मंगलवार, 10 मई 2011

दुष्कर्म पर कामिनी लॉ


देश में कविताई तक के लिए इतनी गरिमा का ध्यान रखा गया  कि वर्णन अगर 'स्वकीया प्रेम' का है तब तो ठीक है, 'परकीया प्रेम' को अवहेलनीय करार दिया गया। रीति और प्रगति की बदलावकारी बेला में हालांकि साहित्य की ये मर्यादाएं भी टूटीं। व्यावहारिकता को सचाई की ऐसी कसौटी माना गया, जिसमें 'क्या हो' की बजाय 'क्या है' का वर्णन जरूरी करार दिया गया। साहित्य जिस समाज से स्याही और कागज लेता है अपनी अक्षर दुनिया रचने के लिए, आज उसका सच तल्ख ही नहीं काफी हद तक क्रूर और वीभत्स हो चुका है। यही वजह है कि प्रेम का सदेह और संदेह भरा होना, स्त्री-पुरुष संबंध की आखिरी इबारत हो गई। संबधों के बांध से छलकी इच्छाओं में क्या कुछ और कितना कुछ डूबा या डूबेगा, आज इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है।
महिला आयोग से लेकर पुलिस की अपराध शाखा तक दर्जनों रिपोर्ट इस बात की खुली गवाही देती हैं कि महिला यौन उत्पीड़न के सबसे ज्यादा मामले उस परिवार और सामाजिक दायरे के बीच से सामने आ रहे हैं, जहां सुरक्षा और देखरेख की गारंटी सबसे ज्यादा है। नाबालिग से दुष्कर्म के हालिया एक मामले में दिल्ली की एक अदालत की जज कामिनी लॉ ने ऐसे दोषियों का बंध्याकरण तक कराने की मांग को कानूनी मान्यता देने की सिफारिश की है। दिलचस्प है कि जिस मामले में दोषी पुरुष को इस तरह का सबक सिखाने की बात कही गई है, वह कोई और नहीं उस अभागी बेटी का बाप है, जिसके शील को उसके पिता ने ही भंग कर दिया। कहने के लिए अभियुक्त बेटी का पिता तो है लेकिन सौतेला। गौरतलब है कि इस मामले में पीड़ित बेटी की मां को भी पुलिस ने सहअपराधी बनाया था।
साफ है कि अपराध से पहले संबंधों के वे डोर उलझे और टूटे हैं, जिसमें गलती से एक गांठ भी लग जाए तो आजीवन उसकी ऐंठन बनी रहती है। समाज, परिवार और परंपरा की जिस पाकिजगी ने सामाजिकता के सर्वाधिक सुलेख और आख्यान लिखे हैं, मौजूदा दौर में वह त्रियक ही सबसे ज्यादा आहत और क्षिन्न-भिन्न है। दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि सुविधा और परमभोग की स्वीकार्यता आधुनिकता और विकास की सीढ़ियां बन चुके हैं। ये वही सीढ़ियां हैं, जो हमारे बेडरूम और डायनिंग रूम ही नहीं पहुंचते, सीधे-सीधे मन-मिजाज के भीतरी कोनों तक दाखिल होते हैं। अदालत और कानून के रास्ते जिस न्यायिक सक्रियता ने पिछले दिनों काफी चीजों को लीक पर लाने की कोशिश की है, उसकी भी अपनी सीमा है।
सरकार और समाज के हर दोष या अपराध के लिए कानून की देवी के आगे याचक बन जाना भी कोई बुद्धिमानी नहीं। जज कामिनी लॉ ने जिस सख्ती की वकालत की है, वह दुनिया के कई विकसित देशों में कानूनी तौर पर मान्य भी है। यह भी नहीं कह सकते कि इसका कोई असर वहां अपराध को कम करने पर नहीं पड़ा हो। कानूनी भय की एक अपनी भूमिका है और यह भूमिका जारी रहे, अपराधमुक्त नागरिक समाज के लिए यह जरूरी भी है। पर जिस खास मामले में जज ने इस तरह की दरकार को रेखांकित किया है, वह गंभीर तो है ही कई मायने में विलक्षण भी है। संबंधों के बांध स्वेच्छा से लांघते जाने की छूट अगर बनी रहेगी और विवाह-परिवार जैसी संस्थाओं को विघटनकारी हस्तक्षेपों से बचाने की हमारी तत्परता अगर प्रभावी नहीं होती, तब तक 'परकीया' का पराभव 'स्वकीया' के मुकाबले मुश्किल है।

रविवार, 8 मई 2011

देस में मना परदेस में अन्ना


दूर होकर भी हम किसी के बेहद करीब हो सकते हैं और कोई बेहद नजदीक होकर भी हमारा नहीं होता। ये बातें प्रेमाख्यानों और कविताई में ही नहीं, जिंदगी की कई दूसरी सूरतों में भी हम बारहा महसूस करते हैं। असल में दूरी और नजदीकी का सच समय, स्थान और परिवेश के साथ बदलता है। कहा यह भी जाता है कि दूरी हमारी पहचान के गाढ़ेपन को तो हल्का करती है पर उसके दायरे को बढ़ा देती है। नजरिया, मजहब, राजनीति, स्थान और बोली के अंतर देश में जिस अनेकता की लकीरों के रूप में दिखते हैं, देश के बाहर वही अनेकता हमें एकता के सूत्र में बांधती है। दूरी और मनुष्य के रिश्ते का यह मनोवैज्ञानिक सच तो है ही उसके सामाजिक और सार्वजनिक सलूक से जुड़ी बुनियादी बात भी है।
जिस अन्ना हजारे को अपने देश में और अपनी सरकार से अपनी बातें कहने-मनवाने के लिए 98 घंटे का अनशन करना पड़ा, उसी को लेकर सरकार को जब देश के बाहर अपनी बातें कहनी होती है तो वह इसे किसी टकराव या मतभेद के बजाय बहुदलीय लोकतंत्र प्रणाली का नया आयाम बताती है। वित्त मंत्री प्रणव मुख़र्जी उस लोकपाल बिल प्रारूप समिति के अध्यक्ष हैं, जिनमें पांच सदस्य सरकार की तरफ से और पांच सदस्य नागरिक समाज की नुमाइंदगी कर रहे हैं। स्वतंत्र भारत की इतिहास में यह अभिनव प्रयोग है, जब कानून बनान के लिए सामज और सरकार एक साथ बैठी है। चूंकि प्रयोग नया है, लिहाजा इस पर प्रतिक्रियाएं भी कई तरह की हैं। सरकार के साथ राजनीतिक बिरादरी में अभी तक इस बात को लेकर बयानबाजी जारी है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना का प्रयोग सैद्धांतिक तकाजों पर कितना खरा या खतरनाक है। पर ये बातें देश के भीतर जिस तरह की प्रतिक्रिया को जन्म दे रही हैं, देश की सीमा से बाहर उसका स्वरूप इससे नितांत भिन्न है। अमेरिका से लेकर यूके और फ्रांस तक में अन्ना के सत्याग्रही प्रयोग के कई प्रशंसक हैं और वे अपने-अपने तरह से इस पहल को ग्लोबल बनाने के लिए प्रयासरत भी हैं।

इस स्थिति से सरकार भी अवगत है और वह इसे लोकतांत्रिक ढांचे के सशक्तिकरण की कोशिश के रूप में ही दुनिया के आगे रखना चाहती है। तभी तो एशियाई विकास बैंक की बैठक के दौरान जब प्रणव मुखर्जी को जब अन्ना हजारे को लेकर प्रतिक्रिया जतानी पड़ी तो वह यह स्वीकार करने में जरा भी नहीं हिचके कि लोकपाल मुद्दे पर सामाजिक संगठनों के दबाव में सरकार को तत्काल कार्रवाई करनी पड़ी क्योंकि कोई भी जिम्मेदार और जवाबदेह सरकार इसकी अनदेखी नहीं कर सकती। मुखर्जी एक वरिष्ठ राजनेता हैं। वह यह जानते हैं कि लोकतंत्र की मर्यादाएं क्या हैं और किस तरह असहमतियों के बीच सहमति की गुंजाइश निकालनी पड़ती है। तभी तो वे इस मौके पर यह कहना भी नहीं भूले कि सरकार की कार्यप्रणाली के विभिन्न पहलू पारदर्शी, जवाबदेह और भ्रष्टाचार मुक्त तो होना ही चाहिए।
देश के बाहर देश की जिस तस्वीर को हम निहायत ही भावुकता के साथ बनाते हैं, उस तस्वीर का सच देश के भीतर भी प्रकट हो तो विचार और वस्तुस्थिति की अनेकता के बीच एकता कायम होगी। लोकपाल बिल प्रारूप समिति की अभी तीन बैठकें हुई हैं। बैठक के टेबल से सहयोग और सौहार्द का संदेश ही बाहर जाए ऐसी कोशिश दोनों पक्षों की तरफ से रही है। देश के भीतर भी ऐसा ही माहौल रहे तो बड़ी बात होगी। क्योंकि परेदस में देस याद आना और देस में इस याद का बिसर जाना खतरनाक है। यह बात कोई और समझे न समझे प्रणव दा तो जरूर समझते होंगे।

गुरुवार, 5 मई 2011

अमूल बेबी की आरटीआई : जागरण में ‘पूरबिया’

राहुल का  भारतीय राजनीति के सबसे ख्यात और शक्तिशाली परिवार से आते हैं, उनकी पार्टी कांग्रेस भी देश की आज तक नंबर एक राजनीतिक पार्टी है। अगर लोगों के बीच जाना, उनसे जुड़ना, उन्हें समझना और लोक संवाद के जरिए लगातार संघर्ष के लिए तत्पर बने रहना राजनीति की कम से कम वह सीख तो नहीं ही है जिसमें एक तरफ जहां प्याली में क्रांति उबलती है, वहीं दूसरी तरफ लाल बत्ती से नेतृत्व का कद तय होता है। राहुल को लेकर एक राय यह भी है कि धैर्य और सरलता की राह उनकी नीति से ज्यादा रणनीति है। एक ऐसी रणनीति जो उनकी भविष्य में होने वाली ताजपोशी के लिए बनाई गई है। अगर यह बात सही है तो यह जनता के साथ एक और विश्वासघात होगा और लोकतंत्र में लोक की आस्था और भरोसे से खिलवाड़ का खामियाजा बहुत बड़ा है। राहुल को यह भी अभी से समझ लेना होगा...  


मंगलवार, 3 मई 2011

अमूल बेबी को भाई आरटीआई


संघर्ष लोकतंत्र में हमेशा जारी रहने वाली प्रक्रिया है। जिस राजनीति को हम सिर्फ सत्ता की दखली और बेदखली से जोड़कर देखते हैं, वह उस पूरी राजनीति के औचित्य का लेश मात्र भी नहीं, जिसकी एक बेहतर लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए दरकार है। यह बातें इसलिए भी समझनी होगी क्योंकि हमें यह लगता है कि नेता और जनता हमेशा एक-दूसरे के खिलाफ होते हैं, यही उनकी फितरत भी है और यही मौजूदा हालात में सतह पर आई सचाई भी है। दरअसल, राजनीति और संघर्ष के लोकतांत्रिक तकाजे जनता से जुड़े हैं, जनता के लिए हैं। इसलिए जन सरोकार से अलग या उसके उलट न तो कोई दूसरा सरोकार लोकतंत्र में मान्य है और न ही कोई दूसरा रास्ता। साफ है कि लोकतंत्र की ताकत अगर लोक है तो सत्ता और शक्ति के किसी दूसरे केंद्र का ताकतवर होना खतरनाक है। यही बात लोकतांत्रिक संघर्षों को लेकर भी है।
यह कहीं से मुनासिब नहीं कि 'राजपथ' का महत्व 'जनपथ' से ज्यादा हो। अगर जनता और नेता के संघर्ष के औजार भिन्न होंगे तो इसका मतलब है कि लोक के लोप की कीमत पर नेता नेतागीरी का स्कोप देख रहे हैं। जिन लोगों को भारतीय राजनीति में राहुल गांधी के आगमन और आगे बढ़ने के उनके सीधे-सरल लोकतांत्रिक तरीके पर जरा भी यकीन हो, उन्हें यह जानना अच्छा लगा होगा कि सरकारी योजनाओं में घपलों-घोटालों को उजागर करने के लिए उन्होंने ओरटीआई को हथियार बनाया है। इसके लिए उन्होंने न सिर्फ खुद से अर्जी लगाई बल्कि यह दिखाया भी कि नेतागीरी की धौंस और सत्ता की पागल कर देने वाली राजनीति में उनका कोई यकीन नहीं। कलावती की झोपड़ी में रात बिताकर परिवर्तन के सवेरे की बात करने वाले इस युवा नेता की कथनी और करनी अगर सचमुच एकमेक है तो यह बड़ी बात है।
राहुल भारतीय राजनीति के सबसे ख्यात और शक्तिशाली परिवार से आते हैं, उनकी पार्टी कांग्रेस भी देश की आज तक नंबर एक राजनीतिक पार्टी है। अगर लोगों के बीच जाना, उनसे जुड़ना, उन्हें समझना और लोक संवाद के जरिए लगातार संघर्ष के लिए तत्पर बने रहना राजनीति की कम से कम वह सीख तो नहीं ही है जिसमें एक तरफ जहां प्याली में क्रांति उबलती है, वहीं दूसरी तरफ लाल बत्ती से नेतृत्व का कद तय होता है। राहुल को लेकर एक राय यह भी है कि धैर्य और सरलता की राह उनकी नीति से ज्यादा रणनीति है। एक ऐसी रणनीति जो उनकी भविष्य में होने वाली ताजपोशी के लिए बनाई गई है। अगर यह बात सही है तो यह जनता के साथ एक और विश्वासघात होगा और लोकतंत्र में लोक की आस्था और भरोसे से खिलवाड़ का खामियाजा बहुत बड़ा है। राहुल को यह भी अभी से समझ लेना होगा।  
पिछले दिनों में कई ऐसी पहलें हुई हैं जिसमें आरटीआई सरकार के अपने कामकाज के साथ व्यवस्थापिका की कमजोरियों को तथ्यगत तौर पर उजागर करने का हथियार बना है। इस कारण कई मौके पर जहां जरूरी कदम उठाए गए, वहीं कई मामलों में अदालत तक ने सार्थक हस्तक्षेप किया। अभी नागरिक समाज की सजगता से भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल बिल को लेकर जो मुहिम आगे बढ़ रही है उसके आगाज के पीछे भी आरटीआई कार्यकर्ताओं की सफलता ही है। दरअसल, यह एक ऐसी कानूनी ताकत है जिसके माध्यम से जनता सरकारी कामकाज, उसके खर्च ब्योरे और तौर-तरीकों पर सीधे सवाल उठा सकती है। सरकार और व्यवस्था के कामकाज का इस तरह सार्वजनिक होना, जहां उनकी विश्वसनीयता को बहाल करने का कारगर जरिया बना है, वहीं जनता को भी भरोसा हुआ है कि उसकी योजनाओं और उसके हक के साधनों की गिद्ध लूट अब संभव नहीं।

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

अपसेट कर गया लांसेट


लांसेट की रिर्पोट हमेशा से ही हंगामाखेज रही हैं। इससे पहले जब उसने युवाओं में लैंगिक रूप में सेक्स प्रवृत्तियों में आए बदलाव का जिक्र किया था, तो आरोप यहां तक लगे थे कि वह कंडोम बनाने वाले एक अंतरराष्ट्रीय ब्रांड के लिए काम कर रही है। सेक्स सर्वे चर्चा को सतह पर लाने का आज एक माना हुआ जरिया हो गया है  और इसका इस्तेमाल ठंडे कमरों में क्रांति की आंच पैदा करने वाले एक्टिविस्टों से लेकर मीडिया तक के लिए दौड़ में बने रहने का सबसे आसन्न औजार बन गया है।
बहरहाल, बात लांसेट के हालिया अध्ययनों की। महज कुछ ही दिनों के अंतराल पर उसकी यह दूसरी रिपोर्ट है, जिसने भारत सहित कई देशों की एक ऐसी तस्वीर दुनिया के सामने रखी है, जो न सिर्फ चिंता बढ़ाने वाली है बल्कि आईना दिखाने वाली भी है। दिल्ली में मिलने वाले पेयजल में सुपरबग मिलने के खुलासे पर बवाल अभी थमा भी नहीं था कि इस प्रसिद्ध मेडिकल जर्नल ने यह आकलन छापकर सनसनी मचा दी कि दुनिया में हर रोज सात हजार से ज्यादा मृत बच्चे पैदा होते हैं। दिलचस्प है कि इनमें 68 फीसद मृत बच्चे मारत, चीन और बांग्लादेश सहित दस देशों में पैदा होते हैं। लांसेट ने अपने विश्लेषण में इस समस्या को सीधे आमदनी से जोड़ा है। उसके मुताबिक 98 फीसद मृत बच्चे उन देशों में पैदा हुए जहां आमदनी कम है।
भारत की गिनती भी अगर विपन्नता के मारे ऐसे देशों में होती है तो इसकी वजह  यह नहीं है कि हमारे यहां अरबपतियों या धनकुबेरों की कोई कमी है। फोर्ब्स जो सूचियां दुनियाभर के रइसों की छापती है, उनमें भारतीयों का दबदबा लगातार कायम है। पर अमीरी और संपन्नता की गाढ़ी मलाई जिस दूध-पानी पर तैर रही है, उसकी सचाई अब भी खासी स्याह है। लांसेट के नए खुलासे भी इस तथ्य पर मुहर लगाते हैं। आलम यह है कि जो देश अपनी शिनाख्त को पिछले तकरीबन दो-ढ़ाई दशकों में लगातार एक बड़ी इकोनमी पावर के रूप में शिद्दत से गढ़ने में लगा है, वह कोख में नौ माह तक पलने के बाद एक नवजात को दुनिया का मुंह तक देख पाने की वांछित स्थिति और  सुविधाएं मुहैया कराने में सबसे पिछड़ा है।
विकास का यह कोढ़ कम से कम हमारे उद्यम और संपन्नता के आंकड़ों  और दावों को तो किसी सूरत में मानवीय नहीं ठहराते। अच्छी बात यह है कि अब विकास के इस विरोधाभास को सरकार  और  उसके योजनकार भी नकारने की बजाय मानने लगे हैं तभी तो विकास की सरपट और प्रतिस्पर्धी दौर में मैदान मारने के बजाय बात अब हो रही है इन्कलूसिव डेवलपमेंट यानी समावेशी विकास की। पंचायतों के सशक्तिकरण से विकास योजनाओं को अमली जाम पहनाने के तंत्र का जो विकेंद्रित रूप सामने आया है, उससे अब गैरबराबरी वाले विकास की खाई को पाटने में मदद मिल रही है। पर अभी यह आगाज मात्र है। सरकार को अपने प्रयासों को इस दिशा में अभी और सघन और कारगर बनाना पड़ेगा तभी गांव-देहातों में स्वास्थ्य सुविधा की बात करें या जच्चा-बच्चा की सुरक्षा की, हमारे देश-समाज का हर हिस्सा हर लिहाज से संपन्न, सुरक्षित और  विकसित हो सकेगा। 'गरीबी हटाओ' भारतीय लोकतंत्र में लोकप्रियता हासिल करने का अब तक का सबसे कारगर नारा रहा है। दिल्ली में अभी जो सरकार सत्ता में अपनी दूसरी पारी खेल रही है, उसने भी अपनी सफलता की वजह गांव और गरीब तक पहुंचने वाली मनरेगा जैसी योजना को ही माना है। पिछले कई चुनावों में वोटरों ने तमाम दूसरे वादों के बजाय क्षेत्र के विकास को ज्यादा महत्व देकर अपनी मानसिकता और इरादे में आए फर्क को दर्ज कराया है। क्या अगले कुछ सालों में भारत की खुशहाली का वह चेहरा दुनिया के सामने होगा, जिसमें उसका हर वर्ग, हर इलाका इतना संपन्न आैर खुशहाल हो कि उसका कोई विलोमी पक्ष कहीं से भी रेखांकित न हो। अगर उम्मीद की यह तस्वीर अब भी बेरंग और  बेनूर है तो यह सचमुच एक खतरनाक स्थिति है।        

रविवार, 10 अप्रैल 2011

जन आंदोलनों का जंतर मंतर

जब इस देश के नेताओं में
लूट प्रवृति आम हो गई...
पूछ रही है चंबल घाटी
मैं ही क्यों बदनाम हो गई...

यह गीत बिहार के वरिष्ठ सर्वोदयी साथी रामशरण भाई का है। इसे वे जेपी आंदोलन और बाद के दिनों में गाते थे। डफली के साथ झूम-झूमकर जब वे गाते थे...तो लोग बस उनसे जुड़ते चले जाते थे। उनके इस जादू का साक्षी बिनोवा-जेपी के दौर के लाखों-हजारों लोग से लेकर जेएनयू कैंपस तक रहा है। अपने तकरीबन दस साल के सामाजिक जीवन और शोधकार्य के दौरान रामशरण भाई से कई मर्तबा मिला और उन्हें सुना। एक झोले में एक मोटी बिनाई का कुर्ता-धोती, एक पुरानी डायरी और एक-दो और सामान। उनके साथ उनका जीवन इतना ही सरल और बोझरहित था।
जहां तक मुझे याद है, अपने जीवन में वे दर्जनों संस्थाओं के सैकड़ों अभिक्रमों से जुड़े पर कभी वेतनभोगी नहीं बने। जीवन को जीने का यह कबीराई अंदाज ही था, जो उन्हें आजीवन तत्पर और  कार्यरत तो बनाए रखा पर संलग्नता का मोह कहीं से भी बांध न सका, न परिवार से और न ही संस्था। तभी तो उनके कंठ से जो स्वर फूटे, वे न सिर्फ धुले हुए थे बल्कि सच्चे भी थे। शादी-ब्याह में दिखावे के बढ़े चलन पर उनका गीत याद आता है-
दुई हाथी के मांगै छै दाम
बेचै छै कोखी के बेटा के चाम...
बड़का कहाबै छै कलजुग के कसाई
बाप कहाबै छै कलजुग के कसाई...
एमफिल के लिए चूंकि मैं 'जयप्रकाश आंदोलन और हिंदी कविता' पर काम कर रहा था, लिहाजा आंदोलन के दौर के कई ऐसे लोगों से मिलने का मौका मिला, जो रामशरण भाई जैसे तो पूरी तरह नहीं, पर थे उनके ही समगोत्रीय। सर्वोदय-समाजवादी आंदोलन में क्रांति गीतों की भूमिका कार्यकर्ता तैयार करने में सबसे जरूरी और कारगर रही है। 'जय हो...' और  'चक दे इंडिया... ' गाकर जो तरुणाई जागती है, उसका 'फेसबुक' कभी भी इतना विश्वसनीय, दृढ़ और जुझारू नहीं हो सकता, जितना किसी आंदोलन की आंच को बनाए और जिलाए रखने के लिए जरूरी है।
दरअसल, रामचंद्र शुक्ल की शब्दावली में कहें तो 'लोक कल्याण' की 'परंपरा'  या तो आज कहीं पीछे छूट गई है या फिर बदले दौर में इसकी दरकार को ही खारिज मान लिया गया है।  देश में जन गायक और लोक गायक की ऐसी परंपरा का अब सर्वथा अभाव दिखता है। दक्षिण भारत में एक स्वर गदर का सुनाई पड़ता है, जो अपनी सांगठनिक और वैचारिक प्रतिबद्धताओं के कारण जन की बजाय कैडर की आवाज ज्यादा  लगती  है।
अन्ना के जंतर मंतर पर चले अनशन के दौरान भी या तो देशप्रेम के फिल्मी गाने बजे या फिर गिटार पर कुछ धुन...आंदोलन का जन चेहरा जन औजारों से ही गढ़ा जा सकता है। रामशरण भाई जैसे जन गायक जिन औजारों से काम करते थे, आज न वैसे हाथ रहे...और न ही ऐसे  हाथों को हुनरमंद करने वाले हालात।


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कविता का आंदोलन : आंदोलन की कविता

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

'सत्य' भी हो यह रिकार्ड 'तथ्य'


आंकड़े तथ्य होते हैं और तथ्य तात्कालिक। रही सत्य की बात तो इसके पीछे तथ्य इतना ही है कि इसका आधार और सार दोनों सार्वकालिक, सार्वकालिक और कल्याणकारी होते हैं। बहरहाल, बात उस तथ्य की जो आंकड़े की शक्ल में एक बार फिर हमारे सामने आया है। सरकार खुश है बहुत यह घोषणा करते हुए कि वर्ष 2010-11 के बीच खाद्यान का रिकार्ड उत्पादन होगा। अगर यह अनुमान अचूक तथ्यगत आधारों पर है तो इसका सकारात्मक असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी आने वाले हफ्ते-महीनों में दिखना शुरू हो जाएगा।
एक तरफ जहां खाद्य मुद्रास्फीति की दर गिरने की संभावना जताई जा रही है, वहीं दूसरी तरफ खाद्य सुरक्षा बिल जैसे अटके मामलों पर सरकारी कदम अब तेजी से बढ़ेंगे, यह उम्मीद भी की जा रही है। पर ये सारी स्थितियां अनुमानित हैं, अभी इन्हें यथार्थ होना है। जहां तक अनाज उत्पादन में स्वावलंबी होने की बात है तो ये स्थिति देश के लिए नई नहीं है। हरित क्रांति के बाद मौसम की जब-तब की बेरुखी को छोड़ दें तो किसानों की मेहनत और पुरुषार्थ हमेशा रंग लाई है। हां, यह जरूर है कि अब हमारा स्वावलंबन रिकार्ड उपलब्धि का आंकड़ा दर्ज करा रहा है।
2010-11 के जुलाई से जून के बीच  23.58 करोड़ टन का अनुमानित खाद्यान्न उत्पादन, ऐसा ही एक रिकार्ड है। इससे पहले देश में 2008-09 में सबसे ज्यादा 23.44 लाख टन खाद्यान का उत्पादन हुआ था। बीच के दो साल में मौसम की मार से अनाज उत्पादन गिरा, सरकारी तर्क यही है और सरकार के बाहर भी इस तर्क पर तकरीबन सहमति है। बीते दो सालों में खाने-पीने की चीजों की महंगाई का रोना कमोबेश आम जनता रोती रही है। बीते 19 मार्च को समाप्त हुए सप्ताह में भी जो खाद्य मुद्रास्फीति की दर रिकार्ड की गई है, वह 9.5 फीसद है। जाहिर है महंगाई का बोझ कुछ कम हुआ है पर अब भी यह सामान्य दर से ज्यादा है। ऐसे में अगर खाने-पीने की चीजें महंगी होती हैं तो सरकार खाद्यान की कमी या उसके वितरण में गड़बड़ी का बहाना आसानी से नहीं बना पाएगी।
साफ है कि आने वाले दिनों में यह बहुत कुछ सरकारी प्रयासों पर ही निर्भर करेगा कि वह रिकार्ड खाद्यान्न उत्पादन को आम उपलब्धता के रूप में किस तरह तब्दील कर पाएगी। रही बात खाद्य सुरक्षा बिल का तो यह मुद्दा सरकार के एजेंडे में तो जरूर लगातार टंगा हुआ है पर अब भी इसका एक असरकारी कदम के रूप में क्रियान्वयन बाकी है। अनाज उत्पादन में स्वाबलंबी होना और रिकार्ड उपलब्धि की तरफ बढ़ना सरकार को इस दिशा में भी फौरी कार्रवाई के लिए अगर प्रेरित करता है तो यह एक आदर्श स्थिति होगी। पर दुर्भाग्य से खाद्य सुरक्षा बिल के लटकने के पीछे मूल कारण अनाज की उपल्बधता की बजाय वह सरकारी तंत्र है, जो आज तक यह तय ही नहीं कर पाया कि गरीबी का स्तर तय करने का मान्य पैमाना क्या हो और इसके तहत लाभान्वितों की अंतिम संख्या कितनी मानी जाए।
सरकार और राज्य आज तक इस बात पर भिड़ रहे हैं कि बीपीएल परिवारों की सही संख्या क्या है। राज्य ज्यादा केंद्रीय अनुदान की चक्कर में इसे बढ़ाकर पेश करते हैं तो केंद्र के लिए यह मानना नाक कटाने जैसा होता है कि उसके लाख प्रयासों के बावजूद देश में तंगहालों की गिनती बढ़ी है। दरअसल आंकड़ों में 'अनर्थ' को 'अर्थपूर्ण' दिखाने की जुगत अभी इस बात के लिए तैयार ही नहीं है कि सारी आर्थिक सफलता और उन्नति के बीच समाज का एक बड़ा तबका आज भी अनाज, अक्षर और आवास के लिए मोहताज है। रिकार्ड अनाज उत्पादन का सार्थक मतलब तभी है जब ये मोहताजी हमारा मुंह न चिढ़ाए। सरकार का रिकार्ड इस मोहताजी के खिलाफ भी बने तो फिर उसे आंकड़ों के कसीदे अपनी तरफ से पढ़ने की शायद जरूरत भी न पड़े। क्योंकि तब उसकी सफलता 'तथ्य' को लांघकर 'सत्य' हो जाएगी।