मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

गरीब हम हैं इसलिए कि तुम अमीर हो गए


भारत की गिनती जरूर आज दुनिया में चीन के बाद सबसे ज्यादा सुरक्षित और संभावनाओं से भरे इकोनमी के रूप में होती है पर देश के भीतर विकास को लेकर वर्गीय अंतर खतरनाक तरीके से बढ़ गया है। तभी अपने देश में अब सीधे विकास को लेकर बात नहीं हो रही बल्कि इसके समावेशी आयाम पर सर्वाधिक बल दिया जा रहा है। आर्थिक सोच में आया यह फर्क अकारण नहीं है।
वित्त राज्यमंत्री नमोनारायण मीणा ने संसद में ग्लोबल वेल्थ इंटेलीजेंस फर्म के हालिया सर्वे की चर्चा में बताया कि देश के चोटी के सर्वाधिक 8200 अमीर लोगों के पास करीब 945 अमेरिकी डॉलर की दौलत है, जो देश की अर्थव्यवस्था का तकरीबन 70 फीसद हिस्सा है। साफ है कि धन और साधन के असमान वितरण की चुनौती एक खतरनाक स्थिति की ओर इशारा कर रही है।
कुछ महीने पहले आए 'हंगामा' रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ था कि देश में 14 करोड़ नौनिहालों का बचपन महज इस कारण असुरक्षित और बीमार है क्योंकि वे कुपोषित हैं। अभी कुछ ही दिन हुए हैं, जब योजना आयोग की तरफ से आए निर्धनता तय करने के अतार्किक पैमाने पर संसद से लेकर सड़क तक शोर मचा। आयोग ने अपनी रपट में शहरी क्षेत्रों में रोजाना 28.65 और देहाती इलाकों में 22.42 रुपए खर्च करने वालों को गरीबी रेखा से ऊपर माना है। कहने की जरूरत नहीं कि यह आमजन के प्रति एक तंग नजरिया है।
भूले नहीं हैं लोग आज भी अर्जुन सेनगुप्ता कमेटी की उस चर्चित रपोर्ट को जिसमें दावा किया गया था कि देश की 77 फीसद आबादी 20 रुपए रोजाना से कम पर अब जीवन गुजारने को विवश है। आज जब वित्तमंत्री कड़े फैसले लेने की दरकार पर जोर देते हैं तो इसमें यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि कड़े फैसले का मतलब अब भी कर ढांचा और आयात-निर्यात नीति आदि में बदलाव मात्र हैं तो यह विकास की असमानता को तो दूर करने वाली अर्थनीति तो साबित होने से रही।
समावेशी अर्थ विकास का दर्शन अगर आज भी सरकारी जुमलेबाजी का हिस्सा भर है तो आगे देश में गरीबी-अमीरी की खाई और बढ़ेगी ही। पिछले कुछ महीनों में भारत सहित दुनिया भर में आर्थिक मोर्चे पर चिंताएं सघन हुई हैं। चार साल पहले की विश्व मंदी एक बार फिर से सिर उठा रही है और इस बार इसकी चपेट में डॉलर से लेकर यूरोजोन तक की इकोनमी के आने का अंदेशा है। ऐसे में भारत को अपने आर्थिक विकास को वर्टिकल से हॉरिजेंटल ग्रोथ की तरफ फोकस करना होगा।

रविवार, 8 अप्रैल 2012

समृद्धि के इकहरेपन के कारण

1991 से ग्लोबल विकास की दौड़ में शामिल भारत भले आज एक दमदार अर्थव्यवस्था के रूप में पूरी दुनिया में देखा जाता हो पर देश के अंदरूनी हालात अब भी खासे विरोधाभासी हैं। सुपर इकोनोमिक पावर होने की हसरत रखने वाले देश की आधी आबादी आज भी खुले में शौच को मजबूर है। इसके उलट 63.2 फीसद आबादी ऐसी है, जो मोबाइल फोन का इस्तेमाल करती है। साफ है कि विकास के नए आग्रहों ने जहां जनजीवन में स्थान बनाया है, वहीं गरीबी और पिछड़ेपन की चंगुल से अब भी लोग पूरी तरह निकल नहीं पाए हैं। गनीमत है कि गुजरे 20 सालों में विकास के इस गाढ़े होते विरोधाभास और वर्गीय अंतर को अब हमारी सरकार भी कबूलती है। समावेशी विकास की सरकारी हिमायत के पीछे कहीं न कहीं यह कबूलनामा ही है।
जनगणना-2011 के आंकड़ों के विश्लेषण में कहीं न कहीं यह तथ्य भी रेखांकित हुआ है कि देश में एक तरफ सुविधाओं के अधिकतम उपभोग की होड़ पैदा हुई है, वहीं कई ऐसे इलाके और तबके भी हैं, जहां लोगबाग आज भी विकास के बुनियादी सरोकार तक से कटे हुए हैं। देश के 49 फीसद घरों में अगर आज भी खाना पकाने के लिए सूखी लकडि़यों का इस्तेमाल होता है और नल से पेयजल की पहुंच मात्र 43 फीसद लोगों तक है, तो साफ है कि हमारी विकास नीति देश की तकरीबन आधी आबादी की जिंदगी का अंधेरा दूर करने में विफल रही है। जनगणना आंकड़ों के विश्लेषण में यह बात साफ झलकती है कि पानी-बिजली-सड़क जैसे आधाराभूत क्षेत्रों में अब भी हम काफी पीछे हैं।
मसलन, 2005 में बड़े जोर-शोर से राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतिकरण योजना की शुरुआत हुई थी। योजना का लक्ष्य 87 फीसद बगैर बिजली की सुविधा वाले घरों तक बिजली पहुंचाने की थी पर आलम यह है कि अब भी सैकड़ों गांव ऐसे हैं, जहां तक या तो यह योजना नहीं पहुंची है या फिर काम अधूरा है। पेयजल उपलब्धता आैर सफाई-स्वच्छता से संबंधित कार्यक्रमों की भी यही हालत है। दरअसल, यह स्थिति इसलिए भी है क्योंकि पिछले कुछ सालों में सरकार का ध्यान विकेंद्रित के बजाय केंद्रित विकास की तरफ ज्यादा रहा है।
नतीजा यह कि एक तरफ देशभर में अरबपतियों की गिनती लगातार बढ़ती जा रही है, वहीं कम से कम 14 करोड़ बच्चे ऐसे हैं जो कुपोषण का शिकार हैं। यह विरोधाभासी अंतर हमारे विकास और समृद्धि के इकहरेपन के कारण है। सरकार अब वर्ष 2020 को लक्ष्य करके देश को समावेशी विकास लक्ष्य की ओर ले जाने की तैयारी कर रही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अगले कुछ सालों में विकास का उजाला सबके हिस्से में आएगा।        

दो साला हार और शिक्षा का अधिकार

 दो साल हो गए शिक्षा का अधिकार कानून लागू हुए । यहां से पलटकर देखने पर रास्ता भले बहुत लंबा न दिखे पर अब तक के अनुभव कई बातें जरूर साफ करती हैं। मनरेगा जैसा ही हश्र इस कानून का भी होता दिख रहा है। प्रथम संस्था द्वारा तैयार की गई प्राथमिक शिक्षा की सालाना स्थिति पर तैयार 'असर' रिपोर्ट कहती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों में नामांकन दर तो 96.7 फीसद तक पहुंच गई है पर उपस्थिति के मामले में यह बढ़त नहीं दिखती है। 2007 की स्थिति से तुलना करें तो स्कूलों में पढ़ने पहुंचने वाले बच्चों का फीसद 2011 में 73.4 से खिसक कर 70.9 पर आ गया है। यही नहीं मुफ्त खाने का प्रलोभन परोसकर प्राथमिक शिक्षा का स्तर सुधारने का दावा करने वाली सरकारी समझ का नतीजा यह है कि न तो बच्चों को ढंग से भोजन मिल रहा है
और न ही अच्छी शिक्षा। ग्रामीण इलाकों में हालत यह है कि तीसरी जमात में पढ़ने वाले हर दस में से बमुश्किल एक या दो बच्चे ऐसे हैं, जो अक्षर पहचानत हैं। 27 फीसद ऐसे हैं जो ढंग से गिनती नहीं जानते हैं। 60 फीसद को अंकों का तो कुछ ज्ञान जरूर है पर जोड़-घटाव में उनके हाथ तंग हैं।
उत्तर भारत के कई राज्यों में खासतौर पर इस तरह की शिकायतें दर्ज की गई  और बताया गया कि कागजी खानापूर्ति के दबाव में बच्चों को कक्षाएं फलांगने की छूट जरूर दे दी जा रही हैं पर तमाम ऐसे बच्चे हैं जो पांचवीं जमात में पहुंचकर भी कक्षा दो की किताबें ढंग से नहीं पढ़ पाते। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल लगातार शिक्षा के विस्तार और तरीके में सुधार के एजेंडे पर काम कर रहे हैं। धरातल पर जो सचाई है उसका भी पता मंत्री महोदय को है पर इस नाकामी के कारणों में जाने के बजाय वे आगे की योजनाओं की गिनती बढ़ाने में व्यस्त हैं। अब जब वह यह कहते हैं कि उनका सारा जोर रटंत तालीम की जगह रचनात्मक दक्षता उन्नयन पर है तो यह समझना मुश्किल है कि वे इस लक्ष्य को आखिर हासिल कैसे करेंगे।
आंकड़े यह भी बताते हैं कि ग्रामीण और सुदूरवर्ती क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों का नेटवर्क ठप पड़ता जा रहा है। देश के 25 फीसद बच्चे अभी ही प्राइवेट स्कूलों का रुख कर चुके हैं आगे यह प्रवृत्ति और बढ़ेगी ही। केरल और मणिपुर में यह आंकड़ा अभी ही साठ फीसद के ऊपर पहुंच चुका है। लिहाजा सरकारी स्तर पर यह योजनागत सफाई जरूरी है कि वह सर्व शिक्षा का लक्ष्य अपने भरोसे पूरा करना चाहते हैं या निजी स्कूलों से। क्योंकि यह एक और खतरनाक स्थिति गांव से लेकर बड़े शहरों तक पिछले कुछ सालों में बनी है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का मानक ही प्राइवेट स्कूल हो गए हैं। जबकि सचाई यह है कि यह सिर्फ प्रचारात्मक तथ्य है। अगर दसवीं और बारहवीं के सीबीएसई नतीजे को एक पैमाना मानें तो साफ दिखेगा कि सरकारी ही अब भी तालीम के मामले में असरकारी है। लिहाजा सरकारी स्कूलों की स्थिति में सुधार के बगैर देश में शिक्षा का कोई बड़ा लक्ष्य हासिल कर पाना नामुमकिन है।  और इस नामुमकिन को बदलने के लिए हर मुमकिन कोशिश होनी ही चाहिए।

रविवार, 25 मार्च 2012

सौ साल का बिहार

बिहार अपनी राज्य स्थापना के सौ साल जिस सरकारी-असरकारी तौर पर मना रहा है, उसमें सिर्फ हर्ष या गौरवबोध शामिल नहीं है। दरअसल, यह एक ऐसा मौका है, जब यह प्रदेश अपनी शिनाख्त को नए सिरे से गढ़ना चाहता है। पिछले दो-तीन दशकों में बिहारी होना जिस तरह गरीब, अशिक्षित, असभ्य और पिछड़े होने की लांछना में तब्दील हुआ है, उसने इस प्रदेश को लेकर नए सांस्कृतिक विमर्श की दराकर पैदा की है। यह विमर्श अब बौद्धिक के साथ राजनीतिक चेतना की भी शक्ल ले रहा है। आलम यह है कि अब बिहार में हर स्तर पर विकास और समृद्धि का अपवाद होने के बजाय इसका उदाहरण बनने की भूख है।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने देश की राजधानी में जब राज्य स्थापना के शताब्दी समारोह के शुभारंभ के मौके पर यह कहा कि अगर बिहारी दिल्ली में एक दिन काम बंद कर दें तो यह महानगर ठहर जाएगा, कहीं न कहीं उस लांछना का ही राजनीतिक शैली में दिया गया जवाब था, जो पिछले वर्षों में दिल्ली और मुंबई में बिहारी अस्मिता को चोटिल करने के लिए लगाए गए थे। इस तरह की राजनीतिक प्रतिक्रिया को एक स्वस्थ परंपरा भले न ठहराया जाए पर इसके पीछे की वजहों को खारिज तो नहीं ही किया जा सकता है। आज जबकि भारतीय संघ में शामिल एक महत्वपूर्ण प्रदेश अपनी अस्मिता पर रोशनाई को रौशन पहलू में बदलने को ललक रहा है तो कुछ बातों पर ध्यान दिया जाना जरूरी है।
सबसे पहली बात तो यह कि बिहार में राजनीति से लेकर शिक्षा और कारोबार के क्षेत्र में एक बेहतर शुरुआत की अभी भूमिका भर तैयार हुई है। यह भूमिका भी जरूरी है इसलिए पिछले पांच-सात साल अगर इसमें लगे हैं तो वे फिजूल नहीं गए हैं। पर अब यहां से इस प्रदेश को आगे के लिए कदम बढ़ाने शुरू करने होंगे, साथ ही इस यात्रा में एक सातत्य भी जरूरी है। कई बार इतिहास और परंपरा का मोह मौजूदा चुनौतियों से मुंह ढांपने का बहाना भी बनता है। यह खतरा नया बिहार का सपना आंज रही सरकार के साथ उन तमाम सामाजिक-सांस्कृतिक समूहों के आगे भी है, जिनमें आज गजब का उत्साह देखने को मिल रहा है।
दूसरी बात यह कि बिहार में पिछले दो विधानसभा चुनावों के नतीजे ने जो नया और आशावादी सत्ता समीकरण पैदा किया है, वह आगे भी सशक्त और कारगर रहे इसके लिए जरूरी है कि इसके नतीजे प्रदेश की जनता को देखने को मिलें। अभी गरीबी को लेकर एक आंकड़ा योजना आयोग ने पेश किया है, इसमें बिहार सबसे नीचले पायदान पर है। विकास दर के आंकड़े और सत्ता के वर्ष गिनाने से बिहार के हिस्से आई परेशानी दूर नहीं हो सकती। उम्मीद करनी चाहिए कि बिहार को अपने शताब्दी वर्ष में जितना इतिहास से सीखने का मौका मिलेगा, उतना ही भविष्य को भी सुंदर और सुफल बनाने का भी।      

रविवार, 11 मार्च 2012

लोकतंत्र का पंचनामा


अपने यहां आलोचना की नामवरी परंपरा में भी एक बात अकसर दुहराई जाती है कि क्या दिखता है से ज्यादा जरूरी है कि हम देखते क्या हैं। छह दशक के गणतंत्रीय अनुभव में ऐसे कई मौके आए जब हमने कुछ बहुत जरूरी बहसों और सरोकारों को महज इसलिए नजरअंदाज कर दिया क्योंकि हमारी समझदारी के आग्रह कहीं और से बन-बिगड़ रहे थे। रचना और विकास के केंद्रित ढांचे को विकेंद्रित विकल्प पर तरजीह देने का फैसला ऐसा ही एक उदाहरण है।
केंद्रित सत्ता के आग्रह में योजना और विकास को कुछ हाथों से बहुत हाथों में कभी बंटने ही नहीं दिया। बाद में जब लोकतांत्रिक संस्थाओं के विकेंद्रीकरण का दबाव बढ़ा भी तो पंचायतीराज के रूप में एक आधे-अधूरे और अधिकारविहीन ढांचे को निचले स्तर पर तैयार कर लिया गया। दिलचस्प है कि भारत का लोकतंत्र पूरी दुनिया में इस मामले में सबसे भिन्न और आगे है कि हमारे यहां प्रातिनिधिक के साथ प्रतिभागिता का तंत्र है, जो जनता का और जनता के लिए तो है पर जनता द्वारा नहीं है।
चूंकि लोकतंत्र एक जीवंत और लगातार अपने अनुभवों से समृद्ध होने वाली व्यवस्था है, लिहाजा एकबारगी फिर यह बहस सतह पर आ गई है कि हम लोकतांत्रिक प्रतिनिधत्व को महत्व दें कि लोक सहभाग को। जाहिर है लोक सहभाग के अभाव में ही लोक प्रतिनिधित्व का महत्व है। ऐसे में लोकसभा-राज्यसभा और विधानसभा के मुकाबले ग्रामसभा की सर्वोपरिता पर सवाल उठाने का कम से कम कोई सैद्धांतिक कारण तो नहीं ही है।
प्रतिनिधित्व को समग्र लोक भागीदारी में बदलने के इसी आग्रह को एक बार फिर से स्वर दिया है समाजसेवी अन्ना हजारे ने। पिछले एक साल में जबसे उनके कार्य और विचार पर लोगों का ध्यान ज्यादा गया है, वे ग्रामसभा के बहाने पंचायतराज और ग्राम स्वराज की बात बार-बार करते रहे हैं। पर भ्रष्टाचार और जनलोकपाल जैसे ज्यादा दिलचस्पी के मुद्दों और फिर उन पर पक्ष-विरोध की बयानबाजी में यह जरूरी मुद्दा कहीं पीछे छूटता रहा है। देश के 63वें गणतंत्र दिवस के मौके पर हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने संघर्ष के अनुभव से कहा कि चुनाव के बाद चुने गए प्रतिनिधि जनता के सेवक की तरह नहीं बल्कि मालिक की तरह सलूक करते हैं। यह लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है। लिहाजा, ग्रामसभाओं को अधिक अधिकार संपन्न बनाकर उसकी भूमिका को ज्यादा निर्णायक बनाने के साथ पंचायतराज संस्था के सशक्तिकरण की दरकार समय की मांग है। 
सोमवार से संसद का बजट सत्र शुरू हुआ है। इस मौके पर राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के संस्थापक केएन गोविंदाचार्य ने पंचायतों के सशिक्तकरण के मुद्दे को एक नई तार्किक दरकार के साथ उठाया है। उनकी मांग है कि सरकार केंद्रीय बजट का कम से कम सात फीसद हिस्सा सीधे पंचायतों को दे। ऐसा करने से न सिर्फ लोकतंत्र का यह उपेक्षित ढांचा सशक्त होगा बल्कि राजसत्ता और अर्थसत्ता के विकेंद्रीकरण का मार्ग भी प्रशस्त होगा। शहरीकरण की बढ़ती होड़ के बावजूद आज भी देश में पांच लाख से ज्यादा गांव हैं और करीब 70 फीसद आबादी इन्हीं गांवों में रहती है। गांव और कृषि की अवहेलना करके हम एक सशक्त और विकसित भारत की कल्पना नहीं कर सकते हैं। पिछले 20 सालों में यह मांग बार- बार उठी है कि सरकार पंचायती राज संस्था को अपनी विकास योजनाओं को तय करने का अधिकार दे और इसके लिए उसे आर्थिक रूप से स्वाबलंबी बनाया जाए ताकि योजनाएं दिल्ली से चलकर गांवों तक न पहुंचे बल्कि इनका निर्धारण स्थानीय स्तर पर स्थानीय लोगों द्वारा हो। गोविंदाचार्य नए सिरे से इस मुद्दे पर दबाव बनाना चाह रहे हैं। आगे यह देखना होगा कि जो चिंता अब तक नागरिक समाज के स्तर पर है, उसके साथ सरकार कब तक और कितना जुड़ पाती है। 

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

हमें मत कहिए ग्लोबल यूथ


लोक और परंपरा के कल्याणकारी मिथकों पर भरोसा करने वाले आचार्यों की बातें अब विश्वविद्यालयों के शोधग्रंथों तक सिमट कर रह गई हैं। इन पर मनन-चिंतन करने का भारतीय समाजशास्त्रीय और सांस्कृतिक विवेक बीते दौर की बात हो चुकी है। ऐसा अगर हम कह रहे हैं तो इसलिए क्योंकि ऐसा मानने वाले आज ज्यादा है। पर तथ्य और सत्य भी यहीं आकर ठहरता है, ऐसा नहीं है। दिलचस्प है कि खुले बाजार ने अपने कपाट जितने नहीं खोले, उससे ज्यादा हमने भारतीय युवाओं के बारे में आग्रहों को खोल दिया। सेक्स, सेंसेक्स और सक्सेस के त्रिकोण में कैद नव भारतीय युवा की छवि और उपलब्धि पर सरकार और कॉरपोरेट जगत सबसे ज्यादा फिदा है। और ऐसा हो भी भला क्यों नहीं क्योंकि इसमें से एक ग्लोबल इंडिया का रास्ता बुहारने और दूसरा रास्ता बनाने में लगा है। यह भूमिका और सचाई उन सब को भाती है जो भारत में विकास और बदलाव की छवि को पिछले दो दशकों में सबसे ज्यादा चमकदार बताने के हिमायती हैं। ऐसे में कोई यह समझे कि देश की युवा आबादी का एक बड़ा हिस्सा न सिर्फ इन बदलावों के प्रति पीठ किए बैठा है बल्कि इंडिया शाइनिंग का मुहावरा ही उसके लिए अब तक अबूझ है तो हैरानी जरूर होगी। पर क्या करें सचाई जो सरजमीं है, वह हैरान करने वाली ही है।
तकरीबन तीन साल पहले अभी के महीने में ही 'इंडियन यूथ इन ए ट्रांसफॉमिंग वर्ल्ड  : एटीट¬ूड्स एंड परसेप्शन'  नाम से एक शोध अध्ययन चर्चा में थी। इसमें बताया गया था कि देश के 29 फीसद युवा ग्लोबलाइजेशन या मार्केट इकोनमी जैसे शब्दों और उसके मायने से बिल्कुल अपरिचित हैं। यही नहीं देश की जिस युवा पीढ़ी को इस इमर्जिंग फिनोमेना से अकसर जोड़कर देखा जाता है कि उनकी आस्था चुनाव या लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं व मूल्यों के प्रति लगातार छीजती जा रही है, उसके विवेक का धरातल इस पूर्वाग्रह से बिल्कुल अलग है। आज भी देश के तकरीबन आधे यानी 48 फीसद युवक ऐसे हैं, जिनका न सिर्फ भरोसा अपनी लोकतांत्रिक परंपराओं के प्रति है बल्कि वे जीवन और विकास को इससे सर्वथा जुड़ा मानते हैं।   
साफ है कि पिछले दो दशकों में देश बदला हो कि नहीं बदला हो, हमारा नजरिया समय और समाज को देखने का जरूर बदला है। नहीं तो ऐसा कतई नहीं होता कि अपनी परंपरा की गोद में खेली पीढ़ी को हम महज डॉलर, करियर, पिज्जा-बर्गर और सेलफोन से मिलकर बने परिवेश के हवाले मानकर अपनी समझदारी की पुलिया पर मनचाही आवाजाही करते। जमीनी बदलाव के चरित्र को जब भी सामाजिक और लोकतांत्रिक पुष्टि के साथ गढ़ा गया है, वह कारगर रहा है, कामयाब रहा है। एक गणतांत्रिक देश के तौर पर छह दशकों के गहन अनुभव और उसके पीछे दासता के सियाह सर्गों ने हमें यह सबक तो कम से कम नहीं सिखाया है कि विविधता और विरोधाभास से भरे इस विशाल भारत में ऊपरी तौर पर किसी बात को बिठाना आसान है। तभी तो हमारे यहां बदलाव या क्रांति की भी जो संकल्पना है, वह जड़मूल से क्रांति की है, संपूर्ण क्रांति की है।
आज पिछले बीस सालों के विकास की अंधाधुंध होड़ के बजबजाते यथार्थ को देखने के बाद यह मानने वालों की तादाद आज ज्यादा है जो यह समझते हैं कि किसानों, दस्तकारों के इस देश को अचानक ग्लोबल छतरी में समाने की नौबत पैदा की गई और यह नौबत इतनी त्रासद रही कि कम से कम ढ़ाई लाख किसान खुदकुशी के मोहताज हुए। साफ है कि ग्लोब पर इंडिया को इमर्जिंग इकोनमी पॉवर के तौर पर देखने के लिए जिन तथ्यों और तर्कों का हम सहारा ले रहे हैं, उसकी विद्रूप सचाई हमें सामने से आईना दिखाती है। सस्ते श्रम की विश्व बाजार में नीलामी कर आंकड़ों के खाने में विदेशी मुद्रा का वजन जरूर बढ़ सकता है पर यह सब देश के हर काबिल युवा के हाथ में काम के लक्ष्य और सपने को पूरा करने की राह में महज कुछ कदम ही हैं। ये कदम भी आगे जाने के बजाय या तो अब ठिठक गए हैं या फिर पीछे जाएंगे क्योंकि मेहरबानी बरसाने वाले अमेरिका जैसे देश एक बार फिर संरक्षणवादी आर्थिक हितों को अमल में लाने लगे हैं।
आखिर में एक बात और देश की लोक, परंपरा और संस्कृति के हवाले से। रूढि़यां तोड़ने से ज्यादा सांस्कृतिक स्वीकृतियों को खारिज करने के लिए बदनाम पब और लव को बराबरी का दर्जा देने वाले युवाओं की जो तस्वीर हमारी आंखों के आगे जमा दी गई है, उसके लिए शराब का सुर्ख सुरूर बहुत जरूरी है। पर दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, चंडीगढ़ आदि से आगे जैसे ही हम इंडिया से भारत की दुनिया में कदम रखते हैं, जरूरत की यह युवा दरकार खारिज होती चली जाती है। नए भारत के युवा को लेकर यहां भी एक पूर्वाग्रह टूटता है क्योंकि जिस अध्ययन का हवाला हम पहले दे चुके हैं, उसमें उभरा एक बड़ा तथ्य यह भी है 66 फीसद युवाओं के लिए आज भी शराब को हाथ लगाना जिंदगी का सबसे कठिन फैसला है। देश की अधिसंख्य युवा आबादी की ऐसी तमाम कठिनाइयों को समझे बगैर कोई सुविधाजनक राय बना लेना सचमुच बहुत खतरनाक है।




सौजन्य : राष्ट्रीय सहारा  

शनिवार, 25 फ़रवरी 2012

ओबामा बने प्रेसीडेंट तो अपने सैम बढई

अमेरिका  में जब बराक ओबामा राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतने में सफल हुए थे, तो वहां की और भारत की स्थितियों को राजनैतिक और बौद्धिक जमात के बीच कई तुलनात्मक नजरिए सामने आए। बार-बार अमेरिका के उदाहरण को सामने रखकर यह समझने की कोशिश की गई कि भारत उस उदार और विकसित राजनीतिक-सामाजिक स्थिति तक पहुंचने से कितनी दूर है, जब हम भी अपने यहां एक दलित को या एक मुसलमान को प्रधानमंत्री पद पर बैठा देखेंगे। जो बात ज्यादा भरोसे से और तार्किक तरीके से समझ में आई वह यही कि विकास और संपन्नता मध्यकालीन और जातीय बेडि़यों को तोड़ने का सबसे मुफीद औजार है। अमेरिका में ये औजार सबसे ज्यादा तेजी से काम कर रहे हैं। इसलिए वहां चेंज को अलग से चेज करने की जरूरत अब नहीं है। पर क्या भारत भी अपनी विकासयात्रा में उन्हीं सोपानों पर पहुंच रहा है, जहां चेंज कोई चैलेंज न होकर एक स्वभाविक स्थिति बन जाती है। अगर आपका उत्तर है तो आपको अपने सैद्धांतिक आधारों पर एक बार फिर विचार करना होगा? दरअसल, यह दरकार कहीं और से नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के हालात के बीच से आए हैं। 2014 के आम चुनाव में यूपी के चुनावी गणित कितने काम आएंगे, पता नहीं। पर सभी सियासी पार्टियां इसे दिल्ली की सत्ता के सेमीफाइनल के तौर पर ही लड़ रही हैं। आरक्षण का खुर्शीदी-बेनी खेल पहले ही बोतल से बाहर आ गया है। रही सही कसर जातीय राजनीति को लेकर खेले गए नंगे खेल ने पूरा कर दिया है। क्षेत्रीय प्रभाव रखने वाले दलों की मजबूरी तो छोड़ दें, कांग्रेस और भाजपा जैसे राष्ट्रीय प्रभाव और विस्तार वाले दलों ने भी विकास व भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को छोड़कर क्षेत्र और जाति की राजनीति पर अपना यकीन ज्यादा दिखाया। बाबूसिंह कुशवाहा मामले में भाजपा ने जहां आंतरिक विरोध तक को सुनना गंवारा नहीं किया, वहीं रियल और  फेयर पॉलिटिक्स के हिमायती राहुल गांधी ने चुनावी सभा में सैम पित्रोदा को विश्वकर्मा जाति का बताकर केंद्र में अपने पिता राजीव गांधी के कार्यकाल के आईटी विकास को जातीय तर्कों पर उतारने को मजबूर हुए। 
विकास को सामाजिक न्याय की समावेशी संगति पर खरा उतारना तो समझ में आता है पर इसे सीधे-सीधे जातीयता की जमीन पर ला पटकना खतरनाक है। इस लिहाज से कांग्रेस पार्टी की इस हिमाकत को सबसे बड़ा मर्यादा उल्लंघन ठहराया जा सकता है, जब उसने देश में आईटी क्रांति के प्रणेता रहे सैम पित्रोदा को जातीय राजनीति के चौसर पर पासे की तरह फेंका। यह गलती नहीं बल्कि कांग्रेस की एक सोची-समझी चुनावी रणनीति है, यह तब ज्यादा जाहिर हुआ जब पार्टी ने यूपी में अपना चुनाव घोषणा पत्र जारी करते हुए सैम को मीडिया से मुखातिब कराया। 
सैम अगर सबके सामने कैलकुलेटेड ढिठाई से यह कहते कि 'मैं बढ़ई का बेटा हूं और अपनी जाति पर मुझे फख्र है', तो कांग्रेस का उनको लेकर खेला गया चुनावी खेल तो समझ में आता है पर सैम को क्या पड़ी थी कि वह खुद को इस खेल में इस्तेमाल हो जाने दे रहे हैं। क्या सैम की यह बढ़ईगिरी विकास को भी जातिगत शिनाख्त देने की दरकार को खतरनाक अंजामों तक नहीं ले जाएगी। राजीव गांधी के जमाने का आईटी 21वीं सदी के एक दशक बीतते-बीतते कहां पहुंच गई, आप समझ सकते हैं।