सोमवार, 17 जून 2013

चलो अमेरिका

1999 में पीयूष झा की एक फिल्म आई थी चलो अमेरिका। इसमें वह पूरी मानसिकता चित्रित की गई थी कि आज के भारतीय युवाओं के लिए अमेरिका और वहां जाने का मतलब क्या है। यही नहीं अगर वह अमेरिका की धरती पर पैर नहीं रखता है तो कैसे उसके जीवन के सारे अरमान बिखर जाते हैं। जिंदगी की बड़ी से बड़ी जद्दोजहद से बड़ा है अमेरिका जाने का वीजा हासिल करना। फिल्म के तीन प्रमुख किरदार निभा रहे निठल्ले नौजवानों की भी जिंदगी का यही सच है। उन्हें साफ लगता है कि अगर वे अमेरिका नहीं पहुंच पाते हैं तो उनकी जिंदगी का कोई मतलब नहीं है। अमेरिका से झंडे से लेकर वहां सबसे ज्यादा बिकने वाले मारलबोरो सिगरेट की बात हो, ये सब इन युवकों को आकर्षित करते हैं।
फिल्म चूंकि हास्य प्रधान है इसलिए फिल्मकार पीयूष ने कई जगहों पर चुहलबाजी के बीच यह दिखाया गया है कि अमेरिका महज एक देश नहीं बल्कि एक ब्रांड भी है, जिसको लेकर युवाओं में एक जुनून है। तभी तो फिल्म में युवा अमेरिकी झंडे की प्रिंटिंग वाले रुमाल रखते हैं। और तो और चूंकि फिल्म में इन युवाओं के पास पैसे नहीं होते हैं इसलिए वे तमाम तरीके अपनाकर अपने को अमेरिकापरस्त दिखाने की कोशिश करते हैं। ऐसी ही एक कोशिश में वे मारलबोरो सिगरेट के खाली डिब्बे में देसी सिगरेट रखकर पीते हैं।
इस फिल्म को बने एक दशक से ज्यादा का समय बीत गया है। क्लिंटन के बाद अब ओबामा में लोग ग्लोबल लीडर की छवि देख रहे हैं, उनके चित्रों वाले टीशर्ट पहन रहे हैं, घरों में उनकेे पोस्टर चिपका रहे हैं, बाजार से उनकी जीवनी खरीदकर पढ़ रहे हैं। इस दौरान अगर नहीं कुछ बदला है तो वह है भारतीय युवाओं में अमेरिका के प्रति बढ़ा लगाव। चेतन भगत की शब्दावली में कहें तो अमेरिका उनके लिए ड्रीम और डेस्टिनेशन एक साथ है। हालांकि जब हम ऐसा कहते हैं तो हमारी आंखों के सामने वे युवा होते हैं जो शहरी हैं और जिन्होंने भारत में ग्लोबल विकास के दौर में अपनी आंखें खोली हैं। 

गांधी नहीं जाना चाहते थे अमेरिका


यह एक अजीब बात है कि महात्मा गांधी कभी अमेरिका नहीं गए। यही नहीं अपने वहां कभी न जाने के फैसले को लेकर उन्होंने अमेरिका को लेकर काफी तल्ख टिप्पणी भी की था। अमेरिका ने जब दूसरे विश्व युद्ध के दौरान 1945 में जापान पर एटम बम बरसाया तो मानवता के खिलाफ इस क्रूरतम कार्रवाई को लेकर लोग उनकी प्रतिक्रिया जानना चाहते थे। खासतौर पर उनके कई अमेरिकी समर्थकों ने उनसे बार-बार पूछा कि अमेरिकी मानसिकता को लेकर वे विश्व को कोई संदेश क्यों नहीं देते।
महात्मा से ऐसे प्रश्न करने का मकसद था कि दुनिया भर में एक संदेश जाए कि अहिंसा का यह पुजारी अमेरिका के इस कृत्य की किन शब्दों में भर्त्सना करता है। लोगों को आशा थी कि कि गांधी अगर ऐसा कुछ कहेंगे तो दुनिया में हिंसा के खिलाफ एक जागरूकता तो पैदा भी होगी अमेरिका में भी लोग हिंसक कृत्यों के खिलाफ एक मानसिकता बनेगी। पर गांधी ने इससे ज्यादा कुछ नहीं कहा कि वे इस जीवन में कभी अमेरिका नहीं जाना चाहेंगे। यह बात उन्होंने किस सख्त लहजे में कही इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अमेरिकी हुक्मरानों के साथ अमेरिकियों के लिए भी यह कहा कि ये पैसे को भगवान की तरह पूजने वाले लोग हैं।
लिहाजा, ऐसे देश में जाने और वहां के लोगों से संवाद करने का वे कभी सोचते भी नहीं है। अपनी इस टिप्पणी के साथ गांधी यह भी जोड़ते हैं कि शायद अमेरिका को लेकर उनकी राय और भावनाओं को दुनिया अभी नहीं समझे। शायद गांधी ने आज के उस दौर की कल्पना तभी कर ली थी जब विकास और आधुनिकता की सारी समझ अमेरिकी रंग में रंगी दिखती है। आज अमेरिका पढ़ाई से लेकर नौकरी और मौज-मस्ती के लिए एक फाइनल डेस्टिनेशन की तरहभारत समेत दुनिया के और मुल्कों में देखा जा रहा है। गांधी की बात अमेरिका को लेकर हमें अपनी धारणा बनाने से भले न रोक पाए, पर सचेत तो वह करता ही है कि हमारी हिमायत जिस तरफ झुकी है, वह देश और उससे जुड़ी सोच क्या कल्याणकारी है।

रविवार, 3 मार्च 2013

खूनी हिमाकत और घाटी में पंचायत


अभी यासीन मलिक चर्चा में थे। उन्होंने घाटी की स्थिति को लेकर अपने विवादास्पद से ज्यादा संदेहास्पद स्टैंड को दुनिया के सामने रखने के लिए 'पाक धरती' चुनी। इस पाक सरजमीं पर उन्हें हाफिज सइद तक की मौजूदगी नागवार न गुजरी। भारत सरकार इस सबके बावजूद थोड़ी इत्मिनान में है तो उसकी वजह है। दरअसल जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र बहाल है। वहां पंचायत से लेकर विधानसभा तक चुने हुए प्रतिनिधि शासन व्यवस्था को संभाल रहे हैं। यह बात भारत दुनिया के किसी भी मंच पर जब कहता है तो कश्मीर समस्या को लेकर तमाम दुष्प्रचारों का वह एक तरह से मुंहतोड़ जवाब दे रहा होता है। यह जवाब खासतौर पर पाकिस्तान और उससे सुर मिलाकर चलने वाले कश्मीरी अलगवादियों को कभी भी सोहाया नहीं। 
बड़े धमाकों और कई दिनों तक चलने वाले हड़तालों के दिन अब जम्मू-कश्मीर में लद चुके हैं। जाहिर है कि इससे नफरत और टूट का खेल खेलने वालों का मनोबल टूटा है। हताशा में उनकी की गई 'पत्थरबाजी' का भी डर वहां काम नहीं कर रहा है। नतीजतन, अमन के दुश्मनों ने पिछले एक-दो सालों में अपनी रणनीति बदल ली है। उन्हें साफ लग रहा है कि सूबे में अपना प्रभाव अगर बनाए रखना है तो उन्हें वहां आए लोकतांत्रिक स्थायीत्व को डिगाना होगा। इसके लिए उन्होंने स्थानीय स्तर पर लोकतांत्रिक ढांचे को तहस-नहस करने का रास्ता चुना।
वैसे इस मंसूबे को पूरा होना उनके लिए बड़ी चुनौती है। क्योंकि सूबे में जब पंचायत चुनाव हुए थे तो मतदान का फीसद 80 से ज्यादा था। साफ है कि वहां लोकतंत्र कोई थोपी हुई स्थिति नहीं बल्कि एक आस्थापूर्ण चुनाव है। अब जबकि मौत का डर दिखाकर पंचायत प्रतिनिधियों को जबरिया इस्तीफा देने के लिए वहां मजबूर किया जा रहा है, तो इसे आतंकी आकाओं का दुस्साहस नहीं बल्कि यह उनकी कुंठा का ज्यादा बड़ा प्रमाण है।
घाटी में पंच-सरपंच मिलाकर करीब 33 हजार पंचायत प्रतिनिधि हैं। इनमें करीब 400 ने डर से इस्तीफा दे दिया है। कुछ लोग इस संख्या को 600 के करीब बताते हैं। इसी तरह दर्जनों पंचायत प्रतिनिधियों को या तो मार डाला गया है या वे आतंकी हिंसा में घायल हुए हैं। बारामूला जिले के क्रीरी क्षेत्र में एक सरपंच की गोलीबारी में मौत, इस तरह की हिंसा की ताजा घटना है। बावजूद इस हिंसक सचाई के नहीं लगता कि वहां लोकतंत्र की विकेंद्रित ताकत को समाप्त करना इतना आसान होगा।
अलबत्ता, यह जरूर है कि लोकतंत्र की जड़ों पर हिंसक प्रहार को लेकर राज्य सरकार को निश्चित रूप से प्रभावी कदम उठाने चाहिए। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को इस बाबत चिंता से कई बार अगवगत भी कराया गया है। मुख्यमंत्री ने खुद इस चुनौती को गंभीरता से कबूला भी है। राज्य सरकार ने अपनी तरफ से इस दौरान जरूर कुछ कदम भी उठाए होंगे। पर पंचायत प्रतिनिधियों की जानें अगर अब भी जा रही हैं और उनके इस्तीफे का सिलसिला अब भी रुका नहीं है, तो इसका मतलब यही है कि उमर सरकार की इसे रोकने की कोशिश असफल रही है। अच्छा होगा कि राज्य सरकार इस मुद्दे पर एकल पहल के बजाय एक राजनीतिक सर्वसम्मति के साथ कोई पहल करे।

रविवार, 20 जनवरी 2013

मीडिया से डरता है ड्रैगन


ज्यादा दिन नहीं हुए हैं, जब चीन खुली नसीहत दे रहा था कि आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में उसके विकास के डग भारत से काफी आगे हैं। एक सरकारी चीनी अखबार ने ये बातें नई दिल्ली में गैंगरेप की घटना के संदर्भ में कही थी। चीन की इस समझ पर सोशल मीडिया में इतना बवाल मचा कि वहां की सरकार को ई-विचार स्रोतों पर ताला जड़ने पर मजबूर होना पड़ा। यह कोई नई या आपवादिक स्थिति नहीं है। चीन के विकास मॉडल की हम सराहना करें या नहीं, इतनी बात तो आज चीन के अंदर-बाहर दोनों जगह समझी जा रही है कि चीन आज कहीं न कहीं उसी मुहाने पर खड़ा है, जहां दो दशक पहले सोवियत संघ खड़ा था। यह चीन और सोवियत संघ की तुलना नहीं है, बल्कि इस साम्य को रेखांकित भर करना है कि देश में लोकतांत्रिक सरोकारों को लंबे समय तक कुचलते रहने से स्थिति कैसे विस्फोटक हो जाती है।
चीन में नए नेतृत्व से जो उम्मीद थी, वह बहुत जल्द हताशा में बदलती दिख रही है। सीपीसी के नए महासचिव जिनपिंग ने इस चिंता को जरूर कबूला है कि देश में जहां भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हुई हैं, वहीं अमीर-गरीब के बीच की खाई खतरनाक रूप से बढ़ गई है। सत्तारूढ़ चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी को लेकर भी उन्होंने माना कि संगठन और कार्यकर्ता जनता से काफी कट गए हैं। बावजूद इस कबूलनामे के लगता नहीं कि चीन में सरकारी स्तर पर कोई आत्ममंथन या बदलाव की प्रक्रिया चल रही है। वहां के एक साप्ताहिक अखबार ने जब सरकारी नियंत्रण का विरोध किया तो  सत्तारूढ़ सीपीसी की तरफ से बयान आया, 'पार्टी का चीन के मीडिया पर संपूर्ण नियंत्रण है। यह बुनियादी सिद्धांत अपनी जगह अटल है।'
मीडिया पर सरकारी सेंसरशिप के खिलाफ न सिर्फ चीन में पत्रकार लामबंद हैं बल्कि उनके इस विरोध को दुनिया भर में समर्थन भी मिल रहा है। अमेरिकी विदेश विभाग की प्रवक्ता विक्टोरिया नूलैंड द्वारा चीनी और चीन में काम करने वाले विदेशी पत्रकारों की स्वतंत्रता की मांग का समर्थन करने से तो वहां की सरकार और तिलमिला गई है। उसने ऐसे किसी बाहरी समर्थन या अभियान को देश के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप करा दिया है।
साफ है कि चीन में पार्टी विचार और अनुशासन के नाम पर दमनात्मक नीतियां जारी हैं। ग्लोबल दौर में लोकतांत्रिक सरोकारों की जमीन को जिस तरह उर्वर बना दिया है, उसमें ऐसी दमनात्मक व्यवस्था बदलाव की आंधी से बहुत लंबे समय तक महफूज नहीं रह सकती। यह चेतावनी अपनी सरकार को चीन के 73 चोटी के विद्वानों ने हाल में ही दी है। बावजूद इसके स्थिति नहीं सुधरी तो 1989 के थ्यानमन विद्रोह जैसा दृश्य चीन में कभी भी प्रकट हो सकती है।  

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

पत्थर फेंक रहा हूं द्रौपदी

चंद्रकांत देवताले
देवताले पचास के दशक के आखिर में हिंदी कविता जगत में एक हस्तक्षेप के रूप में उभरते हैं और उनका यह हस्तक्षेप आगे चलकर भी न तो कभी स्थगित हुआ और न ही कमजोर पड़ा। देवताले की काव्य संवेदना पर वीरेन डंगवाल की चर्चित टिप्पणी है, कि वे 'हाशिए' के नहीं बल्कि 'परिधि' के कवि हैं। उनकी कविताओं में स्वातंत्रोत्तर भारत में जीवनमूल्यों के विघटन और विरोधाभासों को लेकर चिंता तो है ही, एक गंभीर आक्रोश और प्रतिकार भी है। अपनी रचनाधर्मिता के प्रति उनकी संलग्नता इस कारण कभी कम नहीं हुई कि अपने कई समकालीनों के मुकाबले आलोचकों ने उनको लेकर एक तंग नजरिया बनाकर रखा।
जाहिर है कि इस कारण अर्धशती से भी ज्यादा व्यापक उनके काव्य संसार को लेकर एक मुकम्मल राय तो क्या बनती, उलटे उनकी रचनात्मक प्रतिबद्धता और सरोकारों को लेकर सवाल उठाए गए। किसी ने उन्हें 'अकवि' ठहराया तो किसी ने उनकी वैचारिक समझ पर अंगुली उठाई। देवताले के मू्ल्यांकन को लेकर रही हर कसर उन्हें 2012 के साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए चुने जाने के बाद पूरी हो जाएगी, ऐसा तो नहीं कह सकते। हां, यह जरूर है कि इस कारण उनको लेकर नई पीढ़ी को एक आग्रहमुक्त राय बनाने में मदद मिलेगी। देवताले को यह सम्मान उनके 2010 में प्रकाशित काव्य संग्रह 'पत्थर फेंक रहा हूं' के लिए दिया गया है। यह उनकी एक महत्वपूर्ण काव्य पुस्तक है, लेकिन सर्वश्रेष्ठ नहीं। 'भूखंड तप रहा है' और 'लकड़बग्घा हंस रहा है', 'पत्थर की बेंच' और 'आग हर चीज में बताई गई थी' जैसे उनके काव्य संकलन उनकी रचनात्मक शिनाख्त को कहीं ज्यादा गढ़ते हैं।
बहरहाल, यह विवाद का विषय नहीं है। वैसे भी अकादमी सम्मान के बारे में कहा जाता है कि यह भले किसी एक कृति के लिए दिया जाता हो, पर यह कहीं न कहीं पुरस्कृत साहित्याकार के संपूर्ण कृतित्व का अनुमोदन है। इस कारण एक उम्मीद यह जरूर बंधती है कि देवताले के काव्य बोध और उनके विपुल कवि कर्म का पुनरावलोकन करने की आलोचकीय दरकार देर से ही सही लेकिन अब पूरी होगी। इस तरह की दरकारों का जीवित रहना और उनका पूरा होना मौजूदा दौर में इसलिए भी जरूरी है क्योंकि समय, समाज और संवेदना का अंतजर्गत आज सर्वाधिक विपन्नता का संकट झेल रहा है। मानव मूल्यों के विखंडन को नए विकासवादी सरोकारों के लिए जरूरी मान लिया गया है। यह एक खतरनाक स्थिति है पर इस खतरे को रेखांकित करने का जोखिम कोई लेना नहीं चाहता है।
देवताले हिंदी की अक्षर संवेदना को बनाए और बचाए रखने वाले महत्वपूर्ण कवियों में हैं। हिंदी का मौजूदा रचना जगत  सार्वकालिकता के बजाय तात्कालिक मूल्य बोधों को पकड़ने के प्रति ज्यादा मोहग्रस्त मालूम पड़ता है। यही कारण है कि टिकाऊ रचानकर्म का अभाव आज हिंदी साहित्य की एक बड़ी चिंता बनकर उभर रही है। देवताले इस चिंता का समाधान तो देते ही हैं, वे हमें उस चेतना से भी लैस करते हैं, जिसकी दरकार एक जीवंत आैर तत्पर नागरिक बोध के लिए है- 'मेरी किस्मत में यही अच्छा रहा/ कि आग और गुस्से ने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा/ आैर मैंने उन लोगों पर यकीन कभी नहीं किया/ जो घृणित युद्ध में शामिल हैं।' (पत्थर फेंक रहा हूं)
प्रतिभा राय
2011 के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार की घोषणा हो गई है और इस बार इसके लिए चुनी गई हैं वरिष्ठ उडि़या कथाकार प्रतिभा राय। प्रतिभा राय भारतीय साहित्यकारों की उस पीढ़ी की हैं, जिन्होंने गुलाम नहीं बल्कि स्वतंत्र भारत में अपनी आंखें खोलीं। लिहाजा, अपनी अक्षर विरासत को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें स्वतंत्र लीक गढ़ने का हौसला दिखाया। उडि़या से बाहर का रचना संसार उनके इस हौसले से ज्यादा करीब से तब परिचित हुआ, जब उनका उपन्यास आया- 'द्रौपदी'। भारतीय पौराणिक चरित्रों को लेकर नवजागरण काल से 'सुधारवादी साहित्य' लिखा जा रहा है, जिसमें ज्यादा संख्या काव्य कृतियों की है। कथा क्षेत्र में इस तरह का कोई बड़ा प्रयोग नहीं हुआ।
समाकालीन जीवन के गठन और चिंताओं को लेकर एक बात इधर खूब कही जाती है कि साहित्य के मौजूदा सरोकारों पर खरा उतरने के लिए अब 'बिंबात्मक' औजार से ज्यादा जरूरी  है- 'कथात्मक हस्तक्षेप'। मौजूदा भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति को लेकर जारी दुराग्रहों पर हमला बोलने के लिए राय ने इस दरकार को समझा। 'द्रौपदी' में वह विधवाओं के पुनर्विवाह को लेकर सामाजिक नजरिया, पति-पत्नी संबंध और स्त्री प्रेम को लेकर काफी ठोस धरातल पर संवाद करती हैं। इस संवाद में वह एक तरफ जहां पुरुषवादी आग्रहों को चुनौती देती हैं, वहीं भारतीय स्त्री के गृहस्थ जीवन को रचने वाली विसंगतिपूर्ण स्थितियों पर भी वह संवेदनात्मक सवाल खड़ी करती हैं।
बहरहाल, 'द्रौपदी' उपन्यास की रचयिता का रचना संसार काफी विषद और विविधतापूर्ण है। कथा साहित्य की विविध विधाओं के साथ कविता के क्षेत्र में भी वह अधिकारपूर्वक दाखिल हुई हैं। यही कारण है कि आज जब उन्हें भारतीय साहित्य क्षेत्र के सर्वाधिक सम्मानित आैर मान्य पुरस्कार के लिए चुना गया है तो निर्णय प्रक्रिया की तटस्थता पर भी कोई सवाल नहीं उठ रहा है। हां, यह जरूर कहा जा सकता है कि सुप्रसिद्ध उडि़या लेखक डॉ. सीताकांत महापात्र चूंकि ज्ञानपीठ चयन समिति के अध्यक्ष थे, इसलिए प्रतिभा राय के कृतित्व पर विचार करने और सर्वसम्मत निर्णय लेने में सहुलियत हुई होगी।
राय को इससे पूर्व साहित्य अकादमी और भारतीय ज्ञानपीठ का ही एक और महत्वपूर्ण पुरस्कार मूर्तिदेवी सम्मान मिल चुका है। लिहाजा उनके साहित्य को नए सिरे अनुमोदित होने की जरूरत नहीं है। उनका रचनाकर्म अभी न तो थका है और न ही विराम के करीब है, इसलिए उनसे आगे और महत्वपूर्ण साहित्यिक अवदानों की उम्मीद की जा सकती है।     

रविवार, 30 दिसंबर 2012

रविशंकर : हमारी स्थानीयता वैश्विकता के खिलाफ नहीं


चेतना और स्वतंत्रता की जो नई जमीन तैयार दुनिया में 50-60 के दशक में हो रही थी, उसमें राजनीतिक-सामाजिक विचारधारा ही नहीं संस्कृति भी एक बड़े औज़ार के रूप में काम कर रही थी। पंडित रविशंकर की नब्बे साला जिंदगी पर नजर डालें तो यह बात ज्यादा समझ में आती है। रविशंकर से पहले उनके अग्रज उदयशंकर नृत्य की तमाम शैलियों को लेकर नर्तन की एक नई सर्वसमावेशी शैली को रच रहे थे। उनका प्रयोग स्थानीयता के प्रभाव से मुक्त एक ग्लोबल प्रयोग था। 18 साल की उम्र तक रविशंकर अपने अग्रज के साथ रहे। लेकिन नृत्यकला में वैश्विक पहचान बनाने की हुलस अचानक ही बदल गई और उन्होंने सितार के तारों को अपनी आत्मा की आवाज बनाने का निर्णय कर लिया। करियर आैर सक्सेस के प्रतिस्पद्र्धी दौर में इस निर्णय के पीछे की शिद्दत को समझना थोड़ा कठिन है। रविशंकर के लिए यह निर्णय महज अपने रास्ते अपनी मंजिल पाने की धुन भर नहीं थी।
नृत्य का साथ छोड़कर वादन क्षेत्र में आने का फैसला उनके अग्रज के प्रयोगों का ही एक नया विस्तार था। अपने समय और परिवेश के साथ संवादी रिश्ते के साथ रविशंकर को यह भी लगा कि जब तक वे प्रशिक्षण से आगे साधना के रूप में संगीत से नहीं जुड़ेंगे, तब तक उनका संगीत 'अनहद' तक नहीं पहुंच पाएगा। साधना की इस शपथ को उन्होंने मैहर वाले बाबा अल्लाउद्दीन खान की शार्गिदी में और पक्का कर लिया।  फिर क्या था, सितार और रविशंकर इस तरह एक-दूसरे के पर्याय बने कि विश्व संगीत जगत भी दंग रह गया।
दिलचस्प है कि उनकी पैदाइश बनारस की थी और बनारस के बारे में कहा जाता है कि यहां की माटी-पानी का असर जिंदगी भर नहीं जाता। आज भारतीय संगीत के इस महान जादूगर के निधन पर जब भारत के साथ पूरी दुनिया उनके जीवन के स्वर्णिम सर्गों को याद कर विस्मित हो रही है, तो संगीत के भारतीय घराने की परंपरा, शैली और संभावना पर भी नए सिरे से बात हो रही है। भारत रत्न, मैग्सेसे और तीन बार ग्रैमी सम्मान से नवाजे गए रविशंकर को बीटल्स के जार्ज हैरिसन अगर विश्व संगीत के गॉडफादर मानते हैं तो इसलिए नहीं कि उन्होंने भारतीय संगीत परंपरा का साथ छोड़ धुन और साज की कोई नई वैश्विक समझ पा ली थी।
दरअसल, प्राच्य दर्शन की तरह प्राच्य संगीत भी नस्ल और सरहद की दायरेबंदी से आजाद रहा है। विश्व मानवता और उनके बीच के समन्वय, सहयोग और सौहार्द को और प्रगाढ़ करने के लिए संगीत भी एक क्रांतिकारी जरिया हो सकता है, पंडित रविशंकर ने अपनी संगीत साधना से सिद्ध करके दिखाया। आज जब ग्लोबल भाषा, व्यापार और सूचना तंत्र की बात होती है और उसमें भारत की दखल पर जोर दिया जाता है, तो लोग यह भूल जाते हैं कि भारत अपनी तरह से इस तकाजे पर शुरू से खरा उतरता आया है। यह सबक है, उन तमाम लोगों के लिए जो यह मानते हैं कि उत्तर-आधुनिकता की सीढि़यां लोक और परंपरा की भारतीय सीख के साथ नहीं चढ़ी जा सकती है।
कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुर से लेकर एमएफ हुसैन और पंडित रविशंकर तक भारत की यशस्वी सांस्कृतिक परंपरा एक ही बात बार-बार दोहराती है कि हमारी स्थानीयता वैश्विकता के खिलाफ नहीं बल्कि उसकी पूरक है, उसकी संवाहक है।