बुधवार, 15 जनवरी 2014

कुछ कहता है भट्ट साहब का अफसोस


आलिया भट्ट को सैफई नहीं जाना चाहिए। यह इस तरह के आयोजन में शामिल होने का सही वक्त नहीं था। किसी भी संवेदनशील कलाकार को यह समझना चाहिए कि एक तरफ जहां राज्य में लोग डर और अभाव के बीच सर्द रातें काट रहे हैं, वहां सरकारी खर्चे पर भड़कीला आयोजन करना एक वीभत्स हिमाकत है। इसकी आलोचना होनी चाहिए। पिता महेश भट्ट अपनी बेटी के सैफई महोत्सव में शिरकत करने पर अपनी वेटी तरफ से कुछ इन्हीं वजहों से अफसोस जता रहे हैं। हालांकि बॉलीवुड के दबंग सलमान खान को यह सब रास नहीं आ रहा है। सलमान सैफई में आलिया के साथ मंच पर नाचने-गाने वालों में शामिल थे। उन्होंने आलिया के पिता के अफसोस पर कहा, 'भट्ट साहब, आलिया की तरफ से माफी मांगने की कोई जरूरत नहीं है। आपने उसकी परवरिश बहुत बेहतरीन तरीके से की है। वह बहुत मेहनती और समर्पित लड़की है और गरिमा के साथ अपने करियर में आगे बढ़ रही है।’
दरअसल, इस पूरे प्रसंग में सत्य इधर या उधर नहीं बल्कि कहीं बीच में टिका है। न्यू क्रिटिसिज्म का बहुत ही पॉपुलर टर्म है- 'टेक्स्ट’। इस पूरे घटनाक्रम के टेक्स्ट पर जाएं तो समय, संदर्भ और घटना को हम थोड़ा समन्वित रूप में समझ पाएंगे। समाज और राजनीति के लिए मौजूदा दौर नए विमर्श और नए निकष का है। दिलचस्प है कि जिस 21वीं सदी को सूचना तकनीक की सदी कहकर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी अपने को यशस्वी कर रहे थे, वह एक दशक बीतते-बीतते उन सरोकारों और दरकारों के आमने-समाने आ गया, जिसकी इससे पहले किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। आमजन की ताकत और उसकी संवेदना महज सभ्य समाज और लोकतंत्र की मौलिक अवधारणाओं में ही महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि यह महत्व प्रत्यक्ष तौर पर जाहिर और महसूस भी होना चाहिए। दरकार और सरोकार के इस लोकतांत्रिक साझे को लेकर पिछले दो-तीन सालों में देश की जनता एकाधिक बार सड़कों पर उतरी है। दलगत लोकतंत्र के साढ़े छह दशक के अभ्यास में भारत में संभवत: यह पहली स्थिति रही, जब स्पष्ट विचार, संगठन और नेतृत्व के बिना जनता महज इस दरकार से घर से बाहर निकलने को बार-बार मजबूर हुई क्योंकि वह लोकतंत्र में अपनी कथित स्थिति और शिनाख्त को नए सिरे से महसूस करना चाह रही थी।
अण्णा हजारे या उनके नाम से जानी गई टीम जनता की इस तड़प को पूरी तरह एड्रेस कर पाई या नहीं, यह तो कहना मुश्किल है। पर यह जरूर कहा जा सकता है कि जनलोकपाल आंदोलन ने इस दलील को जरूर एक निर्णायक अंजाम तक पहुंचाया कि जनता की भूमिका को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पांच साल में एक बार मतदान के लिए कतारबद्ध होने तक नहीं सीमित किया जा सकता है। जनता अगर लोकतंत्र की सार्वभौम इकाई है तो उसका सामथ्र्य सरकार और शासन की व्यवस्था में भी दिखना चाहिए। प्रातिनिधिक लोकतांत्रिक ढांचे का यह कतई मतलब नहीं कि जन प्रतिनिधि और संसद जनता के ऊपर अपनी सर्वोच्चता को लाद दें।
मुजफ्फरनगर दंगे की टीस की अगर आप इस टेक्स्ट को सामने रखते हुए समझें तो साफ दिखेगा कि सरकार और शासन की संवेदनहीनता हमारी कथित लोकतांत्रिक महानता को किस कदर सामने से मुंह चिढ़ाती है। अखबारों के पन्ने और टीवी चैनलों के कैमरे यह चीख-चीखकर कहते रहे कि मुजफ्फरनगर में दंगे के बाद वहां से उजड़े परिवारों की स्थिति अब भी ठीक नहीं है। जिन लोगों ने राहत कैंपों में शरण ली, वे वहां से घर वापस जाना नहीं चाह रहे थे। रही कैंपों की स्थिति तो सर्दी और पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधा के अभाव में वहां बच्चों की जानें जा रही थी। दूसरी, तरफ इस जख्म पर हर तरफ से सियासी रोटियां सेंकी जाती रहीं। आलम यहां तक रहा कि पीड़ितों की शिनाख्त तक पर सवाल उठाए गए। इस बीच सेक्यूलरवादी तकाजे पर खरा उतरने के लिए मुआवजे की बढ़ी राशियों की घोषणा प्रदेश सरकार करती रही। ध्यान देने की बात है कि यह सब तब हो रहा था जब एक तरफ तो पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के लिए मत डाले जा रहे थे, वहीं दूसरी तरफ लोकसभा चुनाव के लिए सियासी बिसातें बिछनी शुरू हो गई थी।
उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार बड़ी बहुमत से आई है। सरकार चलाने के लिए अंक जुटाने का दबाव सरकार के आगे नहीं है। पर क्या यह ठसक जनता की चुनी गई सरकार को जनता के ऊपर मनमर्जी के शासन का क्या लाइसेंस थमा देती है? क्या सरकार में बने रहने का पांच साल का इत्मीनान इतना संवेदनहीन हो सकता कि सरकार जनता की तकलीफ में उसके साथ खड़े होने की बजाय उसके आगे सरकारी वैभव का भोंडा प्रदर्शन करे। ...और मीडिया जब इस बारे में मुख्यमंत्री या सरकारी दल के नेताओं से बात करे तो उसे फटकारा जाए। कम से कम पिछले दो हफ्ते में जब तक सैफई महोत्सव चलता रहा, यह सवाल सरकार के आगे बार-बार उठाया गया कि वह अपने आचरण से कम से कम अपने ही प्रदेश के एक हिस्से के हजारों लोगों की तकलीफ को कम करने की कवायद करते हुए अगर वह न भी दिखे तो कम से कम उसका क्रूर उपहास करते हुए भी कम से कम न दिखे।
गौरतलब है कि एक ऐसे दौर में जब जनता, सरकार और सादगी का साझा राजनीतिक संस्कृति के बदलाव को जरूरी बना रहा हो, कोई सरकार इस पूरी स्थिति को महज इसलिए खारिज कर दे कि उसके आगे चुनाव में उतरने का तात्कालिक दबाव नहीं है तो इसे आप क्या कहेंगे। महेश भट्ट बहुत संवेदनशील इंसान हैं या अगर वह किसी बात पर अपनी तरफ से अफसोस जता रहे हैं तो उसके बहुत मायने हैं, ऐसा नहीं है। खुद भट्ट साहब के कई बयान पिछले महीनों-सालों में ऐसे आए हैं जिसमें उनकी बौद्धिकता और मानसिकता को लेकर सवाल खड़े हुए हैं। पर बहरहाल, भट्ट साहब उस देशकाल को जरूर पढ़ने-समझने में कामयाब रहे हैं, जिसको लेकर आज हर तरफ बात हो रही है। सलमान खान ने उनकी बेटी का पक्ष लेकर बस इतना भर जताया है कि एक फिल्मी कलाकार की भूमिका के दायरे को रातोंरात इतना विस्तार देना ठीक नहीं जिसमें वे सोशल चेंज के एजेंट के रूप में प्रभावी दिखने लगे। यह एक आदर्श दरकार जरूरी हो सकती है पर इसके जरूरी होने के लिए राजनीति, समाज और सिनेमा को अभी बदलाव के कई पाठ पढ़ने-सीखने होंगे।
अलबत्ता महेश भट्ट का अफसोस उस सरकारी संवेदनहीनता को जरूर एक बार फिर से कठघरे में ले आई, जिस पर सवाल आज हर तरफ से उठ रहे हैं। अगर एक पिता अगर अपनी बेटी को सार्वजनिक रूप से यह नसीहत दे कि उसे कहां जाना चाहिए और कहां नहीं, इसका निर्णय करने से पहले उसे उस टेक्स्ट को भी जरूर ध्यान में रखना चाहिए, जो उसके समय और परिवेश को रचते हैं, तो इस सीख को आप यों ही खारिज नहीं कर सकते हैं ै। इस प्रसंग की आज हर तरफ चर्चा है तो इसलिए कि जनता अब अपने ऊपर शासन के अट्टहास को सहन करने को तैयार नहीं है।

कई विधाओं की अकेली मल्लिका

मल्लिका साराभाई। इस नाम को लोग अलग-अलग वजहों से जानते हैं। जानने वालों के बीच उनकी छवि भी एकाधिक है। खुद मल्लिका भी अपनी शख्सियत के किसी एक रंग को नहीं बल्कि उन तमाम रंगों को पसंद करती हैं, जिनमें उनकी रुचि और इच्छा का इंद्रधनुषी मेल हो। यही वजह है कि कुचिपुड़ी और भरतनाट्यम की कुशल नृत्यांगना के अलावा मल्लिका की ख्याति नाट्य कलाकार, अभिनेत्री, लेखिका, समाज सेविका तथा महिला असुरक्षा और सांप्रदायिकता जैसे ज्वलंत मुद्दों पर मुखरता के साथ सामने आने वाली एक प्रभावशाली महिला के रूप में भी है। मल्लिका अपनी इन तमाम दिलचस्पियों और खुबियों को एक शब्द में यह कहते हुए बयां करती हैं कि वे कुल मिलाकर एक कम्यूनिकेटर हैं। चूंकि वह खुद को एक बेहतर कम्यूनिकेटर के रूप में लोगों के सामने लाना चाहती हैं, इसलिए वह तमाम विधाओं में हाथ आजमाती हैं।
मल्लिका इन दिनों चर्चा में इसलिए हैं कि वे आम आदमी पार्टी में शामिल हो रही हैं। वह कह रही हैं कि देश में अब तक की राजनीतिक व्यवस्था और उसमें शामिल दल फेल साबित हुए हैं, लोगों की उम्मीद पर खरा उतरने में। यह जनता की उम्मीदों के साथ एक धोखे की तरह है। मल्लिका इससे पहले भी भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता विरोध के मुद्दे पर काफी मुखरता से पेश आई हैं। गुजरात में नरेंद्र मोदी सरकार से इसलिए उनका छत्तीस का संबंध है क्योंकि वह गुजरात दंगों को लेकर सरकार और प्रशासन की भूमिका के बारे में लगातार सवाल उठाती रही हैं।
मल्लिका की शख्सियत में जिस तरह की निर्भीकता और जीवंतता है, उसमें उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि का भी काफी योगदान है। वह प्रसिद्ध नृत्यांगना मृणालिनी साराभाई और ख्यातिलब्ध अंतरिक्ष वैज्ञानिक विक्रम साराभाई की बेटी हैं। नौ मई 1954 को को अहमदाबाद में जन्मी मल्लिका को घर में ही काफी सुसंस्कृत और सुशिक्षित माहौल मिला। आगे के जीवन में मल्लिका के जीवन में इसका असर देखने में भी आया। उन्हें नजदीक से जानने वाले भी कहते हैं कि उनके जीवन की कई छटाएं हैं। कभी तो वह अपनी बातचीत और पहनावे से एक अति आधुनिक महिला लगती हैं तो कभी परंपरा और संस्कृति के प्रति उनका प्रेम देखकर दंग रह जाना पड़ता है। एक समृद्ध और जानेमाने परिवार से ताल्लुक रखने वाले के बावजूद आमजन की चिंताओं से भी वह लगातार जुड़ी रही हैं। यही कारण है कि उनकी गिनती एक समर्पित समाज सेविका के रूप में भी होती है।
नृत्य कला और अभिनय के क्षेत्र में तो उनके दखल का लोगा सब मानते हैं। उन्होंने दुनिया के कई देशों में अपनी इस निपुणता से लोगों की सराहना बटोरी है। इसू तरह समानांतर सिनेमा में उनके योगदान को सभी रेखांकित करते हैं। कहकशां, कथा, मुट्ठी भर चावल, हिमालय से ऊंचा और सोनल उनकी यादगार फिल्में हैं। रंगमंच पर उनका अभिनय काफी सम्मोहन भरा रहा है। 1989 में जब वह सोलो परफार्मेंस के साथ 'शक्ति’ नाटक लेकर लोगों के सामने आईं तो उनकी प्रशंसा दर्शकों ने तो की ही, आलोचकों की नजर में भी खरी उतरीं। उन्होंने हर्ष मंदर की अनहर्ड वॉयसेज का नाट्य रुपांतरण 'अनसुनी’ नाम से किया। इसी तरह ब्रेख्त के एक नाटक का भी उन्होंने भारतीय संदर्भ में रुपांतरण किया।
बात करें राजनीति की तो इस क्षेत्र में मल्लिका का नाम तब अचानक पूरे देश में चर्चा में आ गया जब उन्होंने 2००9 में भाजपा के दिग्गज लाल कृष्ण आडवाणी के खिलाफ गांधीनगर से चुनाव लड़ने का फैसला किया। विभिन्न क्षेत्रों में अपने अवदानों के लिए भारत सराकर की तरफ से पद्म भूषण सम्मान से नवाजी जा चुकीं मल्लिका साराभाई कई बार विवादों में भी फंसी है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है कबूतरबाजी का मामला। हालांकि मल्लिका का कहना है कि यह सब उनकी वैचारिक प्रतिब्धदता और मुखरता के कारण उनके खिलाफ एक साजिश भर है।
बहरहाल, मल्लिका साराभाई आज भी देश की उन गिनी चुनी शख्सियतों में शामिल हैं, जिनकी उपस्थिति को कहीं भी गरिमामय माना जाता है और जिनके विचार और काम के पीछे एक सार्थक तर्क होता है।

बुधवार, 8 जनवरी 2014

चुनाव महज मोदी और राहुल के बीच नहीं


नरेंद्र मोदी अगर 2०14 में देश के प्रधानमंत्री होते हैं तो यह अनिष्टकारी होगा। नोबेल विजेता अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन के बाद हाल में मनमोहन सिंह इस बात को अलग-अलग तरीके से कह चुके हैं। इस सिलसिले में आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता और रणनीतिकार योगेंद्र यादव के बयान का भी जिक्र जरूरी है। उनके कहने का तरीका थोड़ा भिन्न है। वे लोकसभा चुनाव को मोदी बनाम राहुल के तौर पर देखने पर ही लानत भरते हैं। उनका बयान अमत्र्य और मनमोहन के बयान के करीब से जरूर गुजरता है पर उसकी मंजिल कहीं और है। वे सिर्फ व्यक्ति केंद्रित राजनीति पर सवाल नहीं उठाते बल्कि साथ ही इस दरकार को भी तार्किक रूप से रेखांकित करते हैं कि लोकतंत्र में चुनाव का मतलब सीएम या पीएम चुनना भर नहीं है और न ही इस या उस पार्टी की हार भर है। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में तो चुनाव उस महापर्व का नाम है, जिसमें देश और समाज का हर वर्ग बराबरी के साथ शिरकत करता है। यह शिरकत सरकार बनाने या गिराने से ज्यादा उस गुंजाइश को बहाल रखने के लिए अहम है, जिसमें एक समान्य जन भी अपने हाथ में सत्ता की चाबी संभाल सकता है। यही लोकतंत्र की महानता है, उसकी ताकत है।
बहरहाल, बात इस चर्चा के जरिए उस लोकतांत्रिक मानस की जिसमें बदलाव की बात आज हर तरफ हो रही है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की बनी सरकार ने इस बदलाव की संभावना को कहीं न हीं ज्यादा पुष्ट कर दिया है। देश में पिछले कम से कम तीन सालों के घटनाक्रमों पर नजर डालें तो लोकतांत्रिक व्यवस्था के केंद्र में जनता की ताकत और उसका निर्णायक सहभाग कैसे सुनिश्चित हो, यह एक बड़ा मुद्दा बना है। बात विकास की हो, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य की हो तो स्थानीय जनता की जरूरत की सर्वोपरिता समझी जा सकती है। नागरिक समाज को खड़ा करने से निश्चित रूप से एक अनुशासित लोकतंत्र को खड़ा होने में मदद मिलेगी।
देश में अब तक आम आदमी पांच साल में एक बार मतदान की कतार में खड़ा होकर अपने लोकतांत्रिक अधिकार और कर्तव्य को पूरा करता रहा है। इससे आगे उसके करने और समझने की कोई गुंजाइश छोड़ी ही नहीं गई है। इस कारण सत्ता से जनता की दूरी बढ़ी है और सत्ता को लेकर एक अविश्वास का जनमानस भी बना है। ऐसी स्थिति लोकतंत्र की मौलिक अवधारणा के भी खिलाफ है। पिछले दिनों जन प्रतिनिधियों से लेकर संसद की सर्वोच्चता पर जब बहस छिड़ी तो मौजूदा राजनीति के माहिरों को यह काफी अखड़ा भी। भारत में जिस तरह का लोकतंत्र है और हमारा संविधान जिसकी व्याख्या करता है उसमें संसद निस्संदेह सर्वोच्च नियामक संस्था है। पर इससे यह आशय कैसे निकल सकता है कि संसद की यह सर्वोच्चता जनता के भी ऊपर है। और अगर जनता सर्वोच्च है तो फिर उसे अपनी यह सर्वोच्चता साबित करने का मौका पांच साल में महज एक बार क्यों मिले। लिहाजा, आज अगर इस सवाल को लोग लोकसभा चुनाव से पहले उठा रहे हैं कि देश का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा, तो इसमें नामों को लेकर आग्रह-दुराग्रह तो दिख रहा है, पर यह सवाल कहीं पीछे छूट जा रहा है कि नामों और दलों की शिनाख्त के आधार पर देश में लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के लिए हो रही कोशिशों के सिलसिले को एक कारगर अंजाम तक नहीं पहुंचाया जा सकता है।
जेपी चौहत्तर आंदोलन के दिनों में बार-बार कहते रहे कि हमें 'कैप्चर ऑफ पॉवर’ नहीं बल्कि 'कंट्रोल ऑफ पॉवर’ चाहिए। घटनाक्रमों में तेजी से आए बदलाव के कारण जेपी का लोक समिति और लोक उम्मीदवार का प्रयोग बहुत कारगर नहीं हो सका। संपूर्ण क्रांति के शीर्ष व्याख्याकार आचार्य राममूर्ति ने भी माना कि चौहत्तर के लोकनायक के प्रयोग को महज सत्ता परविर्तन के तौर पर देखना, उन तमाम मुद्दों और संभावनाओं के प्रति अन्याय है, जिसने जनता को तब काफी मथा था। केंद्र में जनता सरकार का आना महज इसका प्रतिफल कतई नहीं था।
आज जब बात हो रही है 2०14 के लोकसभा चुनाव की तो इसमें पिछले कुछ सालों में नागरिक समाज की उस पहल का तो अक्श दिखना ही चाहिए जिसने लोकतंत्र की ज्यादा सार्थक व्याख्या और भूमिका के प्रति लोगों के बीच भरोसा जगाया, जिनका धीरे-धीरे लोकतांत्रिक संस्थाओं और उसके निर्वाचन प्रक्रिया के प्रति ही मोहभंग होना शुरू हो गया था। आज मुद्दा यह नहीं है कि देश के अगले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी होंगे या राहुल गांधी। न ही यह मुद्दा है कि अगली सरकार केंद्र में यूपीए की बनती है कि एनडीए की। यहां तक कि मुद्दा यह भी नहीं है कि गठबंधन राजनीति के दौर में कौन किस गोद से छिटककर किस गोद में जाकर बैठ जाता है। बल्कि मुद्दा तो यह है कि क्या आगामी लोकसभा चुनाव वैकल्पिक राजनीति की बढ़ी संभावना को बढ़ाता है कि नहीं,जनता और सरकार के बीच की दूरी कम होती है कि नहीं। देखने वाली बात यह भी होगी कि केंद्र में सत्तारूढ़ होने वाली पार्टी या उसका गठबंधन राजनीति को लोकनीति की तरफ ले जाने के लिए कितनी तत्पर दिखती है।
यहां यह साफ होने का है कि विकल्प और स्थानापन्न होने में फर्क है। कांग्रेस और भाजपा के बीच केंद्र के अलावा कई राज्यों में इतने भर का ही राजनीतिक संघर्ष है कि जनता अगर एक से दुखी होती है तो दूसरे को सत्ता सौंप देती है। ऐसा इसलिए नहीं कि जनता को इसके अलावा कुछ सूझता नहीं, बल्कि इसलिए क्योंकि उसके आगे चुनाव ही यही है कि वह इन दोनों में से किसी एक की तरफ जाए। यह तो विकल्प की नहीं बल्कि स्थानापन्नता की राजनीति हुई। मतदान के दौरान चुनाव के विकल्प से जनता को दूर रखने की जड़ता को जो राजनीतिक शक्तियां बहाल रखना चाहती हैं, वो इस लिहाज से तो कमजोर जरूर हैं कि वे अपने आगे किसी अपारंपरिक विकल्प के खड़ा होने से घबड़ाती है।
पारंपरिक राजनीति के प्रतिष्ठान कितना ढहते हैं, यह इस साल होने वाले लोकसभा चुनाव का सबसे दिलचस्प प्रतिफल होगा। यह प्रतिफल ही यह तय करेगा कि इस देश की जनता अपने लिए और अपने नाम पर चलने वाले तंत्र को पराए हाथों से कितना अपने हाथों में ला पाती है। पंजाबी के क्रांतिकारी कवि पाश सबसे खतरनाक स्थिति उसे मानते हैं जब हमारे सपने मर जाते हैं। आने वाला लोकसभा चुनाव देश के जन, गण और मन के लिए सुखद ही होगा, खतरनाक नहीं ऐसी कामना है। भले अमत्र्य सेन या मनमोहन सिंह इस कामना पर भरोसा न करें। योगेंद्र यादव की कामना जरूर ऐसी दिखती है और न भी दिखती हो तो इस देश का आम आदमी तो 16वीं लोकसभा के गठन को इन्हीं कामनाओं से आकार लेता देखना चाह रहा है।

मंगलवार, 7 जनवरी 2014

स्त्री संवेदना की खाकी

अरुणा बहुगुणा भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के अधिकारियों को प्रशिक्षण देने वाली शीर्ष संस्था राष्ट्रीय पुलिस अकादमी (एनपीए) को पहली महिला निदेशक बनने जा रही हैं। उनका का नाम जिस तरह से अचनाक चर्चा में आया, उससे दो बातें जाहिर होती हैं। एक तो यह कि महिलाओं के लिए अब शायद ही कोई क्षेत्र ऐसा बचा है जिसमें वे चोटी पर नहीं पहुंची हैं। भारत जैसे देश के लिए जो अब भी विकास का सिरमौर नहीं बल्कि उसकी रेस में शामिल भर है, यह और भी बड़ी बात है। दूसरी बात यह कि अब भी जब किसी क्षेत्र में किसी महिला को बड़ा पद या सम्मान मिलता है तो हम कहीं न कहीं चौंक उठते हैं। ऐसा महिलाओं की क्षमता के प्रति अंदर बसे पूर्वाग्रह के कारण है। हमें यह बड़ी बात इसलिए लगती है क्योंकि आमतौर पर आधी दुनिया की काबिलियत को लेकर हमारा नजरिया संदिग्ध रहता है।
बहरहाल बात अरुणा बहुगुणा की। कुछ दिनों तक यह नाम किसी तरह की चर्चा में शामिल नहीं था। आज गूगल सर्च पर उनका नाम लिखते ही तकरीबन पचास हजार पन्ने खुलते हैं। इन वेब इंट्रीज में उनकी तस्वीरें, उनके लिए बधाइयां और उनके बारे में काफी तरह की जानकारियां शामिल हैं। केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की विशेष महानिदेशक अरुणा बहुगुणा एनपीए का 28वां निदेशक बनेंगी। 1979 बैच की आंध्र प्रदेश कैडर की आइपीएस अफसर अरुणा फिलहाल दिल्ली में तैनात हैं।
हैदराबाद स्थित 65 साल पुराने एनपीए को सरदार वल्लभ भाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी के नाम से भी जाना जाता है। अरुणा को एनपीए का निदेशक नियुक्त करने संबंधी आदेश जल्द ही जारी किए जाने की संभावना है। गत नवंबर में सुभाष गोस्वामी को भारत-तिब्बत बॉर्डर पुलिस (आईटीबीपी) का महानिदेशक नियुक्त किए जाने के बाद से ही एनपीए निदेशक का पद रिक्त है। शंकर सेन, त्रिनाथ मिश्रा, के विजय कुमार जैसे चर्चित आईपीएस अधिकारी एनपीए के प्रमुख रह चुके हैं।
अरुणा 1977 बैच के पश्चिम बंगाल कैडर के आईपीएस अधिकारी एस जयरामण की पत्नी हैं। जयरामण केंद्रीय गृह मंत्रालय में विशेष सचिव की हैसियत से आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। अरुणा को लेकर यह बात महत्वपूर्ण है कि उन्हें काबिलियत के मुताबिक अब तक कम ही अवसर दिए मिले हैं। इस कारण वह लंबे समय तक महज एक सामान्य अधिकारी के रूप में यहां-वहां काम करती रहीं। अरसे तक तक महत्वहीन पदों पर रहने के बाद अरुणा को अब निश्चित रूप से बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई है। इससे पहले वह आंध्र प्रदेश में विशेष पुलिस बल में अतिरिक्त डीजी की हैसियत से काम कर चुकी हैं। फिलहाल वह सीआरपीएफ की अतिरिक्त महानिदेशक हैं। वह अग्निशमन दस्ते में भी काम कर चुकी हैं। उनकी नई भूमिका निश्चत रूप से उनके लिए चुनौतीपूर्ण होगी।
राष्ट्रीय पुलिस अकादमी देश भर में पुलिस सेवा में शामिल होने वाले अधिकारियों को हर उस तरह की ट्रेनिंग देने के लिए बनाया गया है, जिससे वे अपने कार्यक्षेत्र में किसी भी तरह की चुनौती का सामना कर सकें। आज देश में जिस तरह से अपराध का ग्राफ बढ़ रहा है, अपराध करने के तरीके बढ़ रहे हैं, उसमें पुलिस का काम काफी चुनौतीपूर्ण हो गया है। खासतौर पर महिलाओं को लेकर जिस तरह की संवेदनहीनता पूरे समाज में बढ़ी है, उससे पुलिस की मुश्किल काफी बढ़ गई है।
अरुणा खुद एक महिला हैं और वह इन स्थितियों को भली भांति समझती हैं। वह यह भी समझती हैं कि उनकी नई जिम्मेदारी उनके लिए एक अग्निपरीक्षा की तरह है। एक महिला में आत्मसम्मान के साथ काफी धीरता भी होती है। वह परिस्थिति को ज्यादा संवेदनशील तरीके से परख पाती है। उम्मीद है कि अरुणा एक महिला के रूप में यह सीख नए पुलिस अधिाकरियों को भलीभांति देंगी। अपनी नई नियुक्ति पर उन्होंने प्रसन्नता जताई है लेकिन साथ ही यह भी कहा है कि उनका नया कार्यकाल उनके लिए खुद को साबित करने का एक मौका है। नई कसौटी पर अरुणा खरी उतरें, ऐसी शुभकामना सबकी है।

मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

सौ में एक कपिल

वर्ष 2०13 को लेकर कई तरह की बातें हो रही हैं। ज्यादातर लोगों की नजर में यह 'आम’ आदमी के 'खास’ होने का साल है। इस साल आम जनता ने एकाधिक बार अपनी ताकत का इजहार किया। यह एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव की स्थिति है। इस स्थिति की व्यापकता तब और बढ़ जाती है जब हम देखतें हैं आम आदमी के बूते बदलाव का सियासी 'जंतर मंतर’ टीवी-सिनेमा और मनोरंजन जगत में भी काम आ रहा है। कॉमेडियन कपिल शर्मा को दो-तीन साल पहले तक जो भी पहचान थी, वह आम तरह की लोकप्रियता के दायरे में कैद थी। 2०13 में यह दायरा टूटा और वे आम से एक खास कॉमेडियन हो गए।
'कॉमेडी नाइट विद कपिल’ आज टीवी का एक ऐसा शो बन गया है, जिसकी लोकप्रियता ने बिग बी, सलमान खान, माधुरी दीक्षित और अनिल कपूर जैसे दिग्गजों को पछाड़ दिया है। बात टीआरपी की करें या कांटेंट की, कपिल सब पर भारी पड़ रहे हैं। पिछले दिनों प्रसिद्ध पत्रिका 'फोब्र्स’ ने उन्हें देश के सौ प्रभावशाली लोगों की सूची में स्थान दिया। कपिल के लिए इतनी जल्दी कामयाबी के इतने बड़े मुकाम तक पहुंचना उन तमाम लोगों के लिए एक सीख है, जो अपनी जिंदगी और पृष्ठभूमि को अपनी कामयाबी की राह का बड़ा रोड़ा मानते हैं।
दो अप्रैल 1981 को अमृतसर में जन्मे कपिल शर्मा के पिता पुलिस सेवा में थे जबकि मां एक साधारण गृहिणी। 26 अप्रैल 2००4 को पिता की कैंसर से हुई मौत से अचानक परिवार की सारी जवाबदेही कपिल के कंधों पर आ गई। कपिल के लिए यह चुनौती काफी मुश्किलों भरा था। एक तो उनकी उम्र कम थी, दूसरे उन्हें काम के नाम पर मंच से लोगों को हंसाना भर आता था। स्कूल-कृलेज के दिनों में उन्हें इस कारण थोड़ी लोकप्रियता भी मिली, पर महज इस बूते परिवार की जिम्मेदारी को उठाना आसान नहीं था। कपिल शुरू से थोड़े जुनूनी और इरादों के पक्के रहे। सो इस नई चुनौती को भी उन्होंने अपने तरीके से ही हल करने की ठान ली। कॉमडी को उन्होंने अपनी हॉबी से आगे एक करियर केे तौर पर चुन लिया। इस फैसले से कॉमेडी को लेकर उनका इरादा जहां और मजबूत हुआ, वहीं वे अपने काम को प्रोफेशनली भी गंभीरता से लेने लगे।
कपिल के जीवन में तब एख सुखद क्षण आया, जब वे पॉपुलर टीवी शो 'द ग्रेट इंडियन लॉफ्टर चैलेंज’ (सीजन-3) के विजेता बने। इसके बाद उन्होंने टीवी पर कई कॉमेडी शोज किए तो वहीं कई शोज की मेजबानी करने का भी उन्हें मौका मिला। कामयाबी के इस मुकाम तक आते-आते कपिल गुमनामी के अंधेरे से निकलकर चर्चित नामों में शुमाार होने लगे। पर शायद इससे बड़ी सफलता जीवन में उनका इंतजार कर रही थी। इस साल जब वे अपने प्रोडक्शन बैनर के9 केे तहत जब स्टैंड अप कॉमेडी शो 'कॉमेडी नाइट विद कपिल’ लेकर आए तो देखते-देखते इसकी लोकप्रियता टीवी के तमाम हिट शोज पर भारी पड़ने लगी। आज आलम यह है कि बड़े सेे बड़े सिने सितारे उनके शो में शामिल होने के लिए लालायित रहते हैं।
पिछले दिनों तब जरूर एकबारगी यह लगा कि कपिल के कॉमेडी शो की लोकप्रियता को ग्रहण लग जाएगा, जब इस शो से जुड़े सुनील ग्रोवर ने अपने को इससे अलग करने का फैसला कर लिया। ग्रोवर कपिल के शो में गुत्थी का कैरेक्टर प्ले कर रहे थे। पर यह आशंका बेबुनियाद साबित हुई। इससे पहले कपिल को उस समय भी गहरा धक्का लगा जब उनके शो का सेट जलकर राख हो गया। पर यह कपिल की लोकप्रियता की ही ताकत थी कि उन्होंने न सिर्फ नया सेट खड़ा कर लिया बल्कि शो की लोकप्रियता पर भी आंच नहीं आने दी।
कपिल के हास्य की खास बात यह है कि इसमें न तो कुछ द्बिअर्थी है और न ही कुछ सतही। वे हास्य के नाम पर कुछ भी ऐसा नहीं करते जिससेे उनके शो को एक फेवरेट फैमिली शो होने में बाधा आए। आम जीवन का आम हास्य कपिल की जुबां और अदा से खास बन जाता है। यही तो है आम कपिल का खास कमाल।

'स्मॉल इज नॉट वनली ब्यूटीफुल, इट अज सिग्निफिकेंट आल्सो’


ईएफ शुमाकर की मशहूर किताब है- स्मॉल इज ब्यूटीफुल। शुमाकर की गिनती बीसवीं सदी के चोटी के आर्थिक चिंतक में होती है। वैसे वे महज अर्थ पंडित भर नहीं थे। समय और समाज को लेकर वे एक व्यापक दृष्टिकोण रखते थे। उनकी साफ मान्यता थी कि लोकसमाज को साथ लिए बिना आप न तो विकास का कोई ब्लू प्रिंट तैयार कर सकते हैं और न ही मानव कल्याण के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। बहरहाल, शुमाकर का जिक्र फिलहाल महज इसलिए क्योंकि वर्ष 2०13 के दिनों-महीनों को पलटकर देखने पर उनकी किताब के शीर्षक का बरबस ध्यान आता है। यह शुमाकर की किताब का नाम भर नहीं बल्कि उनके नाम से मशहूर हुई एक कालजयी उक्ति भी है। बिहार आंदोलन के दिनों में जेपी इस उक्ति का कई बार जिक्र करते थे। जेपी तब की स्थिति को देखते हुए इसे थोड़ा बदलते भी थे। वे कहते थे-'स्मॉल इज नॉट वनली ब्यूटीफुल, इट अज सिग्निफिकेंट आल्सो।’
जेपी को तब नहीं पता था कि संपूर्ण क्रांति की जिस मशाल को वह जला रहे हैं, वह देश में राजनीति और व्यवस्था परिवर्तन के संघर्ष को किस मुकाम तक ले जाएगा। पर उन्हें यह जरूर महसूस होता था कि जो भी पहल हो रही वह सामयिक तौर पर जरूरी है। जड़ता के टूटने से ज्यादा जरूरी है, उसके खिलाफ हस्तक्षेप का होना। एक चेतनशील मनुष्य और उसके समाज की यही पहचान है कि वह अपनी चेतना को हर उस जड़ता के खिलाफ एक कार्रवाई का रूप दे जो उसके परिवेश को प्रगतिशील होने के बजाय स्थिर करता है, निष्प्राण करता है। आज जब हम वर्ष 2०13 की समाप्ति पर इन बातों को समझने की कोशिश करते हैं तो हमारा ध्यान कई उन छोटी-बड़ी बातों पर जाता है, जो इस वर्ष को आगे के कई वर्षों के लिहाज से महत्वपूर्ण बनाता है।
वैसे यहां यह साफ होना जरूरी है कि कैलेंडर में तो हफ्ते-महीने को अलगाना आसान है पर अगर हम बात करते हैं देश और समाज की तो हमें बारहमासे के तय खांचे से थोड़ा आगे निकलना होगा। इस तरह अगर वर्ष 2०13 के साथ हम अगर 21वीं सदी के दूसरे दशक के अब तक के दौर को एक साथ देखें तो हमें साफ लगेगा कि छह दशक से ज्यादा लंबी उम्र का भारतीय लोकतंत्र एक बार फिर से अपनी शिनाख्त और भूमिका को नए सिरे से तय करना चाहता है। आजादी पूर्व से लेकर आजादी बाद के भारतीय इतिहास में यह नितांत नए तरह का अनुभव है।
नायक, विचार, संगठन और फिर इनकी सामूहिक ताकत से एक क्रांतिकारी आरोहण की तैयारी रिवोल्यूशन की यह थ्योरी आज बेमानी है। यह उस दौर का सच है जिसमें लोग यहां तक विचार करने की स्थिति में हैं कि 'भीड़ भी एक विचार है’। दिलचस्प है कि अरब बसंत के बाद इस बात को लेकर तमाम तरह के अध्ययन हो रहे हैं कि आज एक नए तरह का विश्व समाज है। एक ऐसा समाज जो एक तरफ तो अपने आस-पड़ोस से दूर है, कटा-कटा है, वहीं सोशल मीडिया पर वह संपर्क के तमाम तरह की एक्टिविटी से जुड़ा है। इस स्थिति को समाजशास्त्री अध्ययन के किसी पुराने चश्मे से नहीं समझा जा सकता है। यह एक नई तरह की स्थिति है, जिसमें व्यक्ति, परिवार और समाज की इकाई हर स्तर पर अपनी नई पहचान और नई दरकारों को दर्ज करा रही है। उत्तर आधुनिकता के नाम पर पिछले दो दशकों में इस स्थिति को लोक और परंपरा की पुरानी लीक के खिलाफ एक दुराग्रह का दौर तक कहा गया। पर क्या यह आश्चर्यजनक नहीं कि एक ऐसे समय में जब आतंकवाद जैसा प्रतिक्रियावादी विकल्प लोगों के सामने अपने को असंतोष को व्यक्त करने के लिए मौजूद है, लोग तमाम तरह के अहिंसक विकल्पों को आजमा रहे हैं।
बात करें भारत की तो एक चिंता जो गांधी ने देश की आजादी से काफी पहले जताई थी कि लोकतंत्र का केंद्रीकृत ढांचा अगर बहाल रहा तो स्वराज का अभीष्ट हमसे दूर ही रहेगा। लोकतंत्र का विकेंद्रीकरण मतलब प्रातिनिधक लोकतंत्र के मॉडल को प्रत्यक्ष जन प्रतिभाग के मॉडल में बदलना। आज जिस आम आदमी पार्टी (आप) की दिल्ली विधानसभा की 28 सीटों पर जीत को लेकर राजनीति-सामाजिक चिंतक तमाम तरह की बातें कर रहे हैं, वह लोकतंत्र में ढांचागत परिवर्तन की जनांकांक्षा को ही कहीं न कहीं प्रतिबिंबित करता है।
वैसे आप के 'स्वराज’ को लेकर अभी तमाम तरह की आशंकाएं भी हैं। जनतंत्र में जन भागीदारी की भूमिका को पांच साल में एक बार मतदान की कतार में खड़े होने से आगे ले जाने की दरकार तो समझ में आती है, पर इससे आगे नीति और निर्णय के जन प्रतिभाग को कैसे व्यवस्थागत रूप से सुनिश्चत किया जाए, यह भी एक बड़ा प्रश्न है। गांधी के स्वराज और अरविंद केजरीवाल के स्वराज में एक बड़ा फर्क है। गांधी स्वराज के लिए सबसे पहले नागरिक इकाई की शुचिता का सवाल उठाते हैं। शारीरिक श्रम, मितव्ययता, प्रेम-करुणा, सर्वधमã समभाव जैसी चारित्रिक और नीतिगत कसौटी पर खड़ा हुए बगैर गांधीवादी अहिंसक स्वराज की कल्पना नहीं की जा सकती।
प्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोशी मौजूदा दौर को 'परम भोग’ का 'चरम दौर’ कहते थे। बाजार के साथ आई सूचना क्रांति ने एक तरफ जहां हमारी रचनात्मक वृतियों से स्वाबलंबन का तत्व छिन लिया है, वहीं हम लालच के महापाश में इतना बंध गए हैं कि इस कैद को ही सुखद कहने-मानने को मजबूर हैं। ऐसे 'उदार’ दौर का स्वराज कितना उदार होगा, यह बड़ा प्रश्न है। पर यह तो हुई गांधी विचार और परंपरा की एक बड़ी लीक के आगे 'आम आदमी’ के कुछ क्रांतिकारी संकल्पों को खारिज करने की बात।
गांधी की ही एक बात को लें तो वे अपने जीवन और अपने कमोर्ं को सत्य का प्रयोग कहते रहे। यह प्रयोग गांधी तक आकर कोई अंतिम स्थिति को पा गया, ऐसा नहीं है। यह एक सतत प्रक्रिया है, जो हमेशा चलती रहनी चाहिए। खुद गांधी भी अगर कोई सीख देते हैं, हमें यही सीख देते हैं। अब इस दृष्टि से वर्ष 2०13 में बनी स्थितियों की बात करें तो इसमें कई सकारात्मक लक्षण लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के दिखाई पड़ते हैं।
'भीड़’ इस या उस पार्टी या संगठन के बैनर तले नहीं बल्कि तिरंगे को लहराती हुई अचानक देश के कोने-कोने में सड़कों पर उतर आती है। नागरिक समझ के नाम पर बस यह प्रतिक्रिया कि भ्रष्टाचार, महिला असुरक्षा, नागरिक अधिकारों पर कुठाराघात की स्थिति को अब नहीं सहेंगे। क्या इतने भर से शासन-प्रशासन की जड़ता भंग होगी? दरअसल यह शुरुआती स्थिति ही आज परिवर्तन की एक प्रक्रिया को जन्म दे रही है। जन, गण और मन का नया समन्वय किसी नीति और विचार से आगे समाधान की स्थिति की ओर ले जाता है। एक ऐसा समाधान जिसे परिवर्तन का आधुनिक लोकतांत्रिक तरीका भी कह सकते हैं। यह तरीका व्यक्ति का व्यक्ति पर भरोसे का है। इस न्यूनतम शपथ का है कि हम बदलेंगे इसलिए हमारा परिवेश, हमारा समय भी बदलेगा। यह तरीका स्वाभाविक रूप से अपने लिए नायकत्व भी तय कर लेता है। शुमाकर के शब्दों का एक बार फिर से स्मरण करें तो यह छोटा प्रयोग सुंदर तो है ही, जेपी की पूरक व्याख्या को जोड़ दें तो रेखांकित करने योग्य भी है।



मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

विवादित कहानी देवयानी

ऐसा बहुत कम होता है कि आपके साथ एक तरफ तो अन्याय हो, वहीं दूसरी तरफ अन्याय के खिलाफ एक बड़े संघर्ष का आप प्रतीक बन जाएं। अमेरिका में भारतीय राजनयिक देवयानी खोब्रागडे के साथ बदसलूकी का मामला ऐसा ही है। इस साल जून-जुलाई से शुरू हुए इस मामले ने साल के आखिर आते-आते ऐसा तूल पकड़ा कि भारत और अमेरिका का संबंध कई नजरिए से निर्णायक मोड़ पड़ पहुंच गया है। भारत इस पूरे मामले पर अमेरिका से बिना शर्त माफी चाहता है तो अमेरिका महज खेद जताकर मामले को कानूनी दरकार का पैरहन देकर उसे रफा-दफा करना चाहता है।
दिलचस्प है कि इस पूरे मामले के केंद्र में खड़ी देवयानी खोब्रागडे के हवाले से न तो मीडिया में कोई बात आ रही है और न ही भारत सरकार उसके हवाले से कोई बड़ा खुलासा कर रही है। ऐसे में देवयानी को लेकर जो बातें हो रही हैं, उसके आधार पर लोग उनकी एक अनुमानित या आभासित शख्सियत खींच रहे हैं। इस सब में सबसे ज्यादा मदद कर रही है देवयानी की कुछ तस्वीरें, जो इंटरनेट के जरिए सबके लिए सुलभ हैं। तस्वीरें झूठ नहीं बोलतीं पर इनसे जिंदगी के मुकम्मल सच का खुलासा हो जाता है, आप ऐसा भी नहीं कह सकते। देवयानी मामले में आज ऐसा ही हो रहा है, उसकी तस्वीर देखकर और उसके बारे में हालिया प्रसंग में कुछ बातें जान-सुनकर लोग तमाम तरह की बातें सोचने-कहने लगे हैं। पर जब देवयानी के व्यक्तिगत सच के बारे में पता करते हैं तो इनमें से कुछ बातें सिरे से खारिज हो जाती हैं।
देवयानी मुंबईकर हैं। उनके पिता उत्तम खोब्रागडे आईएस ऑफिसर थे। देवयानी की शुरुआती तालीम एक बड़े कॉन्वेंट स्कूल में पूरी हुई। बाद में उन्होंने सेंट जीएस मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की। पर देवयानी के लिए अंतिम गंतव्य शायद यही नहीं था। उन्होंने अपनी जिंदगी के लिए एक दूसरा रास्ता चुना। यह रास्ता भारतीय विदेश सेवा का था। मेडिकल जैसे प्रोफेशन को छोड़कर एकाएक दूसरी दिशा में अपने करियर को मोड़ने का फैसला आसान नहीं था। पर उनके लिए जिंदगी का मतलब शायद एक बनी बनाई लीक पर आगे बढ़ना भर नहीं था। देवयानी को जिंदगी में शायद वो सब तजुर्बे चाहिए थे जिसके लिए सात समंदर पार करना जरूरी है।
देवयानी के चाचा डॉ. अजय एम गोडाने आईएफएस 1985 बैच के अधिकारी थे। संभवत: चाचा को देखकर ही देवयानी ने अपना इरादा बदला हो। सुंदर और कुशाग्र देवयानी ने 1999 में अपने इरादे के मुताबिक कामयाबी पा ली। वह आईएफएस की परीक्षा पास कर गईं। अमेरिका में भारतीय राजनयिक का पद संभालने से पहले देवयानी ने पाकिस्तान, इटली और जर्मनी में भारत के राजनयिक मिशन को सफलतापूर्वक पूरा किया।
देवयानी ने एक प्रोफेसर से शादी की है और उनकी दो बेटियां हैं। उनका भाषा ज्ञान खासा समृद्ध है। वह हिंदी के साथ अंग्रेजी और जर्मन भाषा पर समान अधिकार रखती हैं। इसके अलावा उनकी विभिन्न देशों की राजनीतिक और सांस्कृतिक समझ भी काफी अच्छी है। अध्ययन, पर्यटन, संगीत और योग को पसंद करने वाली देवयानी ने अपनी जिंदगी में सीखने और आगे बढ़ने का रास्ता अब भी खुला रखा है। इसी का नतीजा रहा कि पिछले साल वह चेवनिंग रोल्स रॉयस साइंस एंड इनोवेशन लीडरशिप प्रोग्राम के लिए चयनति हुईं।
विवादों से देवयानी का नाता नया नहीं है। दो साल पहले जब मुंबई के आदर्श सोसायटी का घोटाला सामने आया तो सोसायटी में अवैध तरीके से फ्लैट बुक कराने वालों में उनका भी नाम था। वैसे देवयानी के बारे में यह जानना भी जरूरी है कि वह दलितों के लिए लैंगिक समानता के लिए काम करना चाहती है। बहुत संभव है कि विवादों के मौजूदा चक्रव्यूह से निकलने के बाद वह अपनी जिंदगी की इस चाह को पूरा करने के बारे में गंभीरता से विचार करे।