मंगलवार, 7 जनवरी 2014

स्त्री संवेदना की खाकी

अरुणा बहुगुणा भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के अधिकारियों को प्रशिक्षण देने वाली शीर्ष संस्था राष्ट्रीय पुलिस अकादमी (एनपीए) को पहली महिला निदेशक बनने जा रही हैं। उनका का नाम जिस तरह से अचनाक चर्चा में आया, उससे दो बातें जाहिर होती हैं। एक तो यह कि महिलाओं के लिए अब शायद ही कोई क्षेत्र ऐसा बचा है जिसमें वे चोटी पर नहीं पहुंची हैं। भारत जैसे देश के लिए जो अब भी विकास का सिरमौर नहीं बल्कि उसकी रेस में शामिल भर है, यह और भी बड़ी बात है। दूसरी बात यह कि अब भी जब किसी क्षेत्र में किसी महिला को बड़ा पद या सम्मान मिलता है तो हम कहीं न कहीं चौंक उठते हैं। ऐसा महिलाओं की क्षमता के प्रति अंदर बसे पूर्वाग्रह के कारण है। हमें यह बड़ी बात इसलिए लगती है क्योंकि आमतौर पर आधी दुनिया की काबिलियत को लेकर हमारा नजरिया संदिग्ध रहता है।
बहरहाल बात अरुणा बहुगुणा की। कुछ दिनों तक यह नाम किसी तरह की चर्चा में शामिल नहीं था। आज गूगल सर्च पर उनका नाम लिखते ही तकरीबन पचास हजार पन्ने खुलते हैं। इन वेब इंट्रीज में उनकी तस्वीरें, उनके लिए बधाइयां और उनके बारे में काफी तरह की जानकारियां शामिल हैं। केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की विशेष महानिदेशक अरुणा बहुगुणा एनपीए का 28वां निदेशक बनेंगी। 1979 बैच की आंध्र प्रदेश कैडर की आइपीएस अफसर अरुणा फिलहाल दिल्ली में तैनात हैं।
हैदराबाद स्थित 65 साल पुराने एनपीए को सरदार वल्लभ भाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी के नाम से भी जाना जाता है। अरुणा को एनपीए का निदेशक नियुक्त करने संबंधी आदेश जल्द ही जारी किए जाने की संभावना है। गत नवंबर में सुभाष गोस्वामी को भारत-तिब्बत बॉर्डर पुलिस (आईटीबीपी) का महानिदेशक नियुक्त किए जाने के बाद से ही एनपीए निदेशक का पद रिक्त है। शंकर सेन, त्रिनाथ मिश्रा, के विजय कुमार जैसे चर्चित आईपीएस अधिकारी एनपीए के प्रमुख रह चुके हैं।
अरुणा 1977 बैच के पश्चिम बंगाल कैडर के आईपीएस अधिकारी एस जयरामण की पत्नी हैं। जयरामण केंद्रीय गृह मंत्रालय में विशेष सचिव की हैसियत से आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। अरुणा को लेकर यह बात महत्वपूर्ण है कि उन्हें काबिलियत के मुताबिक अब तक कम ही अवसर दिए मिले हैं। इस कारण वह लंबे समय तक महज एक सामान्य अधिकारी के रूप में यहां-वहां काम करती रहीं। अरसे तक तक महत्वहीन पदों पर रहने के बाद अरुणा को अब निश्चित रूप से बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई है। इससे पहले वह आंध्र प्रदेश में विशेष पुलिस बल में अतिरिक्त डीजी की हैसियत से काम कर चुकी हैं। फिलहाल वह सीआरपीएफ की अतिरिक्त महानिदेशक हैं। वह अग्निशमन दस्ते में भी काम कर चुकी हैं। उनकी नई भूमिका निश्चत रूप से उनके लिए चुनौतीपूर्ण होगी।
राष्ट्रीय पुलिस अकादमी देश भर में पुलिस सेवा में शामिल होने वाले अधिकारियों को हर उस तरह की ट्रेनिंग देने के लिए बनाया गया है, जिससे वे अपने कार्यक्षेत्र में किसी भी तरह की चुनौती का सामना कर सकें। आज देश में जिस तरह से अपराध का ग्राफ बढ़ रहा है, अपराध करने के तरीके बढ़ रहे हैं, उसमें पुलिस का काम काफी चुनौतीपूर्ण हो गया है। खासतौर पर महिलाओं को लेकर जिस तरह की संवेदनहीनता पूरे समाज में बढ़ी है, उससे पुलिस की मुश्किल काफी बढ़ गई है।
अरुणा खुद एक महिला हैं और वह इन स्थितियों को भली भांति समझती हैं। वह यह भी समझती हैं कि उनकी नई जिम्मेदारी उनके लिए एक अग्निपरीक्षा की तरह है। एक महिला में आत्मसम्मान के साथ काफी धीरता भी होती है। वह परिस्थिति को ज्यादा संवेदनशील तरीके से परख पाती है। उम्मीद है कि अरुणा एक महिला के रूप में यह सीख नए पुलिस अधिाकरियों को भलीभांति देंगी। अपनी नई नियुक्ति पर उन्होंने प्रसन्नता जताई है लेकिन साथ ही यह भी कहा है कि उनका नया कार्यकाल उनके लिए खुद को साबित करने का एक मौका है। नई कसौटी पर अरुणा खरी उतरें, ऐसी शुभकामना सबकी है।

मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

सौ में एक कपिल

वर्ष 2०13 को लेकर कई तरह की बातें हो रही हैं। ज्यादातर लोगों की नजर में यह 'आम’ आदमी के 'खास’ होने का साल है। इस साल आम जनता ने एकाधिक बार अपनी ताकत का इजहार किया। यह एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव की स्थिति है। इस स्थिति की व्यापकता तब और बढ़ जाती है जब हम देखतें हैं आम आदमी के बूते बदलाव का सियासी 'जंतर मंतर’ टीवी-सिनेमा और मनोरंजन जगत में भी काम आ रहा है। कॉमेडियन कपिल शर्मा को दो-तीन साल पहले तक जो भी पहचान थी, वह आम तरह की लोकप्रियता के दायरे में कैद थी। 2०13 में यह दायरा टूटा और वे आम से एक खास कॉमेडियन हो गए।
'कॉमेडी नाइट विद कपिल’ आज टीवी का एक ऐसा शो बन गया है, जिसकी लोकप्रियता ने बिग बी, सलमान खान, माधुरी दीक्षित और अनिल कपूर जैसे दिग्गजों को पछाड़ दिया है। बात टीआरपी की करें या कांटेंट की, कपिल सब पर भारी पड़ रहे हैं। पिछले दिनों प्रसिद्ध पत्रिका 'फोब्र्स’ ने उन्हें देश के सौ प्रभावशाली लोगों की सूची में स्थान दिया। कपिल के लिए इतनी जल्दी कामयाबी के इतने बड़े मुकाम तक पहुंचना उन तमाम लोगों के लिए एक सीख है, जो अपनी जिंदगी और पृष्ठभूमि को अपनी कामयाबी की राह का बड़ा रोड़ा मानते हैं।
दो अप्रैल 1981 को अमृतसर में जन्मे कपिल शर्मा के पिता पुलिस सेवा में थे जबकि मां एक साधारण गृहिणी। 26 अप्रैल 2००4 को पिता की कैंसर से हुई मौत से अचानक परिवार की सारी जवाबदेही कपिल के कंधों पर आ गई। कपिल के लिए यह चुनौती काफी मुश्किलों भरा था। एक तो उनकी उम्र कम थी, दूसरे उन्हें काम के नाम पर मंच से लोगों को हंसाना भर आता था। स्कूल-कृलेज के दिनों में उन्हें इस कारण थोड़ी लोकप्रियता भी मिली, पर महज इस बूते परिवार की जिम्मेदारी को उठाना आसान नहीं था। कपिल शुरू से थोड़े जुनूनी और इरादों के पक्के रहे। सो इस नई चुनौती को भी उन्होंने अपने तरीके से ही हल करने की ठान ली। कॉमडी को उन्होंने अपनी हॉबी से आगे एक करियर केे तौर पर चुन लिया। इस फैसले से कॉमेडी को लेकर उनका इरादा जहां और मजबूत हुआ, वहीं वे अपने काम को प्रोफेशनली भी गंभीरता से लेने लगे।
कपिल के जीवन में तब एख सुखद क्षण आया, जब वे पॉपुलर टीवी शो 'द ग्रेट इंडियन लॉफ्टर चैलेंज’ (सीजन-3) के विजेता बने। इसके बाद उन्होंने टीवी पर कई कॉमेडी शोज किए तो वहीं कई शोज की मेजबानी करने का भी उन्हें मौका मिला। कामयाबी के इस मुकाम तक आते-आते कपिल गुमनामी के अंधेरे से निकलकर चर्चित नामों में शुमाार होने लगे। पर शायद इससे बड़ी सफलता जीवन में उनका इंतजार कर रही थी। इस साल जब वे अपने प्रोडक्शन बैनर के9 केे तहत जब स्टैंड अप कॉमेडी शो 'कॉमेडी नाइट विद कपिल’ लेकर आए तो देखते-देखते इसकी लोकप्रियता टीवी के तमाम हिट शोज पर भारी पड़ने लगी। आज आलम यह है कि बड़े सेे बड़े सिने सितारे उनके शो में शामिल होने के लिए लालायित रहते हैं।
पिछले दिनों तब जरूर एकबारगी यह लगा कि कपिल के कॉमेडी शो की लोकप्रियता को ग्रहण लग जाएगा, जब इस शो से जुड़े सुनील ग्रोवर ने अपने को इससे अलग करने का फैसला कर लिया। ग्रोवर कपिल के शो में गुत्थी का कैरेक्टर प्ले कर रहे थे। पर यह आशंका बेबुनियाद साबित हुई। इससे पहले कपिल को उस समय भी गहरा धक्का लगा जब उनके शो का सेट जलकर राख हो गया। पर यह कपिल की लोकप्रियता की ही ताकत थी कि उन्होंने न सिर्फ नया सेट खड़ा कर लिया बल्कि शो की लोकप्रियता पर भी आंच नहीं आने दी।
कपिल के हास्य की खास बात यह है कि इसमें न तो कुछ द्बिअर्थी है और न ही कुछ सतही। वे हास्य के नाम पर कुछ भी ऐसा नहीं करते जिससेे उनके शो को एक फेवरेट फैमिली शो होने में बाधा आए। आम जीवन का आम हास्य कपिल की जुबां और अदा से खास बन जाता है। यही तो है आम कपिल का खास कमाल।

'स्मॉल इज नॉट वनली ब्यूटीफुल, इट अज सिग्निफिकेंट आल्सो’


ईएफ शुमाकर की मशहूर किताब है- स्मॉल इज ब्यूटीफुल। शुमाकर की गिनती बीसवीं सदी के चोटी के आर्थिक चिंतक में होती है। वैसे वे महज अर्थ पंडित भर नहीं थे। समय और समाज को लेकर वे एक व्यापक दृष्टिकोण रखते थे। उनकी साफ मान्यता थी कि लोकसमाज को साथ लिए बिना आप न तो विकास का कोई ब्लू प्रिंट तैयार कर सकते हैं और न ही मानव कल्याण के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। बहरहाल, शुमाकर का जिक्र फिलहाल महज इसलिए क्योंकि वर्ष 2०13 के दिनों-महीनों को पलटकर देखने पर उनकी किताब के शीर्षक का बरबस ध्यान आता है। यह शुमाकर की किताब का नाम भर नहीं बल्कि उनके नाम से मशहूर हुई एक कालजयी उक्ति भी है। बिहार आंदोलन के दिनों में जेपी इस उक्ति का कई बार जिक्र करते थे। जेपी तब की स्थिति को देखते हुए इसे थोड़ा बदलते भी थे। वे कहते थे-'स्मॉल इज नॉट वनली ब्यूटीफुल, इट अज सिग्निफिकेंट आल्सो।’
जेपी को तब नहीं पता था कि संपूर्ण क्रांति की जिस मशाल को वह जला रहे हैं, वह देश में राजनीति और व्यवस्था परिवर्तन के संघर्ष को किस मुकाम तक ले जाएगा। पर उन्हें यह जरूर महसूस होता था कि जो भी पहल हो रही वह सामयिक तौर पर जरूरी है। जड़ता के टूटने से ज्यादा जरूरी है, उसके खिलाफ हस्तक्षेप का होना। एक चेतनशील मनुष्य और उसके समाज की यही पहचान है कि वह अपनी चेतना को हर उस जड़ता के खिलाफ एक कार्रवाई का रूप दे जो उसके परिवेश को प्रगतिशील होने के बजाय स्थिर करता है, निष्प्राण करता है। आज जब हम वर्ष 2०13 की समाप्ति पर इन बातों को समझने की कोशिश करते हैं तो हमारा ध्यान कई उन छोटी-बड़ी बातों पर जाता है, जो इस वर्ष को आगे के कई वर्षों के लिहाज से महत्वपूर्ण बनाता है।
वैसे यहां यह साफ होना जरूरी है कि कैलेंडर में तो हफ्ते-महीने को अलगाना आसान है पर अगर हम बात करते हैं देश और समाज की तो हमें बारहमासे के तय खांचे से थोड़ा आगे निकलना होगा। इस तरह अगर वर्ष 2०13 के साथ हम अगर 21वीं सदी के दूसरे दशक के अब तक के दौर को एक साथ देखें तो हमें साफ लगेगा कि छह दशक से ज्यादा लंबी उम्र का भारतीय लोकतंत्र एक बार फिर से अपनी शिनाख्त और भूमिका को नए सिरे से तय करना चाहता है। आजादी पूर्व से लेकर आजादी बाद के भारतीय इतिहास में यह नितांत नए तरह का अनुभव है।
नायक, विचार, संगठन और फिर इनकी सामूहिक ताकत से एक क्रांतिकारी आरोहण की तैयारी रिवोल्यूशन की यह थ्योरी आज बेमानी है। यह उस दौर का सच है जिसमें लोग यहां तक विचार करने की स्थिति में हैं कि 'भीड़ भी एक विचार है’। दिलचस्प है कि अरब बसंत के बाद इस बात को लेकर तमाम तरह के अध्ययन हो रहे हैं कि आज एक नए तरह का विश्व समाज है। एक ऐसा समाज जो एक तरफ तो अपने आस-पड़ोस से दूर है, कटा-कटा है, वहीं सोशल मीडिया पर वह संपर्क के तमाम तरह की एक्टिविटी से जुड़ा है। इस स्थिति को समाजशास्त्री अध्ययन के किसी पुराने चश्मे से नहीं समझा जा सकता है। यह एक नई तरह की स्थिति है, जिसमें व्यक्ति, परिवार और समाज की इकाई हर स्तर पर अपनी नई पहचान और नई दरकारों को दर्ज करा रही है। उत्तर आधुनिकता के नाम पर पिछले दो दशकों में इस स्थिति को लोक और परंपरा की पुरानी लीक के खिलाफ एक दुराग्रह का दौर तक कहा गया। पर क्या यह आश्चर्यजनक नहीं कि एक ऐसे समय में जब आतंकवाद जैसा प्रतिक्रियावादी विकल्प लोगों के सामने अपने को असंतोष को व्यक्त करने के लिए मौजूद है, लोग तमाम तरह के अहिंसक विकल्पों को आजमा रहे हैं।
बात करें भारत की तो एक चिंता जो गांधी ने देश की आजादी से काफी पहले जताई थी कि लोकतंत्र का केंद्रीकृत ढांचा अगर बहाल रहा तो स्वराज का अभीष्ट हमसे दूर ही रहेगा। लोकतंत्र का विकेंद्रीकरण मतलब प्रातिनिधक लोकतंत्र के मॉडल को प्रत्यक्ष जन प्रतिभाग के मॉडल में बदलना। आज जिस आम आदमी पार्टी (आप) की दिल्ली विधानसभा की 28 सीटों पर जीत को लेकर राजनीति-सामाजिक चिंतक तमाम तरह की बातें कर रहे हैं, वह लोकतंत्र में ढांचागत परिवर्तन की जनांकांक्षा को ही कहीं न कहीं प्रतिबिंबित करता है।
वैसे आप के 'स्वराज’ को लेकर अभी तमाम तरह की आशंकाएं भी हैं। जनतंत्र में जन भागीदारी की भूमिका को पांच साल में एक बार मतदान की कतार में खड़े होने से आगे ले जाने की दरकार तो समझ में आती है, पर इससे आगे नीति और निर्णय के जन प्रतिभाग को कैसे व्यवस्थागत रूप से सुनिश्चत किया जाए, यह भी एक बड़ा प्रश्न है। गांधी के स्वराज और अरविंद केजरीवाल के स्वराज में एक बड़ा फर्क है। गांधी स्वराज के लिए सबसे पहले नागरिक इकाई की शुचिता का सवाल उठाते हैं। शारीरिक श्रम, मितव्ययता, प्रेम-करुणा, सर्वधमã समभाव जैसी चारित्रिक और नीतिगत कसौटी पर खड़ा हुए बगैर गांधीवादी अहिंसक स्वराज की कल्पना नहीं की जा सकती।
प्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोशी मौजूदा दौर को 'परम भोग’ का 'चरम दौर’ कहते थे। बाजार के साथ आई सूचना क्रांति ने एक तरफ जहां हमारी रचनात्मक वृतियों से स्वाबलंबन का तत्व छिन लिया है, वहीं हम लालच के महापाश में इतना बंध गए हैं कि इस कैद को ही सुखद कहने-मानने को मजबूर हैं। ऐसे 'उदार’ दौर का स्वराज कितना उदार होगा, यह बड़ा प्रश्न है। पर यह तो हुई गांधी विचार और परंपरा की एक बड़ी लीक के आगे 'आम आदमी’ के कुछ क्रांतिकारी संकल्पों को खारिज करने की बात।
गांधी की ही एक बात को लें तो वे अपने जीवन और अपने कमोर्ं को सत्य का प्रयोग कहते रहे। यह प्रयोग गांधी तक आकर कोई अंतिम स्थिति को पा गया, ऐसा नहीं है। यह एक सतत प्रक्रिया है, जो हमेशा चलती रहनी चाहिए। खुद गांधी भी अगर कोई सीख देते हैं, हमें यही सीख देते हैं। अब इस दृष्टि से वर्ष 2०13 में बनी स्थितियों की बात करें तो इसमें कई सकारात्मक लक्षण लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के दिखाई पड़ते हैं।
'भीड़’ इस या उस पार्टी या संगठन के बैनर तले नहीं बल्कि तिरंगे को लहराती हुई अचानक देश के कोने-कोने में सड़कों पर उतर आती है। नागरिक समझ के नाम पर बस यह प्रतिक्रिया कि भ्रष्टाचार, महिला असुरक्षा, नागरिक अधिकारों पर कुठाराघात की स्थिति को अब नहीं सहेंगे। क्या इतने भर से शासन-प्रशासन की जड़ता भंग होगी? दरअसल यह शुरुआती स्थिति ही आज परिवर्तन की एक प्रक्रिया को जन्म दे रही है। जन, गण और मन का नया समन्वय किसी नीति और विचार से आगे समाधान की स्थिति की ओर ले जाता है। एक ऐसा समाधान जिसे परिवर्तन का आधुनिक लोकतांत्रिक तरीका भी कह सकते हैं। यह तरीका व्यक्ति का व्यक्ति पर भरोसे का है। इस न्यूनतम शपथ का है कि हम बदलेंगे इसलिए हमारा परिवेश, हमारा समय भी बदलेगा। यह तरीका स्वाभाविक रूप से अपने लिए नायकत्व भी तय कर लेता है। शुमाकर के शब्दों का एक बार फिर से स्मरण करें तो यह छोटा प्रयोग सुंदर तो है ही, जेपी की पूरक व्याख्या को जोड़ दें तो रेखांकित करने योग्य भी है।



मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

विवादित कहानी देवयानी

ऐसा बहुत कम होता है कि आपके साथ एक तरफ तो अन्याय हो, वहीं दूसरी तरफ अन्याय के खिलाफ एक बड़े संघर्ष का आप प्रतीक बन जाएं। अमेरिका में भारतीय राजनयिक देवयानी खोब्रागडे के साथ बदसलूकी का मामला ऐसा ही है। इस साल जून-जुलाई से शुरू हुए इस मामले ने साल के आखिर आते-आते ऐसा तूल पकड़ा कि भारत और अमेरिका का संबंध कई नजरिए से निर्णायक मोड़ पड़ पहुंच गया है। भारत इस पूरे मामले पर अमेरिका से बिना शर्त माफी चाहता है तो अमेरिका महज खेद जताकर मामले को कानूनी दरकार का पैरहन देकर उसे रफा-दफा करना चाहता है।
दिलचस्प है कि इस पूरे मामले के केंद्र में खड़ी देवयानी खोब्रागडे के हवाले से न तो मीडिया में कोई बात आ रही है और न ही भारत सरकार उसके हवाले से कोई बड़ा खुलासा कर रही है। ऐसे में देवयानी को लेकर जो बातें हो रही हैं, उसके आधार पर लोग उनकी एक अनुमानित या आभासित शख्सियत खींच रहे हैं। इस सब में सबसे ज्यादा मदद कर रही है देवयानी की कुछ तस्वीरें, जो इंटरनेट के जरिए सबके लिए सुलभ हैं। तस्वीरें झूठ नहीं बोलतीं पर इनसे जिंदगी के मुकम्मल सच का खुलासा हो जाता है, आप ऐसा भी नहीं कह सकते। देवयानी मामले में आज ऐसा ही हो रहा है, उसकी तस्वीर देखकर और उसके बारे में हालिया प्रसंग में कुछ बातें जान-सुनकर लोग तमाम तरह की बातें सोचने-कहने लगे हैं। पर जब देवयानी के व्यक्तिगत सच के बारे में पता करते हैं तो इनमें से कुछ बातें सिरे से खारिज हो जाती हैं।
देवयानी मुंबईकर हैं। उनके पिता उत्तम खोब्रागडे आईएस ऑफिसर थे। देवयानी की शुरुआती तालीम एक बड़े कॉन्वेंट स्कूल में पूरी हुई। बाद में उन्होंने सेंट जीएस मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की। पर देवयानी के लिए अंतिम गंतव्य शायद यही नहीं था। उन्होंने अपनी जिंदगी के लिए एक दूसरा रास्ता चुना। यह रास्ता भारतीय विदेश सेवा का था। मेडिकल जैसे प्रोफेशन को छोड़कर एकाएक दूसरी दिशा में अपने करियर को मोड़ने का फैसला आसान नहीं था। पर उनके लिए जिंदगी का मतलब शायद एक बनी बनाई लीक पर आगे बढ़ना भर नहीं था। देवयानी को जिंदगी में शायद वो सब तजुर्बे चाहिए थे जिसके लिए सात समंदर पार करना जरूरी है।
देवयानी के चाचा डॉ. अजय एम गोडाने आईएफएस 1985 बैच के अधिकारी थे। संभवत: चाचा को देखकर ही देवयानी ने अपना इरादा बदला हो। सुंदर और कुशाग्र देवयानी ने 1999 में अपने इरादे के मुताबिक कामयाबी पा ली। वह आईएफएस की परीक्षा पास कर गईं। अमेरिका में भारतीय राजनयिक का पद संभालने से पहले देवयानी ने पाकिस्तान, इटली और जर्मनी में भारत के राजनयिक मिशन को सफलतापूर्वक पूरा किया।
देवयानी ने एक प्रोफेसर से शादी की है और उनकी दो बेटियां हैं। उनका भाषा ज्ञान खासा समृद्ध है। वह हिंदी के साथ अंग्रेजी और जर्मन भाषा पर समान अधिकार रखती हैं। इसके अलावा उनकी विभिन्न देशों की राजनीतिक और सांस्कृतिक समझ भी काफी अच्छी है। अध्ययन, पर्यटन, संगीत और योग को पसंद करने वाली देवयानी ने अपनी जिंदगी में सीखने और आगे बढ़ने का रास्ता अब भी खुला रखा है। इसी का नतीजा रहा कि पिछले साल वह चेवनिंग रोल्स रॉयस साइंस एंड इनोवेशन लीडरशिप प्रोग्राम के लिए चयनति हुईं।
विवादों से देवयानी का नाता नया नहीं है। दो साल पहले जब मुंबई के आदर्श सोसायटी का घोटाला सामने आया तो सोसायटी में अवैध तरीके से फ्लैट बुक कराने वालों में उनका भी नाम था। वैसे देवयानी के बारे में यह जानना भी जरूरी है कि वह दलितों के लिए लैंगिक समानता के लिए काम करना चाहती है। बहुत संभव है कि विवादों के मौजूदा चक्रव्यूह से निकलने के बाद वह अपनी जिंदगी की इस चाह को पूरा करने के बारे में गंभीरता से विचार करे।

आप की सरकार को यहां से देखें


दिल्ली का राजनीतिक कुहासा छट गया है। अब आम आदमी पार्टी सरकार बनाने को राजी है। पर अब तक के घटनाक्रम में और कुछ हुआ हो या नहीं, पारंपरिक राजनीति के आगे एक वैकल्पिक लीक खींची जा सकती है, यह संभावना कहीं न सहीं संभव होती दिख रही है। दिल्ली विधानसभा के नतीजे जब आठ दिसंबर को आए तो उसके साथ यह धर्मसंकट भी आया कि यहां अगली सरकार कैसे बनेगी और कौन बनाएगा? त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति कोई देश में पहली बार नहीं बनी है। बल्कि सच तो यह है कि केंद्र में भी यह स्थिति एकाधिक बार रही है। पर सरकारें हर बार बनी हैं। कई बार आधे-अधूरे कार्यकाल के लिए तो कई बार पूरे कार्यकाल के लिए। पर दिल्ली में चुनकर आई त्रिशंकु विधानसभा से सरकार गठन की राह दुश्वार इसलिए हो गई क्योंकि एक साल पहले खड़ी हुई एक पार्टी ने 28 सीटें जीतकर एक बदली राजनीतिक स्थिति का संकेत सभी दलों को दे दिया।
दिल्ली में सरकार बनाने के लिए जरूरी आंकड़ा 36 का है। कांग्रेस महज आठ सीटें जीतकर पहले ही सत्ता के रेस से बाहर हो गई। भाजपा के अगुवाई वाली राजग भी बहुमत के आंकड़े से चार सीट पीछे रही। रही आप तो उसे आठ सीटें मिलीं। भाजपा के लिए दिल्ली में बहुमत का आंकड़ा जुगाड़ना कोई बड़ी बात नहीं होती। हाल के वर्षों में भी वह कर्नाटक से लेकर झारखंड तक जोड़तोड़ का यह खेल खेल चुकी है। पर दिल्ली में यह मुमकिन इसलिए नहीं हो सकता था क्योंकि पिछले कम से कम तीन सालों में आम आदमी के भ्रष्टाचार और महिला असुरक्षा के खिलाफ आंदोलन से निकली आम आदमी पार्टी ने राजनीतिक शुचिता की एक नई चुनौती खड़ी कर दी। देश में यह अपने तरह की संभवत: पहली सूरत थी जिसमें कोई भी दल सरकार बनाने के लिए आगे आने को तैयार नहीं दिखा। मीडिया ने इसे आम आदनी पार्टी द्बारा तय किए गए 'मॉरल इंडेक्स’ का नाम दिया। दिलचस्प है ऐसे दौर में जब किसी पॉलिटक डेवलेपमेंट के प्रभाव को सेंसेक्स के चढ़ने-उतरने से जोड़कर देखा जाना एक जरूरी दरकार बन गई हो, उस दौर में सेंसेक्स से बड़ी खबर और चर्चा उस मॉरल इंडेक्स की हो रही है, जो लोकतंत्र में जनता की एक दिन की मतदान की भागीदारी से आगे एक सतत प्रक्रिया को आजमाए जाने की वकालत कर रही है।
 पिछले 14 दिसंबर को दिल्ली के उपराज्यपाल ने आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल को दिल्ली के उपराज्यपाल ने सरकार बनाने की संभावना पर विचार करने के लिए बुलाया था। आप की तरफ से यह पहले ही साफ कर दिया गया था कि वह न तो किसी दल से समर्थन लेगी और न ही किसी को समर्थन देगी। पर देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने इस बीच एक नया सियासी दांव खेला। केजरीवाल उपराज्यपाल से मिलने पहुंचते इससे पहले वहां कांग्रेस की यह चिट्ठी पहुंच चुकी थी कि वह आप को सरकार बनाने के लिए बाहर से बिना शर्त समर्थन देने को तैयार है। कांग्रेस के इस दांव से आप को अपने पुराने स्टैंड पर थोड़ा विचार करना पड़ा। क्योंकि इस दौरान ये बातें भी खूब हुईं कि आम आदमा पार्टी ने बिजली दर आधी करने और हर घर को 7०० लीटर पानी देने जैसे जो चुनावी वादे किए हैं, उससे वह पूरा नहीं कर सकती है। क्योंकि ऐसा करना न तो संभव है और न ही व्यावहारिक। लिहाजा उसकी पूरी कोशिश होगी कि वह सरकार बनाने से बचे।
आप के नेताओं ने इस बदले राजनीतिक खेल को समझा।उसने तय किया कि वह इस पूरी स्थिति को एक बार फिर से जनता की अदालत में ले जाएगी और उससे ही पूछेगी कि क्या उसे सरकार बनानी चाहिए। जो खबरें हैं, उसमें आप ने दिल्ली में 25० से ज्यादा सभाएं की। जनता ने भारी बहुमत से आप को सरकार बनाने के लिए आगे बढ़ने को कहा। अब आप इस पॉलिटकल स्टैंड के साथ सरकार बनाने जा रही है कि वह किसी दल के समर्थन या विरोध के आधार पर नहीं बल्कि जनता की राय पर सरकार बनाने जा रही है।
इस पूरे घटनाक्रम में पहली नजर में एक गैरजरूरी नाटकीयता आप के नेताओं की तरफ से नजर आती है। एक बार चुनाव संपन्न हो जाने के बाद फिर से जनता के पास जाने का क्या तुक है? ऐसी दरकार हमारी संवैधानिक व्यवस्था की भी देन नहीं है। फिर भी ऐसा किया गया। दरअसल, इसका जवाब वे मुद्दे हैं जो गुजरे दो-तीन सालों में बार-बार उठे। लोकतंत्र में जनता की भूमिका सिर्फ एक दिनी मतदान प्रक्रिया में शिरकत करने भर से क्या पूरी हो जाती है? एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद सर्वोच्च संस्था है पर क्या उसकी यह सर्वोच्चता जनता के भी ऊपर है? क्या सरकार और संसद सिर्फ नीतियों और योजनाओं का निर्धारण जनता के लिए करेंगे या फिर इस निर्णय प्रक्रिया में जनता की भी स्पष्ट भागीदारी सुनिश्चत होनी चाहिए? केंद्रीकृत सत्ता लोकतांत्रिक विचारधारा के मूल स्वभाव के खिलाफ है तो फिर उसका पुख्ता तौर पर विकेंद्रीकरण क्यों नहीं किया जा रहा है? पंचायती राज व्यवस्था को अब तक सरकार की तरफ से महज कुछ विकास योजनाओं को चलाने की एजेंसी बनाकर क्यों रखा गया है, उसका सशक्तिकरण क्यों नहीं किया जा रहा है?
ऐसा लगता है कि आप स्थानापन्नता की राजनीति की बजाय विकल्प की राजनीति को एक स्वरूप देने के मकसद से आगे बढ़ना चाहती है। देश में साढ़े छह दशक से भी लंबे दौर में जो सियासी व्यवस्था जड़ जमा चुकी है, उसे एक भिन्न समझ के साथ देखने-समझने की तैयारी और उस ओर अग्रसर होना कोई आसान काम नहीं है। पर आज बदलाव की जमीन पर शुरुआती तौर पर एक दल और उससे जुड़े लोग खड़े हैं तो यह जाहिर करता है कि इस विकल्प के प्रति जनता के मन में भी छटपटाहट कम नहीं है।
जनता के बीच जनता की राजनीति को तो शक्ल लेना ही चाहिए। यही तो जनतंत्र की बुनियादी दरकार है। पिछले कुछ दशकों में जनता के नाम पर भले खूब राजनीति हुई और उसे अस्मितावादी तर्किक निकष पर कसने की भी खूब कोशिश हुई पर जनतांत्रिक व्यवस्था में आमजन की स्पष्ट और प्रत्यक्ष प्रतिभागिता की चुनौती को स्वीकार करने से सब बचते रहे। आज अगर आप की दिल्ली की सरकार को इस प्रतिभागिता को सुनिश्चत करने की क्रांतिकारी पहल की बजाय अगर महज बिजली-पानी के भाव के मुद्दे पर केंद्रित करने की कोशिश हो रही है, तो इसलिए क्योंकि लोकतंत्र की राजनीति करने वाले दूसरे किसी दल के पास यह नैतिक साहस नहीं है कि वह जनता के नाम पर नहीं बल्कि जनता के साथ मिलकर अपनी राजनीति का गंतव्य तय करे। बहरहाल, आप की पहल एक नई राजनीति की शक्ल पूरी तरह ले पाएगी, इसमें संशय अब भी काफी है। पर इन संशयों के धुंध के बीच से ही कुछ सुनहरी किरणें अगर फूट रही हैं तो यह देश के भावी राजनीतिक परिदृश्य के लिए एक शुभ संकेत है।
 

शनिवार, 21 दिसंबर 2013


अमेरिका 2०13 में दो हफ्ते से भी ज्यादा शटडाउन के खतरे में पड़ गया था। हालांकि यह संकट वहां डेमोक्रेट और रिपब्लिकन पार्टियों के बीच सियासी भिड़ंत के कारण आया था। पर यह सूरत एक बार फिर से इस तरफ इशारा कर गई कि दुनिया की तमाम बड़ी आर्थिक ताकतें कहीं न कहीं आज उस मुकाम पर पहुंच गई हैं, जिसमें उनका आर्थिक स्वाबलंबन कभी भी डगमगा सकता है। डॉलर से लेकर यूरो जोन तक की अर्थव्यवस्थाएं लगातार अपने को बचाने में लगी हैं। इस बात को समझना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यही बीते कुछ सालों से देश-दुनिया के रिश्ते को तय करनेवाले नियामक मुद्दे रहे हैं।
दिलचस्प है कि यह एक ऐसे दौर की सचाई बनती जा रही है जिसे 'उदार’ होने का खिताब दिया गया है। अमेरिका इस खिताब को पूरी दुनिया में बांटने वाला अगुवा देश है पर जो सूरत अब वहां भी बराक ओबामा के पिछले और मौजूदा कार्यकाल में बनी है, उसमें आर्थिक सुरक्षा के लिए उसे दुनिया के तमाम देशों के साथ अपने आर्थिक सरोकार खासे 'अनुदार’ तौर पर तय करने पड़ रहे हैं। यह सूरत 2०14 में अचानक से बदल जाएगी, ऐसी कोई उम्मीद न के बराबर ही दिखती है। यह अलग बात है कि अमेरिका इस बदले हालात में भी सुपर पावर नंबर वन होने के अपने दावे को अलग-अलग तरीकों से मजबूत करता रहा है। इस मजबूती के लिए वह कभी ईरान और उत्तर कोरिया पर अपनी आंखें तरेरता है तो वहीं पाकिस्तान जैसे राष्ट्र को प्रत्यक्ष-परोक्ष समर्थन और मदद देकर एक पूरे क्षेत्र में अपनी भूमिका के रकबे को लगातर बढ़ाने की जुगत में रहता है। उसकी यह जुगत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अगले साल भी जारी ही रहेगी, ऐसा मानकर चलना चाहिए। वैसे संतोषप्रद यह जरूर है कि जिस तरह इस साल ईरान के मामले में उसकी हिमाकत एक सीमा से आगे नहीं बढ़ पाई, वैसी स्थिति नए वर्ष में भी अमेरिका के कई विस्तारवादी मंसूबों पर पानी फेर सकता है।
बात करें भारत की तो अगले साल यहां लोकसभा चुनाव होने जा रहे हैं। जो सूरत और संकेत हैं, उसमें केंद्र की अगली सरकार यूपीए की बनती नहीं दिख रही है। वैसे भाजपा की अगुवाई में अगर अगली सरकार एनडीए की भी बनती है तो देश की विदेश नीति में कोई बहुत बुनियादी फर्क आएगा, ऐसा लगता नहीं है। हां, पाकिस्तान को लेकर भावी केंद्र सरकार के रवैए में थोड़ी सख्ती जरूर देखने को मिल सकती है। अलबत्ता यह सख्ती भी युद्धक होने की इंतिहा तक शायद ही पहुंचेगी। आखिर भारत और पाकिस्तान दोनों ही एटमी देश हैं। वैसे एक शुभ संकेत जरूर है कि पाकिस्तान में 2०13 में नवाज शरीफ के नेतृत्व में नई सरकार बनी है। पिछले दिनों वहां के सेनाध्यक्ष भी बदल गए हैं। ऐसे में राजनयिक कुशलता का अगर परिचय दिया जाए तो दोनों देशों के रिश्ते में थोड़ी मिठास घुल सकती है।
इस साल भारत और चीन के बीच सीमा विवाद काफी उलझा रहा और इसमें हमारा देश कई बार बैकफुट पर भी दिखा। पर आखिरकार सरकार ने इस मामले को गंभीरता से लिया और सीमा पर अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने का फैसला किया। यह सामरिक सुदृढ़ता भविष्य में चीन के खिलाफ भारत की स्थिति को रणनीतिक रूप से मजबूत करेगी।

सोमवार, 16 दिसंबर 2013

सिंदूरी साथ का रिकॉर्ड

मौजूदा दौर में देह और संदेह के साझे ने संबंधों के पारंपरिक बनावट को पूरी तरह बदल दिया है। रिश्ते बंधने से ज्यादा खुलने लगे हैं, दरकने लगे हैं। यह एक ऐसे समय का यथार्थ है जिसे नाम ही दिया गया है 'खुलेपन’ का। यह नामकरण हुआ तो था वैसे आर्थिक लिहाज से पर आर्थिक सरोकारों की खुली दरकारों ने देखते-देखते समाज, संबंध और संस्कृति की पारंपरिक दुनिया को पूरी तरह उलट-पुलट दिया। इसलिए अब संबंधों के धागे खुलने पर उतनी हैरत नहीं होती जितना उनके धैर्यपूणã निर्वाह के बारे में जानकर।
बात संबंधों की करें तो विवाह संस्था का ध्यान सबसे पहले आता है। अभी ब्रिटेन से चलकर एक खबर हिंदुस्तान में काफी पढ़ी-देखी और सराही गई कि वहां रहने वाले भारतीय मूल के दंपति करमचंद और करतारी रिकॉर्ड 86 साल से एक-दूसरे के साथ हैं। यह ब्रिटेन की संस्कृति के लिहाज से बड़ी बात है। इसलिए इस जोड़ी के साथ और इनसे जुड़ी तमाम तरह की जानकारियों को लोगों ने चाव से पढ़ा-जाना। खुद करमचंद और करतारी के लिए भी यह एक सुखद अनुभूति है कि जिस सिंदूरी साथ को उन्होंने अपने प्रेम और संस्कार के कारण अब तक बरकरार रखा है, वही अब उन्हें पूरी दुनिया में सम्मान दिला रहा है।
पंजाब के एक छोटे से गांव में 19०5 में जन्मे करमचंद की करतारी से 19०5 में शादी हुई थी। पासपोर्ट में दर्ज जानकारी के मुताबिक इस समय करमचंद की उम्र 1०6 साल और उनकी पत्नी करतारी की उम्र 99 साल है। परिवार के साथ 1965 से रह रहे करमचंद से जब पूछा गया कि रिकार्ड समय तक चले उनके दांपत्य संबंध का क्या राज है तो उन्होंने कहा कि शादीशुदा जिंदगी जीने का कोई राज नहीं होता है। हालांकि यह कहते हुए वह यह भी कहते हैं कि उन्होंने अपनी जिंदगी में भरपूर आनंद उठाया है। जो चाहा वो किया, जैसा चाहा वैसा खाया-पिया, पर सब कुछ एक संयम के साथ। आज अगर उनके बारे में और उनके पारिवारिक जीवन के बारे में पूरी दुनिया में बात हो रही है तो इसलिए क्योंकि उन्होंने जीवन और मर्यादा के बीच कोई सख्त रेखा खींचने की बजाय एक समन्वयी लोच बनाए रखा, अपनी सोच में भी और अपने आचरण में भी।
जानकर लोगों को हैरत होगी कि जिंदगी को जिंदादिली से जीने वाले करमचंद रोज शाम खाने से पहले एक सिगरेेट पीते हैं। यही नहीं हफ्ते में तीन-चार बार व्हिसकी या ब्रांडी भी पीते हैं। उनकी जिंदगी की ये आदतें मर्यादा या संयम से भटकाव नहीं बल्कि जिंदगी को साकारात्मकता के साथ जीने की ललक की तरफ इशारा है।
करमचंद और करतारी के सिंदूरी साथ को सिर्फ वे दोनों ही नहीं पूरा करते हैं बल्कि इसके साथ उनके बच्चे और उनका परिवार भी है। वे दोनों अपने छोटे बेटे सतपाल और उसकी पत्नी रानी और दो पोते-पोतियों के साथ रहते हैं। बहू कहती है कि उनके लिए सास-ससुर उस छाया की तरह है, जहां बहुत सारी शांति और खूब सारा प्यार और आशीर्वाद है। बेटा सतपाल भी खुश है कि उनके मां-पिता न सिर्फ जीवित हैं बल्कि उनके साथ स्वस्थ और प्रसन्न हैं। बेटे को खुशी इस बात की भी है कि उन्हें इतने लंबे समय तक मां-पिता की सेवा करने का अवसर ईश्वर ने दिया है।
फिल्मकार सूरज बड़जात्या और करण जौहर बार-बार फिल्मी पर्दे पर भारतीय परिवारों की संयुक्त परंपरा को उत्सवी रूप में दिखाते हैं और बॉक्स ऑफिस पर सफलता के झंडे गाड़ते हैं। पर जीवन की सिनेमाई समझ रखने वाले उन जैसे तमाम दूसरे लोगों को भी यह बात समझनी चाहिए कि महत्वपूर्ण परिवार को साथ देखना-दिखाना नहीं बल्कि उन सरोकारों को समझना है, जिससे यह साथ अटूट बनता है और सालोंसाल निभता-टिकता है। टेकचंद और करतारी के जीवन में झांकना इन सरोकारों से परिचित होना है।