बुधवार, 29 सितंबर 2010

अंतिम बिगुल


बुझी नहीं है आग
न झुका है आसमान
तमगे हम लाख पहनें
या कि पा लें
पेशेवर रहमदिली का
सबसे बड़ा इनाम

पत्थर में धड़कन की तरह
सख्त सन्नाटे को दरकाती
आवाज
समय ने भी कर दिया इनकार
जिसे सुनने से

कविता की ये पंक्तियां
चुराई हैं मैंने भी
खासी बेशर्मी से
उस बच्चे की बेपरवाह आंखों से

सोचता हूं अब भी
नहीं गूंज रहा होगा क्या
युद्ध का वह अंतिम बिगुल
इतिहास की बेमतलब जारी
बांझ-लहूलुहान थकान के खिलाफ
वह अंतिम तीर
वह अंतिम तान
बस अड्डे पर मिली
लावारिस मुस्कान
पांच रुपये में आठ समान
पांच रुपये में आठ समान

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

सदी का अंतिम फ्लैश


सदी के आखिर में बंधते
लाखों-करोड़ों असबाबों के बीच
छूट गयी है वह
किसी पोंगी मान्यता की तरह
नहीं लेना चाहता कोई
अपने साथ
नहीं होना चाहता कोई
नयी सदी में उसके पास

आने-जाने वाले हर रास्ते पर
चलते-फिरते हर शख्स को
जागो और चल पड़ो की
अहद दे रही हैं नयी रफ्तारें
सांझ के दीये की तरह
कंपती-बलती
कर रही है इंतजार वह
अब भी किसी के लौटने का

इस सदी के
सबसे उदास दोपहर में
मैं पहुंचना चाहता हूं
उसके पास
अभी-अभी छोड़ आई है
उलटा निशान तीर का जो
उस चौराहे पर
शोर जहां सबसे ज्यादा है
भीड़ है
और रेंगती हैं अफवाहें
तरह-तरह की
सांपों की तरह

सदी का सबसे बूढ़ा आदमी
वहां गुजरते समय के
आखिरी दरवाजे पर
बैठा है
चमार के पेशे के साथ
पूरी आस्था और जन्मजात
शपथ की अंटी बांधे
चलते-फिरते धूल उड़ाते
चप्पल-जूतों की चरमराहट
दुरुस्त करने
इस तारीखी मंजर के सामने
रुंधे गले की नि:शब्दता
पूरी होती है
छलछला आये आंसूओं से
लिखता हूं पंक्ति अंतिम
सदी की अंतिम कविता की-
यह इस सदी का अंतिम फ्लैश है

गोसार्इं का गांव


गोसार्इं पूजने
पहुंचा हूं गांव
आज शाम से पहले

तीन दिन पहले
जाते हुए गांव
और उससे पहले
तिलक के समय भी
आया था गांव
काकी के मरने के बाद
अठारह-उन्नीस साल बाद

कोई पूछता नहीं
इस तरह कि
क्यों भूले-भटके
पहंुच जाते हैं गांव
क्यों आते हैं गांव या कि
अब तुम्हारा नहीं रहा गांव

मुझे पाकर भदेस यह
धनी हो जाता है
मैं जब भी आऊं
जितनी बार आऊं
गांव मेरा ऋणी हो जाता है

पूछना तो वैसे
ऐसा भी हो सकता है
आ गये मियां
कहां अपने गांव
नहीं अपना नहीं
गोसार्इं का गांव

सोमवार, 27 सितंबर 2010

मोहल्ले का नायक


गर्म धूप की सेंक से
पक रही हैं लड़कियां
मोहल्ले की लड़कियां
फरवरी के महीने में
बरामदे की कुर्सियों पर
छत पर बिछी चटाई पर
खुले लॉन में
ऊन के फंदों में
कस रही हैं लड़कियां
बैडमिंटन के कोर्ट में
शटल के पंखों से
उड़ रही हैं लड़कियां

लड़कों का क्रिकेट बॉल
उड़ा ला रहे हैं
लड़कियों की बातें
नयी पकी खुशबू की सौगातें
नहीं कर पा रहे हैं यही काम
ऊपर उड़ रहे कई पतंग
प्रयास के बावजूद

सबको पता है कि
शाम से पहले
तीन-साढ़े तीन बजे
इस वासंती मुहूर्त का नायक
यहां नहीं है
वहां लड़कियों की बातों से भी
उसकी टोह मुश्किल है
बची कविता
तो वह भला
यहां कैसे हो सकता है
वैसे यह कहना भी फिजूल है
यह जानने के बाद कि वह
धड़कनों का चित्रकार है
और इस साल वसंत के पास
उसी की कूची से धुला
आईडेंटीटी कार्ड है

श्रीफल में सोडा


सीसे का परदा
बाजार का मंच
नजरबंदी का खेल
बासी चेहरे लाचार
कतारबद्ध
ताजे फरार
अंतिम नियति
चौसठवें खाने शतरंजी हार

चेहरे गिरफ्तार
नजरबंद
मुखौटे आजाद
अपने और बाप के पोस्टर के साथ
मिलने की सलाह
शाम चार से सात
मंडी हाउस के पास

हरेक की कहानी
फर्दबयानी
रिकार्डेड अप-टू-डेट
आप और आपका शहर
वॉल्यूम नंबर आठ पर
और हम यहीं
शॉट नंबर एक सौ बीस
एलबमी मुस्कान के साथ
अपने भदेसी वंशजों के बीच

अचानक एक चीख
पागल प्रलाप
इन सबके बाद
फिर भी शेष
उसकी दुविधा
उसकी बात
जन्मजात

उत्तर आधुनिक खोज
ग्लोबीय इहलोक
बैलुनी परलोक
नयी परंपरा पीढ़ी
बोल्ड आउटलुक
एक्सपोज
पुराने रंग पनसोखे के
रिफ्यूज
नया रेनबो कलर
फन फेयर में इंट्रोड¬ूस

कानों पर जूतों की परेड
खुली आंखों में परीलोक स्वप्नदेश
सूचनाओं की थैली
मगजी गुद्दे के भाव
थोक में जख्मों की सूचना
खुदरे में सूचनाओं के घाव
धन्य संस्कृति
श्रीफल में भरे सोडे से
सेलेबल फैशनेबल
रचना क्रांति से

ह्मदय ग्राम से मानस बीच
प्रतिक्षण टेलीकॉम सेवा
आर्डिनरी एक्सप्रेस
खगोलीय अनुशासन
भूगोलीय जीवन का
रोने से पहले गुंबद का झंडा झुकेगा
हंसेंगे आप तो
संग्रहालय का चीफ दौड़ेगा

शब्दों के पन्ने
संवादों की नत्थी से
पाखी के पंख की तरह
तोड़ लिए जाएं
शोर नारा मुराद
कविता मुर्दाबाद
कविता मुर्दाबाद
अचानक फिर चीख
अट्टहास
एक पागल प्रलाप
इन सबके बाद
फिर भी शेष
उसकी दुविधा
उसकी बात
जन्मजात

शनिवार, 25 सितंबर 2010

अवैध संबंध


संबंधों के क्रूरतम संकट के दौर में
सबसे बड़ा असंवैधानिक अनुबंध है
अवैध संबंध

संविधान की प्रस्तावना
जिस देश-काल को रचने का
जताती है भरोसा
जिसके प्रति जतानी होती है
सबसे ज्यादा निष्ठा
उसके धुर्रे बिखेरकर
तैयार हो रहा है
रिश्तों का मन माफिक जंगल
घुप्प अंधेरे जैसा पसरा
अवैध समाज

अवैध संबंध
जिसकी व्याख्या न तो
अरस्तु के पुरखों
आैर न उनकी सीढ़ियों पर बैठी
संतानों ने की
पर रही हैं ये तब भी
जब मर्यादा के सार्वकालिक
सुलेख रचे गए
महलों में बने हरम
कर्मकांडों की हांडी में
पकने वाला धरम
इतना नरम तो कभी नहीं रहा
कि उसकी गरमाहट
घर के दायरे में कैद हो
आैर किसी लक्ष्मण रेखा से
पहले तक ही वैध हो
इनके पुचकार आैर प्रसार के
अगनित पड़ाव
महज मानवीय इतिहास नहीं
बल्कि उसे सिरहाने सुलाने वाले
मनुष्य की आंख-कान हैं

संवेदना, इच्छा आैर प्रेम की
गोपनीय संहिता की आपराधिक धाराएं
दिमाग से टपकती हैं
पर मन की भट्टी उड़ा देती है
इन्हें भाप बनाकर
भूला देती है सभ्यता का शाप मानकर
पुण्य की सियाही से लिखा पाप मानकर

अब भी जिन आंखों को चुभती हैं ये
अखरती हैं बिछावन में चुभे आलपीन की तरह
उन्हें बटन की तरह खुली
अपनी आंखों पर नहीं
उन पंखों पर
भरोसा करना चाहिए
जिनको खोलने की आदिम इच्छा
मरती तो कभी नहीं
हां, आत्महत्या जरूर कर लेती है कई बार
सिहरन से भी तेज उगने वाले डर से
कानून की काली नजर से

25.09.10

बुधवार, 15 सितंबर 2010

पुरुष से परपुरुष तक


कल जब तुम्हारी शर्ट की कालर पर
जमी देखी कीचट मैल तो मिचलाने लगा मन
लड़खड़ाते देखा किसी अव्वल बेवरे की तरह
तो घबड़ाने लगा मन
प्रेम मैं करती थी तुम्हीं से
किया था खुद से ही वरण तुम्हारा
पर फैसला यह शरमाने लगा
तुम्हारे नाम का पल्लू ओढ़ूं आजीवन
जीवन ऐसा गंवारा नहीं लगा
मेरी कोख से होगा पुनर्जन्म तुम्हारा
सोचकर दरकने लगी मेरे अस्तित्व की धरती
भर-भराकर कर गिरने लगा
सिंदूरी सपनों का आसमान

तुम्हारी गोद में ही ली मैंने
किसी परपुरुष के सपने का सुख पहला
देहगंध का संसर्ग बदलने की हिमाकत
विद्रोह की तरह था मेरे लिए
तुम्हारे साथ रखकर ही शुरू कर दी मैंने
किसी आैर के होने की प्रार्थना
मांगने लगी मनौती छुटकारे की
देह का धधकता दाह
जला दे रही था वह सब
जो तुम्हारे नाम से दौड़ा था कभी नसों में मेरी

बचाने की कोशिश तो की भरसक तुमने
संबंध की अनजाने ही ढीली पड़ती गांठ को
पर जतन के हर पासे को पलटता देख
खोने लगे संतुलन
पटकने लगे थाली
बरबराने लगे गाली
जिन बालों पर फेरकर हाथ तुमने दिया था कभी
अनंत प्यार का भरोसा
वह मेरी मुंहजोर बेवफाई का
बना पहला शिकार
नोचे बेरहमी से तुमने बाल मेरे
कभी पागल कर देने वाली गोलाई पर
टूटा तुम्हारे हाथ से रेत की तरह सरकते जाते
प्यार का भिंचभिंचाता गुस्सा

इस झंझावात का सामना करना
भले दुश्वार था मेरे लिए
बिलख उठती थी मैं
तुमसे बार-बार दागे जाने के बाद
पर यही तो था वह जंगल
जिसे चाहती थी मैं पहले उगाना
आैर बाद में खुद उसमें फंसना
फिर कर लेना चाहती थी इसे जैसे-तैसे पार

तुम नहीं मेरे प्यार
कर नहीं सकते तुम मुझे प्यार
इस सच को सधा होना ही नहीं
अंतिम होना भी जरूरी था
प्यार के रेशमी रिश्ते के टूटने का
लौह तर्क आखिरकार जीत गया
देखते-देखते ही देखते
तुम आैर तुम्हारा साथ बीत गया
आैर इस तरह एक दिन फूंक दिया मैंने
तुमसे मुक्ति का महामंत्र

तुम्हारे साथ होने की ठिठुरन
जिस रजाई को ओढ़कर करती रही दूर
जिसके सपनों के तकिए पर काढ़ती रही
सपनों के फूल
तुम्हें खोने का सुख
जिसके पास होकर देता रहा
गहरी लंबी सांस जैसा सुकून
प्यार वह सहारा जैसा था
सहारा वह भूख जैसी थी
भूख वह देह जैसी थी
आैर देह वह जलाता रहा
मेरी बिंदास चेतना का अलख
भरमाई आंखों से पूजती रही मैं
दीर्घ आैर विद्रोही इच्छाओं का महाकलश

हिंदी दिवस, 2010