शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

आहत रुपया

आपकी अंटी में मेरी मौजूदगी नई नहीं है। नई बात तो है वह गिरावट जो मेरी हैसियत में आई है। मंडी-हाट में मेरी आमद-रफ्त पुरानी है। पर अब तो जिक्र बाजार का होता है। मंडियों की गद्दियों पर बैठने वाले सेठ-साहूकार तो बीते जमाने की बात हो गए। अब तो मेरी हैसियत का 'अर्थ’ बताते हैं बाजार के पंडित। अर्थ आज पूरी एक व्यवस्था है।
भूमंडलीकरण की छतरी के नीचे बैठे तमाम आर्थिक दिग्गज जब यह बताते हैं कि मेरी सेहत तारीखी तौर पर बिगड़ रही है तो हैरत मुझे भी होती है। मैं नहीं चाहता कि मुझे कोई जल्द स्वस्थ होने की शुभकामना दे पर इतनी कामना तो मेरी भी है कि मेरे आगे यह साफ हो कि क्या मैं सचमुच काफी कमजोर हो गया हूं या फिर कोई मुझसे ज्यादा मजबूत है इसलिए उसके सामने मुझे पिद्दी बताया जा रहा है। मैं जानता हूं आंखों पर बड़े फ्रेम का चश्मा चढ़ाकर मेरा बुखार मापने वाले मुझे बस जल्द स्वस्थ होने की शुभकामना ही देंगे। वे यह नहीं बताएंगे कि मुझे जिन महाबलियों के आगे लगातार कमजोर सिद्ध किया जा रहा है, उनकी बढ़ी ताकत के पीछे राज क्या है।
मैं कोई मूढ़ नहीं बल्कि तालीमशुदा हूं। मुझसे यह बात छिपी नहीं कि मेरा कद और मेरी वकत डॉलर के मुकबले आंकी जा रही है। यह मुकाबला मेरा चुनाव नहीं है। मुझे इस मुकाबले में उतरना पसंद भी नहीं। मैं तो उलटे सवाल करना चाहूंगा देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का दिलासा दिलाने वाले तमाम 'मनमोहनों’ से कि उन्होंने मेरी इज्जत दूसरों के सामने यों क्यों उछाली। देश की आजादी के आसपास तो डॉलर की भी वही हैसियत थी जो मेरी। फिर पिछले छह दशकों और खासकर हालिया दो-तीन दशकों में ऐसा क्या हो गया कि डॉलर दुनियाभर की मुद्राओं के लिए एक पैमाना बन गया। क्या यह मुनासिब है? और यह मुनासिब है तो बगैर मेरी ताकत के यह देश आर्थिक महाशक्ति होने का दावा क्या हवा में कर रहा है। अगर देश की मुद्रा की इकाई ही कमजोर है तो फिर वह देश समृद्धि और विकास की दहाई, सैकड़ा, हजार... की दूरी कैसे पूरी कर सकता है। यह अर्थ का ज्ञान नहीं अनर्थ करने की सनक है। और मुझे ऐसे सनकी अगर बख्श ही दें तो अच्छा होगा।
जब कभी मेहनत और पसीने का फल होने की इज्जत मुझे दी जाती है तो मेरे साथ मेरे धारकों को भी फL और संतोष होता है, अपने स्वाबलंबन का, अपने पुरुषार्थ का। आज तो मेरे चेहरे को भी काला-सफेद कर दिया गया है। कई तिजोरियों में मैं काले धन के तौर पर सिसक रहा हूं तो कहीं सफेद होने के बावजूद गरीबी रेखा के नीचे दुबके रहने पर मजबूर हूं।
एक शिकायत मेरी उन तर्कवीरों से भी हैं जो अपनी अगाध राष्ट्र आस्था के नाम पर यह सवाल उछाल रहे हैं कि क्या कमजोर रुपया मतलब कमजोर राष्ट्र है? मैं खुद के कभी सोने या तांबे-पीतल होने को लेकर कोई अकड़ नहीं रखता। पर इतना मुझे भी पता है कि अगर देश के तिरंगे को कमजोर कहने की हिमाकत राष्ट्रीय अपराध है, देश की सेना को कायर कहना राष्ट्रद्रोह है तो देश के करोड़ों मेहनतकशों की कमाई की कीमत को भी कमतर आंकना राष्ट्रीय जुर्म है।
मेरी जन्मकुंडली और हैसियत का हिसाब रखने वाले उस दिन बहुत खुश थे जब मुझे नाम और छवि को पीछे महज एक 'चिह्न’ का दर्जा दिया गया। पांच मार्च 2००9 का वह दिन मनाया तो वैसे मेरे अभिनंदन दिवस के रूप में था पर यह दिन मेरे लिए क्षोभ से भर देने वाला रहा। जिस दौर में डॉलर की पूरी इकोनमी डूब रही थी, मैंने देश को 'अर्थवान’ बनाए रखा। आज उसी कुबड़े डॉलर के चिह्न के आगे मुझे एक कमजोर हैसियत के साथ पस्तहाल दिखाया जाता है तो यह आघात लगता है। बहरहाल यह देश के तिजोरी मंत्री और प्रधानमंत्री पर ही है कि वे मेरी हैसियत और रुतबे से डॉलर को और कितना खेलने देते हैं?

http://www.nationalduniya.com/

रविवार, 25 अगस्त 2013

मीडिया और नियमन



मीडिया और नियमन। बहस का यह मुद्दा पिछले कुछ सालों में देश में जिस तरह उठा है, उसके एक नहीं बल्कि कई निहितार्थ हैं। सरकार का एक बड़बोला मंत्री जब यह कहता है कि बार काउंसिल के लाइसेंस की तरह पत्रकारिता के क्षेत्र में उतरने से पहले पत्रकारों को लाइसेंसशुदा होना जरूरी होना चाहिए तो समझ में यही बात आती है कि यह सुझाव से ज्यादा चिढ़ है देश की मीडिया के प्रति। यह चिढ़ पूर्वाग्रहग्रस्त भी है।
दरअसल, 21वीं सदी लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए कई नई चुनौती लेकर आई है। इस सदी के दूसरे दशक से तो इन चुनौतियों ने सड़कों पर अपने तेवर एकाधिक बार दिखाए। मुद्दा भ्रष्टाचार का हो कि संसद और जनता के बीच सर्वोच्चता को लेकर छिड़ी बहस, इन तमाम सवालों पर जनता घरों से बाहर निकली। और वह भी बिना किसी राजनीतिक छतरी के नीचे आए। जो सूरत बनी उसमें लोकतांत्रिक सशक्तिकरण की असीम संभावनाएं थीं। ये संभावनाएं आज भी बहाल हैं। इसी दौर में देश और राज्यों की राजधानियों में बैठे जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों और उनके समर्थन से बनी सरकारों को लगने लगा कि यह प्रखर नागरिक चेतना उनके पूरे अस्तित्व को मिट्टी की भीत की तरह भर-भराकर गिरा देगी। लिहाजा इस नागरिक सशक्तिकरण को तीव्र और प्रभावी बनाने वाले हाथ को मरोड़ा जाए। मीडिया इसी हाथ का नाम है। लोकतंत्र का चौथा खंभा कहकर जिसे सरकारें अब तक इज्जत तो बख्शती रही हैं पर उसकी अतिशय संलग्नता और तत्परता को कभी गले नहीं उतार पाई हैं। इमरजेंसी के दिनों में इसका सबसे क्रूर रूप हम देख चुके हैं।
जनता के लिए लोकतांत्रिक साझेदारी का मतलब सिर्फ पांच साल में एक बार मतदान केंद्र के बाहर कतार में खड़े होना भर नहीं है। उसकी साझेदारी तो इससे आगे की है और इसी दरकार ने लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को जन्म दिया है। पर दुर्भाग्य से इस दरकार को निर्वाचित जनों और संस्थाओं ने अपने लिए ज्यादा सुरक्षित बनाने का उपक्रम बना लिया और अब तो सूरत यह है कि जनता की लोकतांत्रिक प्रतिभागिता पूरी व्यवस्था में इतनी भर रह गई है कि उसके नाम पर भले सब कुछ होता है पर उसकी मर्जी का कुछ भी नहीं। अखबारों-टीवी चैनलों के बढ़े प्रसार के साथ सोशल मीडिया के नए दमखम ने दुनिया भर के शासक वर्ग के सामने अनुशासन और अनुशीलन का दबाव बढ़ाया है। भारत में इस खतरे को बढ़ते देख सरकार ने कई बार अलग-अलग तरीके से मीडिया पर आंखें तरेरी हैं, उसकी आलोचना की है। चूंकि देश सेंसरशिप और इमरजेंसी के दौर से काफी आगे निकल आया है इसलिए आज मीडिया के मुंह पर जाबी पहनाने की हिमाकत तो शायद ही कोई करे। पर अगर कोई यह कहे कि पत्रकारों के भी लाइसेंस बनने चाहिए, उनके लिए भी एप्टिट्यूड टेस्ट होने चाहिए तो इतना तो लगता ही है कि उसे देश के पत्रकारिता आंदोलन के बारे में जानकारी थोड़ी कम है।
अगर हम बात करें प्रिंट मीडिया की तो देश में पत्रकारिता के लिहाज से दो दौर खास तौर पर महत्वपूर्ण हैं। एक आजादी से पूर्व का दूसरा ग्लोबलाइजेशन के बाद का। अगर एक पराधीन देश की जनता ने जिद पर आने पर दुनिया की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी सत्ता की चूलें हिलाकर रख दीं तो उसके पीछे देश की भाषाई पत्रकारिता का बहुत बड़ा हाथ था। साहित्यकारों-पत्रकारों की एक पूरी पीढ़ी ने देश के आत्मसम्मान को जगाया और स्वाधीनता की ललक जन-जन में पैदा की। बाद में ग्लोबलाइजेशन के दौर में लगने लगा कि खुरदरे कागजों पर खबर पढ़ने का दौर अब पीछे छूट जाएगा क्योंकि उपभोक्तावादी सनक के साथ टीवी चैनलों की खुलती छतरियों और इंटरनेट के बढ़े जोर के बाद इतनी फुर्सत किसे होगी कि वह घर में बैठकर अखबार बांचे। पर हुआ ठीक इसके उलटा। भाषाई पत्रकारिता ने इस दौर में अपना सबसे बड़ा आरोहण दिखाया। प्रसार के साथ कमाई दोनों में उसने कुबेरी आख्यान रचे। और यह सफलता उस देश में मायने रखती है जहां सरकार को अभी सर्वशिक्षा का प्रण ही दोहराना पड़ रहा है।
ऐसी स्थिति में महज इस कारण से कि जनता के मुद्दे अगर मीडिया की ताकत के साथ देश का एजेंडा बनने लगे तो खतरनाक है, यह सोच कमजोर सत्ता प्रतिष्ठानों में ही उभर सकती है। एक गांधीवादी सामाजिक कार्यकताã के अनशन के आगे मजबूर होकर जब देश की संसद को अपनी कार्यवाही चलानी पड़ी, प्रस्ताव पारित करने पड़े तो उसके साथ यह भी साफ हो गया कि लोकमत और मीडिया के साझे से देश में लोकतंत्र की नई लहर शुरू हो सकती है। फिर क्या था, नेताओं के एक के बाद एक बयान आए कि मीडिया ने अण्णा आंदोलन को ओवरएक्सपोज किया। यही स्थिति तब भी सामने आई जब पिछले साल दिसंबर में दिल्ली में चलती बस में एक युवती के साथ की गई बर्बरता के खिलाफ पूरे देश के युवा आक्रोशित होकर घरों से बाहर आए।
देश की राजनीतिक जमात को अभी तक यही लगता रहा है कि उनके मुद्दे और उनकी सोच और पहल से ही देश में लोकतंत्र की गाड़ी आगे बढ़नी चाहिए। जनता बस इस गाड़ी में सवारी की तरह बैठ जाए, वह ड्राइविंग सीट पर आने की हिमाकत ना करे। यहां तक कि प्रेस परिषद के मुखिया जस्टिस काटजू जैसे लोगों के दिमाग में भी यही बात आती है कि पत्रकारिता के पेशे में कूप-मंडूक लोग भरे पड़े हैं।
नक्सल हिंसा से लेकर किसानों की आत्महत्या तक को लेकर जमीनी रिपोर्टों और इन पर बहस का दुस्साहस देश के पत्रकारों ने दिखाया है। इस कवरेज के साथ प्रबंधकीय मुठभेड़ भी पत्रकारों को करनी पड़ी है। बावजूद इसके आज अगर भ्रष्टाचार को लेकर केंद्र से लेकर कई सूबों की सरकारें हलकान हैं तो उसके पीछे भी मीडिया की चौकस नजर ही है। पिछले दो-तीन सालों में चले नागरिक सशक्तिकरण के अभिक्रम को भी मीडिया का संबल इसलिए मिला क्योंकि यह समय की मांग है। देश की राजनीतिक बिरादरी अगर आज जनता की नजरों में अपना इकबाल खोती जा रही है तो उसकी वजह ये लोग खुद हैं। आप आईने पर यह दबाव नहीं डाल सकते कि वह आपको मनमाफिक तरीके से दिखाए। यह बात मनीष तिवारी के साथ उन तमाम लोगों को समझनी चाहिए जिन्हें उनके जैसा बोलना-सोचना अच्छा लगता है। यह बात उन जस्टिस साहब को भी समझनी चाहिए जिन्हें मीडिया मीडियाकरों की जमात लगती है और देश के नब्बे फीसद लोग जाहिल। परिवर्तन का हरकारा इस देश में मीडिया हमेशा रहा है और आज उसके लिए कई बिजनेस कंपल्शन बढ़ जाने के बावजूद अगर उसके भीतर यह जज्बा बहाल है, फिर तो सूचना और खबरों के इस पूरे तंत्र को सलाम। नियमन और लाइसेंस की दरकार तो वहां ज्यादा है जहां निर्वाचित निर्वाचकों के स्वयंभू स्वामी बने फिर रहे हैं।

http://www.nationalduniya.com/

सोमवार, 19 अगस्त 2013

ई-आजादी को सलाम!


देश में आजादी के मायने अब नए मुकाम पर हैं, उतने संकुचित नहीं जितने पिछले दशक तक थे। सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति की आजादी को नए आयाम दिए हैं। दुराग्रह के दौर में अन्ना हजारे के सत्याग्रह की बात हो या फिर जनता और संसद के बीच लोकतांत्रिक सर्वोच्चता पर बहस, पिछले दो-तीन सालों में इनकी जड़ में ई-आजादी यानी सोशल मीडिया ही रहा।
अरब बसंत की सफलता-विफलता से अलग है भारत में सोशल मीडिया का विस्तार और इस्तेमाल। कुछ साइबर पंडितों की नजर में भारत में ई-क्रांति का संदर्भ ज्यादा मौलिक और भरोसेमंद है। तहरीर चौक की क्रांति की मशाल अभी बुझी भी नहींं कि प्रतिक्रांति की लपट ने पिछली सारी इबारतें उलट दीं।
अभी उत्तराखंड में जो विपदा आई, उसमें देश के किसी नेता या दल से ज्यादा जवाबदेह भूमिका रही सोशल मीडिया की। इसने न सिर्फ आपदाग्रस्त इलाके की खबर दी बल्कि घर-परिवार से बिछड़े लोगों को मिलवाने में भी बड़ी भूमिका अदा की। खुद उत्तराखंड के लोग सामने आए और उन्होंने फेसबुक पेज और ब्लॉग संपर्क के जरिए लोगों की मदद के लिए राशि जुटाई।
इसके अलावा पिछले साल 16 दिसंबर को दिल्ली में चलती बस में गैंगरेप की घटना के बाद सोशल मीडिया यानी अभिव्यक्ति की उन्मुक्त आजादी ने सरकार के घुटने टिकवा दिए। उसने महिला सुरक्षा को लेकर सरकार को सख्त कानूनी पहल करने के लिए बाध्य किया।
दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन के बाद दलित लेखक कंवल भारती की सरकार विरोधी टिप्पणी पर उनकी गिरफ्तारी का मामला हो या बाला साहब ठाकरे के निधन के बाद दो लड़कियों की टिप्पणी पर उनके खिलाफ भड़का सरकारी आक्रोश, सत्ता और सियासत को ये ई-मुखरता रास नहीं आती। केंद्र सरकार तक के स्तर पर सोशल मीडिया की मुखरता पर पहरे बैठाने की कोशिशें अगर चलती रही हैं, तो उसकी भी यही वजह है। पर स्वतंत्रता के इस पर्व पर ई-आजादी से आ रहे बदलाव को भी सलाम करना चाहिए।

रविवार, 18 अगस्त 2013

कुछ कहता है यह संन्यास


एक बड़ी सफलता पाना और फिर पूरी होड़ से बाहर हो जाना। ऐसा कोई भी फैसला सबसे पहले तो चौंकाता है। फिर इसे हम सीधे-सीधे पलायनवादी फैसला भी नहीं कह सकते हैं। अलबत्ता यह जानने की दिलचस्पी जरूर बढ़ जाती है कि ऐसे हठात निर्णय के पीछे असली वजह क्या रही होगी। फ्रांस की टेनिस स्टार मरियन बार्तोली को लेकर इन दिनों ऐसी ही कुछ बातें हो रही हैं। 28 साल की बार्तोली ने हाल ही में विंबलडन में महिला एकल का खिताब अपने नाम किया था। लोगों की निगाहें अब इस बात पर थी कि क्या बार्तोली यूएस ओपन में भी अपनी जीत का सिलसिला बना रख पाएंगी। लोग अभी इस बारे में कयासबाजी में ही लगे थे बार्तोली ने खेल से संन्यास लेने का फैसला लेकर सबको चौंका दिया। यूरोपियन मीडिया में इस पर काफी कुछ लिखा-कहा जा रहा है। बार्तोली ने इस बारे में सिर्फ इतना कहा है,'मैंने यह फैसला आसानी से नहीं लिया है।’
फैसला लेने की जो बड़ी वजह बार्तोली ने बताई वह चोट और दर्द से बढ़ी परेशानी थी। पर लोग मानने को तैयार नहीं हैं कि वजह इतनी भर होगी। कुछ और बातें भी इस दौरान चर्चा में आईं। विंबलडन में बार्तोली के मैदान में उतरने से करीब घंटे भर पहले बीबीसी के कमेंटेटर जॉन इनवरडेल ने एक भद्दी टिप्पणी की। इनवरडेल ने कहा, 'वह कम से कम अपनी संुदरता के लिए तो नहीं जानी जाएगी।’ बाद में इस मामले में बीबीसी को बार्तोली से माफी मांगनी पड़ी। एक 28 साल की महिला के खेल जीवन की सार्वजनिकता में प्रताड़ना और मानसिक रूप से ठेस पहुंचाने के मौके कितने आते होंगे, यह इस प्रकरण से जाहिर है।
फ्रांस की इस स्टार टेनिस खिलाड़ी ने जरूर कहा है कि उसने शरीर पर कई चोट और दर्द से आजिज आकर टैनिस रैकेट रखा है। पर मुमकिन है कि उसके मन पर और भी कई घाव हों। खेल और ग्लैमर का साझा अब जरूरी है। इसकी अवहेलना करके कोई आगे बढ़ना चाहेगा तो शायद वह उसी हश्र तक पहुंचेगा जहां बार्तोली पहुंची हैं। हालांकि ऐसे किसी निष्कर्ष पर बार्तोली खामोश हैं।
आम महिला टेनिस खिलाड़ियों के मुकाबले थोड़े ठिगने कद की बार्तोली का जन्म दो अक्टूबर 1984 को हुआ। 16 साल की उम्र में उसने यह तय कर लिया कि उसकी जिंदगी का मैदान टेनिस कोर्ट ही होगा। इससे पहले उसके पिता उसे डॉक्टर बनाना चाहत ेथे। बाद में पिता को भी बार्तोली का फैसला सही लगा। पिता ही उसके टेनिस कोच बने। पिता और बेटी का गुरु-शिष्या का संबंध बेटी के खेल जीवन को अलविदा कहने तक जारी रहा। अपने अब तक के करिअर में बार्तोली ने आठ डब्ल्यूटीए सिंगल और तीन डबल्स के टाइटल जीते। अभी वह दुनिया की सातवें नंबर की टेनिस खिलाड़ी हैं।
इस शिखर आरोहण में जिस एक बात से बार्तोली हमेशा दूर रही वह थी ग्लैमर और गॉसिप की दुनिया। उनसे जब इनवरडेल की टिप्पणी के बारे में पूछा गया तो उसने न चाहते हुए भी यह कह दिया कि वह मॉडल अगर बन नहीं सकतीं तो बनना चाहती भी नहीं। उसे चैंपियन बनना था और वह उसने बनकर दिखा दिया। गौरतलब है कि इनवरडेल ने अमर्यादित तरीके से बार्तोली के चेहरे और कद के साथ टांगों तक पर अश्लील टिप्पणी की थी। कहना नहीं होगा कि इस स्टार टेनिस खिलाड़ी के संन्यास ने खेल और पुरुष मानसिकता के बीच महिला अस्मिता की सुरक्षा के मुद्दे को कहीं न कहीं चर्चा में ला दिया है।
nationalduniya.com

सोमवार, 12 अगस्त 2013

अनर्थ रोको रघुराम


रघुराम राजन। एक अनसुना नहीं तो बहुत जाना-सुना नाम भी नहीं। पर यह सच कल तक का था। अब तो राजन चर्चा में हैं। आखिर उन्हें रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया का नया गवर्नर जो नियुक्त किया गया है। स्वभाव से मितभाषी और एकेडमिक माने जाने वाले राजन के लिए यह खुशी के साथ फL का मौका है। वैसे उन्हें अपने ऊपर आने वाली चुनौतियों का भी भान है। जिस दिन आरबीआई के नए गवर्नर के रूप में उनके नाम का ऐलान हुआ, उसी दिन सेंसेक्स ने 449 अंकों का गोता लगाया । रुपया तो लुढ़ककर डॉलर के मुकाबले अपनी सबसे कमजोर स्थिति में आ गया।
ऐसे में भी राजन ने अपनी तरफ उम्मीद से देखने वालों को किसी खुशफहमी में नहीं रखा। सीधे-सीधे कहा, 'मेरे पास कोई जादू की छड़ी नहीं है।’ दरअसल, यह नाउम्मीदी के बोल नहीं, बड़बोला होने से बचने वाला बयान था। राजन की शख्सियत है भी ऐसी ही। दिखावे से ज्यादा कोशिश करने और करके दिखाने में यकीन। उन्हें देखें, उनसे मिलें, बात करें तो उनका अनुशासित जीवन आप पर अपनी छाप जरूर छोड़ेगा। किसी फौजी अफसर की तरह कसी हुई लंबी कद-काठी। धुली हुई आंखें। चमकता ललाट। सिर पर छोटे-छोटे बाल। आमतौर पर फॉर्मल पहनावा। उपस्थिति ऐसी कि जैसे हमेशा कुछ खास करने को तत्पर।
राजन को जानने वाले कभी उन्हें सीधे-सीधे इकोनमिस्ट कहने के बजाय 'एकेडमिक इकानमिस्ट’ कहते हैं। यह उनका अलंकरण नहीं है। बल्कि यही उनका ट्रैक रिकार्ड रहा है। पढ़ाई के दौरान अव्वल आना और स्वर्ण पदक जीतना उनके लिए कभी आपवादिक नहीं रहा। दरअसल, श्रेष्ठता की इस कसौटी पर खरे होने का ही नाम है रघुराम जी. राजन।
तीन फरवरी 1963 को भोपाल में जन्मे राजन के पिता नौकरशाह थे। पढ़ाई-लिखाई में दिलचस्पी के पीछे एक बड़ी वजह घर का माहौल भी रहा। राजन ने पहले इंजीनियरिंग की तरफ रुख किया। बाद में उन्हें भा गई अर्थ और प्रबंधन की साझी दुनिया। 1985 में आईआईटी दिल्ली से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्वर्ण पदक के साथ स्नातक। फिर आईआईएम से स्नातक और वहां भी स्वर्ण पदक। 1991 में एमआईटी से पीएचडी।
2००3 में अमेरिकन फाइनेंस एसोसिएशन ने राजन को प्रतिभाशाली युवा अर्थशात्री के रूप में सम्मानित किया। यह सम्मान उन्हें वित्तीय सिद्धांतों और उनके अमल की प्रक्रिया को लेकर किए कार्यों के लिए दिया गया। यह राजन की प्रसिद्धि और साख का ही कमाल है कि जिस संस्था ने उन्हें सम्मानित किया, वे 2०11 में उसके अध्यक्ष बने।
राजन की आर्थिक समझ और दूरदर्शिता कितनी अचूक है, इसका अंदाजा 2००8 में आई वैश्विक मंदी को लेकर 2००5 में उनकी भविष्यवाणी से लगाया जा सकता है। उनकी इस भविष्यवाणी की पूरी दुनिया में सराहना हुई और इस पर एक डाक्यूमेंट्री भी बनी, 'इनसाइड जॉब’ नाम से। इस डाक्यूमेंट्री को भी कई पुरस्कार मिले। राजन की एक किताब का नाम है- 'सेविंग कैप्टलिज्म फ्रॉम द कैप्टलिस्ट्स’। जाहिर है कि उनके अर्थ चिंतन में ग्लोबल इकोनमी को लेकर कोई प्रतिगामी आग्रह भले न सही पर वे इसके सीधे-सीधे हिमायती भी नहीं हैं। उनकी इसी समझ और कुशलता को देखते हुए 2००8 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उन्हें मानद रूप में आर्थिक सलाहकार नियुक्त किया। 2०12 में उन्होंने प्रमुख आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु की जगह ली।
अब जबकि राजन अपने जीवन की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण जवाबदेही को संभालने जा रहे हैं तो सबकी निगाहें उन पर हैं। देश आर्थिक लिहाज से एक मुश्किल दौर में है। देश उन्हें एक कुशल आर्थिक प्रबंधक के रूप में याद करना चाहता है। राजन की योग्यता इस चाहत को अधूरी नहीं रहने देगी। यह भरोसा सबको है और यही उनके प्रति सबकी शुभकामना भी।

http://www.nationalduniya.com

रविवार, 28 जुलाई 2013

आसां नहीं होना हबीबा

महिलाओं और बच्चों के छोटे-छोटे समूह। उनके बीच कभी पैदल तो कभी किसी दूसरे साधन से पहुंचने वाली महिला। देखने में किसी आम अफगानी महिला की तरह। बातचीत भी तकरीबन वैसी ही। पर कुछ समय साथ गुजारें और थोड़ी गुफ्तगू करें तो मालूम पड़ेगा कि राष्ट्र और संस्कृति से प्रेम का क्या मतलब क्या है। हम बात कर रहे हैं अफगानिस्तान के बामियान सूबे की गवर्नर हबीबा सराबी की। अफगानिस्तान में हबीबा आज उस मुहिम का नाम है जो अपने मुल्क को युद्ध और आतंक की बजाय जीवन, प्रकृति और संस्कृति की संपन्नता की शिनाख्त दिलाना चाह रही है।
हबीबा के जीवन में संघर्ष और उपलब्धि का साझा काफी पहले से रहा है। उनकी तरफ दुनिया की दिलचस्पी तब एकदम से बढ़ गई जब यह खबर आई कि उन्हें इस साल के लिए रेमन मैग्सेसे एवार्ड के लिए चुना गया है। हबीबा अफगानिस्तान के अशांत रहे सूबों में से एक बामियाम की गवर्नर हैं पर उन्हें यह सम्मान इस कारण नहीं मिला है। रेमन मैग्सेसे एवार्ड फाउंडेश्न की नजर में एक मानवाधिकारवादी कार्यकताã के रूप में उनकी कोशिशें काबिले तारीफ है। वह युद्ध, आतंक और दमन के लंबे दौर से गुजरे देश में सामाजिक और सांस्कृतिक ढांचे को फिर से खड़का करने में लगी हैं। वे कहती हैं यह बड़ा और सबसे जरूरी काम है। जिसे सिर्फ सरकारी घोषणाओं और योजनाओं के बूते नहीं किया जा सकता है। इसके लिए तो पहले लोगों के टूटे हौसले के बहाल करना होगा। व्यक्ति को सामाजिक बहुलता की इकाई में ढालना होगा। हबीबा एक महिला होने के नाते यह भी बखूबी समझती हैं कि आतंक और युद्ध की विभिषिका ने अगर सबसे ज्यादा असर डाला है तो वह अफगानी महिलाओं और बच्चों के जीवन पर। वैसे भी अफगानी समाज पर पारंपरिकता और रूढ़ता इतनी हावी रही है कि ग्लोबल दौर से ये कई दशक पीछे हैं।
हबीबा 2००5 में गर्वनर नियुक्त होने से पहले अफगानिस्तान सरकार में महिला मामलों के साथ शिक्षा और संस्कृति विभाग की मंत्री थी। देश में जब तालिबानी आतंक का दौर कुछ कमजोर पड़ा तो राष्ट्रपति हामिद करजई ने हबीबा के मानवाधिकारवादी प्रयासों को महत्वपूर्ण माना। भूले नहीं हैं लोग कि एक दशक पहले बामियान में बुद्ध की प्रतिमाओं को तालिबानियों ने नुकसान पहुंचाया था। यह एक बर्बर हिमाकत थी शांति और समन्वयी रचना प्रक्रिया से बने अफगानी समाज में सांप्रदायिकता का जहर घोलने की, उसे एक उन्मादी मकसद की तरफ ले जाने की। आज उसी बामियान सूबे में हबीबा एक गवर्नर से ज्यादा एक शांति कार्यकताã के रूप में कार्य कर रही हैं। हबीबा के लिए यह काम थोड़ा चुनौतीपूर्ण भी है क्योंकि वह अल्पसंख्यक हजारा समुदाय से आती हैं।
हबीबा ने अपनी पांच दशक से ज्यादा लंबी जीवनयात्रा में एक तो यात्राएं काफी की हैं, दूसरे तालीम की अहमियत को उन्होंने बखूबी समझा। वह एक अच्छी हिमोटोलॉजिस्ट हैं और डॉक्टरी की इस पढ़ाई को पूरा करने के लिए उन्हें विश्व स्वास्थ्य संगठन से फेलोशिप तक मिला। पर एक पेशेवर डॉक्टर के रूप में काम करना इस शांति कार्यकताã को कभी नहीं भाया। 1998 के आसपास जब तालिबानियों का कहर काफी बढ़ गया तो हबीबा को पाकिस्तान में पेशावर के शरणार्थी शिविर में शरण लेनी पड़ी। इस दौरान उनके पति काबुल में रह गए बाकी परिवार की देखभाल के लिए।
आज जब अफगानिस्तान में अशांति का दौर थोड़ा पीछे छूटता दिखता है तो इस संघर्षशील अफगानी महिला की कोशिश है कि उनका मुल्क दुनिया के बाका देशों के बीच अपवाद के रूप में न देखा जाए। इसके लिए वह अफगानी समाज, संस्कृति और प्रकृति को फिर से सींचने में जुटी हैं।
-प्रेम प्रकाश


सोमवार, 22 जुलाई 2013

देह और संदेह के दौर में डांस बार

मुंबई के डांस बारों पर प्रतिबंध लगना और फिर हाईकोर्ट का उसे गलत ठहराना तथा आखिर में सुप्रीम कोर्ट का भी हाईकोर्ट के फैसले पर हामी भरना, यह महज एक घटनाक्रम नहीं है। 2००5 से 2०13 तक खिंचा यह संघर्ष 21वीं सदी के पहले दशक और उसके बाद के सामाजिक-राजनीतिक विमर्श की सूरतों और उसके हासिल को जाहिर करता है। यह वह दौर है जब देश में सामाजिक न्याय का संघर्ष वैचारिक रूप से स्थगित होता गया और जो बचा वह जाति और क्षेत्र की अस्मितावादी राजनीति। 
गौरतलब है कि इस दौरान बाजार की शह पर जो नए उभार देखने को मिले वे संबंध और परिवार की बहुलतावादी अवधारणा के खिलाफ रहे। दैहिकता के दाह ने स्त्री-पुरुष संबंधों के तमाम सरोकारों को गैरजरूरी बना दिया। टीवी ने इन संबंधों को लेकर नब्बे के दशक में जो 'बुनियाद’ खड़ी की थी उसे बाद के धारावाहिक निर्माताओं ने कोई महत्व नहीं दिया बल्कि उन्होंने अपने मुताबिक 'देह’ और 'संदेह’ के विपरीत साझे में कथानक का फरेबी जाल बुना। इस जाल में देश के नव मध्यवर्ग को जहां अपनी महत्वाकांक्षाओं का आभासी संसार दिखा, वहीं उसकी रही-सही संवेदनाओं को देह और लालच के आगे नतमस्तक दिखाया गया। यह दौर अब भी जारी है। 
बहरहाल समझना यह ज्यादा जरूरी है कि इस पूरे कालप्रवाह में विकल्प और हस्तक्षेप का जरूरी स्पेस कहां सिमट गया या दम तोड़ गया। बात एक बार फिर से डांस बारों पर प्रतिबंध की करें तो इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने में मदद मिलेगी। गौर करें तो पिछले एक-डेढ़ दशक में कथित नैताकितावादी आग्रहों के साथ कई तरह की सामाजिक-सांस्कृतिक शक्तियां आगे आई हैं। खाप पंचायतों से लेकर श्रीराम सेना तक का उन्मुखीकरण इसी दौरान हुआ। यही नहीं, वेलेंटाइंस डे जैसे प्यार-मोहब्बत के सार्वजनिक इजहार के बोल्ड पर्व अगर इस दौरान तेजी से लोकप्रिय हुए तो उसके खिलाफ तेजाबी प्रतिक्रिया भी हर तरफ देखने को मिली। दिलचस्प है कि इन तमाम प्रवृत्तियों और आग्रहों-दुराग्रहों के बीच देश की सियासी जमात ने भी बदलाव की कोई अलख जगाने के बजाय खुद को परिस्थितियों के हवाले किया। बड़ा या छोटा शायद ही कोई राजनीतिक दल ऐसा हो जिसने इस बीच समाज और संबंध के बीच के कल्याणकारी सूत्र को पकड़कर अपनी राजनीति की दिशा तय करने का जोखिम लिया हो। आप खाप पंचायत वालों से बात करें --जिन्हें एक इलाके और समाज के लड़के-लड़कियों का शादी के बंधन में बंधना तो दूर मोबाइल फोन पर बात करना तक अखरता है- -तो वे बताएंगे कि कैसे इस-उस दल के नेता जातीय आधार और प्रभाव के कारण उनके आगे नाक रगड़ने आते हैं। यह समझना भूल होगी कि यह महज एक सियासी समझौता है। अपनी बेटियों-बेटों को जलाने वालों पर धिक्कार की जगह उनके समर्थन से लोकप्रियतावादी राजनीति की राह आसान करना दरअसल हमारे देशकाल की मौजूदा रचना प्रकिया पर एक सख्त टिप्पणी है। लड़कियों की तंग पोशाकें लड़कों को उकसाती हैं, फैशन अश्लीलता की रंगोली है और शादी संबंध नहीं, समझौता ज्यादा है, जिसमें सब कुछ सहना-भोगना ही एक शादीशुदा स्त्री की नियति है, ऐसे तमाम तर्क और ऐसी तमाम समझ हमारी चेतना में कोई पहली बार शामिल हुए हों, ऐसा नहीं है। पर सेक्स, सक्सेस और सेंसेक्स के दौर में इसका बार-बार सार्वजनिक दुहराव हमारी आधुनिक चेतना के रेतीले धरातल का सच जाहिर करता है।
देश में बीते तीन-चार सौ सालों में नगरवधुओं से लेकर तवायफों के चलन के कई-कई प्रकार और स्वरूप देखने को मिलते हैं। राजप्रासादों तक इनकी पहुंच देखी गई। इन पर पैसे-अशर्फियां तक लुटाई गईं। जिस बंगाल से नवजागरण की हांक लगी, राष्ट्रीय आंदोलन के दिनों में खुद उसकी संस्कृति के ईंट-गारे के साथ 'परपुरुष’ और 'परस्त्री’ का अंतरंग लोक सजता-संवरता रहा है। बांग्ला साहित्य में इसका पूरा अक्स उभरा है। पर बावजूद इन चारित्रिक-सांस्कृतिक स्फीतियों के कोई ऐसी प्रतिक्रियावादी कार्रवाई कहीं देखने को नहीं मिलती, जिससे लगे कि इसे एक बड़े खतरे के रूप में देखा जा रहा हो। शायद इसलिए कि इन स्फीतियों के बीच भी संवेदना का जरूरी स्पेस हमारे सलूक और संस्कार में बराबर बना रहा। बनारस की तवायफों ने अपने गहने उतारकर गांधी के राष्ट्रीय आंदोलन में सहयोग किया तो कई राजपुत्रों को इनके पास तहजीब का ककहरा पढ़ने के लिए भेजा गया। 
पर ये तो रही बीते जमाने की बात। हमें तो बात करनी है उस दौर की जो प्रभाष जोशी के शब्दों में 'चरम भोग का परम दौर’ है। लालच की रेखा जब हथेली से खिंचकर हृदय तक पहुंच रही हो और ईष्याã की आग में अपने 'स्व’ के भी तिरोहित होने की परवाह न हो फिर तो जो बचेगा, उस पर न तो हैरत होनी चाहिए और न ही चिंता। मुंबई के डांस बारों में नब्बे के दशक में मनोरंजन, अपराध और कमाई के साझे अड्डे बनने शुरू हुए। इस लिहाज से इसे कानून और व्यवस्था के लिए एक नया सिरदर्द जरूर ठहराया जा सकता है। पर इन पर तो गाज गिरी इस नाम पर कि यहां शरीफ घरों के बच्चे बिगड़ जाते हैं। यहां नाचने वाली लड़कियों के कारण कई खुशहाल घर टूट रहे हैं। किसी ने यह सवाल नहीं उठाया कि जिन बार डांसरों के चरित्र पर ये सारी तोहमतें जड़ी जा रही हैं, उनके कृत्य पर आपत्तियां की जा रही हैं, उनके लिए यहां तक पहुंचने का रास्ता किसने तैयार किया। क्या ये रास्ता इन लड़कियों के लिए पेशागत स्वेच्छा और संघर्ष का रास्ता है या फिर उनकी यह नियति है। फिर इस नियति को गढ़ने वाले हाथों की भी शिनाख्त जरूरी है। देश में जाति और वर्ग की चेतना और अस्मिता को लेकर मुट्ठियां लहराने वालों ने कभी आधी आबादी के हिस्से आई परेशानियों-चुनौतियों की फिक्र नहीं की। 
बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है। पिछले साल दिल्ली में जब चलती बस में गैंगरेप की घटना हुई तो इंडिया गेट और राष्ट्रपति भवन से लेकर देश के कई हिस्सों में जो भीड़ उमड़ी, उसमें कोई सियासी जमात तो हरगिज शामिल नहीं थी। क्योंकि इस जमात ने तो इससे काफी पहले ही स्त्रियों के प्रति अपनी धारणा को उन तमाम ताकतों के साथ कर लिया था, जो या तो उन्हें लक्ष्मणरेखा की मर्यादा सिखाने पर आमादा रहीं या फिर पोशाकों के तंग और खुले होने का सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ सिखाती रहीं। 
सर्वोच्च न्यायालय ने डांस बारों का ताला फिर से खोलने की इजाजत देते हुए समानता के अधिकार की भी दुहाई दी है। पर इस अधिकार को लेकर उन पूर्वाग्रहों का क्या होगा जिसे एक तरफ तो पूनम पांडे के नशे में झूमना भाता है वहीं बार में महिलाओं का नाचना तो क्या उनका प्रवेश भी सांस्कृतिक अपराध लगता है। यह पूर्वाग्रह हमारे आधुनिक चरित्र और समझ के दोगलेपन का है, जो सुप्रीम कोर्ट के एक जजमेंट भर से दूर होने से रहा।