गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

गांधीवादी दौर की वापसी का खंडित मिथक


समय को जीने से पहले ही हम उसके नाम का फैसला कर लेते हैं। यह ठीक उसी तरह है, जैसे बच्चे के जन्म के साथ उसका नामकरण संस्कार पूरा कर लिया जाता है। यह परंपरा हमारी स्वाभाविक वृत्तियों से मेल खाता है। समय की बात शुरू में इसलिए क्योंकि जिस 21वीं सदी में हम जी रहे हैं, उसका आगमन बाद में हुआ नामकरण पहले कर दिया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी इसे कंप्यूटर और सूचना क्रांति की सदी बताते थे। उनकी पार्टी आज भी इस बात को भूलती नहीं और देश को जब-तब इस बात की याद दिलाते रहते हैं।
बहरहाल, बात इससे आगे की। 21वीं सदी के दूसरे दशक में लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के लिए जब सिविल सोसाइटी सड़कों पर उतरी और सरकार के पारदर्शी आचरण के लिए अहिंसक प्रयोगों को आजमाया गया तो फिर से एक बार समय के नामकरण की जल्दबाजी देखी गई। भारतीय मीडिया की तो छोड़ें अमेरिका और इंग्लैंड से निकलने वाले जर्नलों और अखबारों में कई लेख छपे, बड़ी-बड़ी हेडिंग लगी कि भारत में एक बार फिर से गांधीवादी दौर की वापसी हो रही है, लोकतांत्रिक संस्थाओं के विकेंद्रीकरण और उन्हें सशक्त बनाने के लिए खासतौर पर देशभर के युवा एकजुट हो रहे हैं। सूचना और तकनीक के साझे के जिस दौर को गांधीवादी मूल्यों का विलोमी बताया जा रहा था, अचानक उसे ही इसकी ताकत और नए औजार बताए जाने लगे। नौबत यहां तक आई कि थोड़ी हिचक के साथ देश के कई गांवों-शहरों में रचनात्मक कामों में लगी गांधीवादी कार्यकताओं की जमात भी इस लोक आलोड़न से अपने को छिटकाई नहीं रख सकी। वैसे कुछ ही महीनों के जुड़ाव के साथ इनमें से ज्यादातर लोगों ने अपने को इससे अलग कर लिया।
इस सिलसिले में एक उल्लेख और। भाजपा के थिंक टैंक में शामिल सुधींद्र कुलकर्णी ने अपनी किताब 'म्यूजिक ऑफ द स्पीनिंग व्हील’ में तो इंटरनेट को गांधी का आधुनिक चरखा तक बता दिया। कुलकर्णी ने अपनी बात सिद्ध करने के लिए तमाम तर्क दिए और यहां तक कि खुद गांधी के कई उद्धरणों का इस्तेमाल किया। कुलकर्णी के इरादे पर बगैर संशय किए यह बहस तो छेड़ी ही जा सकती है कि जिस गांधी ने अपने 'हिंद स्वराज’ में मशीनों को शैतानी ताकत तक कहा और इसे मानवीय श्रम और पुरुषार्थ का अपमान बताया, उसकी सैद्धांतिक टेक कोकंप्यूटर और इंटरनेट जैसी परावलंबी तकनीक और भोगवादी औजार के साथ कैसे मेल खिलाया जा सकता है।
संयोग से गांधी के 'हिंद स्वराज’ के भी चार साल पहले सौ साल पूरे हो चुके हैं। इस मौके पर गांधीवादी विचार के तमाम अध्येताओं ने एक सुर में यही बात कही कि इस पुस्तक में दर्ज विचार को गांधी न तब बदलने को तैयार थे और न आज समय और समाज की जो नियति सामने है, उसमें कोई इसमें फेरबदल की गंुजाइश देखी जा सकती है। अब ऐसे में कोई यह बताया कि साधन और साध्य की शुचिता का सवाल आजीवन उठाने वाले गांधी की प्रासंगिकता और उनके मूल्यों की 'रिडिस्कवरी’ की घोषणा ऐसे ही तपाक से कैसे की जा सकती है। तो क्या गांधी के मूल्य, उनके अहिंसक संघर्ष के तरीकों की वापसी की घोषणा में जल्दबाजी की गई। और अगर ऐसा हुआ तो इस जल्दबाजी के कसूरवार तो मीडिया से लेकर राजनीतिक दल तक सभी हैं।
इस जल्दबाजी के नुकसान पर आगे चर्चा से पहले कुछ बातें उस चेहरे को लेकर जिसे समय के परिवर्तन का चेहरा बताया गया था, बनाया गया था। आज अण्णा हजारे क्या हैं और क्या कर रहे हैं इस पर जरूर अलग-अलग तरीके से टिप्पणियां की जा सकती हैं। उनके कई शुभचिंतकों और मुरीदों को भी इस बात का अफसोस है कि बदलाव की एक बड़ी लोक अंगराई के वे अगुवा होने के बावजूद वे आज देखते-देखते नेपथ्य में चले गए। पर बड़ा सवाल यह है कि क्या उनके द्बारा या उनके आंदोलन के जरिए उठाए गए मुद्दे भी नेपथ्य में चले गए हैं या बस कुछ महीने बीतते-बीतते पिट गए। वैसे खुद अण्णा अफने को चुका हुआ नहीं मानते हैं। आगामी 1० दिसंबर से वे फिर से अनशन पर बैठने वाले हैं सरकार पर शीतकालीन सत्र में जनलोकपाल बिल पास कराने का दबाव बनाने के लिए। कहना मुश्किल है कि इस बार उनके अनशन का असर क्या होगा, क्योंकि इस संघर्ष के उनके पुराने साथी आज उनके साथ नहीं हैं।
बहरहाल बात उन कुछ सवालों और मुद्दों की जो गुजरे दो-तीन सालों में बार-बार उठे। लोकतंत्र में जनता की भूमिका सिर्फ एक दिनी मतदान प्रक्रिया में शिरकत करने भर से क्या पूरी हो जाती है? एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद सर्वोच्च संस्था है पर क्या उसकी यह सर्वोच्चता जनता के भी ऊपर है? क्या सरकार और संसद सिर्फ नीतियों और योजनाओं का निर्धारण जनता के लिए करेंगे या फिर इस निर्णय प्रक्रिया में जनता की भी स्पष्ट भागीदारी सुनिश्चत होनी चाहिए? केंद्रीकृत सत्ता लोकतांत्रिक विचारधारा के मूल स्वभाव के खिलाफ है तो फिर उसका पुख्ता तौर पर विकेंद्रीकरण क्यों नहीं किया जा रहा है? पंचायती राज व्यवस्था को अब तक सरकार की तरफ से महज कुछ विकास योजनाओं को चलाने की एजेंसी बनाकर क्यों रखा गया है, उसका सशक्तिकरण क्यों नहीं किया जा रहा है?
ये तमाम वे मुद्दे और सवाल हैं, जो बीते कुछ सालों में जनता के बीच उभरे, खुली बहस का हिस्सा बने। जनता के मूड को देखते हुए या तो ज्यादातर राजनीतिक दलों और उनके नेताओं ने इनका समर्थन किया या फिर विरोध की जगह एक चालाक चुप्पी साध ली। पारदर्शी सरकारी कामकाज और उस पर निगरानी के लिए अधिकार संपन्न लोकपाल की नियुक्ति जैसे सवालों पर तो संसद तक ने अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दी। चुनाव सुधार के मुद्दे पर भी तकरीबन एक सहमति हर तरफ दिखी। पर अब जब चुनाव हो रहे हैं। पहले पांच राज्यों के विधानसभाओं के और फिर अगले साल लोकसभा के चुनाव होने हैं, तो इनमें से शायद ही कोई मुद्दा हो जो किसी राजनीतिक दल के चुनावी एजेंडे में शुमार हो। चुनावी वादे के नाम पर कच्ची-पक्की सड़कों के या तो किलोमीटर गिनाए जा रहे हैं या फिर मुफ्त अनाज या लैपटॉप बांटने के लालची वादे। अण्णा आंदोलन से छिटकर कर बनी आम आदमी पार्टी जरूर इनमें से कुछ मुद्दों को लेकर दिल्ली विधानसभा चुनाव में उतरी है, पर उनकी महत्वाकांक्षा और जल्दबाजी से उनके आदर्शवादी कदमों की व्यावहारिकता पर सवाल उठते हैं। तो क्या यह मान लिया जाए कि अपने दौर को पहचानने और उसे नाम देने में हम एक बार फिर से धोखा खा गए? क्या हमारा समय अभी किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था परविर्तन के लिए तैयार नहीं है। क्या देश की जनता की लोकतांत्रिक जागरुकता एक भावावेश भर है, जो देखते-देखते बीत जाता है।
दरअसल, ये सवाल चाहे जैसे भी पूछे जाएं उसका केंद्रीय उत्तर एक ही है। वह उत्तर यह है कि परिवर्तन कोई फैशनेबल चीज नहीं, जिसे जब चाहे प्रचलन में ला दिया और जब चाहे प्रयोग से बाहर कर दिया। फिर यह टू मिनट नूडल्स भी नहीं कि बस कुछ ही समय में बस जो चाहा हासिल कर लिया। यही नियति हाल में बनी परिवर्तनकारी स्थितियों की भी हुई। इसके नाम और परिणाम तय करने की भावुक स्वाभाविकता में हम भूल गए कि समय के तारीख के हर्फ ऐसे नहीं बदलते। फिर जिस राजनीतिक व्यवस्था ने पिछले छह दशकों से ज्यादा के समय में अपनी पकड़ का रकबा हमारे मानस तक फैला रखा है, उसकी बाहें मरोड़ना कोई आसान बात नहीं। निचोड़ यह कि संभावना तभी यकीनी है जब उसके संभव होने के आसार हों और नाम से नहीं बलिक कोई चीज अपने अंजाम से जानी-मानी जाती है।

मंगलवार, 26 नवंबर 2013

कीर्ति का विज्ञान

देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित होने वाले प्रो. सीएनआर राव चौथे वैज्ञानिक हैं। पर इस सम्मान की घोषणा के बाद उनके कुछ तल्ख बयानों की चर्चा ज्यादा हुई, उनके काम और उपलब्धियों की ओर लोगों का ध्यान कम गया। ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि प्रो. राव और सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न देने की घोषणा एक साथ हुई। क्रिकेट और उसके कथित 'भगवान’ के पीछे पागल देश में यह सोचने की फुर्सत किसे थी कि देश एक महान खिलाड़ी के साथ एक महान वैज्ञानिक वैज्ञानिक को भी सर्वोच्च नागरिक सम्मान देने जा रहा है। आंकड़ों में सचिन की महानता को देखने-परखने वालों को अगर यह बताया जाए कि प्रो. राव के नाम 15०० से ज्यादा रिसर्च पेपर हैं, कम से कम 45 किताबें लिए चुके हैं वे, 6० से ज्यादा विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि दी है, तो वे भी रोमांचित हुए बिना शायद ही रहें। प्रो. राव के खाते में यश और कीर्ति इतना भर ही नहीं है। 79 साल के इस विलक्षण प्रतिभा के धनी को देश के कई प्रधानमंत्रियों का वैज्ञानिक सलाहकार बनने का सौभाग्य हासिल है। उनसे पहले तीन ही वैज्ञानिक ऐसे हैं, जिन्हें भारत रत्न मिला है। सबसे बड़ी बात तो यह कि वे देश के अकेले ऐसे वैज्ञानिक हैं जिनका एच-इंडेक्स 1०० है।
प्रो. राव का जन्म 3० जून 1934 को बेंगलुरू में हुआ। वे खुद बताते हैं कि उन्हें बचपन में घर में धार्मिक प्रेरणाएं काफी मिलीं। उनकी मां नागम्मा नागेसा राव काफी पूजा-पाठ करती थी और उन्हें देवी-देवताओं की कहानियां सुनाती थीं। राव अपनी मां से ज्यादा करीब थे इसलिए शुरुआत में उनका झुकाव आध्यात्म की ओर बढ़ने लगा। पर घर में एक विपरीत स्थिति भी थी। पिता हनुमंथ नागेसा राव को यह सब बहुत पसंद नहीं था। वे चाहते थे कि उनका बेटा खूब पढ़े-लिखे और अंग्रेजी में बात करे। नतीजतन प्रो. राव में बचपन में ही एक तरफ तो कुछ उच्च संस्कार आए, वहीं दूसरी तरफ पढ़ाई-लिखाई की तरफ भी वे गंभीरता से मुखातिब हुए। इन बातों का महत्व इसलिए भी है क्योंकि देश तब गुलामी के अंधेरे से निकलने के लिए निर्णायक संघर्ष कर रहा था।
प्रो. राव ने 1951 में मैसूर विश्वविद्यालय से बीएससी की। बाद में वे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय आ गए और यहां से उन्होंने एमएससी की पढ़ी पूरी की। उच्च शिक्षा के इस मुकाम तक आते-आते उनके ज्ञान और प्रतिभा का डंका हर तरफ बजने लगा था। एमआईटी, कोलंबिया और पड्र्यू यूनिवर्सिटी ने उन्ह्ें अपने यहां से पीएचडी करने का ऑफर भेजा, वह भी सौ फीसद छात्रवृत्ति की पेशकश के साथ। प्रो. राव ने पड्र्यू को चुना और वहां उन्होंने नौ महीने के रिकार्ड समय में पीएचडी का अपना शोध पूरा किया और वह भी विशेष सराहना टिप्पणी के साथ। इस समय तक आते-आते वे अपने करियर के उस निर्णायक दौर में पहुंच गए थे, जहां उन्हें यह तय करना था कि वे स्वदेश लौटें कि नहीं।
1959 में वे स्वदेश लौट आए कई स्वर्णिम प्रस्तावों को ठुकराकर। यहां उन्होंने बेंगलुरू में 5०० रुपए मासिक पर इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ साइंस से लेक्चरर के तौर पर नौकरी शुरू की। भारत लोटकर उन्होंने देश की वैज्ञानिक उन्नति को एक तरफ से अपने जीवन का एकमेव शपथ बना लिया। आज नैनो मैटेरियल, सॉलिè स्टेट और मैटेरियल कैमेस्ट्री के क्षेत्र में अपने अध्ययन और शोधों के कारण विज्ञान जगत में उनका खासा नाम-सम्मान है। फिलहाल वे जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च के मानद अध्यक्ष और इंटरनेशनल सेंटर फॉर मैटेरियल साइंस के निदेशक हैं। वे आईआईटी से भी जुड़े हैं।
एक वैक्षानिक के रूप में प्रो. राव का सफरनामा 2०11 में अचानक विवादों में घिर गया था, जब उन पर रिसर्च चौरी का आरोप लगा। तब उन्होंने विनम्रता से माफी भी मांग ली थी पर बाद में पता चला कि यह गलती उनके कनिष्ठ प्रोफेसर और एक छात्र की असावधानी के कारण हुई थी। बहरहाल देश को अपने इस रत्न पर गर्व है। सचिन तेंदुलकर के शब्दों में उन्होंने जो कुछ भी किया पर प्रो. राव साधना एकांतिक है। इस वैज्ञानिक साधक को पूरे देश की तरफ प्रणाम।

तहलकावादी तकनीक और मीडिया


तरुण तेजपाल जिस मामले में फंसे हैं, वह महिला अस्मिता से जुड़े कुछ जरूरी सामयिक सरोकारों की तरफ हमारा ध्यान तो ले ही जाता है, यह मीडिया के अंतजर्गत को भी लेकर एक जरूरी बहस छेड़ने का दबाव बनाता है। एक ऐसी बहस जिसमें खुद से मुठभेड़ करना का हौसला हो। मीडिया अगर खुद को देशकाल का आईना कहता है तो यह अपेक्षा तो उससे भी होनी चाहिए, वह इस आईने का इस्तेमाल खुद के लिए भी बराबर तौर पर करे। आईना अपनी तरफ हो या सामने की तरफ, सच को जैसे को तैसा देखने-दिखाने की उसकी फितरत नहीं बदलती। यह भी कि आईना कीमती हो या कम दामी, काम वह एक जैसा ही करता है। कृष्ण बिहारी नूर का एक शेर भी है-'चाहे सोने के फ्रेम में जड़ दो, आईना है कि झूठ बोलता ही नहीं।’
तरुण जिस तरह की पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं, उसमें तकनीक का बड़ा योगदान है। अब तक उन्होंने जो भी तहलका मचाया, वह तकनीकी मदद से ही संभव हुआ। लिहाजा, तकनीक के जोर पर चल रही पत्रकारिता के मानस को पढ़ने के लिए हमारे आगे कुछ बातें और स्थितियां साफ होनी चाहिए। दरअसल, सूचना के क्षेत्र में तकनीकी क्रांति के कारण मीडिया का अंतजर्गत वैसा ही नहीं रहा, जैसा इससे पूर्व था। यह फर्क इसलिए भी आया क्योंकि इसी दौर में बाजार ने प्रतिभा और विकास के साझे को अपनी ताकत बना लिया।
अस्सी-नब्बे के दशक में खोजी पत्रकारिता के दौर में जातीय और नक्सली हिंसा के साथ मुंबई जैसे शहरों में अंडरवर्ल्ड की रिपोर्टिंग के दौर के साझीदार और चश्मदीद अब भी कई लोग मीडिया क्षेत्र में विभिन्न भूमिकाओं में सक्रिय हैं। ये लोग बताते हैं कि सत्य और तथ्य की खोज के पीछे की पत्रकारीय ललक का पूरा व्याकरण ही तब बदल गया, जब इस काम के लिए नई तकनीकों का इस्तेमाल शुरू हुआ। ऐसा इसलिए क्योंकि तकनीक का अपना रोमांच होता है और कई बार यह रोमांच आपको अपने मकसद से डिगाता है। आज के दौर में तौ खैर तकनीक और सूचना को एक-दूसरे से अलगाया ही नहीं जा सकता है।
बात करें न्यू मीडिया या सोशल मीडिया की तो यह अलगाव वहां भी मुश्किल है। इस मुश्किल को इस तरह भी समझने की जरूरत है कि एक ऐसे दौर में जब अरब बसंत जैसी क्रांति की बात होती है तो उसके पीछे का इंधन और इंजन दोनों ही तकनीक के जोर पर चलने वाला न्यू मीडिया ही है। यानी तकनीकी क्रांति की दुनिया अपने चारों तरफ एक क्रांतिकारी दौर की रचना प्रक्रिया का सीधा हिस्सा है, उसकी जननी है।
ब्लॉग, फेसबुक, ट्विटर और खुफिया कैमरों ने सचाई को जितना नंगा किया है, उससे पत्रकारिता के साथ सामाजिक अध्ययन की तमाम थ्योरीज बदल गई हैं। सच में निश्चित रूप से अपना-पराया जैसा कुछ नहीं होता, पर इसके समानांतर एक सिद्धांत निजता का भी है। निजता के दायरे में व्यक्ति, परिवार और समाज का कौन सा हिस्सा आए और कौन सा नहीं, इसको लेकर कोई स्पष्ट लक्ष्मण रेखा नहीं खींची गई है। यह हमारे दौर की एक बड़ी चुनौती है। क्योंकि निजता का भंग होना व्यक्ति की कई तरह की जुगुप्साओं को जन्म देता है। फिर आप सिर्फ सत्य का साक्षात्कार भर नहीं करते, बल्कि गोपन के भंग होने का अमर्यादित खेल देखने की लालच से भर उठते हैं।
निजी और सार्वजनिक जीवन को एक ही कसौटी पर खरे उतारने का जोखिम एक दौर में गांधी से लेकर उनके कई साथियों ने उठाई। सत्य के इस प्रयोग ने जीवनादर्श को एक बड़ी ऊंचाई दी। पर यह समय और समाज का संस्कार नहीं बन सका। ऐसे में मानवीय दुर्बलताओं को स्वाभाविक मानकर चलने की समझ ही ज्यादा काम आई। इसे ही न्याय और विधान की व्यवस्थाओं में भी स्वीकारा गया। पर अब एक नई स्थिति है। 'द वर्ल्ड इज फ्लैट’ के रचयिता थॉमस फ्रिडमैन बताते हैं कि सूचना के उपकरण मनुष्य की स्वाभाविकता को बदलने वाले औजार तो हैं ही, ये बाजारवादी पराक्रम के बलिष्ठ माध्यम भी हैं। यह एक खतरनाक स्थिति है। खतरनाक इसलिए क्योंकि इस स्थिति के बाद स्वविवेक के लिए कुछ भी शेष नहीं रहा जाता। यों भी कह सकते हैं नए समय की पटकथा पहले से तय है, इसमें बस हमें यहां-वहां फिट भर हो जाना है, वह भी इतिहास और समाज के अपने अब तक को बोध को भूलकर।
तरुण तेजपाल तहलका की तरफ से गोवा में जो बौद्धिकीय विमर्श का आयोजन करा रहे थे, उसमें एक मुद्दा आधुनिक दौर में महिला अस्मिता की चुनौतियां भी था। दरअसल, आधुनिकता के खुले कपाटों में महिलाएं भी पुरुषों के साथ ही दाखिल हो रही हैं। लिहाज, लैंगिक स्तर पर उनके बीच मेलजोल के नए सरोकार विकसित हुए हैं। इसने एक तरफ स्त्री-पुरुष संबंधों की नई दुनिया रची है तो असुरक्षा का एक नया वातावरण भी पैदा हुआ है। निर्भया कांड को सामने रखकर समझना चाहें तो यह असुरक्षा बर्बरता की हद तक जाता है। नीति और विधान की नई व्याख्या और दलीलों के बीच इस बर्बरता का बढ़ता रकबा एक बड़ा खतरा है। डॉ. धर्मपाल के शब्दों में यह 'भारतीय चित्त, मानस और काल का नया यथार्थ’ है। ऐसा यथार्थ जिसका पर्दाफाश तेजपाल सरीखे लोग पारदर्शिता के नाम पर नीति और व्यवस्था से जुड़े बड़े जवाबदेह लोगों के जीवन के निजी एकांत तक पहुंच कर करते रहे हैं।
तकनीक के साथ एक विचित्र स्थिति यह भी है कि वह नैतिकता का कोई दबाव अपनी तरफ से नहीं बनाता है। ईमेल और सीसीटीवी फुटेज के जरिए जो सच अब तेजपाल को मुश्किल में डाल रहा है, उसमें तकनीक का अपना पक्ष तटस्थ है। यहां नैतिकताएं वही आड़े आ रही हैं, जो तेजपाल सरीखे नंगे सच के हिमायतियों ने खुद रचा है। जिन सवालों और तकाजों पर वे दूसरों को नंगा करते रहे हैं, वही सवाल और तकाजे अब उन्हें नहीं बख्श रहे।
यह स्थिति आंख खोलने वाली है। तकनीक के जोर पर बदलाव की संहिताएं रचने वाली पत्रकारिता भी एक ढोंग हो सकती है, इसका इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि आईना लेकर 'अंत:पुर’ तक दाखिल होने वाले खुद अपने अंत:पुर में शर्मनाक हरकतों के साथ पकड़े जा रहे हैं। गनीमत मानना चाहिए कि पर्दाफाश और सनसनी मार्का पत्रकारिता अब भी हिंदी या भारतीय पत्रकारिता का मूल स्वभाव नहीं है। खोजी दौर में सचाई को उसके मर्म के साथ सामने लाया गया था। दलित बस्तियों के कई मातमी विलापों को आज अगर हम एक विमर्शवादी अध्याय की तरह देख पा रहे हैं तो उसके पीछे इस तरह की पत्रकारिता का बहुत बड़ा हाथ है। पर सूचना को सनसनी और सत्य को महज तथ्य की तरह पेश करने की हवस ने न तो देश और समाज के आगे नीति और आचरण के कोई मानक रचे और न ही इससे पत्रकारिता धर्म का ही कोई कल्याण हुआ। यह एक मोहभंग की भी स्थिति है, जिसमें बदलाव का मुगालता पेश करने वाली कई कोशिशंे एक के बाद एक पिटती नजर आ रही हैं।
गुलामी के दौर में आजाद तेवर स्वतंत्र चेतना की लौ जगाने वाली पत्रकारिता के विरासत के बाद यह एक भटकाव की भी स्थिति है। आखिर में यही कि पत्रकारिता की तकनीक का परिष्कार तो जरूर हो पर तकनीक के परिष्कार को पत्रकारिता मान लेने के जोखिम को भी समझना चाहिए। क्योंकि इसमें तात्कालिक खलबली से आगे न तो कुछ पैदा किया जा सकता है, न ही हासिल। उलटे नौबत यहां तक आ सकती है कि खलबली के शिकार हम खुद हो जाएं। अरब बसंत के पत्ते भी अगर देखते-देखते झरने शुरू हो गए हैं तो इसी लिए कि इसमें बदलाव का यथार्थ तात्कालिक से आगे स्थायी नहीं बन सका।

nationalduniya.com

मंगलवार, 5 नवंबर 2013

भारत में नई सनसनी

सोफिया हयात देश में आई नई सनसनी है। टीवी रियलिटी शो 'बिग बॉस’ में उनकी वाइल्ड कार्ड के जरिए एंट्री हुई है। अब आगे यह देखने वाली बात होगी कि सोफिया की इस शो में मौजूदगी उसे भारत के आम लोगों के दिलों में कितनी जगह दे पाती है। उनको लेकर मसालेदार खबरों से लेकर उनकी बोल्ड तस्वीरों का एक पूरा जखीरा इंटरनेट पर मौजूद है। गूगल पर उनका नाम भर आप टाइप करें तो महज कुछ पलों में एक करोड़ से ज्यादा वेब एंट्री की सूची आपके सामने आ जाएगी।
भारत में जो लोग मनोरंजन की अंतरराष्ट्रीय दुनिया के बारे में दिलचस्पी रखते हैं उनके लिए सोफिया हयात को लेकर दिलचस्पी तब एकाएक बढ़ गई थी जब पिछले साल आमिर खान के टीवी शो 'सत्यमेव जयते’में लड़कियों के यौन उत्पीड़न पर केंद्रित एक एपीसोड आया। सोफिया ने बताया कि 'सत्यमेव जयते’ के इस एपिसोड को लंदन में उसने भी देखा और देखकर खूब रोई। मीडिया में इस पर अपनी प्रतिक्रिया में उसने यहां तक कबूला कि उसका भी दस साल की उम्र में यौन उत्पीड़न हो चुका है और तब जब उसने इस बारे में अपने घर में इसकी शिकायत की तो लोगों ने उसे ही गलत माना। सोफिया की ये बातें मीडिया में खूब चर्चा में रहीं। कुछ लोगों ने इस एक आधुनिक नारी का बोल्ड बयान माना तो कुछ ने इसे आधी दुनिया के उस अंधेरे से जोड़ा, जो साल और सदी के बदलने के बावजूद पहले की तरह कायम है।
सोफिया का जन्म छह दिसंबर 1984 को हुआ। वह पाक मूल की ब्रिटिश सिंगर, एक्ट्रेस और मॉडल है। भारत के लोगों ने उन्हें पहली बार तब जाना जब उसने जीटीवी पर अपने एक टीवी शो को लेेकर आई। यह शो वर्ष 2००० से अगले तीन साल तक चला। बाद में यूटीवी बिंदास पर उसका एक बोल्ड रियलिटी शोे आया-'सुपर ड्यूड’। इस शो से वह भारत में युवाओं के बीच एक हॉट सेंसेशन बन गई। पर अभी भी आम भारतीयों में सोफिया की पहचान बननी बाकी थी। यही वजह है कि उसने 'बिग बॉस’ की प्रतिभागी बनना स्वीकार किया।
सोफिया की जिंदगी में महज चमकदार और मसालेदार बातें भर नहीं हैं। उसने 16 साल की उम्र से काम करना शुरू किया और परफार्मिंग आर्ट की तकरीबन विधाओं में हाथ आजमाया। बीबीसी से लेकर फर टीवी तक और अंग्रेजी से लेकर बॉलीवुडिया फिल्मों तक सब जगह उसने हाथ आजमाए। वह इसी साल अभय देओल के साथ 'बॉलीवुड कारमैन’ फिल्म में नजर आई। पर अभिनय की दुनिया में उसकी मुकम्मल पहचान बननी अभी बाकी है। वैसे मॉडलिंग की दुनिया में उसका नाम खासा जाना-पहचाना है।
अभिनय और मॉडलिंग केे अलावा उसने गायन के क्षेत्र में भी कदम रखा। 2००6 में उसने एक बैंड के लिए गाना गाया, जो उस साल इंटरनेशनल म्यूजिक चार्ट पर छठे पायदान पर थी। इसके अलावा भी उसके कई म्यूजिक एलबम रिलीज हो चुकेे हैं। सोफिया के हुनर का विस्तार यहीं तक नहीं है। उसने एक किताब भी लिखी है-'डिजआनर्ड’, जो अब तक तीन भाषाओं में छप चुकी है।
सोफिया की हुनरमंदी केे कायल लोग भी यह मानते हैं कि सोफिया कई क्षेत्रों में एक साथ दस्तक देने के बजाय अगर कुछ चुनींदा फील्ड को लेकर फोकस्ड रहती तो उसकेे कैरियर का ग्राफ अब तक हिचकोला खाते नहीं रहता बल्कि अब तक किसी ऊंचे मुकाम को हासिल कर चुका होता। फिर उसकी बिंदास बाला की छवि ने भी उसकी शख्सियत को गंभीर नहीं रहने दिया। देखना होगा कि 'बिग बॉस’ में आने के बाद से उसकी पहचान कितनी बदलती और मजबूत होती है।

शनिवार, 26 अक्टूबर 2013

महानायक और लोकनायक के बीच

भारत के लिए आज चुनौती क्या है? इस सवाल का जवाब ही यह साफ करेगा कि हम देश और समाज को लेकर किस तरह की चेतना से भरे हैं। वह चेतना जो पूरी तरह बाजार प्रायोजित है या फिर ऐसी चेतना जो विचार और समाज को एक सीध में देखने की चुनौती सामने रखती है। अभी-अभी ग्यारह अक्टूबर बीता है। इस दिन कई महानायक एक साथ चर्चा में रहे। सबसे ज्यादा चर्चा में रहे मिलेनियम स्टार का रुतबा हासिल कर चुके अमिताभ बच्चन। बिग बी का यह जन्मदिन है। क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर चर्चा में इसलिए रहे क्योंकि उन्होंने ट्वेंटी-2० और एकदिनी क्रिकेट के बाद टेस्ट क्रिकेट से भी अपनी विदाई की तारीख की घोषणा कर दी। इन दोनों नामों के साथ दो नाम या तो छूट गए या फिर इनकी चर्चा लोगों ने जरूरी ही नहीं समझी। इस चूक या नासमझी में मीडिया और न्यू मीडिया भी शामिल रहा, जिसे पिछले दो-तीन सालों से यह मुगालता रहा है कि वह देश में लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के लिए अपनी पहल को एक्टिविज्म की हद तक ले जाने का जोखिम मोल ले रहा है। छूट गए ये दो नाम हैं जयप्रकाश नारायण और नानाजी देशमुख। ग्यारह अक्टूबर को इनकी भी जयंती थी। जेपी को जनता ने ही कभी लोकनायक कहा था तो नानाजी आधुनिक राजनीति में संत छवि को जीने और निभाने वाले रहे। 
21वीं सदी के दूसरे दशक के आगाज के साथ भारतीय लोकतंत्र को सशक्त करने वाले कुछ शुभ संकेत प्रकट हुए। सड़कों पर तिरंगा लेकर देश के नवनिर्माण के लिए उतरने वाले नौजवानों की ललक में भले बहुत गंभीरता न हो और पर इस ललक की प्रासंगिकता और ईमानदारी पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है। इस ललक के आलोक में ही देश में छह दशक बाद यह स्थिति आई कि हम देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और उसकी बुनियादी अवधारणा के साथ बहसीय मुठभेड़ कर सकें। इस मुठभेड़ ने ही यह साफ किया कि जो व्यवस्था राजनीतिक पथभ्रष्टता और भ्रष्टाचार की महामारी फैलाने की मशीनरी बन गई है, उसके कायम रहते राष्ट्रीय विकास और नवनिर्माण जैसे किसी लक्ष्य तक पहुंचने का संकल्प कैसे पूरा हो सकता है। 
जिस नई पीढ़ी की वैचारिक-सामाजिक संलग्नता को लेकर हम तरह-तरह के आग्रह-पूर्वाग्रह पाले बैठे हैं, उस फेसबुकिया पीढ़ी ने आगे आकर यह साफ किया कि सेक्स, सक्सेस और सेंसेक्स से आगे उसकी उड़ान देश और समाज के रचनात्मक उन्नयन से भी जुड़ी है। देश की युवाशक्ति की यह नई शिनाख्त राष्ट्रनिर्माण में उनकी प्रासंगिक भूमिका की नई पटकथा की तरह है, जिसमें अभी कई घटनाक्रम जुड़ने बाकी हैं। यहां तक की कहानी का क्लाइमेक्स तक आना अभी बाकी है। 
 अरब में बसंत का आना भले एक सुखद उत्तरआधुनिक परिघटना हो पर भारत में बसंत की कल्पना समाज और संस्कृति के बीच एक परंपरागत अनुशीलन है। पुराने पत्तों का झरना और नए पत्तों को आना हमारे लिए जीवन की नित-नूतन कल्पना की तरह है। इसमें निर्माण और विसर्जन का अलगाव नहीं है बल्कि यह एक सहअस्तित्ववादी जीवनदृष्टि है। अच्छी बात यह है कि सीख के ये पुराने सुलेख आज भी नष्ट नहीं हुए हैं, बचे हुए हैं। कसूर हमारा है कि बाजार का इश्तेहार तो हमारी जुबान पर चढ़ जाते हैं पर तारीख के कुछ जरूरी हर्फ पढ़ने की फुर्सत हमें नहीं। अभी टीवी पर एक विज्ञापन खूब चल रहा है जिसमें नेता और राजनीति में बदलाव के लिए माहौल को बदलने की बात जोर-शोर से की जाती है। विज्ञापन का संदेश है कि पुराने माहौल और पुरानी राहों ने अगर हमें निराश किया है तो निश्चित रूप से नए परिवेश और नए पथ की बात होनी चाहिए। यहां तक तो विज्ञापन की सैद्धांतिक टेक समझ में आती है पर क्षोभ तब यह होता है जब पता चलता है यह सब दिखाया-समझाया इसलिए जा रहा है क्योंकि एक महंगा प्लाई कवर बेचना है। जिस दौर में डेमोक्रेसी भी एड मैनेजमेंट का एक जरूरी सब्जेक्ट है, उस दौर के लिए इतनी बात तो जरूर कही जा सकती है लोकतंत्र की बेहतरी के लिए एक जरूरी रचनात्मक हस्तक्षेप की भूमिका बन चुकी है। अब तो बस इसके आगे के अध्याय लिखे जाने हैं। 
जेपी बिहार आंदोलन के दिनों में अकसर कहा करते थे कि जनता को 'कैप्चर ऑफ पावर’ के लिए नहीं बल्कि 'कंट्रोल ऑफ पावर’ के लिए संघर्ष करना चाहिए। यही बात आज प्रकारांतर से अण्णा हजारे कह रहे हैं। यही नहीं राजनीति की जगह लोकनीति और सत्ता के विकेंद्रीकरण की बात अब फिर से होने लगी है। असंतोष की बात यह है कि लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के इन जरूरी मुद्दों को गिनाने वाले मुंह और खुले मंच तो आज कई हैं पर आमतौर पर इनका सरलीकृत भाष्य ही परोसा जाता है। 
यह सरलीकरण खतरनाक इसलिए है क्योंकि इसमें एक्टिविज्म और मार्केट फोर्सेज की सरपरस्ती को एक साथ स्वीकार है। यह मलेरिया के मच्छर और उसके टीके को एक साथ लेकर चलने जैसी स्थिति है। यह एक छल है। यह छल ही है जो एक तरफ तो अमिताभ और सचिन के स्टारडम को पाए की तरह खड़ा करता है, वहीं दूसरी तरफ लोकनायक जैसी शख्सियत को भूलने की चालाक दरकार को भी अमल में लाता है। बदलाव न तो बिकाऊ हो सकता है और न चलताऊ। इसे एक चैरिटी की तरह भी आप नहीं चला सकते हैं। बदलाव एक कसौटी है जो विचार, उसकी दरकार और आचरण को एक कलेक्टिव एक्शन की शक्ल देता है। आज अगर कुछ मिसिंग है तो यही कलेक्टिव एक्शन। 
जेपी की लोकनीति और उसके लिए बनी लोक समिति ने कार्यकारी रूप में अपना प्रभाव भले न छोड़ा हो पर उनका यह सबक तो आज भी प्रासंगिक है कि ग्रामसभा से लोकसभा तक का लोकतांत्रिक पिरामिड देश में उलटा खड़ा है। इसमें सत्ता का केंद्र और इसकी नियामक ताकतें प्रातिनिधिक लोकतंत्र के नाम पर दिल्ली, मुंबई या लखनऊ, पटना जैसी राजधानियों में हैं। 
ग्राम पंचायतों का सशक्तिकरण देश में लोकतंत्र के प्रातिनिधिकता के ढ़ांचे को प्रत्यक्ष सहभागिता के ढ़ांचे में बदल सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि विधानसभा या लोकतसभा की तरह ग्रामसभा कभी विघटित नहीं होती। इसका अस्तित्व हमेशा कायम रहता है और संबंधित क्षेत्र के अठारह साल से ऊपर के सभी नागरिक इसके आजीवन सदस्य हैं। नीति और विधि की दरकारों को सरकारें अगर इस विकेंद्रित लोकतांत्रिक इकाई के सहभाग से तय करें तो इसमें पूरे देश का लोकतांत्रिक सहभाग होगा और यह नीतियों और कानूनों के अमल का स्पष्टधरातल तैयार करेगा। जेपी ने बिहर आंदोलन के दौरान ये बातें चीख-चीखकर कहीं। आज अण्णा हजारे और उनके साथ या अलग हुई जमातें चुनाव सुधार और लोकतांत्रिक सुधार का जो एजेंडा देश के सामने रख रहे हैं, उसमें भी ये बातें शामिल हैं। पर न तो देश का मीडिया और न ही देश में पिछले दो-तीन दशकों में तैयार हुई एक्टिविस्टों की जमात इन बातों को जनता के बीच खुलकर सामने ला पा रही हैं, उन्हें समझा पा रही हैं। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि हम अपने आइकनों को गढ़ने और उन्हें मान्यता देने में फौरी और बाजारवादी तकाजों की गिरफ्त में होते हैं। जबकि एक देश के जीवन में परंपरा और इतिहास के भी कुछ सबक जरूरी हैं। जेपी ऐसे ही एक सबक का नाम है, जिनको भूलने का मतलब लोकतांत्रिक सुधार की प्रक्रिया को एक तदर्थ नियति की तरफ ले जाएगा। क्या राहुल गांधी या नरेंद्र मोदी जैसे नायक इस तदर्थवाद के खतरे को समझेंगे? 


सोमवार, 9 सितंबर 2013

ऐसे तो बनने से रहा वेलफेयर स्टेट


क्या देश वेलफेयर स्टेट बनने की तरफ लौट रहा है? दरअसल, यह सवाल या बहस का मुद्दा नहीं है बल्कि यह तो उस गफलत का नाम है जो बड़े तार्किक तरीके से लोगों के मन में उतारी जा रही है। सूचना, शिक्षा और रोजगार के अधिकार (मनरेगा) के बाद खाद्यान्न सुरक्षा को लेकर अपनी प्रतिबद्धता दिखाकर मनमोहन सरकार ने इस गफलत या मुगालते को बतौर सियासी हथियार और चोखा कर लिया है। वैसे देश में जो आर्थिक सूरत है, उसमें इस मेगा योजना के कारण कहीं पूरी इकोनमी ही धराशायी न हो जाए, यह खतरा भी कई अर्थ पंडितों को दिख रहा है। बहरहाल, राजनीति और सरोकारों की भावुक समझ रखने वालों को तो यह लग ही सकता है कि एक सरकार अगर स्कूल में गरीब बच्चों के खाने से लेकर उसके परिवार के लिए काम और रोटी तक की फिक्र कर रही है तो इस व्यवस्था को कल्याणकारी क्यों न कहा जाए। इस भावुक दरकार पर खरा उतरने से पहले जरूरी है यह समझ लेना कि सामथ्र्य देने या बांटने में नहीं बल्कि शक्ति, अधिकार और उद्यम का विकेंद्रित ढांचा खड़ा करने में है।
बदकिस्मती से ये मुद्दा अलग-अलग संदर्भों में आजादी के समय भी खड़ा हुआ, फिर जयप्रकाश आंदोलन के दौरान और हाल में सिविल सोसाइटी द्बारा। पर तीनों ही मौकों पर सरकार और उसकी केंद्रित शक्ति को थामने की सियासी लालसा रखने वाली जमात ने इसकी अनदेखी की। दरअसल, इस दरकार पर खरा उतरने का मतलब है जनता पर राज करने और फिर उस पर कृपा बरसाने की राजसी शैली का खारिज होना।
इस संबंध में एक प्रसंग की चर्चा जरूरी है। गांधी ने जो राष्ट्र निर्माण की कल्पना की थी, उसे उनके आलोचक अव्यावहारिक और थोथा आदर्शवाद बताते रहे हैं। आर्थिक समझ को लेकर तो गांधी को आमतौर पर गंभीरता से लिया ही नहीं जाता। पर वस्तुत: ऐसा है नहीं। दरअसल, राष्ट्रपिता को लेकर ऐसा मानस बनाने वालों में वे तमाम लोग शामिल हैं, जिन्हें सत्ता के गलियारे में अपनी आवाजाही बनाए रखना सबसे जरूरी जान पड़ता है। सत्ता की ताकत से न तो लोकतंत्र की ताकत बढ़ती है और न ही इससे कोई कल्याणकारी मकसद हासिल किया जा सकता है। गांधी ने इसीलिए आजादी मिलते ही कांग्रेस के विसर्जन की भी बात कही थी। उनके अनन्य और प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जेसी कुमारप्पा की एक किताब है-'द इकोनमी ऑफ परमानेंस’। दुनियाभर के आर्थिक विद्बानों के बीच इस किताब को बाइबिल सरीखा दर्जा हासिल है। आज अमत्र्य सेन और ज्यां द्रेज सरीखे अर्थशास्त्री जिस कल्याणकारी विकास की दरकार को सामने रखते हैं, उसके पीछे का तर्क कुमारप्पा की आर्थिक अवधारणा की देन है। कुमारप्पा इस किताब में साफ करते हैं कि विकेंद्रित स्तर पर 'संभव स्वाबलंबन’ को मूर्त ढांचे में तब्दील किए बिना देश की आर्थिक सशक्तता की मंजिल हासिल नहीं की जा सकती है। पर निजी क्षेत्र की केंद्रित पूंजी की अठखेली के लिए 'सेज’ बिछाने वाली सरकारों को इन सरोकारों से कहां मतलब कि जनता तक मदद के हाथ पहुंचने से ज्यादा जरूरी है, वह भरोसा और हक, जिसमें वह अपने बूते अपनी जिम्मेदारियों का वहन कर सके।
समावेशी विकास का जो नया जुमला देश में उछला है, उसके पीछे वजह यही रही है कि वर्टिकल ग्रोथ के दौर में विकास की चादर इतनी सिकुड़ती चली गई कि देश की बड़ी आबादी का हिस्सा उससे बाहर ही रह गया। आंकड़ों में किसानों की आत्महत्या और गरीबी की जो भयावह तस्वीर उभरी है, वह विकास की उदारवादी व्यवस्था पर सामने से उंगली उठाती है। नागरिक अस्मिता को महज एक उपभोक्ता की हैसियत में बदल देने वाले मनमोहनों से पूछना चाहिए कि आजादी के आसपास जब डॉलर और रुपए की हैसियत तकरीबन बराबर थी, फिर अर्थ के कल्याणकारी मार्ग को छोड़कर महज आवारा निजी पूंजी के लिए उदार राह क्यों चुनी गई? क्या यह एक बड़ी आबादी वाले देश की श्रमशक्ति और पुरुषार्थ के प्रति अविश्वास नहीं है कि उनके बूते विकास की तस्वीर मुकम्मल नहीं हो सकती।
ऐतिहासिक रूप से देखें तो आजादी के बाद सरकार की जो नीतिगत समझ थी उसमें विकास को सार्वजनिक उपक्रमों के जरिए वह आगे बढ़ा रही थी, उस दौरान भी कल्याणकारी अर्थव्यवस्था और राज व्यवस्था की बात होती थी। दस साल पहले तक सरकारी पाठ्यपुस्तकों में इस बारे में सैद्धांतिक समझ विकसित करने के लिए बच्चों के लिए अलग से पाठ तय थे। पर बाजार का दौर आते-आते देश की पूरी व्यवस्था ने जो बड़ी करवट ली, उसमें पुरानी लीक नई सीख के आगे छोटी पड़ गई। नई दरकारों ने नए सरोकारों की जमीन तैयार कर दी। शुरुआत यहां से हुई कि जनकल्याणकारी होने के नाम पर सरकार अपने कंधे पर अतिरिक्त बोझ न उठाए। तालीम की सरकारी व्यवस्था से लेकर सार्वजनिक उपक्रमों की उपेक्षा ने देश में निजी क्षेत्र की ताकत को रातोंरात खासा बढ़ा दिया।
अब तो आलम यह है कि बिजली-पानी-सड़क मुहैया कराने तक में सरकार ने अपने हाथ समेटने शुरू कर दिए हैं। बात इतने पर ही थमती तो भी गनीमत थी। सरकार ने तो बजाप्ते निजी समूहों के लिए जमीन अधिग्रहण से लेकर तमाम वित्तीय सहूलियतें देने की जवाबदेही अपने कंधों पर उठा रखी है।
गरीबों की फिक्रमंदी में तारीख रचने का दंभ भरने वाली यूपीए सरकार से कोई पूछे कि जिस एजेंडे को वह जनहित में लागू करने में जुटी है क्या वह जनता के स्तर पर या उसकी मांग पर तय हुए हैं। जनता अपना सरोकार जिन मुद्दों पर दिखा ही नहीं रही है सरकार उस पर आगे क्यों बढ़ रही है? फिर इसे कोई महज वोट पॉलिटिक्स कहे तो इसमें गलत क्या है? सस्ता राशन या मुफ्त भोजन का लालच एक वोटर को महज वोटर कहां रहने देता है। कम से कम पिछले चार सालों में देश को जिन मुद्दों ने सबसे ज्यादा झकझोरा है, उनमें भ्रष्टाचार, महंगाई और महिला असुरक्षा का मुद्दा सबसे ऊपर रहा। इन मुद्दों को लेकर जनता एकाधिक बार सड़कों पर उतरी और वह भी बिना किसी सियासी छतरी में खड़े हुए बिना। उनके हाथों में कुछ था तो बस कुछ मांगें और मार्मिक आह्वान की तख्तियां या फिर तिरंगा। पर इनमें से किसी मुद्दे से मुठभेड़ को सरकार तैयार नहीं है। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लोकपाल संस्था को खड़ा करने की उसकी कवायद का तो हश्र यही है कि सरकार अपने अब तक के कार्यकाल में खुद कई बड़े भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरती रही है। आलम यह है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने दागी चरित्र के लोगों की सांसदी-विधायकी जाने की बात कही और उनके चुनाव लड़ने तक पर सवाल उठा दिए तो सरकार तो क्या पूरी पॉलिटिकल क्लास उसके तोड़ को लेकर सहमत हो गई। नैतिकता के इतने मजबूत जोड़ के साथ वेलफेयर तो दूर, कुछ भी फेयर रहना मुश्किल है।

सोमवार, 2 सितंबर 2013

ओम पुरी का अर्ध सत्य

चेहरा खुरदरा। पर आवाज इतनी वजनदार कि कहीं भी एक जोशीली मौजूदगी के एहसास से भर दे। सार्थक सिनेमा का मनोरंजक प्रहसन में बदलना और ओमपुरी की जिंदगी एक-दूसरे के लिए आईने की तरह रहे। कभी चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी कराने से इनकार कर फिल्मी दुनिया में काम करने के अलिखित करारनामे को चुनौती देने वाले इस अभिनेता की गृहस्थी आज कई चुनौतियों से घिर गई है। उनकी बोलते-बोलते बहकने की आदत से तो देश की संसद तक परिचित है पर वे घर में इससे भी ज्यादा विचलन के शिकार हैं, यह आरोप उन पर उनकी पत्नी नंदिता का है। 
अपनी शिकायत में नंदिता ने पति पर हिंसक होने और आर्थिक रूप से परेशान करने का आरोप लगाती हैं। ओमपुरी की सफाई इस पर नकार से भरी है। वे उलटे कहते हैं कि नंदिता एग्रेसिव नेचर की है और मेरे अस्वस्थ होने के बावजूद वह पैसे लुटाने और विदेशों में छुट्टियां बिताने के शौक को हर हाल में पूरी करती रही है। ऐसे मामलों में सत्य इधर या उधर की जगह कहीं बीच में टिका होता है। यानी हर पक्ष का सत्य आधा-अधूरा होता है। इसलिए किसी तुरत-फुरत नतीजे पर पहुंचना खतरे से खाली नहीं। हां, इतना जरूर है कि पर्दे पर संवेदना की इंच-इंच जमीन सींच देने वाले इस बड़े कलाकार की यह गत देखकर अफसोस तो होता ही है। 
अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब ओम पुरी अंबाला में अपने नए बनाए घर को कुछ पत्रकार मित्रों को दिखाकर खुश हो रहे थे। वे थोड़ी भावुकता से बता रहे थे, 'रिटायरमेंट तो अपनी माटी-पानी के साथ ही बीतना चाहिए।...बहुत हो गया मुंबई-मुंबई और अब नहीं।’ पर लगता है कि जीवन की थकान को जिस ठहराव की ओर वे ले जाना चाहते हैं, वह संयोग उनकी कुंडली में ही नहीं है। नहीं तो एक के बाद एक ऐसी खबरें या घटनाएं सामने नहीं आतीं जो इस कलाकार के कद से पूरी तरह बेमेल हों।
1946 में अंबाला में एक साधारण से परिवार में जन्मे ओम पुरी सिनेमा की दुनिया में थिएटर के रास्ते दाखिल हुए। नसीरुद्दीन शाह और वे एक ही खेप के कलाकार हैं। तीस साल की उम्र में उन्होंने अपनी पहली फिल्म की 'घासीराम कोतवाल’। मेहनाताना मिला मूंगफली का एक डोंगा। तब सार्थक फिल्मों का दौर था और इनका बजट इतना कम होता था कि बस जैसे-तैसे फिल्म पूरी हो पाती थी। निर्माता, निर्देशक या कलाकार के हिस्से कुछ आता था सम्मान और चर्चा जो उनकी फिल्म और उसमें उनके प्रदर्शन को लेकर होती थी। इस दौर की सुनहली इबारतों को लिखने वालों में ओम पुरी का नाम काफी ऊपर है। पर इस कलात्मक संतोष ने ही उस असंतोष को जन्म दिया, जिसका निदान ढूंढने वे व्यावसायिक फिल्मों की तरफ निकल पड़े। 
पैसा और सुविधा के बिना नई 'उदार दुनिया’ आपके जीने के लिए कितने मुश्किलात खड़ी करती है, ओम पुरी का फिल्मी सफरनामा इसे बयां करता है। अलबत्ता फिल्मी ग्लैमर और स्टार इमेज की चौंध के बीच भी कहीं कुछ सार्थक बचाया जा सकता है, यह मुमकिन भी इसी सफरनामे का हिस्सा है। विडंबना इस बात को लेकर ज्यादा है कि सादगी, समन्वय और सिनेमा के कठिन त्रियक को समान भाव से नापने वाले इस अप्रतीम कलाकार के निजी जीवन में यही समन्वय नहीं बन पाया। 
प्रेम और परिवार के साझे को पूरा करने वाले भरोसे पर संभव है कि ओम पुरी अपनी पत्नी से ज्यादा खरे नहीं उतरे हों, पर इसका क्या कि इससे एक बड़ी कलात्मक संभावना और उसकी यात्रा असमय ही 'सद्गति’ को प्राप्त कर जाए। अगर ऐसी ही कुछ सूरत ओम पुरी की जिंदगी की है तो उस पर अफसोस तो किसी भी कलाप्रिय और संवेदनशील आदमी को होगा।