सोमवार, 22 अगस्त 2011

हांडी में अनशन और देह दर्शन

 कृष्ण जन्माष्टमी का हर्षोल्लास इस बार भी बीते बरसों की तरह ही दिखा। मंदिरों-पांडालों में कृष्ण जन्मोत्सव की भव्य तैयारियां और दही-हांडी फोड़ने को लेकर होने वाले आयोजनों की गिनती और बढ़ गई। मीडिया में भी जन्माष्टमी का क्रेज लगता बढ़ता जा रहा है। पर्व और परंपरा के मेल को निभाने या मनाने से ज्यादा उसे देखने-दिखाने की होड़ हर जगह दिखी। जब होड़ तगड़ी हो तो उसमें शामिल होने वालों की ललक कैसे छलकती है, वह इस बार खास तौर पर दिखा। दिलचस्प है कि कृष्ण मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं बल्कि लीला पुरुषोत्तम हैं, उनकी यह लोक छवि अब तक कवियों-कलाकारों को उनके आख्यान गढ़ने में मदद करती रही है। अब यही छूट बाजार उठा रहा है।      
हमारे लोकपर्व अब हमारे कितने रहे, उस पर हमारी परंपराओं का रंग कितना चढ़ा या बचा हुआ है और इन सब के साथ उसके संपूर्ण आयोजन का लोक तर्क किस तरह बदल रहा है, ये सवाल चरम भोग के दौर में भले बड़े न जान पड़ें पर हैं ये बहुत जरूरी। मेरे एक सोशल एक्टिविस्ट साथी अंशु ने ईमेल के जरिए सूचना दी कि उन्हें  कृष्णाष्टमी पर नए तरह की ई-ग्रीटिंग मिली। उन्हें किसी रिती देसाई का मेल मिला। मेल में जन्माष्टमी की शुभकामनाएं हैं और साथ में है उसकी एस्कार्ट कंपनी का विज्ञापन, जिसमें एक खास रकम के बदले दिल्ली, मुंबई और गुजरात में कार्लगर्ल की मनमाफिक सेवाएं मुहैया कराने का वादा किया गया है। मेल के साथ मोबाइल नंबर भी है वेब एड्रेस भी। मित्र को जितना मेल ने हैरान नहीं किया उससे ज्यादा देहधंधा के इस हाईटेक खेल के तरीके ने परेशान किया।
लगे हाथ जन्माष्टमी पर इस साल दिखी एक और छटा का जिक्र। एक तरफ जहां गोविंदाओं की टोलियों ने अन्ना मार्का टोपी पहनकर भ्रष्टाचार की हांडी फोड़ी। अन्ना का अनशन दिल्ली के रामलीला मैदान में जनक्रांति का जो त्योहारी-मेला संस्करण दिखा वह मुंबई तक पहुंचते-पहुंचते प्रोटेस्ट का फैशनेबल ब्रांड बन गया। यही नहीं बार बालाओं से एलानिया मुक्ति पा चुकी मायानगरी मुंबई से पिछले साल की तरह इस बार भी खबर आई कि चौक-चारौहों पर होने वाले दही-हांडी उत्सव अब पब्स और क्लब्स तक पहुंच चुके हैं। देह का भक्ति दर्शन एक पारंपरिक उत्सव को जिस तरह अपने रंग में रंगता जा रहा है, वह हाल के सालों में गरबा के बाद यह दूसरा बड़ा मामला है, जब किसी लोकोत्सव पर बाजार ने मनचाहे तरीके से डोरे डाले हैं। ऐसा भला हो भी क्यों नहीं क्योंकि आज भक्ति का बाजार सबसे बड़ा है और इसी के साथ डैने फैला रहा है भक्तिमय मस्ती का सुरूर। मामला मस्ती का हो और देह प्रसंग न खुले ऐसा तो संभव ही नहीं है।   
बात कृष्णाष्टमी की चली है तो यह जान लेना जरूरी है कि देश में अब तक कई शोध हो चुके हैं जो कृष्ण के साथ राधा और गोपियों की संगति की पड़ताल करते हैं। महाभारत में न तो गोपियां हैं और न राधा। इन दोनों का प्रादुर्भाव भक्तिकाल के बाद रीतिकाल में हुआ। रवींद्र जैन की मशहूर पंक्तियां हैं- 'सुना है न कोई थी राधिका/ कृष्ण की कल्पना राधिका बन गई/ ऐसी प्रीत निभाई इन प्रेमी दिलों ने/ प्रेमियों के लिए भूमिका बन गई।' दरअसल राम और कृष्ण लोक आस्था के सबसे बड़े आलंबन हैं। पर राम के साथ माधुर्य और प्रेम की बजाय आदर्श और मर्यादा का साहचर्य ज्यादा स्वाभाविक दिखता है। इसके लिए गुंजाइश कृष्ण में ज्यादा है। वे हैं भी लीलाधारी, जितना लीक पर उतना ही लीक से उतरे हुए भी। सो कवियों-कलाकारों ने उनके व्यक्तित्व के इस लोच का भरसक फायदा उठाया। लोक इच्छा भी कहीं न कहीं ऐसी ही थी।
नतीजतन किस्से-कहानियों और ललित पदों के साथ तस्वीरों की ऐसी अनंत परंपरा शुरू हुई, जिसमें राधा-कृष्ण के साथ के न जाने कितने सम्मोहक रूप रच डाले गए। आज जबकि प्रेम की चर्चा बगैर देह प्रसंग के पूरी ही नहीं होती तो यह कैसे संभव है कि प्रेम के सबसे बड़े लोकनायक का जन्मोत्सव 'बोल्ड' न हो। इसलिए भाई अंशु की चिंता हो या मीडिया में जन्माष्टमी के बोल्ड होते चलन पर दिखावे का शोर-शराबा। इतना तो समझ ही लेना होगा  कि भक्ति अगर सनसनाए नहीं और प्रेम मस्ती न दे, तो सेक्स और सेंसेक्स के दौर में इनका टिक पाना नामुमकिन है।

बुधवार, 17 अगस्त 2011

तुमसे अच्छा कौन है!

एक लकीर जब बहुत लंबी खिंच जाती है तो बाद के लकीरों के लिए इम्तहान बढ़ जाता है। क्योंकि तब उसे न सिर्फ एक सीध में लंबा चलना होता है बल्कि सबसे आगे निकलने का दबाव भी रहता है उसके ऊपर। पृथ्वीराज कपूर के बाद उनके खानदान के हर बारिस के आगे तकरीबन ऐसी ही चुनौती रही खुद को साबित करने की, सबसे आगे दिखने की। पर दिलचस्प है कि राज से लेकर करीना और रणबीर पूर तक ने लकीर के फकीर होने की बजाय अपनी मुख्तलिफ खासियतों को संवारना ज्यादा मुनासिब समझा।
शम्मी कपूर ने जब कैमरे के आगे आने का पेशेवर फैसला लिया तो उन्हें अपनी जमीन नए सिरे से तैयार करनी पड़ी। एक तरफ उनके पिता पृथ्वीराज कपूर का फिल्म और थियेटर की दुनिया में बड़ा नाम और सम्मान था, तो दूसरी तरफ भाई शोमैन राज कपूर की लोकप्रिय छवि। लिहाजा नया कुछ करने और दिखने का दबाव तो था ही पर जोखिम भी था कि लोग उन्हें मंजूर करेंगे कि नहीं। आज यह बात तारीखी सियाही से लिखी जा चुकी है कि न सिर्फ शम्मी ने अपनी विशिष्ट नृत्य और  अभिनय शैली से अपनी अलग पहचान कायम की बल्कि 50-60 के दशक के हिंदी सिनेमा को काफी हद तक अपनी रंग में सराबोर भी रखा।
शम्मी अब हमारे बीच नहीं हैं तो उनके साथ काम करने वाले अभिनेता-अभिनेत्रियों से लेकर पूरा फिल्म उद्योग और उनके लाखों चाहने वाले अपने इस मस्तमौला अभिनेता को अपनी-अपनी तरह से याद कर रहे हैं। पिछले कुछ सालों में हिंदी सिनेमा का फलक एक तरफ जहां व्यापारिक रूप में ग्लोबल हुआ है, वहीं मुख्यधारा की फिल्मों से अलग प्रयोग और विकल्प की भी गुंजाइश भी बढ़ी है। यह गुंजाइश कला फिल्मों के यशस्वी प्रयोगकाल से नितांत भिन्न है। इसमें फिल्म माध्यम की क्षमता का विशुद्ध कलावादी या सार्थकता के आग्रह के साथ इस्तेमाल नहीं बल्कि कहानी कहने की नई शैलियों और नई कहानी  को परदे पर लाने की ललक ज्यादा है। दिलचस्प है हिंदी सिनेमा के इस बदलाव को देखना। तकरीबन 50 साल पहले जब शम्मी कपूर का जादू सिर चढ़कर बोलता था तो आलोचकों ने उनकी 'याहू' छवि को रिबेल स्टार की शिनाख्त दी। प्रेम की तरुणाई और तरुणाई के प्रेम को भारतीय समाज और परंपरा की बंद कोठरियों से खुली हवा में महकाने वाले इस बेजोड़ कलाकार को फिल्मों के रसिया इसलिए भी शायद कभी नहीं भूल पाएंगे कि पारिवारिक मर्यादाओं के खिलाफ बगैर बिगुल फूंके उन्होंने आधुनिकता और स्वच्छंदता का जो तिलिस्म परदे पर रचा, वह एक तरफ जहां खासा मनोरंजक था, वहीं दूसरी तरफ स्टारडम की खूबियों की मिसाल भी। इससे बढ़कर किसी कलाकार की सफलता क्या होगी कि उसके स्वर्णिम दौर के खत्म हो जाने के बाद भी उसकी अदाओं का जादू चलता रहे। जिन लोगों को राजेश खन्ना और जितेंद्र की शुरुआती दौर की फिल्में याद होंगी, वे इस बात को बेहतर कह पाएंगे कि कैसे इन दोनों सितारों की अभिनय और नृत्य शैली में शम्मी कपूर का अक्श झांकता था।
भारत के एल्बिल प्रेस्ले कहने जाने वाले शम्मी ने अपनी अंतिम सांसें जरूर अस्पताल में ली पर उनकी सक्रियता उनके जीवन के आखिरी दिनों तक बनी रही। वे शोहरत की दुनिया के उन सितारों की तरह नहीं थे, जिनका चमकना महज कुछ दिनों या एक दौर तक सीमित रहता है। साइबर और मोबाइल क्रांति के दौर में एक तरफ जहां उनका रुझान लगातार अध्यात्म की तरफ बढ़ता गया, वहीं वे इंटरनेट की दुनिया के भी बड़े सैलानी थे। इंटरनेट के साथ उनके संबंधों की इससे बड़ी मिसाल क्या होगी कि वे इंटनेट यूजर्स कम्यूनिटी ऑफ़ इंडिया के संस्थापक अध्यक्ष थे। शम्मी कपूर की जिंदगी जीने की इस जिंदीदिल शैली के कारण ही उनके बच्चे और परिवार के अन्य लोगों को इस बात का कतई मलाल नहीं है कि वे अपने सफर को कहीं आधा-अधूरा छोड़ इस दुनिया से विदा हो गए। हां, यह जरूर है कि अब शायद ही उनके जैसा कोई फिल्मी दुनिया में आए, जिसे देख हम कह सकें कि 'तुमसे अच्छा कौन है'।

सोमवार, 1 अगस्त 2011

50 लाख पन्नों पर लिखी दोस्ती


प्यार और दोस्ती जीवन से जुड़े ऐसे सरोकार हैं जिनको निभाने के लिए हमारी आपकी फिक्रमंदी भले कम हुई हो पर इसे उत्सव की तरह मनाने वाली सोच बकायदा संगठित उद्योग का रूप ले चुका है। दिलचस्प यह भी है कि कल तक लक्ष्मी के जिन उल्लुओं की चोंच और आंखें सबसे ज्यादा परिवार और परंपरा का दूध पीकर बलिष्ठ हो रहे संबंधों पर भिंची रहतीं थी, अब वही कलाई पर दोस्ती और प्यार का धागा बांधने का पोस्टमार्डन फंडा हिट कराने में लगे हैं। फ्रेंड और फ्रेंडशिप का जो जश्न पूरी दुनिया में अगस्त के पहले रविवार से शुरू होगा उसके पीछे का अतीत मानवीय संवेदनाओं को खुरचने वाली कई क्रूर सचाइयों पर से भी परदा उठाता है।
फ्रेंडशिप डे या मैत्री दिवस को मनाने का ऐतिहासिक सिलसिला 1935 में तब शुरू हुआ जब यूएस कांग्रेस ने दोस्तों के सम्मान में इस खास दिन को मनाने का फैसला किया। इस फैसले तक पहुंचने के पीछे सबसे बड़ी वजह प्रथम विश्वयुद्ध के वे शर्मनाक अनुभव बनी जिसने देशों के साथ समाज के भीतर संबंधों के सारे सरोकारों को तार-तार कर दिया। इस त्रासद अनुभव को सबने मिलकर अनुभव किया। तभी बगैर किसी हील-हुज्जत के यह सर्वसम्मत राय बनने लगी कि अगर हम संबंधों के निभाने के प्रति समय रहते संवेदनशील जज्बे के साथ सामने नहीं आए तो वह दिन दूर नहीं जब मानव इतिहास का कोई भी हासिल बचा नहीं रख पाएंगे। आलम यह है कि पिछले कई दशकों से  दुनिया के सबसे ताकतवर देश का तमगा हासिल करने वाले देश से मैत्री को उत्सव दिवस के रूप में मनाने की परंपरा आज पूरी दुनिया के कैलेंडर की एक खास तारीख है। दोस्ती का दायरा समाज और राष्ट्रों के बीच ज्यादा से ज्यादा बढ़े इस जरूरत को समझते हुए संयुक्त राष्ट्र ने भी 1997 में एक अहम फैसला लिया। उसने लोकप्रिय कार्टून कैरेक्टर विन्नी और पूह को पूरी दुनिया के लिए दोस्ती का राजदूत घोषित किया।
पिछले दस सालों में दोस्ती का यह पर्व उसी तरह पूरी दुनिया में लोकप्रिय हुआ है जिस तरह वेंलेंटाइन डे। अलबत्ता यह बात जरूर थोड़ी चौकाती है कि सेक्स और सेंसेक्स के बीच झूलती दुनिया में संबंधों को कलाई पर बांधकर दिखाने की रस्मी रिवायत से किसका भला ज्यादा हो रहा है। लेखक राजेंद्र यादव दोस्ती की बात छेड़ने पर अंग्रेजी की एक पुरानी कहावत दोहराते हैं- 'बूट्स एंड फ्रेंडशिप शुड बी पॉलिश्ड रेग्युलरली।' जाहिर है संबंधों को एक दिन के उल्लास और उत्सव की रस्म अदायगी के साथ निपटाने के खतरे को वे बखूबी समझते हैं।
फेंड और फ्रेंडशिप का जिक्र हो रहा हो और बात युवाओं की न हो बात पूरी नहीं होती है। आर्चीज जैसी कार्ड और गिफ्ट बनाने और बेचने वाली कंपनियां इन्हीं युवाओं के मानस पर प्रेम, ख्वाब, यादें और दोस्ती जैसे शब्द लिखकर तो अपनी अंटी का वजन रोज ब रोज बढ़ा रही हैं। फिर बात दोस्ती के महापर्व की हो तो इन युवाओं को कैसे भूला जा सकता है। हाल में टीवी पर दिखाए जा रहे एक शो में जज बने जावेद अख्तर तब तुनक गए जब गायिका वसुंधरा दास ने अपने एक गाने को यूथफूल होने की दलील उनके सामने रखी। जावेद साहब ने थोड़े तल्ख लहजे में उस मानसिकता पर चुटकी ली जिसमें देह की अवधारणा को संदेह से अलगाने की कोशिश हो या किसी बेसिर-पैर के म्यूजिकल कंपोजिशन को मार्डन या यूथफूल ठहराने का कैलकुलेटेड एफर्ट, यूथ सेंटीमेंट की बात छेड़कर सब कुछ जायज और जरूरी ठहरा दिया जाता है। उनके शब्द थे "इस तरह की दलीलों को सुनकर ऐसा लगता है कि जैसे यूथ कोई 21वीं सदी का इन्वेंशन हो और इससे पहले ये होते ही नहीं थे।' इस  वाकिए को सामने रखकर यह समझने में थोड़ी सहुलियत हो सकती है कि नई पीढ़ी को सीढ़ी बनाकर संबंधों के केक काटने वाला बाजार किस कदर अपने मकसद में क्रूर है। यहां यह भूल करने से बचना चाहिए कि नई पीढ़ी की संवेदनशीलता कोरी और कच्ची है। हां, यह जरूर है कि उसके आसपास का वातावरण उससे वह मौका भरसक हथिया लेने में सफल हो रहा है जो निभाए जाने वाले मानवीय सरोकारों को दिखाए जाने वाला रोमांच भर बना रहे हैं।
स्थिति शायद उतनी निराशाजनक नहीं जितनी ऊपर से दिखती है। गूगल सर्च इंजन पर फ्रेंडशिप डे के दो शब्द जो 50 लाख से ज्यादा पन्ने हमारे सामने खोलता है उसमें कई सामाजिक संस्थाओं और दोस्तों के ऐसे समूहों के क्रिया-कलापों का बखान भी बखान भी है जो मानवीय संबंधों को हर तरह की त्रासदी से उबाड़ने में लगे हैं। खुशी की बात यह कि ऐसी पहलों का ज्यादातर हिस्सा युवाओं के हिस्से है। बहरहाल, पूरी दुनिया के साथ भारत भी मैत्री दिवस को मनाने के लिए तैयार है। और उम्मीद की जानी चाहिए कि संबंधों और वचनों के मान के लिए सब कुछ दाव पर लगा देने वाले देश में लोक और परंपरा के साथ आधुनिकता के बीच दोस्ती के नए संकल्प पूरे होंगे।  

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

अब आप सुनेंगे नई आकाशवाणी


समाचार की दुनिया कब सूचना में रातोंरात बदल गई यह खबरिया तंत्र के पंडितों को भी पता पहीं लगा। नहीं तो बात-बात में ब्रोकिंग न्यूज चला देने वाले चैनल मास्टरों को कम से कम संभलने का एक मौका तो जरूर मिलता।  बहरहाल अगर बात करें सूचना के दौर का आगाज की तो यह शुरुआत तकरीबन दो दशक पहले ही हो गया था। दिलचस्प है कि इस दौर की उठान अब भी थमी नहीं है। चौबीसों घंटे के टीवी चैनलों को जहां घरेलू होने का दर्जा मिल गया, वहीं मोबाइल फोनों से हमारे हाथ सूचना के औज़ार से लैश हो गए। इस सब के बीच अनसुनी रह गई तो वह 'आकाशवाणी' जिसने अपनी आवाज के जादू से हमारी कई पीढ़ियों को सम्मोहित किए रखा। यह आवाज जब एफएम के रूप में नई तकनीकी कुशलता से कानों तक पहुंची तो इसके रसियों का एक नया शहरी वर्ग पैदा हुआ।
दिलचस्प है कि आज चारों तरफ धूम टीवी चैनलों के साथ एफएम चैनलों की भी है, पर इस सबके पीछे निजी महारथ के आगे सरकारी कोशिशें मार खाती गईं। दूरदर्शन जहां आज किसी भी टीवी रिमोट का सबसे आखिरी बटन है, वहीं सरकारी एफएम रेडियो बस भूली-बिसरी याद जगाने वाला बहलाव भर। अब लगता है कि सरकार इस मुद्दे पर थोड़े पेशेवर तरीके से सोचने और  पहलकदमी के लिए तैयार हुई है। केंद्रीय कैबिनेट ने एक बड़े फैसले के तहत एफएम के तीसरे चरण के विस्तार को हरी झंडी दे दी है। इसके तहत 227 नए शहरों में निजी एफ रेडियो चैनल शुरू होंगे। और इसी एक साथ पूरा हो जाएगा देश के एक लाख से ज्यादा की आबादी वाले तमाम शहरों में एफएम रेडियो पहुंचाने का संकल्प। फिलहाल देश के महज 86 शहरों के के पास अपना एफएम रेडियो है। अकेले एफएम की बात करें तो सरकार का यह फैसला अब तक का सबसे बड़ा फैसला है क्योंकि इसके तहत न सिर्फ सबसे ज्यादा शहरों को एफएम सर्किट का हिस्सा बनाने का लक्ष्य पूरा होगा बल्कि फैसला यह भी लिया गया है कि निजी एफएम चैनलों को आकाशवाणी से प्रसारित होने वाले समाचारों की छूट होगी। सरकारी कंटेंट के बाजार में सेलेबल बनाने की यह फैसला नीतिगत रूप से एक क्रांतिकारी कदम है।
अब तक सरकारी और निजी क्षेत्र इस तरह साथ मिलकर और  पेशेवर साझेदारी के साथ बहुत कम क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। जाहिर है कि इस बड़े फैसले का असर भी बड़ा होगा क्योंकि रेडियो और सेलफोन इस मामले में तो जरूर टीवी चैनलों पर भारी पड़ते हैं कि इन्हें आप अपने साथ कहीं भी ले जा सकते हैं। लिहाजा, आगे देश की एक बड्री आबादी के पास ये सुविधा होगी कि वह जहां है, वहीं स्थानीय खबरों, बाजार गतिविधियों और रोजगार की सूचनाओं को पा सकेगा। सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी अपने मंत्रालय की तरफ से इस बड़ी पहल के कारण खासी गदगद हैं। उन्होंने एफएम के तीसरे चरण के विस्तार की जो रूपरेखा देश के सामने रखी है, उसमें पूरी पारदर्शिता के निर्वाह का वचन दिया है। उम्मीद है कि 2जी और 3जी के विवाद के बीच सरकार की ओर से किए गए इस फैसले को निर्विवादित रहने का श्रेय तो मिलेगा ही, जनता भी सरकार के इस असरकारी फैसले से खुश होगी। वैसे जहां तक बात सूचना और प्रसारण मंत्रालय के कामकाज और उपलब्धियों की है तो दूरदर्शन को लेकर कोई दूरदर्शी फैसला लेना अब भी बाकी है। लंबा समय हो गया और इस दौरान कई सरकारें आई- गईं पर प्रसार भारती की स्वायत्तता का एक तरह से तदर्थ रूप ही अब तक चला आ रहा है।
नतीजतन निजी टीवी चैनलों ने जहां इस दौरान अपनी पूंजी और पैठ काफी बढ़ा ली हैं, वहीं सरकार का दूरदर्शन रोज-ब-रोज आम लोगों से दूर होता जा रहा है। पहले तो यह शिकायत थी कि यह सरकार के विज्ञापन एजेंसी की तरह काम कर रहा है, पर अब तो आलम यह है कि इसकी पहुंच का रकबा भी सिकुड़ता जा रहा है। एफएम के विस्तार के बाद सरकार के सुधार और विस्तार एजेंडे पर निश्चित रूप से दूरदर्शन को आना ही चाहिए। और अगर ऐसा नहीं हुआ तो कहना पड़ेगा कि आज भी हमारी सरकार दूरदर्शी नहीं है।  

रविवार, 24 जुलाई 2011

इंडिया को पढ़िए फेसबुक पर


फेस टू फेस बात करने में यकीन करने वाले चौक जाएं। जमाना फेस टू फेस होने का नहीं बल्कि फेसबुक में दिखने और दर्ज होने का है। अपने इंडिया को तो यह फेसबुक इतना पसंद है कि इसको इस्तेमाल करने वाले टॉप टेन देशों में न सिर्फ उसका शुमार है बल्कि उसका स्थान भी बहुत नीचे नहीं बल्कि चौथा है।  देश में दस करोड़ से ज्यादा इंटरनेट यूजर्स बताए जाते हैं जिनमें करीब तीन करोड़ फेसबुक के रसिया हैं। इस सूची में अमेरिका 15 करोड़ से ऊपर की गिनती के  साथ अव्वल है। नए आंकड़ांे के अनुसार दूसरे नंबर पर इंडोनेशिया (3,88,60,460), तीसरे पर यूनाईटेड किंगडम (2,98,80,860) है। भारत में 2,94,75,740 लोगों के पास फेसबुक आईडी है। तीसरे और चौथे स्थान के बीच फासला बहुत मामूली है और जो स्थिति है उसमें भारत कभी भी अपनी पोजिशन सुधार कर चार से तीन नंबर पर आ सकता है।
पूरी दुनिया में फेसबुक के कुल यूजर्स की संख्या लगभग 75 करोड़ है। दरअसल, यह एक नया गणतंत्र है- फेसबुकिया गणतंत्र।  21वीं सदी का अपना नया गणतंत्र। यह अलग बात है कि इस नए डेमोक्रेटिक सोसाइटी के एक्चुअल बिहेवियर को एक्जामिन होना अभी बाकी है। अब तक इस नए डेमोक्रेसी की सबसे बड़ी ताकत यही है कि यहां एक्शन से ज्यादा तेज रिएक्शन है। बात ओसामा बिन लादेन के मारे जाने की हो या लीबिया में सत्ता पलट के आंदोलन की, यह रिएक्शन हर जगह दिखता है। लीबिया मामले में तो अभी यह साफ होना भी बाकी है कि फेसबुक पर जनचेतना दिखी या जनचेतना का रिएक्शन फेसबुक पर प्रकट हुआ।  
दिलचस्प है कि संवाद के पुराने बिरसे को बहाल करने वालों में भी कई आधुनिकों ने अपने रुदन और विचार प्रसंग के लिए इंटरनेट को ही आैजार बनाया है। यही नहीं लोक अभियान के बूते चलने वाले लोकपाल बिल को लेकर चलने वाले अभियान का जंतर-मंतर भी इन्हीं फेसबुक, मोबाइल मैसज और इंटरनेट जैसे नए साइबर डाकियों के हवाले है। पर इतना तो आज भी कहना पड़ेगा कि यह सब सच इंडिया का है भारत का कतई नहीं। यह अलग बात है कि इस दौरान जहां इंडिया का साइज बढ़ा है, वहीं भारत के वासी और हिमायती कम हुए हैं, अलग-थलग पड़े हैं। भारत का संघर्ष आज भी 'बसपा' (बिजली, सड़क और पानी) के एजेंडे को ही साधने में पसीना बहा रहा है।  ऐसे में संवाद और मीडिया के माहिरों को बजाय इसके कि साइबर सरमाया कितना बढ़ गया है कुछ सवालों के जवाब जरूर देने चाहिए।
सबसे अहम सवाल तो यही कि संवाद क्रांति के दौर का अगर यह क्लाइमेक्स है तो आगे के सफर का हासिल क्या होगा? क्योंकि भी यही यह आलम है कि अगर हम महज दो मिनट में इंटरनेट पर डाउनलोड हुए वीडियो को देखने बैठें तो पूरे दो दिन का समय निकालना होगा। साफ है कि साइबेर दुनिया में अब पहले की तरह उड़ान संभव नहीं क्योंकि यहां भी अब जाम है, जमावड़ा है और भारी रेलमपेल मची है।  वैसे समझना यह भी होगा कि यह कि ईमेल से शुरू होकर फेसबुक तक पहुंची कामयाबी, क्या मनुष्य की संवादप्रियता के सामाजिक तथ्य पर मुहर लगाता है या फिर यह भीड़ और शोरोगुल से जानबूझकर दूर रहकर दुनिया को अपने तरीके से अकेले देखने-सुनने की स्वच्छंदता का आलम है। एक तकनीकी सवाल यह भी कि फेसबुक पर एकाउंटेबल होने वाली पीढ़ी के गोपन बनाम ओपन के संघर्ष में विजय पताका किसके हाथ लगी। बहरहाल, एक बात तो तय है कि तकनीक और फैटेंसी के मानवीय सरोकारों ने 21वीं सदी के आगाज को काफी हद तक अपने कब्जे में ले लिया है। आगे चलकर यह जिम्मेदारी इतिहास की होगी कि वह इसका अंजाम किसी फेसबुक में दर्ज कराता है कि कहीं और।

साभार : राष्ट्रीय सहारा


गुरुवार, 14 जुलाई 2011

पानी बरसने का सबूत महिलाएं दे रही हैं



बढ़ती गरमी बारिश की याद ही नहीं दिलाती, उसकी शोभा भी बढ़ाती है। केरल तट पर मानसून की दस्तक हो कि राजधानी दिल्ली में उमस भरी गरमी के बीच हल्की बूंदा-बांदी, खबर के लिहाज से दोनों की कद्र है और दोनों के लिए स्पेस भी। अखबारों-टीवी चैनलों पर जिन खबरों में कैमरे की कलात्मकता के साथ स्क्रिप्ट के लालित्य की थोड़ी-बहुत गुंजाइश होती है, वह बारिश की खबरों को लेकर ही। पत्रकारिता में प्रकृति की यह सुकुमार उपस्थिति अब भी बरकरार है, यह गनीमत नहीं बल्कि उपलब्धि जैसी है। पर इसका क्या करें कि इस उपस्थिति को बचाए और बनाए रखने वाली आंखें अब धीरे-धीरे या तो कमजोर पड़ती जा रही हैं या फिर उनके देखने का नजरिया बदल गया है। 
दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों के साथ अब तो सूरत, इंदौर, पटना, भोपाल जैसे शहरों में भी बारिश दिखाने और बताने का सबसे आसान तरीका है, किसी किशोरी या युवती को भीगे कपड़ों के साथ दिखाना। कहने को बारिश को लेकर यह सौंदर्यबोध पारंपरिक है। पर यह बोध लगातार सौंदर्य का दैहिक भाष्य बनता जा रहा है। और ऐसा मीडिया और सिनेमा की भीतरी-बाहरी दुनिया को साक्षी मानकर समझा जा सकता है। कई अखबारी फोटोग्राफरों के अपने खिंचे या यहां-वहां से जुगाड़े गये ऐसे फोटो की बाकायदा लाइब्रोरी है। समय-समय पर वे हल्की फेरबदल के साथ इन्हें रिलीज करते रहते हैं और खूब वाहवाही लूटते हैं। नये मॉडल और एक्ट्रेस अपना जो पोर्टफोलियो लेकर प्रोडक्शन हाउसों के चक्कर लगाती हैं, उनमें बारिश या पानी से भीगे कपड़ों वाले फोटोशूट जरूर शामिल होते हैं। बताते हैं कि नम्रता शिरोडकर की बहन शिल्पा शिरोडकर को कई बड़े बैनरों को फिल्में एक दौर में इसलिए मिलीं कि उसे कैमरे के आगे पानी में किसी भी तरह से भीगने से गुरेज नहीं था। खबरें तो यहां तक आर्इं कि उसे एक फिल्म में इतनी बार नहलाया-धुलाया गया कि अगले कई महीनों तक वह निमोनिया से बिस्तर पर पड़ी रही। हीरोइनों के परदे पर भीगने-भिगाने का चलन वैसे बहुत नया भी नहीं है। पर पहले उनका यह भीगना-नहाना ताल-तलैया, गांव-खेत से लेकर प्रेम के पानीदार क्षणों को जीवित करने के भी कलात्मक बहाने थे। 
वह दौर गया, जब रिमझिम फुहारों के बीच धान रोपाई के गीत या सावनी-कजरी की तान फूटे। जिन कुछ लोक अंचलों में यह सांगीतिक-सांस्कृतिक परंपरा थोड़ी-बहुत बची है, वह मीडिया की निगाह से दूर है। इसे उस सनक या समझ का ही कमाल कहेंगे कि टूथपेस्ट बेचना हो या मानसून आने की खबर देनी हो, तरीका चाहे जो भी हो होता दैहिक ही है। बारहमासा गाने वाले देश में आया यह परिवर्तन काफी कुछ सोचने को मजबूर करता है। यह फिनोमना सिर्फ हमारे यहां नहीं पूरी दुनिया का है। पूरी दुनिया में किसी भी पारंपरिक परिधान से बड़ा मार्केट स्विम कॉस्टयूम का है। दिलचस्प तो यह कि अब शहरों में घर तक कमरों की साज-सज्जा या लंबाई-चौड़ाई के हिसाब से नहीं, अपार्टमेंट में स्विमिंग पूल की उपलब्धता की लालच पर खरीदे जाते हैं। इस पानीदार दौर को लेकर इतनी चिंता तो जरूर जायज है कि पानी के नाम पर हमारी आंखों और सोच में कितना पानी बचा है। अगर पानी होने या बरसने का सबूत महिलाएं दे रही हैं तो फिर पुरुषों की दुनिया कितनी प्यासी है।