सोमवार, 16 दिसंबर 2013

विसर्जन स्थापना की जरूरी शर्त नहीं


अस्मिता की राजनीति के दौर में भावनाओं के ज्वार खूब फूट रहे हैं। हर तरफ इस तरह के स्वर उठ रहे हैं कि फलां समुदाय के नेता के साथ तारीखी तौर पर अन्याय हुआ और अब उनके सही मूल्यांकन का समय आ गया है। किसी को स्थापित करने के लिए किसी को भंजित करना भी जरूरी होता है। सो हो यह रहा कि कई ऐतिहासिक नायकों के चेहरों पर कालिख पोती जा रही है। अस्मितावादी विमर्श में पिछले दो दशकों में ऐसी तमाम कोशिशों को एक बड़े अन्याय के खिलाफ खड़े होने का आधार माना जा रहा है। यह आधार अभिजात्यवादी या सवर्णवादी मानसिकता के खिलाफ सोशल चेंज -अब तो इसे सोशल इंजीनियरिंग तक कहा जा रहा है- का जरूरी औजार के तौर पर काम कर रहा है, ऐसा मानने वाले प्रगतिशील भी कम नहीं हैं। पर इस सोच का इस सवाल के बाद क्या मतलब रह जाता है कि बड़ी लकीर से आगे उससे बड़ी लकीर खिंचने की बजाय पहली खिंची लकीर के साथ ही काट-पीट क्यों?
कुछ विसर्जित होगा, भंजित होगा तभी नया कुछ स्थापित होगा, ऐसी सोच तो हिंसक ही मानी जाएगी। अंबेडकर के नाम पर सामाजिक न्याय की गोलबंदी ने समाज के जातीय तानेबाने को कैसे देखते-देखते वैमनस्य का नागफनी मैदान बना दिया, यह अनुभव हमारे सामने है। इसमें साफ होने की बात यह है कि जातीय विभेद अच्छी बात है, यह कोई नहीं कह रहा पर इसे मिटाने के नाम पर अगर सामाजिक समरसता का पारंपरिक आधार भी अगर दबता-मिटता चला जाए तो इस प्रतिवादी संतोष का हासिल क्या एक हिंसक नियति से ज्यादा रह जाता है।
अभी गुजरात के मुख्यमंत्री देश भर में घूम-घूमकर सरदार पटेल की दुनिया की सबसे बड़ी प्रतिमा स्थापित करने के लिए देशभर के किसानों से लोहा दान देने की बात कह रहे हैं। पहली नजर में यह एक आदर्श राष्ट्रवादी सोच दिखती है। ऐसा अगर इस अभियान को लेकर अगर कोई सोचता है, तो वह गलत भी नहीं है। सरदार का भारत के एकीकरण और राष्ट्र के रूप में उसके निर्माण में एक बड़ा योगदान है। इस योगदान का स्मरण हमें अपने राष्ट्र के प्रति गर्वित करता है। पर बात यहीं खत्म होती तो गनीमत थी। हम अपने बाकी के राष्ट्र नायकों का स्मरण कैसे करते हैं और उनके शील और विचार हम पर कितना कारगर असर अब तक छोड़ते रहे हैं, यह सचाई भी हमारे सामने है। दिनकर ने इन्हीं स्थितियों को ध्यान में रखकर बहुत पहले लिखा- 'तुमने दिया देश को देश तुम्हें क्या देगा, अपनी ज्वाला तेज करने को नाम तुम्हारा लेगा।’
सरदार की विशालकाय प्रतिमा के स्थापना पर महात्मा गांधी के पौत्र राजमोहन गांधी ने पहले तो हर्ष जताया। कहा कि सरदार साहब का व्यक्तित्व ऐसा रहा, जिसके कारण पूरे देश का उनके प्रति स्नेह रहा। यह स्नेह अब और प्रगाढ़ हो रहा है, तो यह प्रसन्नता की बात है। पर जिस रूप में यह सब किया जा रहा है, वह सही नहीं है। इससे एक तो यह पूरा मिशन ही अपने रास्ते से भटकेगा, दूसरा इसकी देखादेखी एक होड़ पैदा लेगी बाकी नेताओं और प्रतीक पुरुषों की बड़ी से बड़ी प्रतिमा स्थापित करने की। इससे देश और समाज का कोई भला तो क्या होगा नुकसान भले बहुत ज्यादा हो जाएगा।
राजमोहन गांधी ने ये बातें किसी पक्षकार के नाते नहीं कही। बल्कि उन्होंने ये बातें किसी नाते कही तो वे सरदार के व्यक्तित्व और कृतित्व के मुरीद होने के नाते। वे उन दलीलों में भी नहीं उलझे कि अब क्यों अचानक उनके नाम पर राजनीति हो रही है। अगर सरदार 'भारत रत्न’ हैं तो उन्हें इस या उस दल का नेता बताने का क्या औचित्य है? फिर यह भी कहने का क्या मतलब कि अगर सरदार पटेल तब देश के प्रधानमंत्री बने होते तो देश की आज तस्वीर ही कुछ दूसरी होती। यह भी कि तब न पाकिस्तान हमारे लिए सिरदर्द बनता और न ही आतंकवाद हमारे लिए एक नासूरी समस्या बनता।
कुछ अर्से पहले जब कश्मीर वार्ताकारों की टीम ने भारत सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी तो यह बहस छिड़ी कि क्या ऐतिहासिक घटनाक्रमों को बदला जा सकता है। इस बहस को आगे बढ़ाने की पैरोकारी करने वाले ही आज यह दलील दे रहे हैं कि सरदार को उनके दल ने पर्याप्त सम्मान और अवसर नहीं दिए। अलबत्ता यहां यह बात जरूर साफ होने की नहीं कि इतिहास कोई बंद किताब भी नहीं जो बस हमारी स्मृतियों के ताखे पर रखी रहे। इतिहास भविष्य के लिए हमारी आंखें हैं। हमारे संचित अनुभव हैं, जिससे भविष्य के मुहाने खोलने में हमें मदद मिल सकती है। इतिहास से मुठभेड़ भी होनी चाहिए क्योंकि यह एक गलत लीक को दुरुस्त करने की सबसे जरूरी दरकार है। पर इतिहास के प्रति कुढ़न और दुराग्रह का औचित्य कतई स्वस्थ नहीं हो सकता।
राजमोहन गांधी एक और खतरे की तरफ इशारा करते हैं। यह इशारा महिमा मंडन की राजनीति की तरफ है। ऐसी राजनीति शुरू तो होती है देश और समाज की नजर में किसी की शिनाख्त को और ज्यादा मुकम्मल करने, उसे और ऊपर उठाने के लिए। पर आगे चलकर यह कोशिश दूसरी तमाम शिनाख्तों को तहस-नहस करने की हिंसक सनक में बदल जाती है। सरदार का नाम ऐसे किसी सनक का हिस्सा बने, यह कौन चाहेगा। पर अगर ऐसा किसी पहल से हो जाने का खतरा है तो इसके बारे में सावधान तो रहना ही चाहिए।
एक बात और यह कि भारत की जिस सामासिक संस्कृति और परंपरा की बात की जाती है, वह सिर्फ जीवन, समाज या रहन-सहन से ही नहीं जुड़ा है। यह उस सोच को भी दर्शाता है जिसमें तमाम तरह के विचार और अनुशीलन एक साथ हमारे बीच अपना लोकतांत्रिक आधार विकसित करते हैं। समय के साथ इनमें से कई आधार दरकते चले जाते हैं तो कुछ और विस्तृत, और पुष्ट। अद्बैत से लेकर द्बैत तक की हमारी दार्शनिक समझ भी यही जाहिर करती है कि हम एक गंत्वय की तरफ शुरू से कई रास्तों से बढ़ते रहे हैं। विचार और आचरण के बीच विकल्प और स्वतंत्रता का खुलापन यह दिखाता है कि चयन और निर्णय करने की हमारी पूरी प्रक्रिया शुरू से खासी खुली और लोकतांत्रिक रही है। भारतीय सांस्कृतिक विमर्श में यह बहस खूब चली है कि एक ऐसी जागरूक चेतना और लोकतांत्रिक मानस से लैश देश-समाज को दशकों लंबी दासता का दंश आखिर क्यों झेलना पड़ा? इस सवाल को कुछ लोग इसका जवाब भी मानते हैं कि यह हमारी प्रखर चेतना की समन्वयी ताकत के ही बूते का था कि हम दासता की इतनी लंबी यातना के खिलाफ निर्णायक रूप से खड़े हो सके।
वैसे सरदार की प्रतिमा के बहाने अगर राष्ट्र निर्माण से जुड़ी तमाम तरह की चिंताओं-आशंकाओं का जाहिर होना एक तरह से शुभ लक्षण भी है। यह दिखलाता है कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को लेकर हमारी चेतना कितनी गहरी, कितनी उर्वर और कितनी जिम्मेदार है। एक देश का इससे बड़ा सौभाग्य क्या हो सकता है कि उसका भाल हमेशा तिलकित रहे और हमेशा चमकता रहा, इसके लिए उसकी संतानें इतनी विपुल आस्था के साथ विचार मंथन करती हैं।
 

शनिवार, 7 दिसंबर 2013

सलाम मदीबा

नेल्सन मंडेला के बारे में जिक्र करते हुए महात्मा गांधी का नाम स्वाभाविक तौर पर आता है। पर बीसवीं सदी के इन दोनों महानायकों को सीधे तौर पर एक-दूसरे की छाया बता देना एक असावधान कृत्य होगा। फिर दो बड़ी शख्सियतों का ऐसे भी आमने-सामने रखकर मूल्यांकन करना उनके साथ ज्यादती है। मंडेला निश्चत तौर पर गांधीवादी परंपरा के बड़े नायक थे। उनके संघर्ष ने साम्राज्यवाद और नस्लभेद की चूलें हिला दीं। दक्षिण अफ्रीका आज अगर विश्व के बाकी देशों के साथ बैठकर विकास और समृद्धि की बात कर रहा है तो इसके पीछे मंडेला का तीन दशक से भी लंबा संघर्ष है।
नस्लवाद साम्राज्यवाद का ऐतिहासिक तौर पर सबसे कारगर औजार रहा है। जब गांधी दक्षिण अफ्रीका में थे तो रंगभेदी घृणा के वे खुद शिकार हुए थे। दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए इस घृणा और हिंसा के खिलाफ लोगों को जागरूरक करने और संगठित संघर्ष शुरू करने का पहला श्रेय गांधी को ही है। बाद में संघर्ष की इस विरासत ने वहां एक राष्ट्रीय आंदोलन का रूप लिया।
मंडेला को इस बात का श्रेय जाता है कि दबे-सताए लोगों को संघर्ष की राह पर आगे बढ़ाने और फिर निर्णायक सफलता हासिल करने तक धैर्य और संयम बनाए रखना कितना जरूरी है, यह सीख उन्होंने अपने आचरण से दी। इस तरह का सकर्मक नायकत्व हासिल करना बड़ी उपलब्धि है। मंडेला आज अगर पूरी दुनिया में अन्याय और मानवीय दुराव के खिलाफ संघर्ष करने वालों के हीरो हैं तो अपनी इसी धैर्यपूणã शपथ के कारण।
27 साल का जीवन जेल की सलाखों के पीछे बीताने के बावजूद अपने संघर्ष की अलख को जलाए रखना कोई मामूली बात नहीं है। 199० में जब वे जेल से रिहा हुए तो देखते-देखते दुनिया के हर हिस्से में अन्याय के खिलाफ संघर्ष और क्रांतिकारी-वैचारिक गोलबंदी के जीवित प्रतीक बन गए। एक ऐसे दौर में जब दुनिया भले कहने को एक छतरी में खड़ी हो पर लैंगिक और नस्ली विभेद से लेकर मानवाधिकार हनन तक के मामले हमारी तमाम तरक्की और उपलब्धि को सामने से आंखें दिखा रहे हैं, संघर्ष के प्रतीक और नायक का बने और टिके रहना बहुत जरूरी है। आज अगर मंडेला हमारे बीच नहीं हैं तो सबसे बड़ा संकट यही है कि संघर्ष और व्यक्तित्व के करिश्माई मेल को देखने के लिए अब हमारी आंखें कहां टिकेंगी। संकट की इस घड़ी में आन सान स ूकी की तरफ बरबस ध्यान जाता है। हमारे लिए यह संतोष की बात है कि सू की हमारे बीच अभी हैं।
बहरहाल, एक बार फिर से जिक्र गांधी और मंडेला की। गांधी और मंडेला के बीच तमाम साम्य के बीच कुछ मौलिक भेद भी हैं। गांधी जिस तरह के'सत्यान्वेषी’ रहे उसमें सत्य-प्रेम और करुणा का साझा पहली शर्त है। इसकी अवहेलना करके गांधीवादी मूल्यों की बात नहीं की जा सकती। अलबत्ता, गांधी के कई अध्येताओं ने भी जरूर यह कबूला है कि यह एक ऐसा आदर्शवाद है, जिसे मानवीय दुर्बलताओं के बीच एक प्रवृत्ति की शक्ल देना कोई साधारण बात नहीं।
मंडेला के यहां गांधी का धैर्य और अटूट संघर्ष तो है पर वे साधन और साध्य की शुचिता के मामले में गांधी से थोड़े अलग खड़े दिखाई पड़ते हैं। इस अंतर को जैसे ही हम रेखांकित करते हैं तो हमारी समझ में यह बात आती है कि गांधी जिस रास्ते पर चले उस पर चलने वाले वे संभवत: अकेले पथिक थे। आइंस्टीन के शब्द भी हैं कि आने वाली नस्लों को तो यह भरोसा भी न हो कि हाड़-मांस के देह में गांधी जैसा व्यक्तित्व कभी जन्मा भी होगा।
मंडेला ने अपने जीवन में गांधी का स्मरण कई मौकों पर किया। वे महात्मा को एक शक्ति देने वाले प्रेरक व्यक्तित्व के रूप में देखते थे। पर खुद मंडेला ने भी अपने को 'दूसरा गांधी’ कहे या माने जाने के नजरिए को एक भावुक सोच भर माना। उनके कई संस्मरणों में ऐसा जिक्र आता भी है। मंडेला के आगे एक ही मकसद था उस धरती को नस्लवादी जड़ता से मुक्त कराना, जो उनकी मातृभूमि है। आज अगर 'मदीबा’ दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपिता हैं, तो इसलिए क्योंकि आधुनिक विश्व के नक्शे पर इस देश को उन्होंने वह स्थान दिलाया, जिससे वह लंबे समय तक वंचित रहा था। दक्षिण अफ्रीका के इस महान सपूत ने तारीख के उन हर्फों को लिखा है, जिसने मनुष्य और मनुष्य के बीच खिंची हर लकीर को पूरी तरह अमान्य ठहरा दिया है।
 

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

एक बर्बर कृत्य


तेजाबी हमले के रूप में जिस तरह की घटना पर चर्चा और विमर्श की दरकार की बात आज हर तरफ हो रही है, वह एक बर्बर कृत्य के रूप में हमारे समय और समाज का तेजी से हिस्सा बनता जा रहा है। लड़कियों के चेहरे और शरीर पर तेजाब फेंककर उसकी पूरी जिंदगी तबाह करने की घटनाएं निश्चित तौर पर आपवादिक नहीं कही जा सकती हैं। पर इसके खिलाफ पहल करने के लिए न तो सरकार कभी सामने आई और न ही समाज ने अपनी तरफ से कुछ किया।
अगर किसी ने पहल की तो उस लड़की लक्ष्मी ने जो खुद ऐसी ही एक घटना की शिकार हुई थी। लक्ष्मी की 2००6 में दायर जनहित याचिका को लेकर सुप्रीम कोर्ट का इसी साल 18 जुलाई को एक महत्वपूर्ण फैसला आया था। सर्वोच्च अदालत ने अपने अंतरिम आदेश में तेजाब खरीदने और बेचने को लेकर सख्त नियम-कायदों का प्रावधान किया था। सुप्रीम कोर्ट ने बिना पहचान पत्र देखे तेजाब बेचने को गैरकानूनी बताया था। साथ ही केंद्र और राज्य की सरकारों से यह भी सुनिश्चित करने को कहा था कि कोई नाबालिग इसे किसी भी सूरत में नहीं खरीद सके। इसका मतलब यह कतई नहीं था कि बाजार में तेजाब बिकेगा ही नहीं, बल्कि जो तेजाब बाजार में खुले तौर पर बिकेगा वह त्वचा पर बेअसर होगा।
इस मामले में जस्टिस आरएम लोढ़ा और जस्टिस फकीर मोहम्मद की बेंच ने राज्य सरकारों से दो टूक लहजे में कहा था कि वे तेजाबी हमलों को लेकर गंभीरता दिखाएं और इसे गैरजमानती अपराध घोषित करें। सर्वोच्च न्यायालय ने इस बाबत राज्य सरकारों को तीन महीने के भीतर नीतिगत स्पष्टता लाने और सारी प्रक्रियाएं तय करने को कहा था। सरकारों को ऐसे अपराध के मामले में पुनर्वास को लेकर भी नीति बनाने को कहा गया था।
इस पूरी सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने तेजाबी हमले की शिकार महिलाओं की जिंदगी को लेकर जहां एक गंभीर और संवेदनशील नजरिया बनाए रखा, वहीं सरकारों को इस मामले से कड़ाई से निपटने के लिए कहा। न्यायालय ने यही दरकार सरकारों के आगे भी रखी थी। यही कारण है कि अब जो सूरत बन रही है उसमें यह मुमकिन होता दिख रहा है कि केंद्र सरकार तेजाब को लेकर एक सख्त कानून का ड्राफ्ट देश के सामने लेकर आए। इस बारे में केंद्र सरकार अटार्नी जनरल से राय पहले ही मांग चुकी है। वैसे इस मामले में एक पेंच भी है। तेजाब की खरीद-बिक्री के आधार और तरीके तय करने का मामला राज्य सरकारों के अधीन है। इसलिए दो ही स्थितियां केंद्र सरकार के सामने है कि वह इस मामले में एक मॉडल कानून देश के सामने रखे और दूसरा यह कि वह राज्य सरकारों को ऐसी कानूनी पहल के लिए सख्त दिशानिर्देश दे।
सुप्रीम कोर्ट में इस बारे में अगली सुनवाई चार महीने बाद होनी थी। सर्वोच्च न्यायालय को उम्मीद थी कि इस दौरान सरकारों की तरफ से इस गंभीर मामले में उसके दिशानिर्देश के मुताबिक तेजी से कदम उठाए जाएंगे। पर ऐसा हुआ नहीं। अब सुप्रीम कोर्ट ने 31 मार्च 2०14 तक की नई समयावधि इस काम के लिए तय की है। पर इस लापरवाही का क्या जो इतने संवेदनशील मामले में अब तक केंद्र और राज्य की सरकारों की तरफ से दिखाई गई है। नई मिली मोहलत में ये लापरवाही दूर हो जाएगी, ऐसी उम्मीद भले कर ली जाए पर इस पर यकीन तो कतई नहीं होता।
इसी साल संसद में यौन उत्पीड़न के खिलाफ कानून बनाते समय भी सरकार ने तेजाबी हमलों को एक गंभीर अपराध मानते हुए इस अपराध में कसूरवारों के खिलाफ सख्त सजा की बात कही थी। पर अब यह पूरा संदर्भ सुप्रीम कोर्ट के नए दिशानिर्देश आ जाने के बाद बदल गया है। केंद्र सरकार को पूरी स्थिति पर अब नए सिरे से गौर करना होगा।
वैसे यह पूरा मामला सिर्फ कानून से जुड़ा नहीं है। अगर इस तरह के कृत्य एक तेजी से बढ़ रही कुप्रवृत्ति की शक्ल अख्तियार कर रहे हैं तो इसके बारे में समाज को भी एक जागरूक पहल करनी होगी। सेक्स, सक्सेस और सेंसेक्स के दौर में यह समझना मुश्किल नहीं है कि तेजाबी हमले की शिकार अगर लड़कियों को बनाया जा रहा है तो इसके पीछे वजहें क्या हैं। बहुत गंभीर विमर्श की तरफ न भी जाएं तो इतनी बात तो जरूर हम समझ सकते हैं कि संबंध जब दैहिकता की शर्तों पर ही तय होंगे तो प्रेम संवेदनाओं के लिए स्पेस कहां रह जाएगा। टीवी-सिनेमा, विज्ञापन और लोकप्रियता के दायरे में आना वाला हर कंटेंट अगर हमें बस यही समझाए-बताए कि प्यार हासिल करके भोगने की चीज है और प्रेम वस्तुत: कलात्मक अभिव्यक्ति है तो फिर हसरत अगर हासिल होने से रह जाए तो कार्रवाई तो हिंसक और बर्बर ही होगी। हमारे समय का यह सच वाकई भयावह है और इस भयावहता को लंबे समय तक मानवता शायद ही सहन कर सके। लक्ष्मी ने तेेजाबी हमलों के खिलाफ जो संघर्ष छेड़ा है, उसका निर्णायक मुकाम तक पहुंचना मौजूदा समय की मांग है।

गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

गांधीवादी दौर की वापसी का खंडित मिथक


समय को जीने से पहले ही हम उसके नाम का फैसला कर लेते हैं। यह ठीक उसी तरह है, जैसे बच्चे के जन्म के साथ उसका नामकरण संस्कार पूरा कर लिया जाता है। यह परंपरा हमारी स्वाभाविक वृत्तियों से मेल खाता है। समय की बात शुरू में इसलिए क्योंकि जिस 21वीं सदी में हम जी रहे हैं, उसका आगमन बाद में हुआ नामकरण पहले कर दिया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी इसे कंप्यूटर और सूचना क्रांति की सदी बताते थे। उनकी पार्टी आज भी इस बात को भूलती नहीं और देश को जब-तब इस बात की याद दिलाते रहते हैं।
बहरहाल, बात इससे आगे की। 21वीं सदी के दूसरे दशक में लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के लिए जब सिविल सोसाइटी सड़कों पर उतरी और सरकार के पारदर्शी आचरण के लिए अहिंसक प्रयोगों को आजमाया गया तो फिर से एक बार समय के नामकरण की जल्दबाजी देखी गई। भारतीय मीडिया की तो छोड़ें अमेरिका और इंग्लैंड से निकलने वाले जर्नलों और अखबारों में कई लेख छपे, बड़ी-बड़ी हेडिंग लगी कि भारत में एक बार फिर से गांधीवादी दौर की वापसी हो रही है, लोकतांत्रिक संस्थाओं के विकेंद्रीकरण और उन्हें सशक्त बनाने के लिए खासतौर पर देशभर के युवा एकजुट हो रहे हैं। सूचना और तकनीक के साझे के जिस दौर को गांधीवादी मूल्यों का विलोमी बताया जा रहा था, अचानक उसे ही इसकी ताकत और नए औजार बताए जाने लगे। नौबत यहां तक आई कि थोड़ी हिचक के साथ देश के कई गांवों-शहरों में रचनात्मक कामों में लगी गांधीवादी कार्यकताओं की जमात भी इस लोक आलोड़न से अपने को छिटकाई नहीं रख सकी। वैसे कुछ ही महीनों के जुड़ाव के साथ इनमें से ज्यादातर लोगों ने अपने को इससे अलग कर लिया।
इस सिलसिले में एक उल्लेख और। भाजपा के थिंक टैंक में शामिल सुधींद्र कुलकर्णी ने अपनी किताब 'म्यूजिक ऑफ द स्पीनिंग व्हील’ में तो इंटरनेट को गांधी का आधुनिक चरखा तक बता दिया। कुलकर्णी ने अपनी बात सिद्ध करने के लिए तमाम तर्क दिए और यहां तक कि खुद गांधी के कई उद्धरणों का इस्तेमाल किया। कुलकर्णी के इरादे पर बगैर संशय किए यह बहस तो छेड़ी ही जा सकती है कि जिस गांधी ने अपने 'हिंद स्वराज’ में मशीनों को शैतानी ताकत तक कहा और इसे मानवीय श्रम और पुरुषार्थ का अपमान बताया, उसकी सैद्धांतिक टेक कोकंप्यूटर और इंटरनेट जैसी परावलंबी तकनीक और भोगवादी औजार के साथ कैसे मेल खिलाया जा सकता है।
संयोग से गांधी के 'हिंद स्वराज’ के भी चार साल पहले सौ साल पूरे हो चुके हैं। इस मौके पर गांधीवादी विचार के तमाम अध्येताओं ने एक सुर में यही बात कही कि इस पुस्तक में दर्ज विचार को गांधी न तब बदलने को तैयार थे और न आज समय और समाज की जो नियति सामने है, उसमें कोई इसमें फेरबदल की गंुजाइश देखी जा सकती है। अब ऐसे में कोई यह बताया कि साधन और साध्य की शुचिता का सवाल आजीवन उठाने वाले गांधी की प्रासंगिकता और उनके मूल्यों की 'रिडिस्कवरी’ की घोषणा ऐसे ही तपाक से कैसे की जा सकती है। तो क्या गांधी के मूल्य, उनके अहिंसक संघर्ष के तरीकों की वापसी की घोषणा में जल्दबाजी की गई। और अगर ऐसा हुआ तो इस जल्दबाजी के कसूरवार तो मीडिया से लेकर राजनीतिक दल तक सभी हैं।
इस जल्दबाजी के नुकसान पर आगे चर्चा से पहले कुछ बातें उस चेहरे को लेकर जिसे समय के परिवर्तन का चेहरा बताया गया था, बनाया गया था। आज अण्णा हजारे क्या हैं और क्या कर रहे हैं इस पर जरूर अलग-अलग तरीके से टिप्पणियां की जा सकती हैं। उनके कई शुभचिंतकों और मुरीदों को भी इस बात का अफसोस है कि बदलाव की एक बड़ी लोक अंगराई के वे अगुवा होने के बावजूद वे आज देखते-देखते नेपथ्य में चले गए। पर बड़ा सवाल यह है कि क्या उनके द्बारा या उनके आंदोलन के जरिए उठाए गए मुद्दे भी नेपथ्य में चले गए हैं या बस कुछ महीने बीतते-बीतते पिट गए। वैसे खुद अण्णा अफने को चुका हुआ नहीं मानते हैं। आगामी 1० दिसंबर से वे फिर से अनशन पर बैठने वाले हैं सरकार पर शीतकालीन सत्र में जनलोकपाल बिल पास कराने का दबाव बनाने के लिए। कहना मुश्किल है कि इस बार उनके अनशन का असर क्या होगा, क्योंकि इस संघर्ष के उनके पुराने साथी आज उनके साथ नहीं हैं।
बहरहाल बात उन कुछ सवालों और मुद्दों की जो गुजरे दो-तीन सालों में बार-बार उठे। लोकतंत्र में जनता की भूमिका सिर्फ एक दिनी मतदान प्रक्रिया में शिरकत करने भर से क्या पूरी हो जाती है? एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद सर्वोच्च संस्था है पर क्या उसकी यह सर्वोच्चता जनता के भी ऊपर है? क्या सरकार और संसद सिर्फ नीतियों और योजनाओं का निर्धारण जनता के लिए करेंगे या फिर इस निर्णय प्रक्रिया में जनता की भी स्पष्ट भागीदारी सुनिश्चत होनी चाहिए? केंद्रीकृत सत्ता लोकतांत्रिक विचारधारा के मूल स्वभाव के खिलाफ है तो फिर उसका पुख्ता तौर पर विकेंद्रीकरण क्यों नहीं किया जा रहा है? पंचायती राज व्यवस्था को अब तक सरकार की तरफ से महज कुछ विकास योजनाओं को चलाने की एजेंसी बनाकर क्यों रखा गया है, उसका सशक्तिकरण क्यों नहीं किया जा रहा है?
ये तमाम वे मुद्दे और सवाल हैं, जो बीते कुछ सालों में जनता के बीच उभरे, खुली बहस का हिस्सा बने। जनता के मूड को देखते हुए या तो ज्यादातर राजनीतिक दलों और उनके नेताओं ने इनका समर्थन किया या फिर विरोध की जगह एक चालाक चुप्पी साध ली। पारदर्शी सरकारी कामकाज और उस पर निगरानी के लिए अधिकार संपन्न लोकपाल की नियुक्ति जैसे सवालों पर तो संसद तक ने अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दी। चुनाव सुधार के मुद्दे पर भी तकरीबन एक सहमति हर तरफ दिखी। पर अब जब चुनाव हो रहे हैं। पहले पांच राज्यों के विधानसभाओं के और फिर अगले साल लोकसभा के चुनाव होने हैं, तो इनमें से शायद ही कोई मुद्दा हो जो किसी राजनीतिक दल के चुनावी एजेंडे में शुमार हो। चुनावी वादे के नाम पर कच्ची-पक्की सड़कों के या तो किलोमीटर गिनाए जा रहे हैं या फिर मुफ्त अनाज या लैपटॉप बांटने के लालची वादे। अण्णा आंदोलन से छिटकर कर बनी आम आदमी पार्टी जरूर इनमें से कुछ मुद्दों को लेकर दिल्ली विधानसभा चुनाव में उतरी है, पर उनकी महत्वाकांक्षा और जल्दबाजी से उनके आदर्शवादी कदमों की व्यावहारिकता पर सवाल उठते हैं। तो क्या यह मान लिया जाए कि अपने दौर को पहचानने और उसे नाम देने में हम एक बार फिर से धोखा खा गए? क्या हमारा समय अभी किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था परविर्तन के लिए तैयार नहीं है। क्या देश की जनता की लोकतांत्रिक जागरुकता एक भावावेश भर है, जो देखते-देखते बीत जाता है।
दरअसल, ये सवाल चाहे जैसे भी पूछे जाएं उसका केंद्रीय उत्तर एक ही है। वह उत्तर यह है कि परिवर्तन कोई फैशनेबल चीज नहीं, जिसे जब चाहे प्रचलन में ला दिया और जब चाहे प्रयोग से बाहर कर दिया। फिर यह टू मिनट नूडल्स भी नहीं कि बस कुछ ही समय में बस जो चाहा हासिल कर लिया। यही नियति हाल में बनी परिवर्तनकारी स्थितियों की भी हुई। इसके नाम और परिणाम तय करने की भावुक स्वाभाविकता में हम भूल गए कि समय के तारीख के हर्फ ऐसे नहीं बदलते। फिर जिस राजनीतिक व्यवस्था ने पिछले छह दशकों से ज्यादा के समय में अपनी पकड़ का रकबा हमारे मानस तक फैला रखा है, उसकी बाहें मरोड़ना कोई आसान बात नहीं। निचोड़ यह कि संभावना तभी यकीनी है जब उसके संभव होने के आसार हों और नाम से नहीं बलिक कोई चीज अपने अंजाम से जानी-मानी जाती है।

मंगलवार, 26 नवंबर 2013

कीर्ति का विज्ञान

देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित होने वाले प्रो. सीएनआर राव चौथे वैज्ञानिक हैं। पर इस सम्मान की घोषणा के बाद उनके कुछ तल्ख बयानों की चर्चा ज्यादा हुई, उनके काम और उपलब्धियों की ओर लोगों का ध्यान कम गया। ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि प्रो. राव और सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न देने की घोषणा एक साथ हुई। क्रिकेट और उसके कथित 'भगवान’ के पीछे पागल देश में यह सोचने की फुर्सत किसे थी कि देश एक महान खिलाड़ी के साथ एक महान वैज्ञानिक वैज्ञानिक को भी सर्वोच्च नागरिक सम्मान देने जा रहा है। आंकड़ों में सचिन की महानता को देखने-परखने वालों को अगर यह बताया जाए कि प्रो. राव के नाम 15०० से ज्यादा रिसर्च पेपर हैं, कम से कम 45 किताबें लिए चुके हैं वे, 6० से ज्यादा विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि दी है, तो वे भी रोमांचित हुए बिना शायद ही रहें। प्रो. राव के खाते में यश और कीर्ति इतना भर ही नहीं है। 79 साल के इस विलक्षण प्रतिभा के धनी को देश के कई प्रधानमंत्रियों का वैज्ञानिक सलाहकार बनने का सौभाग्य हासिल है। उनसे पहले तीन ही वैज्ञानिक ऐसे हैं, जिन्हें भारत रत्न मिला है। सबसे बड़ी बात तो यह कि वे देश के अकेले ऐसे वैज्ञानिक हैं जिनका एच-इंडेक्स 1०० है।
प्रो. राव का जन्म 3० जून 1934 को बेंगलुरू में हुआ। वे खुद बताते हैं कि उन्हें बचपन में घर में धार्मिक प्रेरणाएं काफी मिलीं। उनकी मां नागम्मा नागेसा राव काफी पूजा-पाठ करती थी और उन्हें देवी-देवताओं की कहानियां सुनाती थीं। राव अपनी मां से ज्यादा करीब थे इसलिए शुरुआत में उनका झुकाव आध्यात्म की ओर बढ़ने लगा। पर घर में एक विपरीत स्थिति भी थी। पिता हनुमंथ नागेसा राव को यह सब बहुत पसंद नहीं था। वे चाहते थे कि उनका बेटा खूब पढ़े-लिखे और अंग्रेजी में बात करे। नतीजतन प्रो. राव में बचपन में ही एक तरफ तो कुछ उच्च संस्कार आए, वहीं दूसरी तरफ पढ़ाई-लिखाई की तरफ भी वे गंभीरता से मुखातिब हुए। इन बातों का महत्व इसलिए भी है क्योंकि देश तब गुलामी के अंधेरे से निकलने के लिए निर्णायक संघर्ष कर रहा था।
प्रो. राव ने 1951 में मैसूर विश्वविद्यालय से बीएससी की। बाद में वे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय आ गए और यहां से उन्होंने एमएससी की पढ़ी पूरी की। उच्च शिक्षा के इस मुकाम तक आते-आते उनके ज्ञान और प्रतिभा का डंका हर तरफ बजने लगा था। एमआईटी, कोलंबिया और पड्र्यू यूनिवर्सिटी ने उन्ह्ें अपने यहां से पीएचडी करने का ऑफर भेजा, वह भी सौ फीसद छात्रवृत्ति की पेशकश के साथ। प्रो. राव ने पड्र्यू को चुना और वहां उन्होंने नौ महीने के रिकार्ड समय में पीएचडी का अपना शोध पूरा किया और वह भी विशेष सराहना टिप्पणी के साथ। इस समय तक आते-आते वे अपने करियर के उस निर्णायक दौर में पहुंच गए थे, जहां उन्हें यह तय करना था कि वे स्वदेश लौटें कि नहीं।
1959 में वे स्वदेश लौट आए कई स्वर्णिम प्रस्तावों को ठुकराकर। यहां उन्होंने बेंगलुरू में 5०० रुपए मासिक पर इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ साइंस से लेक्चरर के तौर पर नौकरी शुरू की। भारत लोटकर उन्होंने देश की वैज्ञानिक उन्नति को एक तरफ से अपने जीवन का एकमेव शपथ बना लिया। आज नैनो मैटेरियल, सॉलिè स्टेट और मैटेरियल कैमेस्ट्री के क्षेत्र में अपने अध्ययन और शोधों के कारण विज्ञान जगत में उनका खासा नाम-सम्मान है। फिलहाल वे जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च के मानद अध्यक्ष और इंटरनेशनल सेंटर फॉर मैटेरियल साइंस के निदेशक हैं। वे आईआईटी से भी जुड़े हैं।
एक वैक्षानिक के रूप में प्रो. राव का सफरनामा 2०11 में अचानक विवादों में घिर गया था, जब उन पर रिसर्च चौरी का आरोप लगा। तब उन्होंने विनम्रता से माफी भी मांग ली थी पर बाद में पता चला कि यह गलती उनके कनिष्ठ प्रोफेसर और एक छात्र की असावधानी के कारण हुई थी। बहरहाल देश को अपने इस रत्न पर गर्व है। सचिन तेंदुलकर के शब्दों में उन्होंने जो कुछ भी किया पर प्रो. राव साधना एकांतिक है। इस वैज्ञानिक साधक को पूरे देश की तरफ प्रणाम।

तहलकावादी तकनीक और मीडिया


तरुण तेजपाल जिस मामले में फंसे हैं, वह महिला अस्मिता से जुड़े कुछ जरूरी सामयिक सरोकारों की तरफ हमारा ध्यान तो ले ही जाता है, यह मीडिया के अंतजर्गत को भी लेकर एक जरूरी बहस छेड़ने का दबाव बनाता है। एक ऐसी बहस जिसमें खुद से मुठभेड़ करना का हौसला हो। मीडिया अगर खुद को देशकाल का आईना कहता है तो यह अपेक्षा तो उससे भी होनी चाहिए, वह इस आईने का इस्तेमाल खुद के लिए भी बराबर तौर पर करे। आईना अपनी तरफ हो या सामने की तरफ, सच को जैसे को तैसा देखने-दिखाने की उसकी फितरत नहीं बदलती। यह भी कि आईना कीमती हो या कम दामी, काम वह एक जैसा ही करता है। कृष्ण बिहारी नूर का एक शेर भी है-'चाहे सोने के फ्रेम में जड़ दो, आईना है कि झूठ बोलता ही नहीं।’
तरुण जिस तरह की पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं, उसमें तकनीक का बड़ा योगदान है। अब तक उन्होंने जो भी तहलका मचाया, वह तकनीकी मदद से ही संभव हुआ। लिहाजा, तकनीक के जोर पर चल रही पत्रकारिता के मानस को पढ़ने के लिए हमारे आगे कुछ बातें और स्थितियां साफ होनी चाहिए। दरअसल, सूचना के क्षेत्र में तकनीकी क्रांति के कारण मीडिया का अंतजर्गत वैसा ही नहीं रहा, जैसा इससे पूर्व था। यह फर्क इसलिए भी आया क्योंकि इसी दौर में बाजार ने प्रतिभा और विकास के साझे को अपनी ताकत बना लिया।
अस्सी-नब्बे के दशक में खोजी पत्रकारिता के दौर में जातीय और नक्सली हिंसा के साथ मुंबई जैसे शहरों में अंडरवर्ल्ड की रिपोर्टिंग के दौर के साझीदार और चश्मदीद अब भी कई लोग मीडिया क्षेत्र में विभिन्न भूमिकाओं में सक्रिय हैं। ये लोग बताते हैं कि सत्य और तथ्य की खोज के पीछे की पत्रकारीय ललक का पूरा व्याकरण ही तब बदल गया, जब इस काम के लिए नई तकनीकों का इस्तेमाल शुरू हुआ। ऐसा इसलिए क्योंकि तकनीक का अपना रोमांच होता है और कई बार यह रोमांच आपको अपने मकसद से डिगाता है। आज के दौर में तौ खैर तकनीक और सूचना को एक-दूसरे से अलगाया ही नहीं जा सकता है।
बात करें न्यू मीडिया या सोशल मीडिया की तो यह अलगाव वहां भी मुश्किल है। इस मुश्किल को इस तरह भी समझने की जरूरत है कि एक ऐसे दौर में जब अरब बसंत जैसी क्रांति की बात होती है तो उसके पीछे का इंधन और इंजन दोनों ही तकनीक के जोर पर चलने वाला न्यू मीडिया ही है। यानी तकनीकी क्रांति की दुनिया अपने चारों तरफ एक क्रांतिकारी दौर की रचना प्रक्रिया का सीधा हिस्सा है, उसकी जननी है।
ब्लॉग, फेसबुक, ट्विटर और खुफिया कैमरों ने सचाई को जितना नंगा किया है, उससे पत्रकारिता के साथ सामाजिक अध्ययन की तमाम थ्योरीज बदल गई हैं। सच में निश्चित रूप से अपना-पराया जैसा कुछ नहीं होता, पर इसके समानांतर एक सिद्धांत निजता का भी है। निजता के दायरे में व्यक्ति, परिवार और समाज का कौन सा हिस्सा आए और कौन सा नहीं, इसको लेकर कोई स्पष्ट लक्ष्मण रेखा नहीं खींची गई है। यह हमारे दौर की एक बड़ी चुनौती है। क्योंकि निजता का भंग होना व्यक्ति की कई तरह की जुगुप्साओं को जन्म देता है। फिर आप सिर्फ सत्य का साक्षात्कार भर नहीं करते, बल्कि गोपन के भंग होने का अमर्यादित खेल देखने की लालच से भर उठते हैं।
निजी और सार्वजनिक जीवन को एक ही कसौटी पर खरे उतारने का जोखिम एक दौर में गांधी से लेकर उनके कई साथियों ने उठाई। सत्य के इस प्रयोग ने जीवनादर्श को एक बड़ी ऊंचाई दी। पर यह समय और समाज का संस्कार नहीं बन सका। ऐसे में मानवीय दुर्बलताओं को स्वाभाविक मानकर चलने की समझ ही ज्यादा काम आई। इसे ही न्याय और विधान की व्यवस्थाओं में भी स्वीकारा गया। पर अब एक नई स्थिति है। 'द वर्ल्ड इज फ्लैट’ के रचयिता थॉमस फ्रिडमैन बताते हैं कि सूचना के उपकरण मनुष्य की स्वाभाविकता को बदलने वाले औजार तो हैं ही, ये बाजारवादी पराक्रम के बलिष्ठ माध्यम भी हैं। यह एक खतरनाक स्थिति है। खतरनाक इसलिए क्योंकि इस स्थिति के बाद स्वविवेक के लिए कुछ भी शेष नहीं रहा जाता। यों भी कह सकते हैं नए समय की पटकथा पहले से तय है, इसमें बस हमें यहां-वहां फिट भर हो जाना है, वह भी इतिहास और समाज के अपने अब तक को बोध को भूलकर।
तरुण तेजपाल तहलका की तरफ से गोवा में जो बौद्धिकीय विमर्श का आयोजन करा रहे थे, उसमें एक मुद्दा आधुनिक दौर में महिला अस्मिता की चुनौतियां भी था। दरअसल, आधुनिकता के खुले कपाटों में महिलाएं भी पुरुषों के साथ ही दाखिल हो रही हैं। लिहाज, लैंगिक स्तर पर उनके बीच मेलजोल के नए सरोकार विकसित हुए हैं। इसने एक तरफ स्त्री-पुरुष संबंधों की नई दुनिया रची है तो असुरक्षा का एक नया वातावरण भी पैदा हुआ है। निर्भया कांड को सामने रखकर समझना चाहें तो यह असुरक्षा बर्बरता की हद तक जाता है। नीति और विधान की नई व्याख्या और दलीलों के बीच इस बर्बरता का बढ़ता रकबा एक बड़ा खतरा है। डॉ. धर्मपाल के शब्दों में यह 'भारतीय चित्त, मानस और काल का नया यथार्थ’ है। ऐसा यथार्थ जिसका पर्दाफाश तेजपाल सरीखे लोग पारदर्शिता के नाम पर नीति और व्यवस्था से जुड़े बड़े जवाबदेह लोगों के जीवन के निजी एकांत तक पहुंच कर करते रहे हैं।
तकनीक के साथ एक विचित्र स्थिति यह भी है कि वह नैतिकता का कोई दबाव अपनी तरफ से नहीं बनाता है। ईमेल और सीसीटीवी फुटेज के जरिए जो सच अब तेजपाल को मुश्किल में डाल रहा है, उसमें तकनीक का अपना पक्ष तटस्थ है। यहां नैतिकताएं वही आड़े आ रही हैं, जो तेजपाल सरीखे नंगे सच के हिमायतियों ने खुद रचा है। जिन सवालों और तकाजों पर वे दूसरों को नंगा करते रहे हैं, वही सवाल और तकाजे अब उन्हें नहीं बख्श रहे।
यह स्थिति आंख खोलने वाली है। तकनीक के जोर पर बदलाव की संहिताएं रचने वाली पत्रकारिता भी एक ढोंग हो सकती है, इसका इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि आईना लेकर 'अंत:पुर’ तक दाखिल होने वाले खुद अपने अंत:पुर में शर्मनाक हरकतों के साथ पकड़े जा रहे हैं। गनीमत मानना चाहिए कि पर्दाफाश और सनसनी मार्का पत्रकारिता अब भी हिंदी या भारतीय पत्रकारिता का मूल स्वभाव नहीं है। खोजी दौर में सचाई को उसके मर्म के साथ सामने लाया गया था। दलित बस्तियों के कई मातमी विलापों को आज अगर हम एक विमर्शवादी अध्याय की तरह देख पा रहे हैं तो उसके पीछे इस तरह की पत्रकारिता का बहुत बड़ा हाथ है। पर सूचना को सनसनी और सत्य को महज तथ्य की तरह पेश करने की हवस ने न तो देश और समाज के आगे नीति और आचरण के कोई मानक रचे और न ही इससे पत्रकारिता धर्म का ही कोई कल्याण हुआ। यह एक मोहभंग की भी स्थिति है, जिसमें बदलाव का मुगालता पेश करने वाली कई कोशिशंे एक के बाद एक पिटती नजर आ रही हैं।
गुलामी के दौर में आजाद तेवर स्वतंत्र चेतना की लौ जगाने वाली पत्रकारिता के विरासत के बाद यह एक भटकाव की भी स्थिति है। आखिर में यही कि पत्रकारिता की तकनीक का परिष्कार तो जरूर हो पर तकनीक के परिष्कार को पत्रकारिता मान लेने के जोखिम को भी समझना चाहिए। क्योंकि इसमें तात्कालिक खलबली से आगे न तो कुछ पैदा किया जा सकता है, न ही हासिल। उलटे नौबत यहां तक आ सकती है कि खलबली के शिकार हम खुद हो जाएं। अरब बसंत के पत्ते भी अगर देखते-देखते झरने शुरू हो गए हैं तो इसी लिए कि इसमें बदलाव का यथार्थ तात्कालिक से आगे स्थायी नहीं बन सका।

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मंगलवार, 5 नवंबर 2013

भारत में नई सनसनी

सोफिया हयात देश में आई नई सनसनी है। टीवी रियलिटी शो 'बिग बॉस’ में उनकी वाइल्ड कार्ड के जरिए एंट्री हुई है। अब आगे यह देखने वाली बात होगी कि सोफिया की इस शो में मौजूदगी उसे भारत के आम लोगों के दिलों में कितनी जगह दे पाती है। उनको लेकर मसालेदार खबरों से लेकर उनकी बोल्ड तस्वीरों का एक पूरा जखीरा इंटरनेट पर मौजूद है। गूगल पर उनका नाम भर आप टाइप करें तो महज कुछ पलों में एक करोड़ से ज्यादा वेब एंट्री की सूची आपके सामने आ जाएगी।
भारत में जो लोग मनोरंजन की अंतरराष्ट्रीय दुनिया के बारे में दिलचस्पी रखते हैं उनके लिए सोफिया हयात को लेकर दिलचस्पी तब एकाएक बढ़ गई थी जब पिछले साल आमिर खान के टीवी शो 'सत्यमेव जयते’में लड़कियों के यौन उत्पीड़न पर केंद्रित एक एपीसोड आया। सोफिया ने बताया कि 'सत्यमेव जयते’ के इस एपिसोड को लंदन में उसने भी देखा और देखकर खूब रोई। मीडिया में इस पर अपनी प्रतिक्रिया में उसने यहां तक कबूला कि उसका भी दस साल की उम्र में यौन उत्पीड़न हो चुका है और तब जब उसने इस बारे में अपने घर में इसकी शिकायत की तो लोगों ने उसे ही गलत माना। सोफिया की ये बातें मीडिया में खूब चर्चा में रहीं। कुछ लोगों ने इस एक आधुनिक नारी का बोल्ड बयान माना तो कुछ ने इसे आधी दुनिया के उस अंधेरे से जोड़ा, जो साल और सदी के बदलने के बावजूद पहले की तरह कायम है।
सोफिया का जन्म छह दिसंबर 1984 को हुआ। वह पाक मूल की ब्रिटिश सिंगर, एक्ट्रेस और मॉडल है। भारत के लोगों ने उन्हें पहली बार तब जाना जब उसने जीटीवी पर अपने एक टीवी शो को लेेकर आई। यह शो वर्ष 2००० से अगले तीन साल तक चला। बाद में यूटीवी बिंदास पर उसका एक बोल्ड रियलिटी शोे आया-'सुपर ड्यूड’। इस शो से वह भारत में युवाओं के बीच एक हॉट सेंसेशन बन गई। पर अभी भी आम भारतीयों में सोफिया की पहचान बननी बाकी थी। यही वजह है कि उसने 'बिग बॉस’ की प्रतिभागी बनना स्वीकार किया।
सोफिया की जिंदगी में महज चमकदार और मसालेदार बातें भर नहीं हैं। उसने 16 साल की उम्र से काम करना शुरू किया और परफार्मिंग आर्ट की तकरीबन विधाओं में हाथ आजमाया। बीबीसी से लेकर फर टीवी तक और अंग्रेजी से लेकर बॉलीवुडिया फिल्मों तक सब जगह उसने हाथ आजमाए। वह इसी साल अभय देओल के साथ 'बॉलीवुड कारमैन’ फिल्म में नजर आई। पर अभिनय की दुनिया में उसकी मुकम्मल पहचान बननी अभी बाकी है। वैसे मॉडलिंग की दुनिया में उसका नाम खासा जाना-पहचाना है।
अभिनय और मॉडलिंग केे अलावा उसने गायन के क्षेत्र में भी कदम रखा। 2००6 में उसने एक बैंड के लिए गाना गाया, जो उस साल इंटरनेशनल म्यूजिक चार्ट पर छठे पायदान पर थी। इसके अलावा भी उसके कई म्यूजिक एलबम रिलीज हो चुकेे हैं। सोफिया के हुनर का विस्तार यहीं तक नहीं है। उसने एक किताब भी लिखी है-'डिजआनर्ड’, जो अब तक तीन भाषाओं में छप चुकी है।
सोफिया की हुनरमंदी केे कायल लोग भी यह मानते हैं कि सोफिया कई क्षेत्रों में एक साथ दस्तक देने के बजाय अगर कुछ चुनींदा फील्ड को लेकर फोकस्ड रहती तो उसकेे कैरियर का ग्राफ अब तक हिचकोला खाते नहीं रहता बल्कि अब तक किसी ऊंचे मुकाम को हासिल कर चुका होता। फिर उसकी बिंदास बाला की छवि ने भी उसकी शख्सियत को गंभीर नहीं रहने दिया। देखना होगा कि 'बिग बॉस’ में आने के बाद से उसकी पहचान कितनी बदलती और मजबूत होती है।