सोमवार, 17 जून 2013

चलो अमेरिका

1999 में पीयूष झा की एक फिल्म आई थी चलो अमेरिका। इसमें वह पूरी मानसिकता चित्रित की गई थी कि आज के भारतीय युवाओं के लिए अमेरिका और वहां जाने का मतलब क्या है। यही नहीं अगर वह अमेरिका की धरती पर पैर नहीं रखता है तो कैसे उसके जीवन के सारे अरमान बिखर जाते हैं। जिंदगी की बड़ी से बड़ी जद्दोजहद से बड़ा है अमेरिका जाने का वीजा हासिल करना। फिल्म के तीन प्रमुख किरदार निभा रहे निठल्ले नौजवानों की भी जिंदगी का यही सच है। उन्हें साफ लगता है कि अगर वे अमेरिका नहीं पहुंच पाते हैं तो उनकी जिंदगी का कोई मतलब नहीं है। अमेरिका से झंडे से लेकर वहां सबसे ज्यादा बिकने वाले मारलबोरो सिगरेट की बात हो, ये सब इन युवकों को आकर्षित करते हैं।
फिल्म चूंकि हास्य प्रधान है इसलिए फिल्मकार पीयूष ने कई जगहों पर चुहलबाजी के बीच यह दिखाया गया है कि अमेरिका महज एक देश नहीं बल्कि एक ब्रांड भी है, जिसको लेकर युवाओं में एक जुनून है। तभी तो फिल्म में युवा अमेरिकी झंडे की प्रिंटिंग वाले रुमाल रखते हैं। और तो और चूंकि फिल्म में इन युवाओं के पास पैसे नहीं होते हैं इसलिए वे तमाम तरीके अपनाकर अपने को अमेरिकापरस्त दिखाने की कोशिश करते हैं। ऐसी ही एक कोशिश में वे मारलबोरो सिगरेट के खाली डिब्बे में देसी सिगरेट रखकर पीते हैं।
इस फिल्म को बने एक दशक से ज्यादा का समय बीत गया है। क्लिंटन के बाद अब ओबामा में लोग ग्लोबल लीडर की छवि देख रहे हैं, उनके चित्रों वाले टीशर्ट पहन रहे हैं, घरों में उनकेे पोस्टर चिपका रहे हैं, बाजार से उनकी जीवनी खरीदकर पढ़ रहे हैं। इस दौरान अगर नहीं कुछ बदला है तो वह है भारतीय युवाओं में अमेरिका के प्रति बढ़ा लगाव। चेतन भगत की शब्दावली में कहें तो अमेरिका उनके लिए ड्रीम और डेस्टिनेशन एक साथ है। हालांकि जब हम ऐसा कहते हैं तो हमारी आंखों के सामने वे युवा होते हैं जो शहरी हैं और जिन्होंने भारत में ग्लोबल विकास के दौर में अपनी आंखें खोली हैं। 

गांधी नहीं जाना चाहते थे अमेरिका


यह एक अजीब बात है कि महात्मा गांधी कभी अमेरिका नहीं गए। यही नहीं अपने वहां कभी न जाने के फैसले को लेकर उन्होंने अमेरिका को लेकर काफी तल्ख टिप्पणी भी की था। अमेरिका ने जब दूसरे विश्व युद्ध के दौरान 1945 में जापान पर एटम बम बरसाया तो मानवता के खिलाफ इस क्रूरतम कार्रवाई को लेकर लोग उनकी प्रतिक्रिया जानना चाहते थे। खासतौर पर उनके कई अमेरिकी समर्थकों ने उनसे बार-बार पूछा कि अमेरिकी मानसिकता को लेकर वे विश्व को कोई संदेश क्यों नहीं देते।
महात्मा से ऐसे प्रश्न करने का मकसद था कि दुनिया भर में एक संदेश जाए कि अहिंसा का यह पुजारी अमेरिका के इस कृत्य की किन शब्दों में भर्त्सना करता है। लोगों को आशा थी कि कि गांधी अगर ऐसा कुछ कहेंगे तो दुनिया में हिंसा के खिलाफ एक जागरूकता तो पैदा भी होगी अमेरिका में भी लोग हिंसक कृत्यों के खिलाफ एक मानसिकता बनेगी। पर गांधी ने इससे ज्यादा कुछ नहीं कहा कि वे इस जीवन में कभी अमेरिका नहीं जाना चाहेंगे। यह बात उन्होंने किस सख्त लहजे में कही इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अमेरिकी हुक्मरानों के साथ अमेरिकियों के लिए भी यह कहा कि ये पैसे को भगवान की तरह पूजने वाले लोग हैं।
लिहाजा, ऐसे देश में जाने और वहां के लोगों से संवाद करने का वे कभी सोचते भी नहीं है। अपनी इस टिप्पणी के साथ गांधी यह भी जोड़ते हैं कि शायद अमेरिका को लेकर उनकी राय और भावनाओं को दुनिया अभी नहीं समझे। शायद गांधी ने आज के उस दौर की कल्पना तभी कर ली थी जब विकास और आधुनिकता की सारी समझ अमेरिकी रंग में रंगी दिखती है। आज अमेरिका पढ़ाई से लेकर नौकरी और मौज-मस्ती के लिए एक फाइनल डेस्टिनेशन की तरहभारत समेत दुनिया के और मुल्कों में देखा जा रहा है। गांधी की बात अमेरिका को लेकर हमें अपनी धारणा बनाने से भले न रोक पाए, पर सचेत तो वह करता ही है कि हमारी हिमायत जिस तरफ झुकी है, वह देश और उससे जुड़ी सोच क्या कल्याणकारी है।

रविवार, 3 मार्च 2013

खूनी हिमाकत और घाटी में पंचायत


अभी यासीन मलिक चर्चा में थे। उन्होंने घाटी की स्थिति को लेकर अपने विवादास्पद से ज्यादा संदेहास्पद स्टैंड को दुनिया के सामने रखने के लिए 'पाक धरती' चुनी। इस पाक सरजमीं पर उन्हें हाफिज सइद तक की मौजूदगी नागवार न गुजरी। भारत सरकार इस सबके बावजूद थोड़ी इत्मिनान में है तो उसकी वजह है। दरअसल जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र बहाल है। वहां पंचायत से लेकर विधानसभा तक चुने हुए प्रतिनिधि शासन व्यवस्था को संभाल रहे हैं। यह बात भारत दुनिया के किसी भी मंच पर जब कहता है तो कश्मीर समस्या को लेकर तमाम दुष्प्रचारों का वह एक तरह से मुंहतोड़ जवाब दे रहा होता है। यह जवाब खासतौर पर पाकिस्तान और उससे सुर मिलाकर चलने वाले कश्मीरी अलगवादियों को कभी भी सोहाया नहीं। 
बड़े धमाकों और कई दिनों तक चलने वाले हड़तालों के दिन अब जम्मू-कश्मीर में लद चुके हैं। जाहिर है कि इससे नफरत और टूट का खेल खेलने वालों का मनोबल टूटा है। हताशा में उनकी की गई 'पत्थरबाजी' का भी डर वहां काम नहीं कर रहा है। नतीजतन, अमन के दुश्मनों ने पिछले एक-दो सालों में अपनी रणनीति बदल ली है। उन्हें साफ लग रहा है कि सूबे में अपना प्रभाव अगर बनाए रखना है तो उन्हें वहां आए लोकतांत्रिक स्थायीत्व को डिगाना होगा। इसके लिए उन्होंने स्थानीय स्तर पर लोकतांत्रिक ढांचे को तहस-नहस करने का रास्ता चुना।
वैसे इस मंसूबे को पूरा होना उनके लिए बड़ी चुनौती है। क्योंकि सूबे में जब पंचायत चुनाव हुए थे तो मतदान का फीसद 80 से ज्यादा था। साफ है कि वहां लोकतंत्र कोई थोपी हुई स्थिति नहीं बल्कि एक आस्थापूर्ण चुनाव है। अब जबकि मौत का डर दिखाकर पंचायत प्रतिनिधियों को जबरिया इस्तीफा देने के लिए वहां मजबूर किया जा रहा है, तो इसे आतंकी आकाओं का दुस्साहस नहीं बल्कि यह उनकी कुंठा का ज्यादा बड़ा प्रमाण है।
घाटी में पंच-सरपंच मिलाकर करीब 33 हजार पंचायत प्रतिनिधि हैं। इनमें करीब 400 ने डर से इस्तीफा दे दिया है। कुछ लोग इस संख्या को 600 के करीब बताते हैं। इसी तरह दर्जनों पंचायत प्रतिनिधियों को या तो मार डाला गया है या वे आतंकी हिंसा में घायल हुए हैं। बारामूला जिले के क्रीरी क्षेत्र में एक सरपंच की गोलीबारी में मौत, इस तरह की हिंसा की ताजा घटना है। बावजूद इस हिंसक सचाई के नहीं लगता कि वहां लोकतंत्र की विकेंद्रित ताकत को समाप्त करना इतना आसान होगा।
अलबत्ता, यह जरूर है कि लोकतंत्र की जड़ों पर हिंसक प्रहार को लेकर राज्य सरकार को निश्चित रूप से प्रभावी कदम उठाने चाहिए। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को इस बाबत चिंता से कई बार अगवगत भी कराया गया है। मुख्यमंत्री ने खुद इस चुनौती को गंभीरता से कबूला भी है। राज्य सरकार ने अपनी तरफ से इस दौरान जरूर कुछ कदम भी उठाए होंगे। पर पंचायत प्रतिनिधियों की जानें अगर अब भी जा रही हैं और उनके इस्तीफे का सिलसिला अब भी रुका नहीं है, तो इसका मतलब यही है कि उमर सरकार की इसे रोकने की कोशिश असफल रही है। अच्छा होगा कि राज्य सरकार इस मुद्दे पर एकल पहल के बजाय एक राजनीतिक सर्वसम्मति के साथ कोई पहल करे।

रविवार, 20 जनवरी 2013

मीडिया से डरता है ड्रैगन


ज्यादा दिन नहीं हुए हैं, जब चीन खुली नसीहत दे रहा था कि आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में उसके विकास के डग भारत से काफी आगे हैं। एक सरकारी चीनी अखबार ने ये बातें नई दिल्ली में गैंगरेप की घटना के संदर्भ में कही थी। चीन की इस समझ पर सोशल मीडिया में इतना बवाल मचा कि वहां की सरकार को ई-विचार स्रोतों पर ताला जड़ने पर मजबूर होना पड़ा। यह कोई नई या आपवादिक स्थिति नहीं है। चीन के विकास मॉडल की हम सराहना करें या नहीं, इतनी बात तो आज चीन के अंदर-बाहर दोनों जगह समझी जा रही है कि चीन आज कहीं न कहीं उसी मुहाने पर खड़ा है, जहां दो दशक पहले सोवियत संघ खड़ा था। यह चीन और सोवियत संघ की तुलना नहीं है, बल्कि इस साम्य को रेखांकित भर करना है कि देश में लोकतांत्रिक सरोकारों को लंबे समय तक कुचलते रहने से स्थिति कैसे विस्फोटक हो जाती है।
चीन में नए नेतृत्व से जो उम्मीद थी, वह बहुत जल्द हताशा में बदलती दिख रही है। सीपीसी के नए महासचिव जिनपिंग ने इस चिंता को जरूर कबूला है कि देश में जहां भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हुई हैं, वहीं अमीर-गरीब के बीच की खाई खतरनाक रूप से बढ़ गई है। सत्तारूढ़ चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी को लेकर भी उन्होंने माना कि संगठन और कार्यकर्ता जनता से काफी कट गए हैं। बावजूद इस कबूलनामे के लगता नहीं कि चीन में सरकारी स्तर पर कोई आत्ममंथन या बदलाव की प्रक्रिया चल रही है। वहां के एक साप्ताहिक अखबार ने जब सरकारी नियंत्रण का विरोध किया तो  सत्तारूढ़ सीपीसी की तरफ से बयान आया, 'पार्टी का चीन के मीडिया पर संपूर्ण नियंत्रण है। यह बुनियादी सिद्धांत अपनी जगह अटल है।'
मीडिया पर सरकारी सेंसरशिप के खिलाफ न सिर्फ चीन में पत्रकार लामबंद हैं बल्कि उनके इस विरोध को दुनिया भर में समर्थन भी मिल रहा है। अमेरिकी विदेश विभाग की प्रवक्ता विक्टोरिया नूलैंड द्वारा चीनी और चीन में काम करने वाले विदेशी पत्रकारों की स्वतंत्रता की मांग का समर्थन करने से तो वहां की सरकार और तिलमिला गई है। उसने ऐसे किसी बाहरी समर्थन या अभियान को देश के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप करा दिया है।
साफ है कि चीन में पार्टी विचार और अनुशासन के नाम पर दमनात्मक नीतियां जारी हैं। ग्लोबल दौर में लोकतांत्रिक सरोकारों की जमीन को जिस तरह उर्वर बना दिया है, उसमें ऐसी दमनात्मक व्यवस्था बदलाव की आंधी से बहुत लंबे समय तक महफूज नहीं रह सकती। यह चेतावनी अपनी सरकार को चीन के 73 चोटी के विद्वानों ने हाल में ही दी है। बावजूद इसके स्थिति नहीं सुधरी तो 1989 के थ्यानमन विद्रोह जैसा दृश्य चीन में कभी भी प्रकट हो सकती है।