शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010
बुधवार, 27 अक्टूबर 2010
मारे जाएंगे
अलंकरण समारोहों में
गुलदस्तों का भार उठाना
कितनी बड़ी कृतज्ञता है
विनम्रता है कितनी बड़ी
अपने समय के प्रति
हमारे समय के सुलेखों
आैर पुस्तकालय के ताखों पर रखे
अग्रलेखों ने
लेख से ज्यादा बदली है लिखावट
उतनी ही जितनी
उनकी बातें सुनकर
महसूस होता है
श्रोताओं की पहली, दूसरी आैर
अंतिम कतार को
ऐतिहासिक होने का उद्यम
श्रीमान होने के करतब का
सबसे खतरनाक पक्ष है
समय की धूल पोंछकर
हाथ गंदा करने का जमाना लद गया
अब तो समय को सबसे क्रूरता से
बांचने वालों की सुनवाई है
कलम ने कुदाल की तौहीनी
भले न की हो
पर खुद को मटमैला होने से
भरसक बचाया है
हम जिन बातों पर रो सकते थे
सिर फोड़ सकते थे आपस में
कैसा तिलस्मी असर है इनका
कि हम बेवजह हंस रहे हैं
रो रहे हैं
जबकि हमें भी मालूम है
कि हम पूर्वजन्म से लेकर
पुनर्जन्म तक जागे ही नहीं
बस सो रहे हैं
मंचासीन जादूगरों के डमरू पर
डम-डम-डिगा-डिगा गाने वाले
जादू का खेल देखकर ताली बजाने वाले
अब मजमे में शामिल तमाशबीन नहीं
एक पागल भीड़ है
जो घर-घर पहुंच चुकी है
अगर न बने हम भीड़
तो भीरु कहलाएंगे
आैर अगर हो गए भीड़ तो
मारे जाएंगे
मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010
नहीं कर सकती तुम उतना प्यार
तुम हो सकती हो नंगी
पर उतनी नहीं
जितना होता है नंगा
एक पुरुष
अनावरण समारोह का
फीता काटने के बाद
तुम्हें करना आता है प्यार
खूब करती हो प्यार
मनाती हो खुशी-खुशी हर साल
प्यार का त्योहार
पर कभी नहीं कर सकती
तुम उतना प्यार
जितना कर सकता है
एक पुरुष
एक साथ
एक क्षण में अपने मन में
उगीं हजारों भुजाओं के साथ
सलीके आैर नजाकत के कीमती
दोशाले से लिपटा
इनकार आैर इजहार तुम्हारा
बन सकती है कविता
गा सकता है कवि
पर कथन का जादुई यथार्थ
अभिव्यक्ति का मारक इस्तेमाल
सब कुछ करके
न कहने का भरोसेमंद अंदाज
तो है एक पुरुष के ही पास
वही कर सकता है
इस पर नाज
तुम्हें भाता है श्रृंगार
बहुत जरूरी है तुम्हारे लिए
आईने का इस्तेमाल
पर सजावट का तर्क तुम्हारा
कभी इतना सधा नहीं हो सकता
जितना एक पुरुष का रंगीन ख्याल
उसकी उभरी हुई जमीन
उसका छितराया हुआ आकाश
तड़प होगी कोई तुम्हारी भी
प्यास लगती होगी तुम्हें भी
पर इतना तो शायद ही कभी
जितना तड़पता है
एक पुरुष बीच रात में
अपनी खाट की आवाज सुनकर
जितनी छटपटाती है
उसकी इच्छा
किसी चील के कोटर में
रखा मांस देखकर
सोमवार, 25 अक्टूबर 2010
परंपरा और करवा
परंपरा जब आधुनिकता से गलबहियां डालकर डग भरती है तो जो "फ्यूजन' क्रिएट होता है, उसकी स्वीकार्यता आश्चर्यजनक रूप से काफी बढ़ जाती है। बात नवरात्र के गरबा रास की हो या करवा चौथ की, नए दौर में पुरानी परंपराओं से जुड़ने वालों की कमी नहीं है। करवा चौथ की कथा पारंपरिक पतिव्रता पत्नियों की चाहे जैसी भी छवि पेश करती रही हो, इस व्रत को करने वाली नई दौर की सौभाग्यवतियों ने न सिर्फ इस पुराकथा को बदला है बल्कि इस पर्व को मनाने के नए औचित्य भी गढ़े हैं। विवाह नाम की संस्था आज दांपत्य निर्वाह का महज संकल्प भर नहीं है, जहां स्त्री-पुरुष संबंध के तमाम स्तरों और सरोकारों को महज संतानोत्पत्ति के महालक्ष्य के लिए तिरोहित कर दिए जाएं। संबंधों के स्तर पर व्यावहारिकता और व्यावहारिकता के स्तर पर एक-दूसरे के मुताबिक होने-ढलने की ढेर सारी हसरतें, नए दौर में विवाह संस्था के ईंट-गारे हैं।
करवा चौथ की पुरानी लीक आज विवाह संस्था की नई सीख है। खूबसूरत बात यह है कि इसे चहक के साथ सीखने और बरतने वालों में महज पति-पत्नी ही नहीं, एक-दूसरे को दोस्ती और प्यार के सुर्ख गुलाब भेंट करने वाले युवक-युवती भी शामिल हैं। दो साल पहले शादी के बाद बिहार से अमेरिका शिफ्ट होने वाले प्रत्यंचा और मयंक को खुशी इस बात की है कि वे इस बार करवा चौथ अपने देश में अपने परिवार के साथ मनाएंगे। तो वहीं नोएडा की प्राइवेट यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली प्रेरणा इस खुशी से भर रही है कि वह पहली बार करवा चौथ करेगी और वह भी अपने प्यारे दोस्त के लिए। दोनों ही मामलों में खास बात यह है कि व्रत करने वाले एक नहीं दोनों हैं, यानी ई·ार से अपने साथी के लिए वरदान मांगने में कोई पीछे नहीं रहना चाहता। सबको अपने प्यार पर फख्र है और सभी उसकी लंबी उम्र के लिए ख्वाहिशमंद।
भारतीय समाज में दांपत्य संबंध के तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद उसे बनाए, टिकाए और निभाते चलने की वजहें ज्यादा कारगर हैं। यह बड़ी बात है और खासकर उस दौर में जब लिव-इन और समलैंगिक जैसे वैकल्पिक और खुले संबंधों की वकालत सड़क से अदालत तक गूंज रही है। अमेरिका और स्वीडन जैसे देशों में तलाक के मामले जहां 54-55 फीसद हैं, वहीं अपने देश में यह फीसद आज भी बमुश्किल 1.1 फीसद है। जाहिर है कि टिकाऊ और दीर्घायु दांपत्य के पीछे अकेली वजह परंपरा निर्वाह नहीं हो सकती। सचाई तो यह है कि नए दौर में पति-पत्नी का संबंध चर-अनुचर या स्वामी-दासी जैसा नहीं रह गया है। पूरे दिन करवा चौथ के नाम पर निर्जल उपवास के साथ पति की स्वस्थ और लंबी उम्र की कामना कुछ दशक पहले तक पत्नियां इसलिए भी करती थीं कि क्योंकि वह अपने पति के आगे खुद को हर तरीके से मोहताज मानती थी, लिहाजा अपने "उनके' लंबे साथ की कामना उनकी मजबूरी भी थी। आज ये मजबूरियां मेड फॉर इच अदर के रोमांटिक यथार्थ में बदल चुकी हैं। परिवार के संयुक्त की जगह एकल संरचना एक-दूसरे के प्रति जुड़ाव को कई स्तरों पर सशक्त करते हैं। यह फिनोमिना गांवों-कस्बों से ज्यादा नगरों-महानगरों में ज्यादा इसलिए भी दिखता है कि यहां पति-पत्नी दोनों कामकाजी हैं, दोनों परिवार को चलाने के लिए घर से लेकर बाहर तक बराबर का योगदान करते हैं। इसलिए जब एक-दूसरे की फिक्र करने की बारी भी आती है तो उत्साह दोनों ओर से दिखता है। पत्नी की हथेली पर मेंहदी सजे, इसकी खुशी पति में भी दिखती है, पति की पसंद वाले ट्राउजर की खरीद के लिए पत्नी भी खुशी से साथ बाजार निकलती है। यही नहीं अब तो बच्चे पर प्यार उडे़लने में भी मां-पिता की भूमिका बंटी-बंटी नहीं बल्कि समान होती जा रही है।
करवा चौथ के दिन एक तरफ भाजपा नेता सुषमा स्वराज कांजीवरम या बनारसी साड़ी और सिंदूरी लाली के बीच पारंपरिक गहनों से लदी-फदी जब व्रत की थाली सजाए टीवी पर दिखती हैं तो वहीं देश के सबसे ज्यादा चर्चित और गौरवशाली परिवार का दर्जा पाने वाले बच्चन परिवार में भी इस पर्व को लेकर उतना ही उत्साह दिखता है। साफ है कि नया परिवार संस्कार अपनी-अपनी तरह से परंपरा की गोद में दूध पी रहा है। यह गोद किसी जड़ परंपरा की नहीं समय के साथ बदलते नित्य नूतन होती परंपरा की है। भारतीय लोक परंपरा के पक्ष में अच्छी बात यह है कि इसमें समायोजन की प्रवृत्ति प्रबल है। नए दौर की जरूरतों और मान्यताओं को आत्मसात कर बदलती तो है पर बिगड़ती नहीं। करवा चौथ का बदला स्वरूप ही ज्यादा लोकप्रिय हो रहा है। अब यह पर्व कर्मकांडीय आस्था के बजाय उसी तरह सेलिब्रोट किया जा रहा है जैसे मदर्स-फादर्स और वेलेंटाइन डे। यह अलग बात है कि बदलाव के इस झोंके में बाजार ने अपनी भूमिका तलाश ली है, सबके साथ वह भी हमारी खुशियों में शामिल है।
रविवार, 24 अक्टूबर 2010
गल्र्स नेवर बी एलोन
अपनी बात शुरू करने से पहले वह बात जिसने अपनी बात कहने के लिए तैयार किया। आशुतोष राणा महज अभिनेता नहीं हैं। उनकी शख्सियत ने मुख्तलिफ हलकों में लोगों को अपना मुरीद बनाया है। अरसा हुआ टीवी के एक कार्यक्रम में उनकी टिप्पणी सुनी, जो अलग-अलग वजहों से आज तक याद है। राणा ने कहा था, "हमारी परंपरा महिलाओं से नहीं, महिलाओं को जीतने की रही है।' यह वक्तव्य स्मरणीय होने की सारी खूबियों से भरा है। होता भी यही है कि किसी बेहतरीन शेर या गाने की तरह ऐसे बयान हमारी जेहन में गहरे उतर जाते हैं बगैर किसी अंदरुनी जिरह के। यह खतरनाक स्थिति है। आज जब बुद्धि और तर्क के तरकश संभाले विचारवीरों की बातें पढ़ता-सुनता हूं तो इस खतरे का एहसास और बढ़ जाता है।
दरअसल, तर्क किसी विचार की कसौटी हो तो हो किसी मन की दीवारों पर लिखी इबारत को पढ़ने का चश्मा तो कतई नहीं। यह बात अक्षर लिखने वालों की क्षर दुनिया में कहीं से भी झांकने से आसानी से समझ आ सकती है। इसी बेमेल ने शब्दों की दुनिया को उनके ही रचने वालों की दुनिया में सबसे ज्यादा बेपर्दा किया है। दो-चार रोज पहले का वाकया है। फिल्म का नाइट शो देखकर बाहर कुछ दूर आने पर सड़क के दूसरे छोर पर अकेली लड़की जाती दिखी। मेरे साथ तीन साथी और थे। इनमें जो पिछले करीब एक दशक से बाकायदा रचनात्मक पत्रकारिता करने का दंभ भरने वाला था, उसने अपनी जेब से गांजे से भरी सिगरेट का दम लगाते हुए कहा, "मन को उतना ही अकेला होना चाहिए, जितनी वह लड़की अकेली दिख रही है।'
दूसरे साथी ने हिंदी की बजाय पत्रकारिता की अंग्रेजी-हिंदी अनुवाद की धारा से जुड़े होने की छाप देते हुए कहा, "गल्र्स नेवर बी एलोन। सिचुएशन एंड सराउंडिंग ऑलवेज आक्यूपाय देयर लोनलिनेस।' तीसरे ने कहा, "किसी लड़की को अकेले बगैर उसकी जानकारी के देखना किसी दिलकश एमएमएस को देखने का सुख देता है।' रहा मुझसे भी नहीं गया और मैंने छूटते ही कहा," वह या तो कहीं छूट गई है या फिर किसी को छोड़ चुकी है।'
साफ है कि पढ़ा-लिखा पुरुष मन किसी स्त्री को सबसे तेज पढ़ने का न सिर्फ दावा करता है बल्कि उसे गाहे-बगाहे आजमाता भी रहता है। तभी तो विचार की दुनिया में यह मान्यता थोड़े घायल होने के बावजूद अब भी टिकी है कि स्त्री मन, स्त्री प्रेम, स्त्री सौंदर्य को लेकर दुनिया में "सच्चा' लेखन भले किसी महिला कलम से निकली हो पर अगर "अच्छा' की बात करेंगे तो प्रतियोगिता पुरुष कलमकारों के बीच ही होगी।
इसलिए राणा जैसों को भी जब जुमला गढ़ने की बारी आती है तो स्त्री से जीत की स्पर्धा करने की बजाय उस पर एकाधिकार का चमकता हौसला आजमाना पसंद करते हैं। यह और कुछ नहीं सीधे-सीधे छल है, पुरुष बुद्धि छल। आधी आबादी को समाज के बीच नहीं प्रयोगशाला की मेज पर समझने की बेईमानी सोच-समझ की मंशा पर ही सवाल उठाते हैं। जिस रात की घटना का जिक्र पहले किया गया, वहां भी ऐसा ही हुआ। किसी ने महिला-पुरुष के सामाजिक रिश्ते को सामने रखकर उस अकेली दिख रही लड़की के बारे में सोचने की जरूरत महसूस नहीं की। क्योंकि तब सोच की आंखों में सुरूर की बजाय थोड़ा जिम्मेदार सामाजिक होने की सजलता होती। और इस सजलता की दरकार को किस तरह जानबूझकर खारिज किया गया, वह अगले ही कुछ मिनटों में उस रात भी जाहिर हुआ।
असल में, रात के अंधेरे में वह महिला अपने घर के पास उतरने की बजाय कहीं और उतर गई थी। और वह लगातार इस कोशिश में थी कि उसका स्थान और दिशा भ्रम किसी तरह टूटे पर उसकी कोशिश काम नहीं आ रही थी। सो जैसे ही उसकी निगाह हम चारों पर पड़ी, वह थोड़े आश्वस्त भाव से हमारी ओर लपकी । हम खुश भी थे और इस चोर आशंका से भी भर रहे थे कि कहीं वह यह तो नहीं जान गई, जो हम अब तक उसके बारे में बोल-सोच रहे थे। पास आकर जब उसने अपनी परेशानी बताई तो बारी हमारे गलत साबित होने की की थी, शर्मिंदगी की थी। हम बाद में जरूर उस महिला की मदद कर पाए पर उस खामख्याली का क्या जो महिला देखते ही पर तोलने लगते हैं। राणा भी ऐसा ही करते हैं। वह बगैर महिला सच से मुठभेड़ किए उस पर विजय होने का सपना देखते हैं।
शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010
हार्दिक विरोध
अतीत के लिए टेसू बहाने वाली ने
नया शगल अपनाया है-
व्यतीत को कोसने का
शीशे से नजरें मिलाकर
आंखों में आई हौसले की चमक नई
बड़ी है कैनवस पर एक नंगी नायिका के
चरित्र को काढ़ने वाली
हर मीनाकारी से
कल होना आैर कल का होना
उसे न होने देगा आज
आैर न आज के मन माफिक
कल को ही शक्ल दे सकेगी वह
पलटकर न देखना
आदत न होती है नदी की
आैर न ही इक्कीसवीं सदी की
किसी तेज-तर्रार स्त्री की
समय ने सभ्यता की अप्सराओं को
बदहवास सताए जाने की
पीड़ा से मुक्त तो नहीं किया
हां बदहवास जीवन को
अघोषित गंतव्य की दिशा
बनाए रखने का महामंत्र जरूर दिया है
कल तक
उसे भोगे जाने का शोक था
आज थाली उसने
खुद अपने हाथों सजाई है
आज उसके पास अपने चुनाव की
तोशक है तकिया-रजाई है
कलकल बहता कल
है सबसे बड़ा झूठ
भविष्य के सत्य दर्शन से
हमारे समय की नायिका का
है लिवइन रिलेशन
एक आधुनिका
कितनी स्वच्छंद
कितनी निद्र्वंद्व हो सकती है
उसकी हिमाकत
कितनी हो सकती है बोल्ड
अगर पढ़ना है इस लिखावट को तो
उन मेडिकल रिपोर्टों को
मेज पर रखना होगा
जिसमें किसी प्रेमी के बाप बन जाने का डर
किसी आधुनिका के मां बन जाने के
आत्महंता साक्ष्य से खेलता है गलबहियां
कभी सरेआम
तो कभी अंधेरे में लुकाछिपी के साथ
प्रेम की टहनी आैर कली कही जाने वाली
नायिकाओं ने दूसरों के हाथों में अब
रंग-बिरंगे बैलून होने से
कर दिया है इनकार
रोने-बिसुरने आैर तकिए गीले करने का
उनका अनुभव
उनका अवसाद
अब उनका क्षोभ है
यह प्रेम का नहीं
एक प्रेमिका का
अपने समय की कुलीनता के प्रति
हार्दिक विरोध है
बुधवार, 13 अक्टूबर 2010
नंगी पीठ पर
पहला शब्द पुरुष
फिर चुनिंदा फूल
और भीना-भीना प्यार
गोदने की तरह
चमड़ी में उतरे हैं शब्द कई
नीले-नीले हरे कत्थई
नंगी पीठ पर उसकी
थोड़ा ऊपर
बस वहीं
एकदम पास
उत्तेजना की चरमस्थली
स्पर्शसुख का जैकपॉट
शादी की पहली वर्षगांठ पर
वह सिर्फ पति नहीं
उस कला संग्राहलय का
मालिक भी है
जहां के हर बुत में
उतनी ही जान है
जितनी हथेली और
नाखूनों को चाहिए
सदस्यता लें
संदेश (Atom)







