इसलिए भी नहीं किया जा सकता क्योंकि विधानसभा या राज्य सरकार की मंजूरी के बावजूद इसे न्यायिक चुनौती दी जाएगी, जहां उसे मान्यता मिलने का सवाल ही नहीं है।

एक जो आखिरी बात इस पूरे मसले पर गौर करने की है, वह यह कि कर्नाटक में झंडे की मांग कोई आज नई नहीं उठी है, बल्कि इससे पहले जब वहां भाजपा की सरकार थी तो कांग्रेस की तरफ से यह मांग उठी थी और इसके लिए विधानसभा में प्रस्ताव लाया गया था। मामला न्यायालय भी पहुंचा और तब सदानंद गौड़ा की अगुवाई वाली भाजपा सरकार ने कर्नाटक उच्च न्यायालय को बताया कि उसने दो रंग वाले कन्नड़ झंडे को राज्य का आधिकारिक झंडा घोषित करने के सुझाव को स्वीकार नहीं किया है, क्योंकि अलग झंडा ‘देश की एकता एवं अखंडता के खिलाफ’  होगा। साफ है कि नए सिरे से इस मांग को उठाकर कांग्रेस देश में सांप्रदायिक से आगे प्रांतवादी या अलगाववादी ध्रुवीकरण का खतरनाक दांव खेलना चाहती है।

सोमवार, 14 नवंबर 2016

नोटबंदी के अलावा भी थे विकल्प



- प्रेम प्रकाश
अगर सरकार और समाज की व्यवस्था को लेकर सोच सुधारवादी नहीं रही तो हम समय के प्रवाह से कट जाएंगे। इसी तरह व्यवस्था के फैसले पर सवाल खड़े करने के अधिकार की जगह अगर जनता पर महज रजामंदी जाहिर करने का दबाव हो तो यह लोकतंत्र के लिए अशुभ संकेत है। इस सैद्धांतिक टेक के साथ नोटबंदी के सरकार के हालिया फैसले पर गौर करें तो इसे फौरी तौर पर सराहने वाले भी अब कहने लगे हैं कि सरकार ने यह फैसला जल्दबाजी में लिया है। बेहतर होता कि सरकार फैसले के इस विकल्प तक पहुंचने से पहले पर्याप्त सोच-विचार करती। आलम यह है कि फैसले के चार दिन बाद भी स्थिति लगातार असामान्य बने हुए हैं। बैंकों और एटम मशीनों के आगे घंटों कतार में खड़ी जनता का सब्र आक्रोेश मंे बदले लगा है। यह आक्रोश अगर विस्फोटक शक्ल अख्तियार करता है तो कानून व्यवस्था की स्थिति को संभालना आसान नहीं रह जाएगा। सड़कों से लेकर मंडियों तक लूटपाट जैसी घटनाएं तो फैसले के दूसरे-तीसरे दिन से ही सामने आने लगी हैं। 
ऐसे में यह सवाल तो सरकार से पूछा ही जाना चाहिए कि आखिर नोटबंदी के बड़े एलान से पहले उसने ऐसी पक्की व्यवस्था क्यों नहीं कि जिससे आमजनों को हो रही परेशानी से बचाया जा सके। यह भी कि क्या यह कालाधन से निपटने का एकमात्र मुफीद तरीका रह गया था? क्योंकि कई विशेषज्ञ भी इस बात को कह रहे हैं कि सरकार के पास तमाम ऐसी जानकारियां हैं, जिससे वे अवैध धन इकट्ठा करने वालों के गिरेबान सीधे पकड़ सकती है। रहा बड़े नोटों का सवाल तो इस पर रोक की मांग पुरानी है। दिलचस्प है कि अपने नए फैसले में भी सरकार इन्हें बंद करने के बजाय सिर्फ बदल रही है। यही नहीं, पांच सौ और हजार के बाद वह दो हजार का नया नोट प्रचलन में ला रही है। इस तरह यह कार्रवाई बड़े नोटों को चलन से बाहर करने का तो कतई नहीं है। हां, सरकार के फैसले से कालाधन के नाम पर फर्जी नोटों पर कार्रवाई की दलील तो समझ में आती है पर इससे अवैध धन जमा करने के रास्तों और जुगाड़ों पर नकेल कसेगी, यह समझ से परे है। जहां तक सवाल है पुराने बड़े नोटों को अमान्य करने का तो इस काम को भी एकबारगी या क्रमिक तौर पर छपाई बंद करने का विकल्प ज्यादा बेहतर होता। इससे धीरे-धीरे बड़े नोट खुद ब खुद प्रचलन से बाहर हो जाते। पर सरकार ने ऐसा न कर एक ऐसा फैसला किया जिसमें घुन और गेंहू साथ-साथ पिस रहे हैं। ये तमाम सवाल मौजूदा हालात में इसलिए जरूरी हैं क्योंकि सरकार की तरफ से अब भी कोई ऐसा आश्वासन नहीं कि वह आमजनों की परेशानी के साथ बिगड़े हालात पर जल्द काबू पा लेगी। 
आठ दिसंबर की रात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विमुद्रीकरण की घोषणा की तो अगले दो दिनों में एटीएम के साथ बैंकों के सामान्य कामकाज का एक तरह से भरोसा देश को दिलाया था। पर चार दिन बाद आलम यह है कि सरकार की तरफ से यह सफाई आने लगी कि कि दैनिक जरूरतें पूरी करने के लिए खुले पैसे की समस्या से जूझ रहे आम आदमी की तकलीफें दूर होने में उम्मीद से अधिक समय लग सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि जारी किए गए 5०० और 2,००० रुपये के नए नोटों के लिए देशभर के दो लाख एटीएम मशीनों को रीसेट करना होगा। वित्तमंत्री अरुण जेटली से जब पूछा गया कि अब जब वे एटीएम मशीनों के सामान्य तौर पर काम करने को लेकर दो से तीन हफ्ते का वक्त लगने की बात कह रहे हैं तो सरकार सरकार ने पहले से एटीएम मशीनों में ये बदलाव क्यों नहीं किए। इस पर जेटली की दलील है कि इससे सरकार का चकित करने वाले कदम की गोपनीयता खत्म हो जाती। पर इस गोपनीयता को बनाए रखने के लिए आम लोगों के सब्र की परीक्षा लेने का विकल्प ही क्यों सरकार को पसंद आया, इसका सीधा जवाब सरकार की तरफ से कोई नहीं दे रहा। 
इस प्रक्रिया की जटिलता और इसमें लगने वाले समय का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि किसी एटीएम मशीन को रीकन्फीगर करने के लिए एक तकनीशियन को खुद एटीएम मशीन जाना होगा। इस तरह किसी एक मशीन को रीकन्फीगर करने में अमूमन चार घंटे का समय लग सकता है। इसका मतलब है कि देश भर की दो लाख एटीएम मशीनों को रिकन्फीगर करने में आठ लाख घंटे लगेंगे। इस काम के लिए बड़ी संख्या में तकनीशियनों को इकट्ठा करना भी चुनौती ही है। लिहाजा, यह सवाल तार्किक तौर पर और मजबूत होता है कि कथित कालेधन से निपटने के लिए सरकार ने एक ऐसा रास्ता क्यों चुना जिससे समाज का हर तबका इस कदर परेशानहाल है कि उसे पता भी नहीं कि वे इससे कब तक और कैसे बाहर निकलेंगे। 
तथ्यात्मक तौर पर देखें तो देश में कुल 17 लाख करोड़ की करेंसी में 8.2 लाख करोड़ (5०० के नोट) और 6.7 लाख करोड़ (1००० के नोट) पूरी करेंसी का 86 फीसदी हैं, जो अब प्रचलन से बाहर हो गए हैं। इससे पैदा होने वाले संकट का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि देश में नगदी नोटों से आम जनता की अर्थव्यवस्था चलती है, जबकि बड़े लोग बैंकिग प्रणाली से कारोबार करते हैं। सरकार चाहती तो ऐसे में 2.7 लाख करोड़ के रोजाना बैंकिग ट्रांजेक्शन और सालाना 8०० लाख करोड़ के बैंकिग कारोबार में बड़े लेनदेन को सीधे अपने स्कैन पर ले सकती थी और जांच के बाद संबंधित लोगों-कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई कर सकती थी। 
सीबीआई डायरेक्टर एपी सिह ने फरवरी 2०12 में यह बताया था कि कालाधन के नाम पर लगभग 3० लाख करोड़ रुपए विदेशों में जमा हैं। 2०14 के लोकसभा चुनाव के समय भाजपा ने इस धन को देश में लाने की बात कही थी। पर अब इस वादे को पूरा करने के बजाय सरकार देश की मुद्रा व्यवस्था को बदलने की एक ऐसी कार्रवाई कर रही है जो जनता को बैठे-बिठाए मुसीबत में डालने वाली है। जबकि सरकार के सामने दूसरे विकल्प भी थे। हाल के पनामा लीक्स में देश के 5०० रसूखदार तथा एचएसबीसी में 1,195 लोगों के पास कालाधन होने का पता चला था। इसी तरह कुछ बड़े उद्योगपतियों द्बारा बैलेंसशीट में गड़बड़ी करके सरकारी बैंकों से 15 लाख करोड़ रुपए से अधिक का लोन लिया गया जिसमें अधिकांश एनपीए में तब्दील हो गया है। और तौ और रिजर्व बैंक का खुद का आंकड़ा है कि पिछले 44 वर्षों में एक्सपोर्ट और ओवर इनवाइसिग के माध्यम से बड़ा घोटाला हुआ है जो कुल जीडीपी का एक चौथाई हो सकता है। सरकार चाहती तो ऐसे बड़े समूहों और उद्योगपतियों के फारेंसिक तथा सीएजी ऑडिट कराने का फैसला कर सकती थी। इससे देश में एक नए कारोबारी वित्तीय अनुशासन को अमल में लाने का श्रेय भी सरकार को मिलता। पर उसने ऐसा नहीं करके बेकसूर आम जनता के लिए परेशानी बढ़ाने वाला फैसला लिया। 
साफ है के कालाधन के खिलाफ सार्थक और अचूक कार्रवाई के बजाय सरकार एक ऐसे कदम को तरजीह दे रही है जिसका फायदा वह राजनीतिक लोकप्रियता के लिए कर सके। पर कालेधन को लेकर प्रचारित इस निर्भीकता का एक नतीजा यह भी है कि ट्विटर पर प्रधानमंत्री मोदी के 3,13,312 फॉलोअर्स ने उनका साथ छोड़ दिया है। बेहतर होगा कि सरकार अपने खिलाफ जा रही इन प्रतिक्रियाओं को खारिज करने के बजाय इन्हें गंभीरता से ले। 

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016

खबरिया चैनल बिगाड़ रहे राजस्थानी महिला की छवि


- प्रेम प्रकाश
सनसनी पैदा करने के चक्कर में मीडिया कई बार ऐसी हिमाकतों से गुजर जाता है, जिसका खामियाजा देश और समाज को आगे लंबे समय तक उठाना पड़ता है। बात करें महिला अपराध की तो यह एक ऐसा संवेदनशील मसला है, जिससे खबरिया आपाधापी में अकसर गंभीर चूक होती है। यह चूक कितनी बड़ी और घातक हो सकती है इसकी मिसाल हाल की जयपुर की एक घटना है। टीवी चैनलों पर आधे-आधे घंटे इस घटना पर विशेष शो दिखाए गए। बताया गया कि एक मां भी हत्यारी हो सकती है और वह भी अपने चार माह के दूधमुंहा बच्ची की। एंकर से लेकर रिपोर्टर इस घटना में एक मां की हिंसक जघन्यता को यह कहते हुए रेखांकित करने में लगे रहे कि कैसे एक मां की ममता इतनी कमजोर पड़ गई कि उसने अपनी गोद में खेलती बेटी की हत्या का फैसला ले लिया। जबकि जो खबर थी उसमें यह तथ्य भी शामिल था कि यह सब उस मां ने क्यों और किस दबाव में किया यह पूरी तरह साफ नहीं। क्योंकि एक अंदेशा यह भी जताया जा रहा कि संभव है कि वह मां ऐसा नहीं करना चाहती हो पर उसके ऊपर इसके लिए दबाव हो। पितृसत्तात्मक समाज में यह दबाव किस तरह पारिवारिक-सामाजिक स्तर पर स्त्री मन को तोड़ता-बदलता है, इसके तो अब कई चौंकाने वाले अध्ययन तक सामने आ चुके हैं। फिर बगैर मामले के पूरी तह में गए अगर किसी की छवि को निर्णायक तौर पर स्याह करार दे दिया जाए और वह भी किसी महिला की तो यह न सिर्फ एक गैरजिम्मेदार बल्कि खुद अपने में हिंसक रवैया है।  इस मामले में महिला मामलों में बरती जाने वाली संवेदनशीलता तो खैर नहीं ही दिखी, अव्वल ऐसी सोच जरूर हावी है कि अगर कोई महिला अपराध करती है तो वह पहली नजर में ही अक्षम्य है, नाकाबिले बर्दाश्त है। पलटकर यह सवाल अगर मीडिया के माननीयों से पूछा जाए कि एक ऐसे दौर में जब हर 18 मिनट में देश की कोई न कोई बेटी किसी पुरुष की हवस का शिकार बन रही है, अदालती हिदायतों और कानूनी सख्ती के बावजूद आधी दुनिया के चेहरे पर एसिड फेंकने की घटनाएं रुकी नहीं हैं, फिर एक महिला के अपराधी होने को लेकर इतनी दिलचस्पी आखिर क्यों? क्या यह दिलचस्पी उसी मानसिकता की देन नहीं है, जिससे महिलाएं घर-परिवार से लेकर कार्यस्थलों पर असुरक्षित हैं, शारीरिक से लेकर मानसिक उत्पीड़न का शिकार हैं।  जयपुर की जिस घटना को लेकर इतनी बातें हो रही हैं, वह घटना 26 अगस्त की है। पुलिस को उस दिन सूचना मिली कि शास्त्रीनगर इलाके मेंएक व्यक्ति की चार माह की बेटी घर में ही रखे हुये एसी कैबिनेट में मृत पायी गई है। मकान में रहने वाले एवं घटना के समय मौजूद लोगों से गहनता से पूछताछ की गयी तो बच्ची की मां की भूमिका पर संदेह हुआ। मृतका बच्ची अपनी मां नेहा के पास अपने बेडरूम में सोई थी। उसके बाद बच्ची लहुलुहान हालात में उसके बेडरूम से कुछ ही दूरी पर स्थित हॉल में रखे लोहे के एसी केबिनेट में मृत पायी गयी। लेकिन बच्ची के एसी केबिनेट में पहुंचने को लेकर मां कुछ भी नहीं बता सकी। अलबत्ता एफएसएल टीम द्बारा जुटाये गए सबूतों में पाया गया कि कि मृतका बच्ची की मां के नाखूनों में रक्त पाया गया व उसके बेडरूम से अटैच बाथरूम में भी रक्त पाया गया। इसमें कहीं दो मत नहीं कि इस दुर्भाग्यपूणã घटना की शुरुआती तफ्सील ही किसी को भी अंदर तक हिला देने वाली है। हर लिहाज से यह घटना पूरी तरह आपवादिक जान पड़ता है क्योंकि ऐसा किसी समान्य सामाजिक-पारिवारिक स्थिति में संभव ही नहीं।  पर दुर्भाग्य से इस आपवादिक खबर में सनसनी देखने वालों ने इस बहाने राजस्थान में बालिका भ्रूण हत्या से लेकर महिलाओं की असुरक्षित स्थिति तक कई नतीजे निकाल लिए। जबकि तथ्य और सच्चाई कुछ और है। राजस्थान में जहां वर्ष 2०11 की जनगणना में ० से 6 वर्ष तक का लिगानुपात महज 888 था, वह 2०15 आते-आते 37 अंक बढ़कर 925 हो गया है। दरअसल, प्रदेश में 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान के प्रभावी क्रियान्वयन के साथ ही, लिगानुपात बढ़ाने के लिए विभिन्न योजनाएं चलाई जा रही हैं। भामाशाह योजना, राजश्री योजना, आपणी बेटी योजना सहित अन्य कई योजनाएं प्रदेश में संचालित की गई हैं, जो महिला सशक्तीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो रही हैं। साथ ही, जिन परिवारों में बेटी का जन्म होता है, उन्हें मुख्यमंत्री द्बारा हस्ताक्षरित बधाई पत्र भेजा जाता है। प्रदेश में लिगानुपात बढाने के लिये राज्य सरकार द्बारा प्रसव पूर्व लिग जांच की गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए अपनी तरह की पहली मुखबिर योजना और जीपीएस युक्त सोनोग्राफी मशीनों जैसे नवाचार किए गए हैं। इन सब योजनाओं के आशातीत परिणाम आए हैं। ऐसे में महज एक खबर की नोक पर राज्य में महिलाओं के लिए सरकार और समाज की सारी तत्परता और बड़ी पहलों को नकार देना कितना गलत और घातक है, समझा जा सकता है।  राजस्थान से निकलकर पूरे देश की बात करें खासतौर पर निर्भया मामले के बाद कई स्तरों पर जागरुकता बढ़ी है। इस दौरान बलात्कार सहित महिलाओं के खिलाफ अपराध को रोकने को लेकर कई वैधानिक सख्तियां भी सरकारें लेकर आई हैं। इससे आगे महिलाएं पूजास्थलों में प्रवेश से रोके जाने जैसी मध्यकालीन सोच को भी समाज से लेकर अदालतों तक चुनौती दे रही हैं। बात करें मौजूदा केंद्र सरकार की तो उसने तो बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ से लेकर स्तनपान को प्रश्रय तक कई बड़े अभिक्रम एक के बाद एक शुरू किए हैं। ऐसे में देश में महिला सम्मान और सुरक्षा की राह पर सरकार और समाज के साथ मीडिया को कदम आगे बढ़ाने की दरकार है। यह दरकार इस लिहाज से जरूरीअमल की मांग करता है क्योंकि आजादी के आंदोलन के लंबे दौर से बाद तक मीडिया देश में जागरूकता के एक बड़े स्रोत और उपकरण के तौर पर काम करता रहा है। श्रेय और उपलब्धि से यशस्वी होने का गौरव अगर पत्रकारिता जगत महज कुछ बाजारू तकाजों के आगे खोता है तो यह अविवेक आगे किसी बड़े और खतरनाक प्रवृति की भी शक्ल ले सकता है।