LATEST:


रविवार, 10 अप्रैल 2011

जन आंदोलनों का जंतर मंतर

जब इस देश के नेताओं में
लूट प्रवृति आम हो गई...
पूछ रही है चंबल घाटी
मैं ही क्यों बदनाम हो गई...

यह गीत बिहार के वरिष्ठ सर्वोदयी साथी रामशरण भाई का है। इसे वे जेपी आंदोलन और बाद के दिनों में गाते थे। डफली के साथ झूम-झूमकर जब वे गाते थे...तो लोग बस उनसे जुड़ते चले जाते थे। उनके इस जादू का साक्षी बिनोवा-जेपी के दौर के लाखों-हजारों लोग से लेकर जेएनयू कैंपस तक रहा है। अपने तकरीबन दस साल के सामाजिक जीवन और शोधकार्य के दौरान रामशरण भाई से कई मर्तबा मिला और उन्हें सुना। एक झोले में एक मोटी बिनाई का कुर्ता-धोती, एक पुरानी डायरी और एक-दो और सामान। उनके साथ उनका जीवन इतना ही सरल और बोझरहित था।
जहां तक मुझे याद है, अपने जीवन में वे दर्जनों संस्थाओं के सैकड़ों अभिक्रमों से जुड़े पर कभी वेतनभोगी नहीं बने। जीवन को जीने का यह कबीराई अंदाज ही था, जो उन्हें आजीवन तत्पर और  कार्यरत तो बनाए रखा पर संलग्नता का मोह कहीं से भी बांध न सका, न परिवार से और न ही संस्था। तभी तो उनके कंठ से जो स्वर फूटे, वे न सिर्फ धुले हुए थे बल्कि सच्चे भी थे। शादी-ब्याह में दिखावे के बढ़े चलन पर उनका गीत याद आता है-
दुई हाथी के मांगै छै दाम
बेचै छै कोखी के बेटा के चाम...
बड़का कहाबै छै कलजुग के कसाई
बाप कहाबै छै कलजुग के कसाई...
एमफिल के लिए चूंकि मैं 'जयप्रकाश आंदोलन और हिंदी कविता' पर काम कर रहा था, लिहाजा आंदोलन के दौर के कई ऐसे लोगों से मिलने का मौका मिला, जो रामशरण भाई जैसे तो पूरी तरह नहीं, पर थे उनके ही समगोत्रीय। सर्वोदय-समाजवादी आंदोलन में क्रांति गीतों की भूमिका कार्यकर्ता तैयार करने में सबसे जरूरी और कारगर रही है। 'जय हो...' और  'चक दे इंडिया... ' गाकर जो तरुणाई जागती है, उसका 'फेसबुक' कभी भी इतना विश्वसनीय, दृढ़ और जुझारू नहीं हो सकता, जितना किसी आंदोलन की आंच को बनाए और जिलाए रखने के लिए जरूरी है।
दरअसल, रामचंद्र शुक्ल की शब्दावली में कहें तो 'लोक कल्याण' की 'परंपरा'  या तो आज कहीं पीछे छूट गई है या फिर बदले दौर में इसकी दरकार को ही खारिज मान लिया गया है।  देश में जन गायक और लोक गायक की ऐसी परंपरा का अब सर्वथा अभाव दिखता है। दक्षिण भारत में एक स्वर गदर का सुनाई पड़ता है, जो अपनी सांगठनिक और वैचारिक प्रतिबद्धताओं के कारण जन की बजाय कैडर की आवाज ज्यादा  लगती  है।
अन्ना के जंतर मंतर पर चले अनशन के दौरान भी या तो देशप्रेम के फिल्मी गाने बजे या फिर गिटार पर कुछ धुन...आंदोलन का जन चेहरा जन औजारों से ही गढ़ा जा सकता है। रामशरण भाई जैसे जन गायक जिन औजारों से काम करते थे, आज न वैसे हाथ रहे...और न ही ऐसे  हाथों को हुनरमंद करने वाले हालात।


इसे भी पढ़ें...
कविता का आंदोलन : आंदोलन की कविता

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें