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सोमवार, 20 अप्रैल 2026

लैंगिक भेदभाव और मातृत्व

- प्रेम प्रकाश

भारत में मां को त्याग, समर्पण और अनंत जिम्मेदारियों के प्रतीक के रूप में महिमामंडित किया जाता है, लेकिन इस छवि के पीछे एक असहज सच छिपा है—बच्चों के लालन-पालन और शिक्षा का लगभग पूरा दायित्व आज भी महिलाओं के कंधों पर ही क्यों है? अच्छी बात यह है कि एक ऐसे दौर में जब संसद ऐतिहासिक नारी शक्ति वंदन अधिनियम पास करने जा रहा है, मातृत्व की भूमिका को लेकर भी गहरे सवाल खड़े हो रहे हैं। यह लैंगिक समानता और न्याय की दृष्टि से एक बड़ा बदलाव है जिसे हम अपने समय में देख रहे हैं, महसूस कर रहे हैं। आज पब्लिक डोमेन में इस बात को बढ़ा-चढ़ाकर और खासे तार्किक व स्पष्ट रूप से कहने वाले कई लोग हैं कि जब तक परिवार में बच्चों की देखभाल को महिलाओं का स्वाभाविक काम मानने की सोच नहीं बदलेगी, तब तक न तो महिलाओं की वास्तविक स्वतंत्रता संभव है और न ही एक संतुलित समाज का निर्माण।

भारत में घर के भीतर होने वाला श्रम बच्चों की देखभाल, उनकी पढ़ाई, पोषण से लेकर भावनात्मक विकास महिलाओं का दायित्व तकरीबन अनपेड और अनविजिवल है। यह काम आर्थिक आंकड़ों में नहीं दिखता, लेकिन इसकी अहमियत किसी भी औपचारिक नौकरी से कम नहीं है। इस संबंध में महिला अधिकारों की आजीवन लड़ाई लड़ने वाली रोज़ा लक्जमबर्ग का यह वक्तव्य खासा चर्चित रहा है कि जिस दिन औरतों के श्रम का हिसाब होगा, इतिहास की सबसे बड़ी धोखाधड़ी पकड़ी जाएगी।  

दरअसल, समस्या यह है कि इस अदृश्य श्रम का सबसे बड़ा हिस्सा महिलाओं के हिस्से में आता है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और संयुक्त राष्ट्र की महिला इकाई जैसी विश्व की कई संस्थाओं की रिपोर्टें लगातार यह बताती रही हैं कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में कई गुना अधिक समय अनपेड केयर वर्क करती हैं। भारत के संदर्भ में यह असंतुलन और भी गहरा है, जहां सामाजिक अपेक्षाएं महिलाओं को प्राइमरी केयरगिवर के रूप में स्थापित कर देती हैं। इन सबका असर केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि महिलाओं के करियर और आर्थिक स्वतंत्रता पर सीधा पड़ता है। 

अशोका यूनिवर्सिटी के एक चर्चित अध्ययन के अनुसार भारत में लगभग आधी कामकाजी महिलाएं 30 वर्ष की उम्र के आसपास नौकरी छोड़ देती हैं और इसका सबसे बड़ा कारण बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी है। यह आंकड़ा किसी व्यक्तिगत पसंद का नहीं, बल्कि उस सामाजिक ढांचे का प्रतिबिंब है, जिसमें महिलाओं से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने पेशेवर जीवन से पहले परिवार को प्राथमिकता दें, जबकि पुरुषों पर ऐसी कोई बाध्यता नहीं होती।

हमारे समाज में अच्छी मां की जो परिभाषा गढ़ी गई है, वह इतनी कठोर और एकतरफा है कि वह महिला की बाकी सभी पहचानों को पीछे छोड़ देती है। एक आदर्श मां वह मानी जाती है जो हर समय बच्चे के लिए उपलब्ध हो, उसकी हर जरूरत का ध्यान रखे और अपने व्यक्तिगत सपनों को पीछे छोड़ दे। इसके उलट, पिता की भूमिका अक्सर केवल आर्थिक जिम्मेदारियों तक सीमित कर दी जाती है। यह असमानता केवल महिलाओं पर जरूरत से ज्यादा मानसिक और शारीरिक बोझ नहीं डालती, बल्कि बच्चों की सोच को भी उसी दिशा में ढाल देती है। वे बचपन से ही यह मानने लगते हैं कि घर और देखभाल की जिम्मेदारी महिलाओं की है, जबकि पैसे कमाना पुरुषों का काम है।

बच्चों की देखभाल के इस स्त्रीकरण का व्यापक आर्थिक प्रभाव भी है। भारत में महिलाओं की श्रम भागीदारी दर पहले से ही चिंताजनक रूप से कम है, और इसका एक बड़ा कारण यही असमान केयर बर्डन है। विश्व बैंक सहित कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं यह मानती हैं कि यदि महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़े, तो देश की जीडीपी में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। लिहाजा, सरकार औऱ समाज दोनों को इस बात को समझना होगा कि जब महिलाएं अपने जीवन के सबसे उत्पादक वर्षों में बच्चों की देखभाल के कारण नौकरी छोड़ने को मजबूर होती हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत नुकसान नहीं, बल्कि राष्ट्रीय क्षति भी है।

महिला हित में उठी जागरूक आवाजों की यह देन है कि “डिफेमिनाइजेशन ऑफ चाइल्डकेयर” की अवधारणा पर विभिन्न मंचों पर बात हो रही है। यह अवधारणा न सिर्फ समस्या पर विचार करती है बल्कि इसके लिए समाधान भी सुझाती है। यह जागरूक अवधारणा इस दरकार को गहरे तौर पर रेखांकित कर रही है कि बच्चों की देखभाल को केवल महिलाओं की जिम्मेदारी मानने की सोच को खत्म करना और इसे परिवार व समाज की साझा जिम्मेदारी के रूप में स्थापित करना समय की मांग है। अलबत्ता इस दरकार को पूरा होने के लिए यह जरूरी होगा कि इसके लिए जरूरी सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया में पुरुष सक्रिय रूप से शरीक हों। क्योंकि बिना इसके लैंगिक समानता का आदर्श कोरा कागजी ही बना रहेगा। 

आज स्थिति यह है कि महिलाओं पर केवल बच्चों की देखभाल ही नहीं, बल्कि उनकी शिक्षा, होमवर्क, स्कूल से जुड़े संवाद और भावनात्मक मार्गदर्शन की जिम्मेदारी भी अधिक होती है। यह “डबल बर्डन” उन्हें लगातार थकान, तनाव और कई बार बर्नआउट की स्थिति में पहुंचा देता है। कामकाजी महिलाएं दिनभर नौकरी करने के बाद घर लौटकर दूसरी शिफ्ट में प्रवेश करती हैं, जहां उनसे वही अपेक्षाएं की जाती हैं जो एक पूर्णकालिक गृहिणी से की जाती हैं।

लिहाजा, इस समस्या का समाधान केवल नीतियों से नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता में बदलाव से संभव है। पितृत्व अवकाश को बढ़ावा देना, कार्यस्थलों पर लचीली नीतियां लागू करना, और क्रेच व डे-केयर जैसी सुविधाओं का विस्तार करना जरूरी कदम हैं, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है सोच में बदलाव। जब तक मां का स्वाभाविक कर्तव्य जैसी धारणाएं समाज के भीतर गहराई से जमी रहेंगी, तब तक कोई भी नीति पूरी तरह प्रभावी नहीं हो पाएगी। बच्चों को बचपन से ही यह सिखाना होगा कि घर और परिवार की जिम्मेदारियां साझा होती हैं, न कि किसी एक लिंग की।

महिलाओं के सशक्तिकरण की चर्चा अक्सर शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक भागीदारी तक सीमित रह जाती है, लेकिन असली कसौटी घर के भीतर तय होती है। यदि एक महिला को अपने ही घर में बराबरी का अधिकार नहीं मिलता, तो बाहर की उपलब्धियां भी अधूरी रह जाती हैं। “वुमन डेवलपमेंट” से “वुमन-लेड डेवलपमेंट” की बात तब ही सार्थक होगी, जब महिलाएं केवल देखभाल की भूमिका तक सीमित न रहकर निर्णय लेने और नेतृत्व की प्रक्रिया में बराबरी से भाग लें।

आखिरकार सवाल यही है कि क्या हम बच्चों के लालन-पालन को एक साझा सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में देखने को तैयार हैं, या हम इसे अब भी महिलाओं के त्याग और कर्तव्य के रूप में ही देखते रहेंगे? जब तक इस प्रश्न का ईमानदार उत्तर नहीं खोजा जाएगा, तब तक हर मां के भीतर एक अधूरी पहचान बनी रहेगी और समाज अपनी आधी संभावनाओं को यूं ही खोता रहेगा।

(दैनिक भास्कर 15.04.26)



शनिवार, 26 जनवरी 2019

जिद्दी प्रतिरोध की अक्षर दुनिया


- प्रेम प्रकाश

भारत में महिला लेखन के जरिए स्त्री संघर्ष, चेतना और अस्मिता की जो अक्षर दुनिया पिछले कुछ दशकों में आबाद हुई है, उस दुनिया में रचनात्मक हस्तक्षेप की जो सबसे बड़ी धुरी है, उसे चिन्हित करने में कृष्णा सोबती का बड़ा योगदान रहा है। कृष्णा जी ने महिलावादी आंदोलन की वैश्विकता के बीच स्त्री, समाज और परंपरा को अपने तरीके से एक सीध में रखकर देखा। 1950 में कहानी ‘लामा’ से साहित्यिक सफर शुरू करने वाली इस महान लेखिका ने महिला पक्ष के साथ अपने समय के हस्तक्षेप को भी काफी निर्भीक तरीके से लिखा और बोला। इसलिए उनके लेखन और जीवन की रचनात्मक चौहद्दी को बांधना आसान नहीं है।

उनके लेखन में अगर किसी पहाड़ी नदी की तरह आधी दुनिया की हहराती संवेदना है तो समय और समाज की उस चिंता से भी वह हरसंभव मुठभेड़ करती हैं, जिसके लिए कलम को सीधे-सीधे आंदोलन और प्रतिरोध का हथियार बनना पड़ता है।

यह नहीं कि आज जब कृष्णा सोबती हमारे बीच नहीं हैं, तो उनके लेखन और जीवन को लेकर हम भावनात्मक रूप से अतिरिक्त रूप से विवश या सम्मोहन का शिकार हुए जा रहे हैं, बल्कि यह तो उनके जीते-जी ही हो गया था कि समकालीन भारतीय साहित्य की कोई भी कतार बगैर उनके नाम के पूरी नहीं होती है। उनकी नाक पर चढ़े बड़े ऐनक में हम सब अपनी दुनिया को आलोचकीय विवेक के साथ देखने-समझने के आदी बहुत पहले हो गए हैं।

उनकी स्मृति को प्रणाम करते हुए हम अगर उस दौर की स्थितियों को देखें-समझें, जब वो अपनी स्वीकृति और उभार के लिए संघर्ष कर रही थीं तो साफ दिखता है कि नई कहानी आंदोलन के भीष्म साहनी और कमलेश्वर से लेकर राजेंद्र यादव जैसे नामवर सितारों के बीच एक लेखिका कैसे अपने जिद्दी महिला किरदारों के साथ कथा और जीवन का एक नया साझा रचने का जोखिम उठाती है। हिंदी संवेदना की अक्षर दुनिया में यह एक बड़ा मोड़ ही नहीं, एक साहसी हस्तक्षेप भी था। मृदुला गर्ग से लेकर ममता कालिया, नासिरा शर्मा और उनके बाद की कथाकारों तक यह दुनिया अगर लागातार आबाद और सघन होती चली गई तो इसलिए क्योंकि इस विस्तार को कृष्णा जी पाठकों के बीच बड़ी स्वीकृति दिला चुकी थीं। हिंदी आलोचना ने इस रचनात्मक स्वीकृति के दमखम को भले देर-सबेर पहचाना हो पर स्त्री विमर्श का समकालीन सर्ग आज अगर एक बड़ी आलोचकीय दरकार का नाम है तो इसलिए क्योंकि इसने जीवन और लेखन के पुरुषवादी मिथ को निणार्यक रूप से तोड़ दिया है।

कृष्णा जी को पिछले साल ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा गया था। इससे पहले उपन्यास ‘जिंदगीनामा’ के लिए उन्हें वर्ष 1980 का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। उन्हें 1996 में अकादमी के उच्चतम सम्मान साहित्य अकादमी फेलोशिप से भी नवाजा गया था। इसके अलावा पद्मभूषण, व्यास सम्मान, शलाका सम्मान जैसे अलंकरण उनकी यशस्विता को बढ़ाते हैं। उन्होंने अपने लेखन से हिंदी की कम से कम दो पीढ़ियों को रचनात्मक संवेदना से जोड़ा है। उनके कालजयी उपन्यासों में ‘सूरजमुखी अंधेरे के’, ‘दिलोदानिश’, ‘जिंदगीनामा’, ‘ऐ लड़की’, ‘समय सरगम’, ‘मित्रो मरजानी’, ‘जैनी मेहरबान सिंह’, ‘हम हशमत’, ‘बादलों के घेरे’ ने कथा साहित्य को अप्रतिम ताजगी और स्फूर्ति प्रदान की है।

उनकी रचनात्मक सक्रियता के आखिरी दिनों में आई ‘बुद्ध का कमंडल लद्दाख’ और ‘गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान’ जैसी पुस्तकें ये दिखाती हैं कि वह मौजूदा देशकाल और परिस्थिति को देखते-समझते हुए किस तरह अपने रचनात्मक शिल्प और कथ्य को लगातार विचार और लोकतंत्र की हिफाजत के औजार के तौर पर मांज रही थीं।

18 फरवरी 1924 को गुजरात (वर्तमान पाकिस्तान) में जन्मीं कृष्णा सोबती हमेशा साहसपूर्ण रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए जानी जाती रहेंगी। निजी जिंदगी से लेकर अपने शब्दों की दुनिया को वे लगातार इस काबिल बनाए रखने में सफल रहीं, जिस कारण उनके प्रति सम्मान रखने वालों का समाज हर तरह के इकहरेपन का अतिक्रमण करता है। दिलचस्प है कि यह अतिक्रमण खुद उनके जीवन और लेखन का भी हिस्सा रहा है। 94 साल का जीवन जिस दुनिया में उन्होंने जिया, उसमें जब-जब कोई महिला आजादख्याली की बात करेगी, जब-जब लेखकों-बौद्धिकों की जमात अभिव्यक्ति की निर्भीक आजादी की बात करेगी, तब-तब उनकी स्मृति हमें रचनात्मक ऊर्जा से समृद्ध करती रहेगी।

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016

खबरिया चैनल बिगाड़ रहे राजस्थानी महिला की छवि


- प्रेम प्रकाश
सनसनी पैदा करने के चक्कर में मीडिया कई बार ऐसी हिमाकतों से गुजर जाता है, जिसका खामियाजा देश और समाज को आगे लंबे समय तक उठाना पड़ता है। बात करें महिला अपराध की तो यह एक ऐसा संवेदनशील मसला है, जिससे खबरिया आपाधापी में अकसर गंभीर चूक होती है। यह चूक कितनी बड़ी और घातक हो सकती है इसकी मिसाल हाल की जयपुर की एक घटना है। टीवी चैनलों पर आधे-आधे घंटे इस घटना पर विशेष शो दिखाए गए। बताया गया कि एक मां भी हत्यारी हो सकती है और वह भी अपने चार माह के दूधमुंहा बच्ची की। एंकर से लेकर रिपोर्टर इस घटना में एक मां की हिंसक जघन्यता को यह कहते हुए रेखांकित करने में लगे रहे कि कैसे एक मां की ममता इतनी कमजोर पड़ गई कि उसने अपनी गोद में खेलती बेटी की हत्या का फैसला ले लिया। जबकि जो खबर थी उसमें यह तथ्य भी शामिल था कि यह सब उस मां ने क्यों और किस दबाव में किया यह पूरी तरह साफ नहीं। क्योंकि एक अंदेशा यह भी जताया जा रहा कि संभव है कि वह मां ऐसा नहीं करना चाहती हो पर उसके ऊपर इसके लिए दबाव हो। पितृसत्तात्मक समाज में यह दबाव किस तरह पारिवारिक-सामाजिक स्तर पर स्त्री मन को तोड़ता-बदलता है, इसके तो अब कई चौंकाने वाले अध्ययन तक सामने आ चुके हैं। फिर बगैर मामले के पूरी तह में गए अगर किसी की छवि को निर्णायक तौर पर स्याह करार दे दिया जाए और वह भी किसी महिला की तो यह न सिर्फ एक गैरजिम्मेदार बल्कि खुद अपने में हिंसक रवैया है।  इस मामले में महिला मामलों में बरती जाने वाली संवेदनशीलता तो खैर नहीं ही दिखी, अव्वल ऐसी सोच जरूर हावी है कि अगर कोई महिला अपराध करती है तो वह पहली नजर में ही अक्षम्य है, नाकाबिले बर्दाश्त है। पलटकर यह सवाल अगर मीडिया के माननीयों से पूछा जाए कि एक ऐसे दौर में जब हर 18 मिनट में देश की कोई न कोई बेटी किसी पुरुष की हवस का शिकार बन रही है, अदालती हिदायतों और कानूनी सख्ती के बावजूद आधी दुनिया के चेहरे पर एसिड फेंकने की घटनाएं रुकी नहीं हैं, फिर एक महिला के अपराधी होने को लेकर इतनी दिलचस्पी आखिर क्यों? क्या यह दिलचस्पी उसी मानसिकता की देन नहीं है, जिससे महिलाएं घर-परिवार से लेकर कार्यस्थलों पर असुरक्षित हैं, शारीरिक से लेकर मानसिक उत्पीड़न का शिकार हैं।  जयपुर की जिस घटना को लेकर इतनी बातें हो रही हैं, वह घटना 26 अगस्त की है। पुलिस को उस दिन सूचना मिली कि शास्त्रीनगर इलाके मेंएक व्यक्ति की चार माह की बेटी घर में ही रखे हुये एसी कैबिनेट में मृत पायी गई है। मकान में रहने वाले एवं घटना के समय मौजूद लोगों से गहनता से पूछताछ की गयी तो बच्ची की मां की भूमिका पर संदेह हुआ। मृतका बच्ची अपनी मां नेहा के पास अपने बेडरूम में सोई थी। उसके बाद बच्ची लहुलुहान हालात में उसके बेडरूम से कुछ ही दूरी पर स्थित हॉल में रखे लोहे के एसी केबिनेट में मृत पायी गयी। लेकिन बच्ची के एसी केबिनेट में पहुंचने को लेकर मां कुछ भी नहीं बता सकी। अलबत्ता एफएसएल टीम द्बारा जुटाये गए सबूतों में पाया गया कि कि मृतका बच्ची की मां के नाखूनों में रक्त पाया गया व उसके बेडरूम से अटैच बाथरूम में भी रक्त पाया गया। इसमें कहीं दो मत नहीं कि इस दुर्भाग्यपूणã घटना की शुरुआती तफ्सील ही किसी को भी अंदर तक हिला देने वाली है। हर लिहाज से यह घटना पूरी तरह आपवादिक जान पड़ता है क्योंकि ऐसा किसी समान्य सामाजिक-पारिवारिक स्थिति में संभव ही नहीं।  पर दुर्भाग्य से इस आपवादिक खबर में सनसनी देखने वालों ने इस बहाने राजस्थान में बालिका भ्रूण हत्या से लेकर महिलाओं की असुरक्षित स्थिति तक कई नतीजे निकाल लिए। जबकि तथ्य और सच्चाई कुछ और है। राजस्थान में जहां वर्ष 2०11 की जनगणना में ० से 6 वर्ष तक का लिगानुपात महज 888 था, वह 2०15 आते-आते 37 अंक बढ़कर 925 हो गया है। दरअसल, प्रदेश में 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान के प्रभावी क्रियान्वयन के साथ ही, लिगानुपात बढ़ाने के लिए विभिन्न योजनाएं चलाई जा रही हैं। भामाशाह योजना, राजश्री योजना, आपणी बेटी योजना सहित अन्य कई योजनाएं प्रदेश में संचालित की गई हैं, जो महिला सशक्तीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो रही हैं। साथ ही, जिन परिवारों में बेटी का जन्म होता है, उन्हें मुख्यमंत्री द्बारा हस्ताक्षरित बधाई पत्र भेजा जाता है। प्रदेश में लिगानुपात बढाने के लिये राज्य सरकार द्बारा प्रसव पूर्व लिग जांच की गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए अपनी तरह की पहली मुखबिर योजना और जीपीएस युक्त सोनोग्राफी मशीनों जैसे नवाचार किए गए हैं। इन सब योजनाओं के आशातीत परिणाम आए हैं। ऐसे में महज एक खबर की नोक पर राज्य में महिलाओं के लिए सरकार और समाज की सारी तत्परता और बड़ी पहलों को नकार देना कितना गलत और घातक है, समझा जा सकता है।  राजस्थान से निकलकर पूरे देश की बात करें खासतौर पर निर्भया मामले के बाद कई स्तरों पर जागरुकता बढ़ी है। इस दौरान बलात्कार सहित महिलाओं के खिलाफ अपराध को रोकने को लेकर कई वैधानिक सख्तियां भी सरकारें लेकर आई हैं। इससे आगे महिलाएं पूजास्थलों में प्रवेश से रोके जाने जैसी मध्यकालीन सोच को भी समाज से लेकर अदालतों तक चुनौती दे रही हैं। बात करें मौजूदा केंद्र सरकार की तो उसने तो बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ से लेकर स्तनपान को प्रश्रय तक कई बड़े अभिक्रम एक के बाद एक शुरू किए हैं। ऐसे में देश में महिला सम्मान और सुरक्षा की राह पर सरकार और समाज के साथ मीडिया को कदम आगे बढ़ाने की दरकार है। यह दरकार इस लिहाज से जरूरीअमल की मांग करता है क्योंकि आजादी के आंदोलन के लंबे दौर से बाद तक मीडिया देश में जागरूकता के एक बड़े स्रोत और उपकरण के तौर पर काम करता रहा है। श्रेय और उपलब्धि से यशस्वी होने का गौरव अगर पत्रकारिता जगत महज कुछ बाजारू तकाजों के आगे खोता है तो यह अविवेक आगे किसी बड़े और खतरनाक प्रवृति की भी शक्ल ले सकता है।