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Friday, April 22, 2022

गजल और जल


- प्रेम प्रकाश

गरज बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला, निदा फाजली की इस गजल को कई गायकों ने गाया है। पर किसी ने भी इसे चढ़े स्वर में नहीं गाया। सबने इसे प्रार्थना की तरह गाया, अजान की तरह तान भरी। दिलचस्प है कि कोस-कोस पर पानी और बोली का फर्क भांपने वाले देश में पानी कभी ऐसा मसला नहीं रहा, जिसकी चर्चा अलग से हो या उसे लेकर खूब सिर धुना जाए। पानी का जिक्र करते हुए हर तरह की तल्खी से बचने वाले भारतीय समाज के लिए जल हमेशा से एक सांस्कृतिक मसला रहा है। अच्छी बात यह है कि समाज और परंपरा के हिस्से लंबे समय से दर्ज यह समझ अब सरकारों के भी काम आ रही है। भारत जैसे देश में स्वच्छता और पानी का मुद्दा आज योजना से आगे मिशन की शक्ल ले रहा है तो इसलिए कि विकास की नीति और पहल हर लिहाज से समावेशी और संवेदनशील होने की दरकार से लैस हो, इस समझ पर खरा होने की चुनौती लगातार महसूस की जा रही है। यह भी कि खासतौर पर हवा और पानी के मुद्दे अब हमारे रोज के जीवन का हिस्सा हैं। सेंसेक्स का ऊपर या नीचे जाना हमें उतना नहीं प्रभावित करता जितना हवा-पानी की शुद्धता और उपलब्धता से जुड़े सूचकांक। अकेले पानी की बात करें तो हम दो मुल्कों की चर्चा के साथ पिछले तीन दशक में इस मुद्दे को देखने-समझने की दृष्टि में आए फर्क को ज्यादा बेहतर तरीके से समझ सकते हैं। पानी को मुद्दा या मसला से आगे मिशन तक पहुंचने के सफरनामे के एक छोर पर खड़ा है सिंगापुर तो दूसरी छोर पर भारत। एक खासा छोटा देश और दूसरा बड़ी आबादी और भौगोलिक विविधता वाला मुल्क।     

बात पहले सिंगापुर की, फिर भारत की। दुनियाभर में सैर-सपाटे के लिए सबसे पसंदीदा ठिकाने और ‘बिजनेस डेस्टिनेशन’ के रूप में सिंगापुर का नाम पूरी दुनिया में है। तीन दशक पहले जब पूरी दुनिया में ‘डिजिटिलाइजेशन’ का जोर बढ़ा तो दुनिया भर की कंपनियों ने अपने उत्पाद को यहीं से पूरी दुनिया में भेजना और प्रचारित करना सबसे बेहतर माना। पर जैसा कि आज वहां के युवाओं को भी लगता है कि सिंगापुर की एक दूसरी पहचान भी है, जो ज्यादा प्रेरक है, ज्यादा मौजू है। एक ऐसे दौर में जब जल प्रबंधन को लेकर पूरी दुनिया में तमाम तरह के उपायों की बात हो रही हैं उसमें सिंगापुर की चर्चा खासतौर पर होती है। विश्व में जल प्रबंधन के जितने भी मॉडल हैं, उसमें सिंगापुर का मॉडल अव्वल माना जाता है। आने वाले चार दशकों के लिए आज सिंगापुर के पास पानी के प्रबंधन को लेकर ऐसा ब्लूप्रिंट है, जिसमें जल संरक्षण से जल शोधन तक पानी की किफायत और उसके बचाव को लेकर तमाम उपाय शामिल हैं। सिंगापुर की खास बात यह भी है कि उसका जल प्रबंधन शहरी क्षेत्रों के लिए खास तौर पर मुफीद है। ग्रामीण आबादी वाले इलाकों में सिंगापुर का मॉडल शायद ही ज्यादा कारगर हो।  

बहरहाल, सिंगापुर के सामने लंबे समय तक यह सवाल रहा कि एक शहर-राष्ट्र जिसके पास न तो कोई प्राकृतिक जल इकाई है, न ही पर्याप्त भूजल भंडार है, जिसके पास इतनी भूमि भी नहीं कि वह बरसात के पानी का भंडारण कर सके, आखिर वह अपनी 50 लाख से ऊपर की आबादी की प्यास को कैसे बुझाए। दक्षिण पूर्वी एशियाई देश सिंगापुर का जोहार नदी (अब मलेशिया का हिस्सा) से जुड़ा 50 वर्ष पुराना अनुबंध समाप्त हो चुका है। गौरतलब है कि सिंगापुर अपनी कुल जल आपूर्ति का 40 फीसद पड़ोसी देश मलेशिया से आयात करता है। आयातित पानी का मूल्य बहुत ही कम है, क्योंकि मलेशिया ने पिछले पांच दशकों में पानी के दाम ही नहीं बढ़ाए। 

इस बीच, सिंगापुर की राष्ट्रीय जल एजंसी ‘पब्लिक यूटिलिटी बोर्ड’ (पीयूबी) 2060 तक पानी की मांग की स्वयं पूर्ति कर पाने के लिए चौबीसों घंटे कार्य कर रही है। इसका लक्ष्य है कि वह सिंगापुर की मलेशिया पर पानी की निर्भरता को सिर्फ कम ही न करे, बल्कि उसे समाप्त भी कर दे। इसके लिए उसने जल प्राप्ति की तीन पद्धतियों पर कार्य करने का निश्चय किया है। ये हैं- गंदे पानी का पुन: शुद्धिकरण, समुद्री जल का खारापन कम करना और वर्षा जल का अधिकतम संग्रहण। 

सिंगापुर से भारत सीख तो सकता है पर इस देश की आबादी और भूगोल ज्यादा मिश्रित और व्यापक है। फिर हमारे यहां पानी के अभाव से ज्यादा बड़ा सवाल उसके संग्रहण और वितरण का है। किसी भी क्षेत्र में पानी की उपलब्धता का यह कतई मतलब नहीं कि आसापास के घरों में भी पानी पहुंच रहा हो। लिहाजा पानी को लेकर भारतीय दरकार और सरोकार सिंगापुर से खासे भिन्न हैं। अलबत्ता इसे भारतीय राजनीति में प्रकट हुए साकारात्मक बदलाव के साथ सरकारी स्तर पर आई नई योजनागत समझ भी कह सकते हैं कि अब स्वच्छता और घर-घर नल से जल की पहुंच जैसा मुद्दा साल के एक या दो दिनों नारों-पोस्टरों में जाहिर होने वाली कामना और सद्भावना से आगे सरकार की घोषित प्राथमिकता है। 

इस संदर्भ में आगे चर्चा से पहले यह देखना-समझना भी जरूरी है कि आधुनिक भारत की गाथा हमें स्वाधीनता बाद के 75 सालों की यात्रा नहीं कराती बल्कि यह हमें उस दौर में ले जाती है जब देश में स्वाधीनता की ललक के साथ वह ‘नवजागरण’ भी अंगड़ाई ले रहा था, जो जीवन और प्रकृति के प्रति समझ और आचरण का एक जिम्मेदार और प्रतिबद्ध मानस रच रहा था। नवजागरण का यह मानस आज भी हमारी पंरपराओं और प्रेरणाओं में जीवंत है। इसे बुद्धिमानी ही कहेंगे कि 2014 में लाल किले से तिरंगा फहराते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महात्मा गांधी का स्मरण किया और स्वच्छता के मुद्दे को सरकार और समाज दोनों के एजंडे में शामिल कराने में बड़ी कामयाबी हासिल की। यह देश में राजनीति के उस बदले आधार और सूचकांक का भी संकेत था, जिसमें आगे यह साफ-साफ तय हुआ कि सुशासन का मुद्दा महज सरकारी दफ्तरों में फाइलों के तेजी से आगे बढ़ने और योजनागत खर्चों में शून्य की गिनती बढ़ते जाने का नाम भर नहीं है। स्वच्छता के बाद जिस तरह पानी के मुद्दे को 2019 में भारत सरकार जल जीवन मिशन के तौर पर लेकर सामने आई, वह यह दिखाता है विकास का रंग हरा या धूसर के साथ साथ नीला भी होना चाहिए। 

सिंगापुर का जिक्र हम पहले कर चुके हैं। खासतौर पर पानी के मुद्दे को वहां जिस तरह बेहतर संग्रहण और वितरण के साथ तय किया गया, उससे यह भी जाहिर हुआ कि बाजार और विकास से उत्तर-आधुनिक दरकारों पर खरा उतरने के लिए हवा-पानी जैसे मुद्दे पर एक दीर्घकालिक समझ और नीति के साथ सामने आना होगा। बीसवीं सदी के आखिरी दशक से शुरू हुआ वैश्वीकरण का जोर भारत में भी पहले गुरुग्राम, नोएडा, बंगलुरु और हैदराबाद जैसे नए-पुराने शहरों में बिजनस हब के निर्माण और वैश्विक कारोबारी मॉडल के तौर पर सामने आया। पर यह सिलसिला लंबा नहीं चला। एक तरफ शहर और गांव की दूरी बढ़ी, वहीं लोकतांत्रिक आकांक्षा के तहत देश के ग्रामीण इलाके से यह आवाज उठनी शुरू हुई कि उन्हें पहले तो विकास के बुनियादी सरोकारों के साथ जोड़ा जाए ताकि तालीम और रोजगार के क्षेत्र में उभर रही नई संभावनाओं का वे भी बराबरी के साथ हिस्सा बन सकें। इस लिहाज से जल जीवन मिशन के मकसद और उससे जुड़ी चुनौतियों की चर्चा इसलिए जरूरी है क्योंकि यह दिखाता है कि शासन और राजनीति के सूर्य को आज हम उत्तरायण और दक्षिणायन बताकर अपनी सियासी समझ पर चाहे जितना इतरा लें, हम उस सच्चाई और बदलाव को समझने से दूर रहेंगे जिसने इस दौरान तारीखी इबारत लिखी है। इस मिशन के तहत 15 अगस्त 2019 से 19 अप्रैल 2022 तक अगर देश के ग्रामीण इलाकों में लगभग साढ़े नौ करोड़ पानी के नए कनेक्शन दिए गए हैं, राज्य सरकारों के बीच 2024 से पहले सफलता के शत-फीसद  लक्ष्य को हासिल करने को लेकर एक स्वस्थ होड़ छिड़ी है, तो यह देश में राजनीति और शासन का भी वह बदला चेहरा है, जिसे देखने के लिए नए और धुले चश्मे की दरकार है। दलगत राजनीति और धर्म-संप्रदाय को देखने-पहचानने में माहिरों को अगर यह बदलाव नहीं दिख रहा तो यह बदलती दुनिया के साथ बदलते भारत को देखने का एक तंग नजरिया ही कहलाएगा। वह दिन दूर नहीं जब भारत के नक्शे में बच्चे जब रंग भरें तो वे हरित भारत की पारंपरिक छवि के साथ स्वच्छ-सजल भारत के सपने को साकार होते देख नीले रंग का भी खुशी-खुशी इस्तेमाल करें।


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