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शनिवार, 17 मार्च 2018

थ्योरी से ज्यादा डॉयलोग पर भरोसा


- प्रेम प्रकाश

स्टीफन हॉकिंग की सबसे अच्छी बात यह थी कि वे डायलॉग में विश्वास करते थे। बहस करना उनकी आदत में शामिल नहीं था
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विज्ञान दुरूह नहीं बल्कि खासा दिलचस्प है। हमारे दौर में इस बात को जिस शख्सियत ने अपने कार्य और विचार से सबसे प्रभावशाली तरीके से समझाया, वे थे महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग। हॉकिंग ने विज्ञान के क्षेत्र में अपने काम से दुनियाभर में करोड़ों युवाओं को विज्ञान पढ़ने के लिए प्रेरित किया। अलबत्ता हॉकिंग ने विज्ञान की नजर से ही भगवान, पृथ्वी पर इंसानों का अंत और एलियनों के अस्तित्व पर अपनी बात पुरजोर अंदाज में रखी। यह निर्भीकता इसलिए भी अहम है क्योंकि गैलिलियो की तरह हॉकिंग को भी इपने इन बयानों के लिए धार्मिक संस्थाओं की ओर से विरोध का सामना भी करना पड़ा था।

ईश्वर के अस्तित्व को नकारा 
स्टीफन हॉकिंग ने अपनी किताब 'द ग्रांड डिजाइन' में भगवान के अस्तित्व को सिरे से नकारा है। उन्होंने एक नए ग्रह की खोज के बारे में बात करते हुए हमारे सौरमंडल के खास समीकरण और भगवान के अस्तित्व पर सवाल उठाया। साल 1992 में एक ग्रह की खोज की गई थी, जो हमारे सूर्य की जगह किसी अन्य सूर्य का चक्कर लगा रहा था। हॉकिंग ने इसका ही उदाहरण देते हुए कहा, ‘ये खोज बताती है कि हमारे सौरमंडल के खगोलीय संयोग- एक सूर्य, पृथ्वी और सूर्य के बीच में उचित दूरी और सोलर मास, सबूत के तौर पर ये मानने के लिए नाकाफी हैं कि पृथ्वी को इतनी सावधानी से इंसानों को खुश करने के लिए बनाया गया था।’

गुरुत्वाकर्षण से बनी सृष्टि
उन्होंने सृष्टि के निर्माण के लिए गुरुत्वाकर्षण के नियम को श्रेय दिया। हॉकिंग कहते हैं, ‘गुरुत्वाकर्षण वह नियम है, जिसकी वजह से ब्रह्मांड अपने आपको शून्य से एक बार फिर शुरू कर सकता है और करेगा भी। ये अचानक होने वाली खगोलीय घटनाएं हमारे अस्तित्व के लिए जिम्मेदार हैं। ऐसे में ब्रह्मांड को चलाने के लिए भगवान की जरूरत नहीं है।’ हॉकिंग को इस बयान के लिए ईसाई धर्म गुरुओं की ओर से विरोध का सामना करना पड़ा।

ब्रह्मांड और एलियन
स्टीफन हॉकिंग ने दुनिया के सामने ब्रह्मांड में एलियनों के अस्तित्व को लेकर कड़ी चेतावनी दी थी। उन्होंने अपने लैक्चर 'लाइफ इन द यूनिवर्स' में भविष्य में इंसानों और एलियन के बीच मुलाकात को लेकर अपनी राय रखी थी। भौतिक शास्त्र के इन महान वैज्ञानिक ने कहा था, ‘अगर पृथ्वी पर जीवन के पैदा होने का समय सही है तो ब्रह्मांड में ऐसे तमाम तारे होने चाहिए जहां पर जीवन होगा। इनमें से कुछ तारामंडल धरती के बनने से 5 बिलियन साल पहले पैदा हो चुके होंगे।’ इस सवाल पर कि ऐसे में गैलेक्सी में मशीनी और जैविक जीवन के प्रमाण तैरते क्यों नहीं दिख रहे हैं। अब तक कोई पृथ्वी पर कोई क्यों नहीं आया और इस पर कब्जा क्यों नहीं किया गया, हॉकिंग ने कहा, ‘मैं ये नहीं मानता कि यूएफओ में आउटर स्पेस के एलियन होते हैं। मैं सोचता हूं कि एलियन का पृथ्वी पर आगमन खुल्लमखुल्ला होगा और शायद हमारे लिए ये अच्छा नहीं होगा।’

चौंकाने वाला एलान
हॉकिंग ने पृथ्वी पर इंसानियत के भविष्य को लेकर चौंकाने वाला एलान किया था। उन्होंने कहा था, ‘मुझे विश्वास है कि इंसानों को अपने अंत से बचने के लिए पृथ्वी छोड़कर किसी दूसरे ग्रह को अपनाना चाहिए और इंसानों को अपना वजूद बचाने के लिए अगले 100 सालों में वो तैयारी पूरी करनी चाहिए जिससे पृथ्वी को छोड़ा जा सके।’

नार्लीकर की स्मृति में हॉकिंग
भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. जयंत विष्णु नार्लीकर ने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में हॉकिंग के साथ पढ़ाई की थी। इसके बाद साइंस से संबंधित कई ग्लोबल सम्मेलनों में दोनों की मुलाक़ात होती रही। डॉ. नार्लीकर के अनुसार, ‘कॉलेज के दिनों में वो स्टीफन हॉकिंग के साथ टेबल टेनिस के मैच भी खेल चुके हैं।’ कॉलेज की उन यादों पर उन्होंने कई दिलचस्प जानकारियां हॉकिंग के बारे में दी। उन्होंने बताया कि वे मुझसे साल दो साल जूनियर ही थे। वो बाकी आम स्टूडेंट्स की तरह ही थे। उस वक़्त कोई उनकी प्रतिभा के बारे में नहीं जानता था। लेकिन कुछ सालों के भीतर ही लोगों को ये अंदाज़ा हो गया था कि स्टीफन में कुछ खास बात है।

कैंब्रिज में हॉकिंग
डॉ. नार्लीकर के शब्दों में, ‘मुझे याद है कि ब्रिटेन की रॉयल ग्रीनविच शोध विद्यालय ने साल 1961 में एक साइंस सम्मेलन आयोजित किया था। वहां स्टीफन हॉकिंग से पहली बार मेरी सीधी मुलाकात हुई थी। उस वक्त वह ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे। मैं एक छात्र ही था, लेकिन मुझे वहां एक लेक्चर देने के लिए बुलाया गया था। लेक्चर शुरू होने के कुछ देर बाद ही मैंने पाया कि एक स्टूडेंट है जो बहुत ज़्यादा सवाल कर रहा है। वो थे स्टीफन हॉकिंग। उन्होंने मुझ पर सवालों की बौछार कर दी थी। वो ब्रह्मांड के विस्तार के बारे में जानना चाहते थे. वो जानना चाहते थे कि बिग बैंग थियोरी है क्या?’
हॉकिंग पीएचडी करने के लिए कैंब्रिज यूनिवर्सिटी गए थे। उस वक़्त तक लोगों को समझ आ चुका था कि हॉकिंग के मस्तिष्क की क्षमता कितनी है। उनकी पीएचडी की थीसिस पढ़कर सब हैरान रह गए थे। अपनी थीसिस में ब्रह्मांड के विस्तार के बारे में उन्होंने कई बेहद दिलचस्प बातें लिखी थीं। उन्होंने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में बतौर प्रोफेसर क़रीब 30 साल काम किया। ब्लैक होल पर उनकी रिसर्च को सबसे ज़्यादा पहचान मिली।

डॉयलोग पर यकीन
उनकी सबसे अच्छी बात थी कि वे डायलॉग में विश्वास करते थे। बहस करना उनकी आदत में शामिल नहीं था। डॉ. नार्लीकर बताते हैं कि कैंब्रिज में उनके साथ मैंने विज्ञान के कई सिद्धांतों पर कई बार चर्चा की, लेकिन कभी हमारे बीच गर्म बहस नहीं हुई. हमने हमेशा एक दूसरे से सीखा ही। अपनी बीमारी की वजह से बीते कई सालों से स्टीफनलेक्चर नहीं दे पा रहे थे, लेकिन लोगों की जिज्ञासाओं और उनके सवालों के जवाब वे कई माध्यमों से देते रहे।’ हॉकिंग इस बात को जोर देकर कहते थे कि दुनिया किसी ईश्वर के इशारे पर नहीं चलती। भगवान कुछ नहीं है और संभावना है कि इस विश्व के अलावा भी कोई दुनिया हो। लोगों को हमेशा ये उनकी कल्पना ही लगी। स्टीफनके पास भी इसे साबित करने के लिए कोई पुख़्ता सबूत नहीं थे। लेकिन उन्होंने मरते दम तक इसे साबित करने की कोशिश की। उनकी इस ललक का सम्मान किया जाना चाहिए।

शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

शेक्सपियर के नाटक और स्टीफेंस का बयान

ब्रह्मांड का रहस्य जटिल तो है पर अबूझ नहीं। इस रहस्यमयता का भेदन रोमांटिक तो हो सकता है पर डरावना कतई नहीं। इसलिए यह मानने का भी कतई कोई कारण नहीं है कि इस सृष्टि का स्रष्टा ईश्वर है। स्टीफन विलियम हॉकिंग जब यह कहते हैं तो उनकी वैज्ञानिक दृष्टि की सूक्ष्मता और उपलब्धि देखकर कोई भी कायल हो जाए। ब्राह्मांड की रचना को समझने और इसके रहस्य को आम आदमी की दिलचस्पी का विषय बनाने वाले हॉकिंग जितने बड़े भौतिकविज्ञानी हैं, उतने ही लोकप्रिय विचारक भी। उनकी शारीरिक विवशता उनकी जीवटता से लगातार हारी है। इस लिहाज से वे मानवीय संघर्ष क्षमता के भी जीवंत उदाहरण हैं।  
पर यहां इस महान प्रतिभा की आभा से बाहर निकलकर कुछ और बातें समझने की दरकार है। ज्ञान जब विज्ञान की  खड़ाऊं पहन ले तो अज्ञान की धुंध जितनी नहीं छंटती, उससे ज्यादा छंटता है वह स्पेस- जहां हमारी संवेदना, हमारा मन, हमारा प्रेम और उससे भी आगे हमारा जीवन अपनी स्वाभाविकता को प्राप्त करता है। मानवीय चेतना की विलक्षणता ही यही है कि वह दिल और दिमाग को कंपार्टमेंटली बिलगाती नहीं है बल्कि एक साथ बाएं और दाएं हाथ की तरह काम करती है। न तो साझीदारी का कोई आनुपातिक सिद्धांत और न ही एक-दूसरे के खिलाफ जाने और दिखने का कोई आग्रह।
हिंदी के वरिष्ठ आलोचक डॉ. नगेंद्र की छायावाद को लेकर प्रसिद्ध उक्ति है कि यह 'स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह' है। दिलचस्प है कि यहां जिस सूक्ष्मता को रेखांकित किया गया है, वह हॉकिंग जैसे वैज्ञानिकों को महान बनाने वाली सूक्ष्मता से सर्वथा भिन्न है, विपरीत है। अपने जीवन के 70 वसंत पूरा करते हुए हॉकिंग ने सूक्ष्मता के अनंत को तलाशते हुए अचानक उस संवेदना और प्रेम के रहस्यवादी जाले में फंस गए, जिसे कलम और कूची थामने वालों ने सबसे ज्यादा धैर्य और दिलचस्पी के साथ समझने की कोशिश की है। रचना और कला क्षेत्र का यह धैर्य कोई समाधानकारी छोर को भले न छू पाए हों पर इसमें सवाल और जवाब के टकराव को ठहराव के चिंतन में बदलने की संवेदनशील कोशित तो दिखती ही है। हां, यह जरूर है कि यह ठहराव यहां भी कुछ दुराग्रहियों और पूर्वाग्रहियों के यहां सिरे से गायब है।  
हॉकिंग का यह कहना कि महिलाएं एक ऐसी रहस्य हैं, जिन्हें समझना नामुमकिन है। उनके वैज्ञानिक होने की कसौटी को नए सिरे से परिभाषित कर गया। विज्ञान और कला को प्रतिलोमी देखने की समझदारी नई नहीं है। विरोध के इस पूर्वाग्रह को पूरकता में देखने का समाधान काफी सुकूनदेह है। पर विज्ञान और कला में एक दूसरे की पूरकता तलाशने का समाधान कम से कम हॉकिंग के यहां तो उनके नए विवादास्पद बयान से नहीं दिखता है। आइंस्टीन की सापेक्षता से टकराने और एक हद तक उसे आगे ले जाने वाले हमारे समय की सबसे विलक्षण प्रतिभा हॉकिंग कम से कम मानवीय विमर्श में अपने पूर्वज को पीछे नहीं छोड़ पाए हैं। अपने जीवन के बाद के दिनों में आइंस्टीन की जिज्ञासाएं महात्मा गांधी की प्रार्थना और सत्य, अहिंसा और करुणा के दर्शन में अपना समाधान देखती थी। विज्ञान की सूक्ष्मता उन्हें मानवीय तरलता के आगे स्थूल और अपरिहार्य मालूम पड़ती थी।
कई सफल सिद्धांतों के जनक स्टीफेंस हॉकिंग के सत्तर साला जीवन में दो असफल शादियों के दुखद वृतांत दर्ज हैं। महिलाओं को अबूझ कहने की उनकी दलील उन हिंसक पात्रों की याद दिलाती है, जो शेक्सपियर के नाटकों में ऐसी ही जबान में अपने संवाद बोलते हैं। आखिर ऐसा क्यों है कि महिलाओं को 'सभ्यता की भुक्तभोगिनी' की नियति देने वाला पुरुष आग्रह आज भी महिलाओं की छवि को कहीं न कहीं नकारात्मक और गैरभरोसेमंद बताने से बाज नहीं आता। कात्यायनी के शब्दों में इस आधुनिक 'पौरुषपूर्ण समय' में स्त्री अस्मिता का संकट ज्यादा जटिल, ज्यादा भयावह है। खतरनाक यह भी कम नहीं कि हमारे समय का सबसे ज्यादा तेज-तर्रार वैज्ञानिक दिमाग भी महिला मुद्दे पर खासा हिला दिखता है।